Mohacurottara Sanskrit Devanagari: Unterschied zwischen den Versionen
Die Seite wurde neu angelegt: „'''Mohacurottara Sanskrit Devanagari''' (मोहचूरोत्तर, auch मोहचूडोत्तर) erschließt eine shaivische Lehre, in der äußere Verehrung und innere Sammlung einander durchdringen. Lingam und Tempel werden zu Orten der Gegenwart Shivas; Shakti erscheint als tragende und wirkende Kraft. Der Sanskritwortlaut verbindet diese spirituelle Sicht mit ausführlichen Anweisungen zu Gestaltung, Weihe und Mantra…“ |
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'''१''' ओं नमः शिवाय || | '''१''' ओं नमः शिवाय || | ||
'''२''' स्कन्दं ब्रह्मविदं शान्तं सर्वज्ञपदसंस्थितम् |<br> | '''२''' स्कन्दं ब्रह्मविदं शान्तं सर्वज्ञपदसंस्थितम् |<br>प्रणिपत्य हरिः प्राह जानुभ्यामवनौ स्थितः || | ||
'''३''' शक्र उवाच || | '''३''' शक्र उवाच || | ||
'''४''' त्वत्प्रसादात् परिज्ञातम् मोहचूडं मया प्रभो |<br> | '''४''' त्वत्प्रसादात् परिज्ञातम् मोहचूडं मया प्रभो |<br>तत्रासूचि त्वया लिङ्गं प्रासादाश्च समासतः || | ||
'''५''' समासेन यतः प्रोक्तन्तस्मान्नैवावधारितम् |<br> | '''५''' समासेन यतः प्रोक्तन्तस्मान्नैवावधारितम् |<br>मोहचूरोत्तरं शास्त्रन्तदर्थं वक्तुमर्हसि || | ||
'''६''' इति तस्य गिरं श्रुत्वा जगाद हिमजासुतः |<br> | '''६''' इति तस्य गिरं श्रुत्वा जगाद हिमजासुतः |<br>लिङ्गादिकं प्रवक्ष्यामि शृणु तस्माच्छतक्रतो || | ||
'''७''' देवासुरनरा यक्षा मुनयो वीतमत्सराः |<br> | '''७''' देवासुरनरा यक्षा मुनयो वीतमत्सराः |<br>लिङ्गाराधनतः सिद्धागता मुक्तिञ्च साश्वतीम् || | ||
'''८''' भुक्तिमुक्तिपरिप्राप्तिकारणं वचनन्ततः |<br> | '''८''' भुक्तिमुक्तिपरिप्राप्तिकारणं वचनन्ततः |<br>श्रुत्वां तद्विविजिज्ञासुः साधको वक्तुमुद्यतः || | ||
'''९''' किं स्वरूपं भवेल्लिङ्गं विधिभेदाश्च लिङ्गकाः |<br> | '''९''' किं स्वरूपं भवेल्लिङ्गं विधिभेदाश्च लिङ्गकाः |<br>आचार्यवनयागञ्च दारुपाषाणलक्षणं || | ||
'''१०''' लिङ्गलक्षणमप्यन्तं प्रतिमालक्षणन्तथा |<br> | '''१०''' लिङ्गलक्षणमप्यन्तं प्रतिमालक्षणन्तथा |<br>पिण्डिकालक्षणं ब्रूहि धरित्रीलक्षणं प्रभो || | ||
'''११''' परिग्रहो यथा तस्या वास्तुलक्षणपूजने |<br> | '''११''' परिग्रहो यथा तस्या वास्तुलक्षणपूजने |<br>शिलान्यासं पीठबन्धं प्रासादानाञ्च लक्षणम् || | ||
'''१२''' मण्डपानपि मे ब्रूहि स्नान द्रव्यं समासतः |<br> | '''१२''' मण्डपानपि मे ब्रूहि स्नान द्रव्यं समासतः |<br>वेदीप्रमाणमुन्मानं कुण्डलक्षण संयुतम् || | ||
'''१३''' एतत् सर्वं समाचक्ष्व प्रसादादम्विकात्मज |<br> | '''१३''' एतत् सर्वं समाचक्ष्व प्रसादादम्विकात्मज |<br>यन्न पृष्टम् मया नाथ बुद्धिहीनान्तरात्मना || | ||
'''१४''' तत्सर्वं मम गाङ्गेय प्रसादाद् वक्तुमर्हसि |<br> | '''१४''' तत्सर्वं मम गाङ्गेय प्रसादाद् वक्तुमर्हसि |<br>श्रीस्कन्द उवाच || | ||
'''१५''' अक्ष्ममृल्लोहमुद्दारुरत्नद्रव्यादि सम्भवम् |<br> | '''१५''' अक्ष्ममृल्लोहमुद्दारुरत्नद्रव्यादि सम्भवम् |<br>विधिना हृत्प्रतिष्ठं स्याल्लिङ्गं भुक्तिविमुक्तिदम् || | ||
'''१६''' तत् सिद्ध्यर्थं व्रजेद् विद्वान् देशिकः शिल्पिभिः सह |<br> | '''१६''' तत् सिद्ध्यर्थं व्रजेद् विद्वान् देशिकः शिल्पिभिः सह |<br>भूधरं विपिनञ्चैव पुण्यक्षेत्रमथापि वा || | ||
'''१७''' चीर्णविद्याव्रतो मन्त्री ज्ञानवान् सुसमाहितः |<br> | '''१७''' चीर्णविद्याव्रतो मन्त्री ज्ञानवान् सुसमाहितः |<br>भस्मनिष्ठो यतिः ख्यातस्तद् विना भौतिको वरः || | ||
'''१८''' सुतिथौ वारनक्षत्रेसु लग्ने करणान्विते |<br> | '''१८''' सुतिथौ वारनक्षत्रेसु लग्ने करणान्विते |<br>अस्त्रं संस्मृत्य मेधावी वनयात्रां समारभेत् || | ||
'''१९''' शिलां शुभां समासाद्य तस्याः सौम्ये यजेच्छिवम् |<br> | '''१९''' शिलां शुभां समासाद्य तस्याः सौम्ये यजेच्छिवम् |<br>हुताशनं ततो विद्वान् हरेद् भूतबलिं बहिः || | ||
'''२०''' असिना प्रोक्ष्य पाषाणं वर्मणा वेष्ठ्य पूजयेत् |<br> | '''२०''' असिना प्रोक्ष्य पाषाणं वर्मणा वेष्ठ्य पूजयेत् |<br>तेनैव प्रोक्षयेत् तत्र शिल्पिनं सुकुलोद्भवम् || | ||
'''२१''' सहायानपि संप्रोक्ष्य कुठारं टङ्कमुद्गरान् |<br> | '''२१''' सहायानपि संप्रोक्ष्य कुठारं टङ्कमुद्गरान् |<br>पूजयेदस्त्र राजेन स्वपेन्मेध्यासनस्ततः || | ||
'''२२''' भुक्तिमुक्तिप्रसिद्ध्यर्थं पूर्व व * सिरा गुरुः |<br> | '''२२''' भुक्तिमुक्तिप्रसिद्ध्यर्थं पूर्व व * सिरा गुरुः |<br>ध्यात्वा महेश्वरं देवं स्वप्नमन्त्रञ्जपन् बुधः || | ||
'''२३''' स्वप्नमन्त्रं प्रवक्ष्यामि साम्प्रतन्ते शचीपते |<br> | '''२३''' स्वप्नमन्त्रं प्रवक्ष्यामि साम्प्रतन्ते शचीपते |<br>वाग्विशुद्धं महावीजं नेत्रमण्डलभेदितम् || | ||
'''२४''' सीतयं भेदयेत् पश्चा * * * * पुरन्दर |<br> | '''२४''' सीतयं भेदयेत् पश्चा * * * * पुरन्दर |<br>छेदनेनाहतं कुर्याद् भूतवीजं सुरेश्वर || | ||
'''२५''' ब्रह्मपूर्वाहतं वीजन्निश्चलन्तदनन्तरम् |<br> | '''२५''' ब्रह्मपूर्वाहतं वीजन्निश्चलन्तदनन्तरम् |<br>वृकोदरयुतं भद्रं वीजं ताराधिपन्ततः || | ||
'''२६''' शुद्धं पयोधरं पश्चाज्ज्योस्नान्तसृष्टियोजितम् |<br> | '''२६''' शुद्धं पयोधरं पश्चाज्ज्योस्नान्तसृष्टियोजितम् |<br>अभिन्नं भीषणं साधो यकारञ्छेदनीहतम् || | ||
'''२७''' स्वाहान्तः प्रणवादिश्च प्रोक्तः स्वप्नाधिपो मनुः |<br> | '''२७''' स्वाहान्तः प्रणवादिश्च प्रोक्तः स्वप्नाधिपो मनुः |<br>सुस्वप्नं कथयेदिष्टे दुःस्वप्नेः शान्तिमाचरेत् || | ||
'''२८''' प्रातः संपूज्य देवेशं शिलामाकोटयेत् त्रिधाः |<br> | '''२८''' प्रातः संपूज्य देवेशं शिलामाकोटयेत् त्रिधाः |<br>रुद्राशाद् ब्रह्मणो वापि भोगमोक्षाभिकांक्षया || | ||
'''२९''' शिलां रथे समारोप्य सिद्धयात्रामुपक्रमेत् |<br> | '''२९''' शिलां रथे समारोप्य सिद्धयात्रामुपक्रमेत् |<br>अनेनैव विधानेन गृह्णीयात् तत् संभवम् || | ||
'''३०''' अधुना कारयेल्लिङ्गं व्यक्ताव्यक्तोभयात्मकम् |<br> | '''३०''' अधुना कारयेल्लिङ्गं व्यक्ताव्यक्तोभयात्मकम् |<br>ज्येष्ठादि क्रमभेदेन कर्तुर्वित्तानुसारतः || | ||
'''Das innere und das äußere Lingam''' | '''Das innere und das äußere Lingam''' | ||
'''३१''' निस्कलं सकलञ्चैव तृतीयं सकलाकलम् |<br> | '''३१''' निस्कलं सकलञ्चैव तृतीयं सकलाकलम् |<br>लिङ्गव्यूहं समाख्यातञ्चित्तव्यूहात् पुरन्दर || | ||
'''३२''' उच्छृसन्तं परन्तत्वन्न च केनापि खण्डितम् |<br> | '''३२''' उच्छृसन्तं परन्तत्वन्न च केनापि खण्डितम् |<br>तल्लिङ्गं सकलं प्रोक्तं नादरूपं हृदं व्रजे || | ||
'''३३''' चैतन्यं चित्तया युक्तं चित्तेनैव सहैकतः |<br> | '''३३''' चैतन्यं चित्तया युक्तं चित्तेनैव सहैकतः |<br>बोधरूपं यदा याति तदा लिङ्गं परापरम् || | ||
'''३४''' बोधरूपं यदा शान्ते निस्तरङ्गे विलीयते |<br> | '''३४''' बोधरूपं यदा शान्ते निस्तरङ्गे विलीयते |<br>तदा लिङ्गं परं प्रोक्तं मोक्षदन्तदुदाहृतम् || | ||
'''३५''' एतदाभ्यन्तरं लिङ्गं वाह्यमन्यत् प्रचक्षते |<br> | '''३५''' एतदाभ्यन्तरं लिङ्गं वाह्यमन्यत् प्रचक्षते |<br>व्यक्तिस्थान तया भाक्ते तच्छन्दः संप्रवर्तते || | ||
'''३६''' शिलामृद्दारुलोहोत्थं तुष्ठिग्रहरसानलैः |<br> | '''३६''' शिलामृद्दारुलोहोत्थं तुष्ठिग्रहरसानलैः |<br>ज्येष्ठज्येष्ठं करैर्लिङ्गं चतुर्द्रव्यविभेदतः || | ||
'''३७''' तत् तृतीयांश सन्त्यागान् मध्यमस्योत्तमं भवेत् |<br> | '''३७''' तत् तृतीयांश सन्त्यागान् मध्यमस्योत्तमं भवेत् |<br>कन्यसाग्र्यं दलादस्य त्रिधा लिङ्गमुदाहृतम् || | ||
'''३८''' भिद्यन्ते स्वस्वरामांसैर्नवलिङ्गं यथा भवेत् |<br> | '''३८''' भिद्यन्ते स्वस्वरामांसैर्नवलिङ्गं यथा भवेत् |<br>ज्येष्ठादिकन्यसान्तानि लिङ्गानि कथितानि ते || | ||
'''३९''' नागभक्ते च लिङ्गार्द्धे रसवाणकृतैर्भवेत् |<br> | '''३९''' नागभक्ते च लिङ्गार्द्धे रसवाणकृतैर्भवेत् |<br>आ * * * ? सुर ज्येष्ठविष्कम्भः सर्वतः समे || | ||
'''४०''' सन्त्रिभागैर्भवेद् दक्षैर्ब्रह्मांशश्चतुरस्रकः |<br> | '''४०''' सन्त्रिभागैर्भवेद् दक्षैर्ब्रह्मांशश्चतुरस्रकः |<br>तत् कर्णार्द्धे तरस्यागान्मङ्गलास्त्रं शतक्रतो || | ||
'''४१''' मुनित्रयेण मध्यं स्यान्ध्रासस्तु करसंख्यया |<br> | '''४१''' मुनित्रयेण मध्यं स्यान्ध्रासस्तु करसंख्यया |<br>षोडशास्त्रमथैवं स्यात् समं पश्चात् प्रवर्त्तयेत् || | ||
'''४२''' लिङ्गमुक्तं शिरस्तस्य वक्षे सामान्यतो हरे |<br> | '''४२''' लिङ्गमुक्तं शिरस्तस्य वक्षे सामान्यतो हरे |<br>पुण्डरीकं विशालञ्च श्रीवत्सं शत्रुमर्दकम् || | ||
'''४३''' त्रपुषं कुक्कुयण्डञ्च खण्डचन्द्रं शचीपते |<br> | '''४३''' त्रपुषं कुक्कुयण्डञ्च खण्डचन्द्रं शचीपते |<br>इति सप्तशिरः प्रोक्तं वर्तनामधुना शृणु || | ||
'''४४''' अर्चाष्टांशे युगैर्भक्ते पुण्डरीकं तनुक्षयात् |<br> | '''४४''' अर्चाष्टांशे युगैर्भक्ते पुण्डरीकं तनुक्षयात् |<br>कर्णक्षयाद् विशालञ्च श्रीवत्सङ्गुणसंक्षयात् || | ||
'''४५''' कोणक्षयाद् विजानीयाच्चतुर्थं शत्रुमर्दकं |<br> | '''४५''' कोणक्षयाद् विजानीयाच्चतुर्थं शत्रुमर्दकं |<br>रसभक्ते क्षपादांशसांतनान् त्रपुषाकृति || | ||
'''४६''' श्रुत्यंशस्य परित्यागात् कुक्कुटाण्डम् भवेच्छिरः |<br> | '''४६''' श्रुत्यंशस्य परित्यागात् कुक्कुटाण्डम् भवेच्छिरः |<br>गुणभक्तेंशसन्त्यागाद् वालेन्दुः स्यात् परिस्फुटम् || | ||
'''४७''' व्यक्ताव्यक्तन्तथा कुर्यादेकत्रिश्चतुरास्यकम् |<br> | '''४७''' व्यक्ताव्यक्तन्तथा कुर्यादेकत्रिश्चतुरास्यकम् |<br>शक्तिभक्ते च रुद्राङ्गे वह्निभागादधः शिरः || | ||
'''४८''' ललाटन्नासिका वक्त्रं चिवुकादि पुरन्दर |<br> | '''४८''' ललाटन्नासिका वक्त्रं चिवुकादि पुरन्दर |<br>कल्पनीयं हरे सम्यक् लिङ्गविष्कम्भवाह्यतः || | ||
'''४९''' लिङ्गदैर्घ्यविकारांशं लिङ्गविस्तरवाह्यतः |<br> | '''४९''' लिङ्गदैर्घ्यविकारांशं लिङ्गविस्तरवाह्यतः |<br>चतुरास्ये चतुर्दिक्षु निर्गमाय प्रदापयेत् || | ||
'''५०''' भागान् प्रकल्प्य कुर्वीत रूपकं व्यक्तलिङ्गवत् |<br> | '''५०''' भागान् प्रकल्प्य कुर्वीत रूपकं व्यक्तलिङ्गवत् |<br>उपरिभागञ्च लिङ्गाभं मूलविष्कंभविस्तृतम् || | ||
'''५१''' भागाभ्यां मुकुटं कुर्याज्जटाबन्धान्वितं शुभम् |<br> | '''५१''' भागाभ्यां मुकुटं कुर्याज्जटाबन्धान्वितं शुभम् |<br>गुणास्य कारयेद् विद्वान् भवांशे रसभाजिते || | ||
'''५२''' भागखण्डभुजस्कन्धौ ऋत्वङ्गुलविनिःसृतौ |<br> | '''५२''' भागखण्डभुजस्कन्धौ ऋत्वङ्गुलविनिःसृतौ |<br>ग्रीवास्याद् रामभागो ना * *? मात् तदूर्ध्वतः || | ||
'''५३''' पादात् पादात् प्रकर्तव्यं मुकुटं पूर्वलक्षणम् |<br> | '''५३''' पादात् पादात् प्रकर्तव्यं मुकुटं पूर्वलक्षणम् |<br>लिङ्गदैर्घ्यार्द्धमुत्यंशे लिङ्गव्यासवहिष्कृतेः || | ||
'''५४''' कर्णनासाकपोलाघं तत्र सर्वम् प्रकल्पयेत् |<br> | '''५४''' कर्णनासाकपोलाघं तत्र सर्वम् प्रकल्पयेत् |<br>अथैकवक्त्रैके लिङ्गे भवांशे तु भवाजिते || | ||
'''५५''' अधोभागं द्विधा कुर्यात् पुनरर्द्धमधः स्थितम् |<br> | '''५५''' अधोभागं द्विधा कुर्यात् पुनरर्द्धमधः स्थितम् |<br>स्कन्धौ ग्रीवां च भागाभ्यां मध्ये सार्द्ध पुनर्युगैः || | ||
'''५६''' भागैकैकेन वक्त्रादि मस्तकान्तं विवर्तयेत् |<br> | '''५६''' भागैकैकेन वक्त्रादि मस्तकान्तं विवर्तयेत् |<br>तदूर्ध्वे तु गुणैर्भक्ते द्वाभ्यां मौलिं प्रकल्पयेत् || | ||
'''५७''' भागेनैव तु लिङ्गाभं वक्त्रनिर्गतिरुच्यते |<br> | '''५७''' भागेनैव तु लिङ्गाभं वक्त्रनिर्गतिरुच्यते |<br>लिङ्गदैर्घ्यार्कभागेन निर्गमः शुभकारकः || | ||
'''५८''' व्यक्ताव्यक्तं समुद्दिष्टमुभयार्थप्रसाधकम् |<br> | '''५८''' व्यक्ताव्यक्तं समुद्दिष्टमुभयार्थप्रसाधकम् |<br>गङ्गादिसरितो याता पुरा पक्षेन्न समुद्भवा || | ||
'''५९''' तया तु घटयेल्लिङ्गं यथा वक्ष्यामि लक्षणम् |<br> | '''५९''' तया तु घटयेल्लिङ्गं यथा वक्ष्यामि लक्षणम् |<br>मृत्स्नां * * * * कृत्वा त्रिफलाचूर्णसंयुताम् || | ||
'''६०''' कुनदीतालसिन्दूररसगन्धकयोजिताम् |<br> | '''६०''' कुनदीतालसिन्दूररसगन्धकयोजिताम् |<br>सुवर्णगैरिकयुतां किञ्चिद् गुग्गुलुमिश्रिताम् || | ||
'''६१''' मर्दयेत् सुपरिश्राव्यपदेनानुविचक्षणः |<br> | '''६१''' मर्दयेत् सुपरिश्राव्यपदेनानुविचक्षणः |<br>शणमाषातसीविल्वसौराष्ट्रीरसमिश्रिताम् || | ||
'''६२''' कषायोदकसंक्लिन्नां सप्तरात्रमथोषिताम् |<br> | '''६२''' कषायोदकसंक्लिन्नां सप्तरात्रमथोषिताम् |<br>सुगन्धि गन्धमिश्रेण तथा सर्जरसेन च || | ||
'''६३''' मर्दयेत् सर्वतो येन स कषायेन यत्नतः |<br> | '''६३''' मर्दयेत् सर्वतो येन स कषायेन यत्नतः |<br>ततो लिङ्गं प्रकुर्वीत यथोक्तलक्षणं शुभम् || | ||
'''६४''' पक्वापक्वं सुराध्यक्ष यथा मनसि वाञ्छितम् |<br> | '''६४''' पक्वापक्वं सुराध्यक्ष यथा मनसि वाञ्छितम् |<br>मरकतं पद्मरागं च वज्रवैदूर्यमौक्तिकम् || | ||
'''६५''' चन्द्रप्रियं पुष्परागं महानीलादिटिट्टिभम् |<br> | '''६५''' चन्द्रप्रियं पुष्परागं महानीलादिटिट्टिभम् |<br>भिन्नाभिन्न गुणास्त्वेषां स्फाटिकं सर्वकामदम् || | ||
'''६६''' सरित्सलिलसंकाशं स्वच्छं स्निग्धं प्रभान्वितम् |<br> | '''६६''' सरित्सलिलसंकाशं स्वच्छं स्निग्धं प्रभान्वितम् |<br>तुषारकणिकाहीनं सर्वदोषविवर्जितम् || | ||
'''६७''' स्फाटिकं लिङ्गमासाद्य केन सिद्धाः शतक्रतो |<br> | '''६७''' स्फाटिकं लिङ्गमासाद्य केन सिद्धाः शतक्रतो |<br>वाणे लौहे स्वयं व्यक्ते दैवे च ऋषिकल्पिते || | ||
'''६८''' असुरैः स्थापिते लिङ्गे लक्षणं न पुरोदितम् |<br> | '''६८''' असुरैः स्थापिते लिङ्गे लक्षणं न पुरोदितम् |<br>मानोन्मानयुतं लिङ्गं मण्डलादिविदूषितम् || | ||
'''६९''' प्रतिकूलं विजानीयात् सर्वेषामपि प्राणिनाम् |<br> | '''६९''' प्रतिकूलं विजानीयात् सर्वेषामपि प्राणिनाम् |<br>शिलायास्थे दान यत्नात् तक्षणे घर्षणे पि च || | ||
'''७०''' निष्पन्नावपि ज्ञातव्यं गर्भमण्डलकादिकम् |<br> | '''७०''' निष्पन्नावपि ज्ञातव्यं गर्भमण्डलकादिकम् |<br>माञ्जिष्ठे कपिले रक्ते सालूराखुकृकालकाः || | ||
'''७१''' कृष्णासिगुडकर्णेषु सर्प आपस्तथोपलः |<br> | '''७१''' कृष्णासिगुडकर्णेषु सर्प आपस्तथोपलः |<br>कपोतभस्मचित्रेषु गोधिकासिकतालिनः || | ||
'''७२''' पीतभृङ्गाभके गोधाविषञ्चैव विनिर्दिशेत् |<br> | '''७२''' पीतभृङ्गाभके गोधाविषञ्चैव विनिर्दिशेत् |<br>नीले च मण्डले श्यामे गोनासे मानुषन्तथा || | ||
'''७३''' चाषाभ पक्षिणं विधाच्छ्याम चाषनृपक्षिणम् |<br> | '''७३''' चाषाभ पक्षिणं विधाच्छ्याम चाषनृपक्षिणम् |<br>द्विके द्विके द्विरूपञ्च यद्रूपन्तत् तदादिशेत् || | ||
'''७४''' वाह्यतो लक्षणाभावे लेपं युञ्जित भ्रान्तितः |<br> | '''७४''' वाह्यतो लक्षणाभावे लेपं युञ्जित भ्रान्तितः |<br>सौराष्ट्री वालकास्वघ्न ऋद्धिवृद्धी द्विजन्तथा || | ||
'''७५''' आरनालेन पिष्ट्वैनमुपलं लेपयेन्निशि |<br> | '''७५''' आरनालेन पिष्ट्वैनमुपलं लेपयेन्निशि |<br>आर्द्रता सिमिकाक्लेदो वाष्पोत्थानमनुक्रमात् || | ||
'''७६''' द्विजं महीतं तथा मीनं कृष्णं ज्ञात्वानु तान् त्यजेत् |<br> | '''७६''' द्विजं महीतं तथा मीनं कृष्णं ज्ञात्वानु तान् त्यजेत् |<br>अतो दोषविनिर्मुक्ते पृष्टेशाणादिभिर्वुधाः || | ||
'''७७''' धौतदेहे ततो लिङ्गे चिह्नं लक्षं शुभाशुभम् |<br> | '''७७''' धौतदेहे ततो लिङ्गे चिह्नं लक्षं शुभाशुभम् |<br>हयेभवृष शंखाब्जस्वस्तिकच्छत्रभूधरैः || | ||
'''७८''' मृगारिध्वजभृङ्गारमुद्गरा * शाचामरैः |<br> | '''७८''' मृगारिध्वजभृङ्गारमुद्गरा * शाचामरैः |<br>कूर्मोर्मीमत्सश्रीवत्सचक्रनेत्रपवित्रकैः || | ||
'''७९''' सिद्धिमेभिर्विजानीयान्निर्वाणन्तदनन्तरम् |<br> | '''७९''' सिद्धिमेभिर्विजानीयान्निर्वाणन्तदनन्तरम् |<br>व्याघ्रमार्जारभल्लूककबन्धकाककङ्ककैः || | ||
'''८०''' संदंसर्पासगृध्रोष्ट्र उलूकवकपेचकैः |<br> | '''८०''' संदंसर्पासगृध्रोष्ट्र उलूकवकपेचकैः |<br>एभिः सर्वैर्युतं लिङ्गं वर्णैश्चाग्नेयमारुतैः || | ||
'''८१''' यजमानप्रजाराज्ञां दुःखमृत्युप्रदं भवेत् |<br> | '''८१''' यजमानप्रजाराज्ञां दुःखमृत्युप्रदं भवेत् |<br>अव्यक्तमुखलिङ्गानि समासात् कथितानि ते || | ||
'''८२''' साम्प्रतं कथ्यते व्यक्तन्निःसन्दिग्धं शचीपते |<br> | '''८२''' साम्प्रतं कथ्यते व्यक्तन्निःसन्दिग्धं शचीपते |<br>इति मोहचूरोत्तरे अव्यक्तमुखलिङ्गप्रख्याने प्रथमः पटलः || | ||
===Kapitel 2: Gestalten der Gottheiten=== | ===Kapitel 2: Gestalten der Gottheiten=== | ||
'''८३''' प्रतिमालक्षणं वक्षे माने द्वारकरात्मके |<br> | '''८३''' प्रतिमालक्षणं वक्षे माने द्वारकरात्मके |<br>तिर्यग्भक्तगुणैर्द्वारे द्वाभ्यामर्चोत्तमोत्तमम् || | ||
'''८४''' पीठं भागेन कर्तव्यं मध्योत्कृष्टन्निगद्यते |<br> | '''८४''' पीठं भागेन कर्तव्यं मध्योत्कृष्टन्निगद्यते |<br>नन्दवद् भाजिते दैर्घ्ये त्यक्ता भागं पुनस्त्रिधा || | ||
'''८५''' भागाभ्यां प्रतिमा कार्या भागं पीठाय कल्पयेत् |<br> | '''८५''' भागाभ्यां प्रतिमा कार्या भागं पीठाय कल्पयेत् |<br>सिद्धिभक्ते पुनर्द्वारि तनुभागं परित्यजेत् || | ||
'''८६''' विभज्य गुणवच्छेषं द्वाभ्यां जीवप्रकल्पना |<br> | '''८६''' विभज्य गुणवच्छेषं द्वाभ्यां जीवप्रकल्पना |<br>अंशैकेन भवेत् पीठं प्रत्येकाद् वा द्वयन्द्वयम् || | ||
'''८७''' ज्येष्ठादिभेदतः शक्रद्वार्मानात् प्रतिमानव |<br> | '''८७''' ज्येष्ठादिभेदतः शक्रद्वार्मानात् प्रतिमानव |<br>करमेकं सभारभ्य यावत् स्यादङ्कगोचरम् || | ||
'''८८''' लिङ्गवन्मानमेतासां संख्या तद्वत् पुरन्दर |<br> | '''८८''' लिङ्गवन्मानमेतासां संख्या तद्वत् पुरन्दर |<br>आयामार्द्धरसैर्भक्ते षष्ठांशस्य नवांशके || | ||
'''८९''' अङ्गुलं स्वकमुद्दिष्टन्तेनाङ्गोपाङ्गवर्तना |<br> | '''८९''' अङ्गुलं स्वकमुद्दिष्टन्तेनाङ्गोपाङ्गवर्तना |<br>नव तालाः सुरा ज्ञेया ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः || | ||
'''९०''' तालैकादशभिः कार्या भूतवेतालराक्षसाः |<br> | '''९०''' तालैकादशभिः कार्या भूतवेतालराक्षसाः |<br>किङ्कराः सप्ततालाश्च पञ्च तालाश्च वामनाः || | ||
'''९१''' पङ्गुकुब्जौ च भूतांशैः कुष्माण्डा युगतालिकः |<br> | '''९१''' पङ्गुकुब्जौ च भूतांशैः कुष्माण्डा युगतालिकः |<br>रुचितं रूपकायामं विभज्य नवभागिकम् || | ||
'''९२''' रूपकं वर्तयेत् तत्र यस्य देवस्य यद् भवेत् |<br> | '''९२''' रूपकं वर्तयेत् तत्र यस्य देवस्य यद् भवेत् |<br>विकाराङ्गुलमुत्सेधो मुकुटे पाकशासन || | ||
'''९३''' आस्यं तालसमं प्रोक्तं ग्रीवा वेदाङ्गुला ततः |<br> | '''९३''' आस्यं तालसमं प्रोक्तं ग्रीवा वेदाङ्गुला ततः |<br>ग्रीवाधस्ताद् विजानीयाद् हृदयं नाभिमण्डलम् || | ||
'''९४''' जठरं तालतालेन ज्येष्ठायाः कारणं विना |<br> | '''९४''' जठरं तालतालेन ज्येष्ठायाः कारणं विना |<br>दैर्घ्यात् कामकला १३ ऊरूजानू पालीकृताङ्गुले || | ||
'''९५''' जङ्घे रुद्रकले कार्ये गुल्फे वेदाङ्गुले ततः |<br> | '''९५''' जङ्घे रुद्रकले कार्ये गुल्फे वेदाङ्गुले ततः |<br>मङ्गलदिगङ्गुलाज्ञेया प्रतिमा तु पराहरः || | ||
'''९६''' ऊर्द्ध्वमानं समाख्यातं तिर्यङ्मानादिकं शृणु |<br> | '''९६''' ऊर्द्ध्वमानं समाख्यातं तिर्यङ्मानादिकं शृणु |<br>भाग त्रयञ्च वदने वक्त्रञ्चिवुक संयुतम् || | ||
'''९७''' नासा वंश ललाटं * * * * स्यात्स ताङ्गुलम् |<br> | '''९७''' नासा वंश ललाटं * * * * स्यात्स ताङ्गुलम् |<br>सिद्ध्यङ्गुलं ललाटञ्च तिर्यक् स्यात् पाकशासन || | ||
'''९८''' ललाटाधोङ्गुला शक्ते सुभुवौ सार्द्धलोचने |<br> | '''९८''' ललाटाधोङ्गुला शक्ते सुभुवौ सार्द्धलोचने |<br>मूलेद्वियवविस्तीर्णे पादहीने ततः क्रमात् || | ||
'''९९''' प्रान्तेयवार्द्ध विस्तारे वक्त्रे वै कार्मुका कृती |<br> | '''९९''' प्रान्तेयवार्द्ध विस्तारे वक्त्रे वै कार्मुका कृती |<br>मात्रा श्यामे शुभे कार्ये लोचने त्र्यंशतारके || | ||
'''१००''' मीनोदरनिभे तारे भूतांशे ज्योतिषी शुभे |<br> | '''१००''' मीनोदरनिभे तारे भूतांशे ज्योतिषी शुभे |<br>अङ्गुले पृथुनी मध्ये शेषं ज्ञात्वा प्रयोजयेत् || | ||
'''१०१''' यथा हिमवतं रूपन्तथा दृष्टिन्नियोजयेत् |<br> | '''१०१''' यथा हिमवतं रूपन्तथा दृष्टिन्नियोजयेत् |<br>अग्रे समुच्छ्रिता नासा अङ्गुल्याभ्यां शचीपते || | ||
'''१०२''' पार्श्वे यवाधिकासाधो मूले तारक विच्युते |<br> | '''१०२''' पार्श्वे यवाधिकासाधो मूले तारक विच्युते |<br>निष्पावदलवद् वाह्ये पुटौ तारकविस्तृतौ || | ||
'''१०३''' द्व्यर्द्धयवदलौ कार्यौ नासा रन्ध्रे चतुर्यवे |<br> | '''१०३''' द्व्यर्द्धयवदलौ कार्यौ नासा रन्ध्रे चतुर्यवे |<br>अपाङ्गे द्विकले ख्याते श्रुती वक्त्र समासके || | ||
'''१०४''' यवाधिकेर्द्ध विस्तीर्णे वर्तीयुग्म यवे मते |<br> | '''१०४''' यवाधिकेर्द्ध विस्तीर्णे वर्तीयुग्म यवे मते |<br>शष्कुल्यौद्वियवे कार्ये ककुनी तु चतुर्यवे || | ||
'''१०५''' खल पत्रं कलामान मायामर्द्धि न विस्तृतम् |<br> | '''१०५''' खल पत्रं कलामान मायामर्द्धि न विस्तृतम् |<br>तुदूकावङ्गुलं दीर्घौ पार्श्वौ भूषानुरोधतः || | ||
'''१०६''' कर्णान्तरं समुद्दिष्टङ्ग्रहगोलकमानकम् |<br> | '''१०६''' कर्णान्तरं समुद्दिष्टङ्ग्रहगोलकमानकम् |<br>ललाटान्तात्तुदुयावत्तद्विन्द्यात् पङ्क्ति गोलकम् || | ||
'''१०७''' दलं सार्द्धयवं कर्णे त्रिनाला वेष्टितं शिरः |<br> | '''१०७''' दलं सार्द्धयवं कर्णे त्रिनाला वेष्टितं शिरः |<br>हनू दशाङ्गुलौ कर्णात् सन्धानं गोलकन्तयोः || | ||
'''१०८''' मुखन्तु द्विदलं दैर्घ्याद्विस्तृतं सार्द्धमङ्गुलम् |<br> | '''१०८''' मुखन्तु द्विदलं दैर्घ्याद्विस्तृतं सार्द्धमङ्गुलम् |<br>अविस्तृतं समुद्दिष्टं विस्तृतन्त्वन लाङ्गुलम् || | ||
'''१०९''' कलार्द्धमधरे मा * * * * * परं विदुः |<br> | '''१०९''' कलार्द्धमधरे मा * * * * * परं विदुः |<br>तस्याधोङ्गुल वद्गर्तागोजीतत्रार्द्धमङ्गुलम् || | ||
'''११०''' ऊर्द्ध्वगोजीतुना साधो द्वियवादलविस्तृतः |<br> | '''११०''' ऊर्द्ध्वगोजीतुना साधो द्वियवादलविस्तृतः |<br>सृक्किणौ दृष्टि सूत्रेण कविरौ पुटसूत्रगौ || | ||
'''१११''' मध्यवक्त्रो * * साधू चिवुकाश्चैव सूत्रगाः |<br> | '''१११''' मध्यवक्त्रो * * साधू चिवुकाश्चैव सूत्रगाः |<br>ग्रीवावस्वङ्गुला कार्या वेष्टनेनार्क गोलिका || | ||
'''११२''' स्कन्धौ त्रिगोलकौ कार्यौ विकाराङ्गुल वेष्टनौ |<br> | '''११२''' स्कन्धौ त्रिगोलकौ कार्यौ विकाराङ्गुल वेष्टनौ |<br>वाहू भूया वद * * वुप वाहू पुरन्दर || | ||
'''११३''' वसु रूपाङ्गुलायामौ ग्रन्थिं विन्द्यात् कलार्द्धतः |<br> | '''११३''' वसु रूपाङ्गुलायामौ ग्रन्थिं विन्द्यात् कलार्द्धतः |<br>तद्वत्कर प्रवाहोश्च दैर्घ्यान्युन्यङ्गुलन्तलम् || | ||
'''११४''' तिर्यक्काणाङ्गुलं मध्यत् तद्वत् सूना यवं विना |<br> | '''११४''' तिर्यक्काणाङ्गुलं मध्यत् तद्वत् सूना यवं विना |<br>तर्जन्यनामिकेताभ्यां कलार्द्धो नाच कन्यसा || | ||
'''११५''' दैर्घ्य तस्तत् समाङ्गुष्ठो देसिन्यास्त्र्यङ्गुलो ह्यधः |<br> | '''११५''' दैर्घ्य तस्तत् समाङ्गुष्ठो देसिन्यास्त्र्यङ्गुलो ह्यधः |<br>मूले वह्नि कलो ज्ञेयः सस्यन्द्रेण परिच्युतः || | ||
'''११६''' वाहन्ते च तथा शक्र किन्तु राम यवोसितः |<br> | '''११६''' वाहन्ते च तथा शक्र किन्तु राम यवोसितः |<br>अक्षाङ्गुलादि कोणान्तो विष्कम्भस्त्रिगुणा वृतिः || | ||
'''११७''' मांसलौचकरौ श्रेष्ठा वङ्गुल्येद्वर्तुलाहरे |<br> | '''११७''' मांसलौचकरौ श्रेष्ठा वङ्गुल्येद्वर्तुलाहरे |<br>सार नेत्र सरैर्हीनं मध्या या गोलकं यवैः || | ||
'''११८''' दैर्घ्यं स्वपर्वणो न्यासां पङ्क्ति मांस परिच्युते |<br> | '''११८''' दैर्घ्यं स्वपर्वणो न्यासां पङ्क्ति मांस परिच्युते |<br>चतुर्थांशं विना कन्या प्रान्ते यर्वार्द्ध जानखाः || | ||
'''११९''' मूले च त्र्यङ्गुलो मध्या मध्ये चैव यवोह्रिताः |<br> | '''११९''' मूले च त्र्यङ्गुलो मध्या मध्ये चैव यवोह्रिताः |<br>गुण यवोह्रितः प्रान्ते स्वायामादन्यतः पुनः || | ||
'''१२०''' कन्दे ग्रन्थौ तथा मध्ये रसभूतकृताङ्गुलः |<br> | '''१२०''' कन्दे ग्रन्थौ तथा मध्ये रसभूतकृताङ्गुलः |<br>पर्वणः सयवाङ्गुष्ठे च्युतश्च्युततराग्रतः || | ||
'''१२१''' कण्ठकूप स * * * * * ? कौरस गोलकौ |<br> | '''१२१''' कण्ठकूप स * * * * * ? कौरस गोलकौ |<br>अन्तरञ्च तदेव स्यात् तयोः पक्षौ षडङ्गुलौ || | ||
'''१२२''' मण्डलं द्वियवं प्रोक्तं मध्यस्थं यवमानकम् |<br> | '''१२२''' मण्डलं द्वियवं प्रोक्तं मध्यस्थं यवमानकम् |<br>व्यासश्चैव समस्तस्य विपर्यय यविर्भवेत् || | ||
'''१२३''' * * ? कौ तु समुद्दिष्टौ नाभिमानमथोच्यते |<br> | '''१२३''' * * ? कौ तु समुद्दिष्टौ नाभिमानमथोच्यते |<br>नाभिः स्याद् दक्षिणावर्ता गंभीरा तु चतुर्यवैः || | ||
'''१२४''' विस्तृतैकाङ्गुले नैव वेष्टनन्त्रिगुणं हरे |<br> | '''१२४''' विस्तृतैकाङ्गुले नैव वेष्टनन्त्रिगुणं हरे |<br>अधुनासंप्रवक्ष्यामि नाभि देशादि विस्तरम् || | ||
'''१२५''' विस्तृतिन्नाभि देशे तु कुर्याद्वृत्यङ्गुलैर्बुधः |<br> | '''१२५''' विस्तृतिन्नाभि देशे तु कुर्याद्वृत्यङ्गुलैर्बुधः |<br>दुःखा२१ङ्गुलैस्ततो धस्तात् कटिदेशे जिनाङ्गुलैः || | ||
'''१२६''' मेहनं द्विकलञ्चाधो वृषणौ नेत्रमानकौ |<br> | '''१२६''' मेहनं द्विकलञ्चाधो वृषणौ नेत्रमानकौ |<br>विष्कंभः कलया मूले स त्र्यंशा विकलापुरः || | ||
'''१२७''' वेष्टनन्त्रिगुणं सर्वं हस्तपादादिकं विना |<br> | '''१२७''' वेष्टनन्त्रिगुणं सर्वं हस्तपादादिकं विना |<br>षण्मात्रविस्तृता ब्रूहू ज्ञात्वा हासन्ततोन्ततः || | ||
'''१२८''' त्रिकला जानुकन्देस्याज्जंघाकन्दे तथैव च |<br> | '''१२८''' त्रिकला जानुकन्देस्याज्जंघाकन्दे तथैव च |<br>तद्रन्थौ गोलकाधिक्य मत्स्या पादाङ्गुलेन तु || | ||
'''१२९''' त्रिगुणा प्रावृतिः ख्याता पूर्ववतशतक्रतो |<br> | '''१२९''' त्रिगुणा प्रावृतिः ख्याता पूर्ववतशतक्रतो |<br>पादौ मन्त्रङ्गुलौ कार्यौ पार्ष्णीं कृत्यङ्गुलौ ततः || | ||
'''१३०''' पादो नस्त्र्यङ्गुलोङ्गुष्टो वहीना प्रदेशिनी |<br> | '''१३०''' पादो नस्त्र्यङ्गुलोङ्गुष्टो वहीना प्रदेशिनी |<br>पादपादविहीनाः स्युरङ्गुल्योन्यां शतक्रतो || | ||
'''१३१''' कन्दे भूताङ्गुलो नाभो मध्ये तु विकलाच्युतः |<br> | '''१३१''' कन्दे भूताङ्गुलो नाभो मध्ये तु विकलाच्युतः |<br>सार्द्धविपर्ययाङ्गुष्ठे च्युतश्च्युततरः क्रमात् || | ||
'''१३२''' रामाङ्गुलस्तु देशिन्याः कण्ठाभ्यासे करा * * |<br> | '''१३२''' रामाङ्गुलस्तु देशिन्याः कण्ठाभ्यासे करा * * |<br>* वा व्यस्त ग्रतोऽन्यासो माय ८ भोग परिच्युतम् || | ||
'''१३३''' मूल निम्नं न स्वङ्कुर्यात् किञ्चिदग्रे समुन्नतम् |<br> | '''१३३''' मूल निम्नं न स्वङ्कुर्यात् किञ्चिदग्रे समुन्नतम् |<br>पुन्नारी लक्षणं प्रोक्तं लेसान्नमुचि सूदन || | ||
'''१३४''' अधुनासंप्रवक्ष्यामि यथामानं भवेस्त्रियः |<br> | '''१३४''' अधुनासंप्रवक्ष्यामि यथामानं भवेस्त्रियः |<br>नार्यष्ट तालिका तन्वी नेत्र श्रोणीस्तनाधिका || | ||
'''१३५''' भ्रुवौ यवाधिका नासा यवहीना समुच्छ्रयात् |<br> | '''१३५''' भ्रुवौ यवाधिका नासा यवहीना समुच्छ्रयात् |<br>दस्राङ्गुल * * * र्घ्यतच्च्युतं विस्तरेण तु || | ||
'''१३६''' तेन हीनौ सुभावङ्गौ स्यातां नभ्रौ मनो रमौ |<br> | '''१३६''' तेन हीनौ सुभावङ्गौ स्यातां नभ्रौ मनो रमौ |<br>ग्रीवामष्ट यवैर्हीनां तिर्यक्कृत्वौर्द्धतो न्यसेत् || | ||
'''१३७''' एवमक्षाङ्गुलैर्दैर्घ्य विस्तृता करणाङ्गुलैः |<br> | '''१३७''' एवमक्षाङ्गुलैर्दैर्घ्य विस्तृता करणाङ्गुलैः |<br>द्वन्द्व गोलकमादाय प्रवाहुभ्यां शतक्रतो || | ||
'''१३८''' ऊरू जानुक पिण्डीषु दद्यादर्द्धार्द्धमङ्गुलम् |<br> | '''१३८''' ऊरू जानुक पिण्डीषु दद्यादर्द्धार्द्धमङ्गुलम् |<br>उच्चैस्त्वे पादयोर्दद्यात् पादौ समतलौ पुनः || | ||
'''१३९''' चतुरङ्गुलमादाय वाह्वायामाद्विवर्द्धितौ |<br> | '''१३९''' चतुरङ्गुलमादाय वाह्वायामाद्विवर्द्धितौ |<br>पीनौ वृत्तौ स्फिचौ कार्या वङ्गुली मानमुच्यते || | ||
'''१४०''' नागांशं स्वस्वमादाय विस्तारेणोर्द्धतो न्यसेत् |<br> | '''१४०''' नागांशं स्वस्वमादाय विस्तारेणोर्द्धतो न्यसेत् |<br>* * कूर्मोन्नतञ्चैव भगं कुर्यात् स लक्षणम् || | ||
'''१४१''' तन्मध्यतस्त्वधो भागे रन्ध्रं स्यात् कुञ्जरोष्ठवत् |<br> | '''१४१''' तन्मध्यतस्त्वधो भागे रन्ध्रं स्यात् कुञ्जरोष्ठवत् |<br>प्रतिमै तन्मानतः कार्या करण स्थानकान्विता || | ||
'''१४२''' * * * * प्रदाधन्यास्यादतोन्यान शोभना |<br> | '''१४२''' * * * * प्रदाधन्यास्यादतोन्यान शोभना |<br>हीनाधिकं भवेल्लक्ष्य यत्र यद्युक्तमाचरेत् || | ||
'''१४३''' युक्तादवाप्यते यस्मात् पारलौहिकिकं फलम् |<br> | '''१४३''' युक्तादवाप्यते यस्मात् पारलौहिकिकं फलम् |<br>सम्पत् करीदारुमयी मृण्मयी सुखदा सदा || | ||
'''१४४''' पुष्टिप्रदा हेममयी धन्यारत्नमयी मता |<br> | '''१४४''' पुष्टिप्रदा हेममयी धन्यारत्नमयी मता |<br>वर्ण क्रमाच्छुभाशैली क्षेम्यातां भ्रमयी तथा || | ||
'''१४५''' जयदाराजती साधोरैतीरतिकरी नृणाम् |<br> | '''१४५''' जयदाराजती साधोरैतीरतिकरी नृणाम् |<br>सौभाग्यान्नाद्य पशुदा कांस्यपित्तलसंभवा || | ||
'''१४६''' वलदासी स जातास्यान्न कार्या लोह संभवा |<br> | '''१४६''' वलदासी स जातास्यान्न कार्या लोह संभवा |<br>क्षुद्भयं दीर्घजठरा धनहानिः कृशोदरी || | ||
'''१४७''' रोगङ्करोति हीनाङ्गी दिर्घाङ्गी च नृपाद्भयम् |<br> | '''१४७''' रोगङ्करोति हीनाङ्गी दिर्घाङ्गी च नृपाद्भयम् |<br>भर्तारं दक्षिणनता हन्ति वामनतास्त्रियम् || | ||
'''१४८''' करोति स क्षता मृत्युं स गर्भा रुग्भयं नृप |<br> | '''१४८''' करोति स क्षता मृत्युं स गर्भा रुग्भयं नृप |<br>ऊर्ध्व दृष्टिस्तथा व्याधिर्मधो दृष्टिर्जनक्षयम् || | ||
'''१४९''' निम्नोन्नतोष्ठी कलहं मुखरोगं महामुखी |<br> | '''१४९''' निम्नोन्नतोष्ठी कलहं मुखरोगं महामुखी |<br>नेत्रहीना तु वैकल्यमवक्त्रावक्त्रशोणितम् || | ||
'''१५०''' वधिरत्वमकर्णा तु हीनाङ्गा च यशः क्षयम् |<br> | '''१५०''' वधिरत्वमकर्णा तु हीनाङ्गा च यशः क्षयम् |<br>हीनास्या शिल्पिनं हन्ति रौद्राङ्गी स्वामिनन्तथा || | ||
'''१५१''' हीन पादकरा नित्यं वालानाञ्च विनाशनी |<br> | '''१५१''' हीन पादकरा नित्यं वालानाञ्च विनाशनी |<br>हीनजंघा च जापाघ्नी जानु हीनारि वर्द्धनी || | ||
'''१५२''' सत्रासाक्षि भयङ्कुर्यात् स रेखा सर्पसंभवम् |<br> | '''१५२''' सत्रासाक्षि भयङ्कुर्यात् स रेखा सर्पसंभवम् |<br>कटिहीना पशुं हन्ति नृपं हन्ति महाभुजा || | ||
'''१५३''' स विन्दुका सदोन्मादं कुरुते नात्र संशयः |<br> | '''१५३''' स विन्दुका सदोन्मादं कुरुते नात्र संशयः |<br>पुरुहूत समाख्याता दोषास्त्वेते समासतः || | ||
'''Shiva und weitere Gottheitsgestalten''' | '''Shiva und weitere Gottheitsgestalten''' | ||
'''१५४''' मूर्तिभेद मतो वक्षे यानास्त्रादि विभेदतः |<br> | '''१५४''' मूर्तिभेद मतो वक्षे यानास्त्रादि विभेदतः |<br>स देशानः सरोजस्थो दिग्वाहु स्थिति लोचनः || | ||
'''१५५''' पञ्चवक्त्रो हिमाभश्च हारकुण्डलमण्डितः |<br> | '''१५५''' पञ्चवक्त्रो हिमाभश्च हारकुण्डलमण्डितः |<br>खट्वाङ्गमुत्पलन्नागमभयं वीजपूरकम् || | ||
'''१५६''' आयुधंगम हस्तस्य दक्षिणेत् वधुना शृणु |<br> | '''१५६''' आयुधंगम हस्तस्य दक्षिणेत् वधुना शृणु |<br>वरदं शक्तिशूलञ्च सूत्रं डमरूकन्तथा || | ||
'''१५७''' स देशानः समाख्यातो ह्यर्द्ध नारीश्वरं शृणु |<br> | '''१५७''' स देशानः समाख्यातो ह्यर्द्ध नारीश्वरं शृणु |<br>अर्द्धनारीश्वरः कार्यो ह्यर्द्धार्द्ध कृति लक्षितः || | ||
'''१५८''' अर्द्धमिन्दु जटाभारमर्द्धसतिलकालकम् |<br> | '''१५८''' अर्द्धमिन्दु जटाभारमर्द्धसतिलकालकम् |<br>कुण्डलं दक्षिणे कर्णे वामेस्या वालि कादिकम् || | ||
'''१५९''' ग्रीवाव्यालार्द्ध हाराङ्गीस्तनमेकञ्च वामतः |<br> | '''१५९''' ग्रीवाव्यालार्द्ध हाराङ्गीस्तनमेकञ्च वामतः |<br>कपालन्दक्षिणे हस्ते वामे चैवोत्पलन्न्यसेत् || | ||
'''१६०''' अर्द्धनारीश्वरः ख्यात उमेशः कथ्यते धुना |<br> | '''१६०''' अर्द्धनारीश्वरः ख्यात उमेशः कथ्यते धुना |<br>उमेशावुपविष्ठाङ्गौ पुंस्त्री रूपौ शतक्ततो || | ||
'''१६१''' सोरगेन्द्र जटाभार धरस्त्र्यक्षो हरः परम् |<br> | '''१६१''' सोरगेन्द्र जटाभार धरस्त्र्यक्षो हरः परम् |<br>ग्रीवा साभररगा कार्या करार्गै कुण्डल मण्डितौ || | ||
'''१६२''' द्विभुजः सोपवीताङ्ग अर्द्धवीरासन स्थितः |<br> | '''१६२''' द्विभुजः सोपवीताङ्ग अर्द्धवीरासन स्थितः |<br>वामोरुसंस्थिता गौरीमुखालोक न तत्परा || | ||
'''१६३''' वाम वाहूप गूढाङ्गी ललाटतिलकोज्वला |<br> | '''१६३''' वाम वाहूप गूढाङ्गी ललाटतिलकोज्वला |<br>कर्तव्यः केश विन्यासः सुबन्धः कुसुमाविलः || | ||
'''१६४''' कर्णौ साभरणौ कार्यौ पादौ नूपुर मण्डितौ |<br> | '''१६४''' कर्णौ साभरणौ कार्यौ पादौ नूपुर मण्डितौ |<br>दर्शयेद् दक्षिणन्देव्या देव स्कन्धे भुजं हरे || | ||
'''१६५''' वामे च दर्पणन्दद्यात् कट्यां सूत्रं समेखलम् |<br> | '''१६५''' वामे च दर्पणन्दद्यात् कट्यां सूत्रं समेखलम् |<br>देवहस्तं पुनर्दक्षन्देवी चिवुके निवेशयेत् || | ||
'''१६६''' सुनासिका सुवदनासु नेत्रीसु पयोधरा |<br> | '''१६६''' सुनासिका सुवदनासु नेत्रीसु पयोधरा |<br>सुवाहु लतिका भद्रा केयूर कटकाङ्किता || | ||
'''१६७''' उमेश्वर समाख्यातो हर नारायणं शृणु |<br> | '''१६७''' उमेश्वर समाख्यातो हर नारायणं शृणु |<br>हरनारायणं रूपञ्जटा केशार्द्ध मस्तकम् || | ||
'''१६८''' ललाटे चार्द्ध नयनं मुद्रा कुण्डल मण्डितम् |<br> | '''१६८''' ललाटे चार्द्ध नयनं मुद्रा कुण्डल मण्डितम् |<br>चतुर्भुजः समाख्यातो हरनारायणस्तव || | ||
'''१६९''' कपालखड्गखट्वाङ्ग चक्रं स्याद्वामदक्षयोः |<br> | '''१६९''' कपालखड्गखट्वाङ्ग चक्रं स्याद्वामदक्षयोः |<br>वृषं तार्क्ष्यो तथा भव्या श्रीर्दक्षिणोत्तरस्थिता || | ||
'''१७०''' हरनारायणः ख्यातो नृत्येशं कथ्यते धुना |<br> | '''१७०''' हरनारायणः ख्यातो नृत्येशं कथ्यते धुना |<br>नृत्य रुद्रं प्रकुर्वीत चन्द्रार्द्ध कृत मस्तकम् || | ||
'''१७१''' वैशाख स्थानकन्धरन्नाग यज्ञोपवीतिनम् |<br> | '''१७१''' वैशाख स्थानकन्धरन्नाग यज्ञोपवीतिनम् |<br>सौम्याननं जटाजूट धारिणं व्याल मेखलम् || | ||
'''१७२''' पीनवक्षोरुजघनं सर्वलक्षणसंयुतम् |<br> | '''१७२''' पीनवक्षोरुजघनं सर्वलक्षणसंयुतम् |<br>द्विपि चर्मधरं साधो वृषारूढं स्मिताननम् || | ||
'''१७३''' सुभव्यं षोडश भुजं कुर्याद् वा द्विभुजं शुभम् |<br> | '''१७३''' सुभव्यं षोडश भुजं कुर्याद् वा द्विभुजं शुभम् |<br>वेणूवीणा मृदङ्गादि वाद्यसंघोपशोभितम् || | ||
'''१७४''' वामं प्रसारित भुजं द्वितीयमभयप्रदम् |<br> | '''१७४''' वामं प्रसारित भुजं द्वितीयमभयप्रदम् |<br>अक्षसूत्रेषु दण्डासि शूलशक्ति वरङ्करैः || | ||
'''१७५''' कपालपाशखट्वाङ्ग खेटचर्माङ्कुशान्वितम् |<br> | '''१७५''' कपालपाशखट्वाङ्ग खेटचर्माङ्कुशान्वितम् |<br>एकञ्चापधरं तद्वत्सुसारितमथोत्तरम् || | ||
'''१७६''' भव्या ब्रह्माहरिस्कन्दो नन्दी कालादयश्चये |<br> | '''१७६''' भव्या ब्रह्माहरिस्कन्दो नन्दी कालादयश्चये |<br>वीक्ष्यमाणाः शिवं नृत्यं भृङ्गी कार्योग्रतः स्थितः || | ||
'''१७७''' मालाखड्गभृतो ये तु सिद्धा यक्षादयस्तथा |<br> | '''१७७''' मालाखड्गभृतो ये तु सिद्धा यक्षादयस्तथा |<br>बाह्यस्थाच्च प्रकर्तव्या नृत्येशः कथितस्तव || | ||
'''१७८''' त्रिधा विष्णुं प्रवक्ष्यामि वासुदेवं द्विवाहुकं |<br> | '''१७८''' त्रिधा विष्णुं प्रवक्ष्यामि वासुदेवं द्विवाहुकं |<br>प्रोच्यते लक्षणन्तस्य समासे नैव सुव्रत || | ||
'''१७९''' सुनाससु कपोलञ्च स रत्न मुकुटोज्वलम् |<br> | '''१७९''' सुनाससु कपोलञ्च स रत्न मुकुटोज्वलम् |<br>ललाट तिलकोपेतं श्यामं पीताम्बरं हरे || | ||
'''१८०''' गदा खड्गाम्वुजं दक्षे स्यात् तुर्यः शान्तिदः करः |<br> | '''१८०''' गदा खड्गाम्वुजं दक्षे स्यात् तुर्यः शान्तिदः करः |<br>शङ्ख चक्र धनुः खेट वामे चाष्ट भुजे हरौ || | ||
'''१८१''' शङ्ख चक्रं प्रदातव्यं वामहस्ते चतुर्भुजे |<br> | '''१८१''' शङ्ख चक्रं प्रदातव्यं वामहस्ते चतुर्भुजे |<br>दक्षिणे तु करे पद्मं गदा त्रैलोक्य तर्जनी || | ||
'''१८२''' द्विभुजे शङ्ख भृद्वामे दक्षिणः शान्तिदः करः |<br> | '''१८२''' द्विभुजे शङ्ख भृद्वामे दक्षिणः शान्तिदः करः |<br>विष्णुरेय समाख्यातो ब्रह्माणमधुना शृणु || | ||
'''१८३''' पितामहश्चतुर्वक्त्रो लम्बकूर्चश्चतुर्भुजः |<br> | '''१८३''' पितामहश्चतुर्वक्त्रो लम्बकूर्चश्चतुर्भुजः |<br>आपिङ्गल जटाबन्ध हंसस्थो पंकजासनः || | ||
'''१८४''' दक्षिणे च भुजे तस्य दण्डः स्यादक्षसूत्रकम् |<br> | '''१८४''' दक्षिणे च भुजे तस्य दण्डः स्यादक्षसूत्रकम् |<br>कमण्डलुं करे वामे वर्हिराज्यादिकन्तथा || | ||
'''१८५''' सावित्री दक्षिणे कार्या वामे चैव सरस्वती |<br> | '''१८५''' सावित्री दक्षिणे कार्या वामे चैव सरस्वती |<br>इति ब्रह्मासमाख्यातः कथ्यते ते दिवाकरः || | ||
'''१८६''' एकचक्रो रतः सप्ततुरगोरुण सारथिः |<br> | '''१८६''' एकचक्रो रतः सप्ततुरगोरुण सारथिः |<br>तत्रस्थो भास्करो देवो मणि कुण्डलमण्डितः || | ||
'''१८७''' त्रपूषाङ्घ्रि सुरक्ताङ्गः सर्वाङ्ग कवचा वृतः |<br> | '''१८७''' त्रपूषाङ्घ्रि सुरक्ताङ्गः सर्वाङ्ग कवचा वृतः |<br>सुकेशो वा किरीटी वा त्रिनेत्रो वा द्विनेत्रकः || | ||
'''१८८''' स पत्र नालपद्मौ च कराभ्यां स्कन्धयोर्वहन् |<br> | '''१८८''' स पत्र नालपद्मौ च कराभ्यां स्कन्धयोर्वहन् |<br>पार्श्वे प्रतीहार युतः स्त्रीभिरग्ने विभूषितः || | ||
'''१८९''' साक्षसूत्रं सितं सोमं सुरूपं स कमण्डलुम् |<br> | '''१८९''' साक्षसूत्रं सितं सोमं सुरूपं स कमण्डलुम् |<br>रक्ताक्षं रक्तवर्णञ्च कुजं शक्त्यक्षमालिनम् || | ||
'''१९०''' बुधञ्चापधरं पीतं रूपाढ्यं शान्त लोचनम् |<br> | '''१९०''' बुधञ्चापधरं पीतं रूपाढ्यं शान्त लोचनम् |<br>वृद्धाकारङ्गुरुङ्गौरं साक्षसूत्र कमण्डलुम् || | ||
'''१९१''' दक्षैकाक्षं सितं शुक्रं कुण्डिका जपमालिनम् |<br> | '''१९१''' दक्षैकाक्षं सितं शुक्रं कुण्डिका जपमालिनम् |<br>भानुपुत्रमधो दृष्टिं वक्र पादं सुभीषणम् || | ||
'''१९२''' क्रूरं महाभुजञ्चैव खिङ्खिरी जपमालिनम् |<br> | '''१९२''' क्रूरं महाभुजञ्चैव खिङ्खिरी जपमालिनम् |<br>राहुं व्यात्ताननं घोरं कृष्णमर्द्धाङ्ग भूषणम् || | ||
'''१९३''' अर्द्धचन्द्रधरं साधो कथितं राहुरूपकम् |<br> | '''१९३''' अर्द्धचन्द्रधरं साधो कथितं राहुरूपकम् |<br>त्रिभोग भूषितं धूम्रन्नर नागार्द्ध रूपिणम् || | ||
'''१९४''' खड्गखेटधरं केतुं कुर्याद्वाथ कृताञ्जलिम् |<br> | '''१९४''' खड्गखेटधरं केतुं कुर्याद्वाथ कृताञ्जलिम् |<br>हेरम्वो वामनाकारो हस्ति वक्त्रत्वदन्तभृत् || | ||
'''१९५''' महोदरो महाकायः सालङ्कारश्चतुर्भुजः |<br> | '''१९५''' महोदरो महाकायः सालङ्कारश्चतुर्भुजः |<br>सर्पयज्ञोपवीती च त्र्यक्षः खण्डेन्दु शेखरः || | ||
'''१९६''' पुरन्दराङ्गुल विस्तारं दैर्घ्याद्भूयाङ्गुलं भवेत् |<br> | '''१९६''' पुरन्दराङ्गुल विस्तारं दैर्घ्याद्भूयाङ्गुलं भवेत् |<br>तस्यास्यं वसुविस्तीर्णङ्ग्रिवा स्यात्त्र्यङ्गुलोच्छ्रया || | ||
'''१९७''' रसरामाङ्गुलं शुण्डं मूलन्तस्यदिगङ्गुलम् |<br> | '''१९७''' रसरामाङ्गुलं शुण्डं मूलन्तस्यदिगङ्गुलम् |<br>अन्ते कृताङ्गुलं यावन्मध्ये सूत्रानुया ततः || | ||
'''१९८''' स रन्ध्राद्व्यङ्गुला नाभिर्व्यासान्मासाङ्गुलौ ततः |<br> | '''१९८''' स रन्ध्राद्व्यङ्गुला नाभिर्व्यासान्मासाङ्गुलौ ततः |<br>आदौ समुन्नतौ वान्ते कुंभो निविडमस्तकः || | ||
'''१९९''' नन्दनन्दाङ्गुलौ कुंभौ तन्मध्ये सूत्रमानतः |<br> | '''१९९''' नन्दनन्दाङ्गुलौ कुंभौ तन्मध्ये सूत्रमानतः |<br>दन्तकोशो भवेत् तस्य घ्राणं सार्द्धाङ्गुलंविलम् || | ||
'''२००''' कर्णौ दृगन्त विस्तीर्णौ वाहुल्ये नाङ्गुलौ मतौ |<br> | '''२००''' कर्णौ दृगन्त विस्तीर्णौ वाहुल्ये नाङ्गुलौ मतौ |<br>सर्वावयवसम्पूर्ण सर्वशोभासमन्वितः || | ||
'''२०१''' गणाधिपः समाख्यातः शरजन्मानिगद्यते |<br> | '''२०१''' गणाधिपः समाख्यातः शरजन्मानिगद्यते |<br>रसवक्त्रः शिशुर्वेशः स्यात् केशवा १२ क्षस्तथा भुजः || | ||
'''२०२''' शक्तिघण्टा पताकाब्ज पाश कुक्कुटदण्डकान् |<br> | '''२०२''' शक्तिघण्टा पताकाब्ज पाश कुक्कुटदण्डकान् |<br>वराभयं धनुर्वाणं परशुं तत्करे न्यसेत् || | ||
'''२०३''' चतुर्भुजं द्विवाहुम्वा कारयेच्छिखिवाहनम् |<br> | '''२०३''' चतुर्भुजं द्विवाहुम्वा कारयेच्छिखिवाहनम् |<br>त्र्यक्षो जटान्वितो नन्दी श्रुति वाहुर्युवा स्मृतः || | ||
'''२०४''' शूलसूत्रधरः कार्यो वराभयसमन्वितः |<br> | '''२०४''' शूलसूत्रधरः कार्यो वराभयसमन्वितः |<br>मुण्डमाली विशालाक्ष्यः श्रुति वाहुर्महोदरः || | ||
'''२०५''' त्रिनेत्रः पीतकृष्णाङ्गो वक्रश्मश्रुशिरोरुहः |<br> | '''२०५''' त्रिनेत्रः पीतकृष्णाङ्गो वक्रश्मश्रुशिरोरुहः |<br>मुण्डखड्गौ न्यसेद् दक्षे वामे खेट त्रिशूलकम् || | ||
'''२०६''' महाकालः समाख्यातः शृण्वपर्णां पुरन्दर |<br> | '''२०६''' महाकालः समाख्यातः शृण्वपर्णां पुरन्दर |<br>कन्यारूपात्व पर्णा च भूता तप परिग्रहा || | ||
'''२०७''' चतुर्वाहुस्तपोनिष्ठा ध्यायमाना महेश्वरम् |<br> | '''२०७''' चतुर्वाहुस्तपोनिष्ठा ध्यायमाना महेश्वरम् |<br>दण्डङ्कुण्डी न्यसेद् वामे दक्षे सूत्र वरन्तथा || | ||
'''२०८''' तपो गौरी समाख्याता वच्मि दुर्गान्त वा धुना |<br> | '''२०८''' तपो गौरी समाख्याता वच्मि दुर्गान्त वा धुना |<br>कुर्याद् दुर्गां प्रसन्नास्यां दिग्भुजां सारलोचनाम् || | ||
'''२०९''' सुकेश पाश विन्यासां पीनोन्नतपयोधराम् |<br> | '''२०९''' सुकेश पाश विन्यासां पीनोन्नतपयोधराम् |<br>सर्वलक्षणसम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम् || | ||
'''२१०''' स नूपुर पदाक्रान्त तलस्थ महिषासुराम् |<br> | '''२१०''' स नूपुर पदाक्रान्त तलस्थ महिषासुराम् |<br>तच्छीर्षच्चेदनोत्पन्नां स खड्गनर भेदिनीम् || | ||
'''२११''' शूलच्छेदोच्छलद्रक्त धारोक्षित धरातलाम् |<br> | '''२११''' शूलच्छेदोच्छलद्रक्त धारोक्षित धरातलाम् |<br>त्रिशूलमाशुगं खड्गं शक्तिञ्चक्रं शतक्रतो || | ||
'''२१२''' टङ्कपाशाङ्कुशं खेटमानतज्यन्धनुस्तथा |<br> | '''२१२''' टङ्कपाशाङ्कुशं खेटमानतज्यन्धनुस्तथा |<br>सव्यासव्ये करे देव्या न्यसेद् एतत् सदा युधम् || | ||
'''२१३''' इति दुर्गा सहस्राक्ष कथ्यते ते सरस्वती |<br> | '''२१३''' इति दुर्गा सहस्राक्ष कथ्यते ते सरस्वती |<br>शुभपद्म स्थिता शुभ्रा शुभ्रभूषणभूषिता || | ||
'''२१४''' सुप्रस्ताक्ष करमास्ता वीणाभृत्स्यात् सरस्वती |<br> | '''२१४''' सुप्रस्ताक्ष करमास्ता वीणाभृत्स्यात् सरस्वती |<br>अन्ये ये वहवो भेदा मूर्तीनान्तु शतक्रतो || | ||
'''२१५''' सम्यक्ता न योजयेज्ज्ञात्वा स्थानमानादि भेदतः |<br> | '''२१५''' सम्यक्ता न योजयेज्ज्ञात्वा स्थानमानादि भेदतः |<br>समासेन समुद्दिष्टं प्रतिमा लक्षणं मया || | ||
'''२१६''' पुनः संक्षेपतो वक्ष्ये पिण्डिकायाश्च वर्तनाम् |<br> | '''२१६''' पुनः संक्षेपतो वक्ष्ये पिण्डिकायाश्च वर्तनाम् |<br>इति मोहचूरोत्तरे व्यक्तलिङ्ग प्रख्याने द्वितीयः पटलः || | ||
===Kapitel 3: Sockel und tragende Kraft=== | ===Kapitel 3: Sockel und tragende Kraft=== | ||
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[[Datei:Shiva-parvati-2.1-500.jpg|thumb|Shiva und Shakti: zum Sanskritabschnitt über den Sockel.]] | [[Datei:Shiva-parvati-2.1-500.jpg|thumb|Shiva und Shakti: zum Sanskritabschnitt über den Sockel.]] | ||
'''२१७''' ययाव्या मोहितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमन् |<br> | '''२१७''' ययाव्या मोहितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमन् |<br>शक्तिक्रिया ह्वयाशक्र पिण्डिका सैव कीर्तिता || | ||
'''२१८''' ज्ञात्वा तस्मात् परं पीठं देहस्थं सुसमाहितः |<br> | '''२१८''' ज्ञात्वा तस्मात् परं पीठं देहस्थं सुसमाहितः |<br>अपरं वर्तये सश्चान्नाममानादि भेदतः || | ||
'''२१९''' विधिना स्थापितं लिङ्गं पिण्डिका रहितं यदा |<br> | '''२१९''' विधिना स्थापितं लिङ्गं पिण्डिका रहितं यदा |<br>तदा पूजान्न गृह्णाति सान्निध्यन्नैव गच्छति || | ||
'''२२०''' तस्मात् पीठं प्रकर्तव्यं यत्नमास्थाय सुव्रत |<br> | '''२२०''' तस्मात् पीठं प्रकर्तव्यं यत्नमास्थाय सुव्रत |<br>येन सर्वफलावाप्तिर्जायते साधकस्य तु || | ||
'''२२१''' स्थूलतां पिण्डिकायाश्च त्यागमष्टाम्र कस्य तु |<br> | '''२२१''' स्थूलतां पिण्डिकायाश्च त्यागमष्टाम्र कस्य तु |<br>आत्मभूतागवेशञ्च ज्ञात्वा पीठं प्रकल्पयेत् || | ||
'''२२२''' व्यक्ताव्यक्ते च सुव्यक्ते अव्यक्ते पांकशासन |<br> | '''२२२''' व्यक्ताव्यक्ते च सुव्यक्ते अव्यक्ते पांकशासन |<br>यथा तेषां भवेत् पीठं तथा ते कथ्यते धुना || | ||
'''२२३''' लिङ्गदैर्घ्येण विस्तीर्णं हरिभागान्त मुच्छ्रितम् |<br> | '''२२३''' लिङ्गदैर्घ्येण विस्तीर्णं हरिभागान्त मुच्छ्रितम् |<br>अव्यक्ते मुखलिङ्गे च पीठमानमुदाहृतम् || | ||
'''२२४''' स्वायामेन भवेत् पीठन्तदर्द्धाद्विस्मृतं मतम् |<br> | '''२२४''' स्वायामेन भवेत् पीठन्तदर्द्धाद्विस्मृतं मतम् |<br>उच्छ्रितिः पूर्वमाख्याता सुव्यक्ते पीठ कल्पना || | ||
'''२२५''' पीठ व्यास चतुर्थांश प्रणालं वाह्यनिर्गतम् |<br> | '''२२५''' पीठ व्यास चतुर्थांश प्रणालं वाह्यनिर्गतम् |<br>मूले तन्मान विस्तीर्णं कुर्यादग्रे तदर्द्धतः || | ||
'''२२६''' विस्तरस्य त्रिभागेन तोय मार्ग प्रकल्पयेत् |<br> | '''२२६''' विस्तरस्य त्रिभागेन तोय मार्ग प्रकल्पयेत् |<br>कुशस्वभ्रान्विता कार्या पिण्डिका लक्षणान्विता || | ||
'''२२७''' पिण्डिकापार्द्ध वाहुल्यं कुशदैर्घ्यं पुरन्दर |<br> | '''२२७''' पिण्डिकापार्द्ध वाहुल्यं कुशदैर्घ्यं पुरन्दर |<br>कुश वाहुल्यरूपेण पीठे स्वभ्रं प्रकल्पयेत् || | ||
'''२२८''' मोहचूरोत्तरे शास्त्रे पिण्डिका वसुसंख्यया |<br> | '''२२८''' मोहचूरोत्तरे शास्त्रे पिण्डिका वसुसंख्यया |<br>तासान्नामानि कथ्यन्ते सांप्रतन्ते शचीपते || | ||
'''२२९''' प्रथमा कमला तत्र द्वितीया च पयोधरा |<br> | '''२२९''' प्रथमा कमला तत्र द्वितीया च पयोधरा |<br>तृतीया च भवेद् वापी चतुर्थी वज्रसंज्ञिता || | ||
'''२३०''' चन्द्राख्या पञ्चमीख्याता षष्ठी चैवामृता भवेत् |<br> | '''२३०''' चन्द्राख्या पञ्चमीख्याता षष्ठी चैवामृता भवेत् |<br>सम्वर्ता सप्तमी शक्र नन्दिकाख्या तु चाष्टमी || | ||
'''२३१''' लिङ्गदैर्घ्यस्य सूर्यांशं मेखलार्थं प्रकल्पयेत् |<br> | '''२३१''' लिङ्गदैर्घ्यस्य सूर्यांशं मेखलार्थं प्रकल्पयेत् |<br>लिङ्गाश्रयश्च सूर्यांशं शेषं पश्चाद् विवर्तयेत् || | ||
'''२३२''' भूतेन्दु भाजिते क्षेत्रे पादपद्मन्तथाम्वुजम् |<br> | '''२३२''' भूतेन्दु भाजिते क्षेत्रे पादपद्मन्तथाम्वुजम् |<br>कर्णिका कण्ठदेशञ्च वर्तयेत् सुसमाहितः || | ||
'''२३३''' रूपवेदकरे चन्द्रे राम भागैर्यथा क्रमम् |<br> | '''२३३''' रूपवेदकरे चन्द्रे राम भागैर्यथा क्रमम् |<br>चन्द्रद्वन्द्वाब्दैर्जलजे तुल्ये पूर्वा परे हिते || | ||
'''२३४''' जया सिद्धा सुरा दैत्या मुनयो वीतमत्सराः |<br> | '''२३४''' जया सिद्धा सुरा दैत्या मुनयो वीतमत्सराः |<br>एषां पद्मेति विख्याता महासिद्धि निधानभूः || | ||
'''२३५''' भूपांशे * य कोणाग्नि क्ष्माग्नि भागैर्यथा क्रमम् |<br> | '''२३५''' भूपांशे * य कोणाग्नि क्ष्माग्नि भागैर्यथा क्रमम् |<br>योजगत्कुम्भवेद्यः स्यात् कण्ठो रूपांशवेशतः || | ||
'''२३६''' श्रुति पट्टीपयोधात्र्या वाप्याश्चैव पुरन्दर |<br> | '''२३६''' श्रुति पट्टीपयोधात्र्या वाप्याश्चैव पुरन्दर |<br>पुरन्दर * * दासा वापी ज्ञेया तदा यता || | ||
'''२३७''' भानुभक्ते च पीठार्द्धे क्ष्माग्नि द्विक्षान्ति युग्मकैः |<br> | '''२३७''' भानुभक्ते च पीठार्द्धे क्ष्माग्नि द्विक्षान्ति युग्मकैः |<br>पादोर्जगती घटो वेदी ग्रीवास्यादेकवेशतः || | ||
'''२३८''' एकेनोत्तर वेदी च भागाभ्यां पट्टिके नृप |<br> | '''२३८''' एकेनोत्तर वेदी च भागाभ्यां पट्टिके नृप |<br>वज्रामेवं विजानीयात् पुत्रराज्य प्रदायिनी || | ||
'''२३९''' नागांशभाजितोत्सेधे रूपमात्राब्द नेत्रकैः |<br> | '''२३९''' नागांशभाजितोत्सेधे रूपमात्राब्द नेत्रकैः |<br>अङ्घ्रिजङ्घा तथा धारः कण्ठश्चैवोर्द्ध पट्टिके || | ||
'''२४०''' शान्तिपुष्टि प्रदाधन्या सर्वसिद्धि प्रदायिनी |<br> | '''२४०''' शान्तिपुष्टि प्रदाधन्या सर्वसिद्धि प्रदायिनी |<br>एषा चन्द्रकला साम्रिश्च्युतापश्चामृता मता || | ||
'''२४१''' षड्भागभाजिते क्षेत्रे जङ्घा कुम्भोर्द्ध पट्टिका |<br> | '''२४१''' षड्भागभाजिते क्षेत्रे जङ्घा कुम्भोर्द्ध पट्टिका |<br>कण्ठोपकण्ठ पट्टः स्यात् संवर्ता पिण्डिका हरे || | ||
'''२४२''' अष्टां १६ शभाजितोच्छ्राये यक्षौ तुरग भाजितौ |<br> | '''२४२''' अष्टां १६ शभाजितोच्छ्राये यक्षौ तुरग भाजितौ |<br>पादमारभ्यग्रीवान्तमेकैकं ह्रासयेत् पदम् || | ||
'''२४३''' ग्रीवा द्वाभ्यान्तथा जङ्घा प्रवेशो मुनि संख्यया |<br> | '''२४३''' ग्रीवा द्वाभ्यान्तथा जङ्घा प्रवेशो मुनि संख्यया |<br>निर्गमो ऋतुभागेन यथा पीठानुमानतः || | ||
'''२४४''' सर्वसिद्धिप्रदा भद्रा सर्वेषां सर्वदाहिता |<br> | '''२४४''' सर्वसिद्धिप्रदा भद्रा सर्वेषां सर्वदाहिता |<br>नन्दावर्ताङ्किता भद्रा नन्दावर्तेति विश्रुता || | ||
'''२४५''' इति पिण्डीसमाख्याता वक्ष्ये ब्रह्मशिलान्तव |<br> | '''२४५''' इति पिण्डीसमाख्याता वक्ष्ये ब्रह्मशिलान्तव |<br>ब्रह्मभागसमाभद्रा कार्या ब्रह्मशिला शुभा || | ||
'''२४६''' दिगङ्गुलैर्यथा व्यासादधिका ज्येष्ठज्येष्ठके |<br> | '''२४६''' दिगङ्गुलैर्यथा व्यासादधिका ज्येष्ठज्येष्ठके |<br>एकैकाङ्गुलमन्येषां ह्रासयेत् क्रमतो हरे || | ||
'''२४७''' तन्मानामेखला कार्या खातं मेखल या समम् |<br> | '''२४७''' तन्मानामेखला कार्या खातं मेखल या समम् |<br>गंभीरन्तत्समुद्दिष्टं व्यासं वच्मि तवाधुना || | ||
'''२४८''' ब्रह्मव्यासेन विस्तीर्णमधिकं षड्यवं वहिः |<br> | '''२४८''' ब्रह्मव्यासेन विस्तीर्णमधिकं षड्यवं वहिः |<br>यवार्द्धार्द्धन्तु चान्येषां ह्रासयेत् क्रमतः पुनः || | ||
'''२४९''' अधिकं विस्तरेणैव कन्यसेद्वियवं भवेत् |<br> | '''२४९''' अधिकं विस्तरेणैव कन्यसेद्वियवं भवेत् |<br>सूत्रेण संमितं कृत्वा वर्तयेत् सुतलं समम् || | ||
'''२५०''' खात मध्ये तु पत्नेन रत्नाधाराणि चोत्किरेत् |<br> | '''२५०''' खात मध्ये तु पत्नेन रत्नाधाराणि चोत्किरेत् |<br>दिग्विदिक्षु ततो मध्ये वृत्तवत् परिकल्पयेत् || | ||
'''२५१''' यथा ब्रह्मशिला कार्या ब्रह्मभागाधिका हरे |<br> | '''२५१''' यथा ब्रह्मशिला कार्या ब्रह्मभागाधिका हरे |<br>तथा कूर्म शिलाङ्कुर्यात् किन्तु ब्रह्मशिलाधिकाम् || | ||
'''२५२''' इति ब्रह्मशिला चैव प्रणालमधुनोच्यते |<br> | '''२५२''' इति ब्रह्मशिला चैव प्रणालमधुनोच्यते |<br>स प्रणालं भवेत् पीठं लौहं शैलञ्च रत्नजम् || | ||
'''२५३''' पार्थिवं दारुजं प्रोक्तं प्रणाल रहितं हितम् |<br> | '''२५३''' पार्थिवं दारुजं प्रोक्तं प्रणाल रहितं हितम् |<br>रुद्रभागसमायामः प्रान्ते तदर्द्धविस्तरः || | ||
'''२५४''' कण्ठादूर्द्ध सदाश्रेष्ठः स्वत्रिभागाम्बुनिर्गमः |<br> | '''२५४''' कण्ठादूर्द्ध सदाश्रेष्ठः स्वत्रिभागाम्बुनिर्गमः |<br>कण्ठोर्द्ध कर्म सम्पन्नः प्रणालं सुखदो यतः || | ||
'''२५५''' ततो न्यूनाधिकः पुंसां दुःखदः स्याच्छत क्रतो |<br> | '''२५५''' ततो न्यूनाधिकः पुंसां दुःखदः स्याच्छत क्रतो |<br>श्रुत्यसाष्टाम्रकं पीठे ब्रह्माच्युत विभागतः || | ||
'''२५६''' लिङ्गस्थौल्य प्रमाणेन रन्ध्रं स्यात् कशिलाखवत् |<br> | '''२५६''' लिङ्गस्थौल्य प्रमाणेन रन्ध्रं स्यात् कशिलाखवत् |<br>वस्वसञ्चोत्तमे लिङ्गे दृश्यं भूत यवं भवेत् || | ||
'''२५७''' यवार्द्धार्द्धन्तु चान्येषां ह्रासयेत् क्रमतस्ततः |<br> | '''२५७''' यवार्द्धार्द्धन्तु चान्येषां ह्रासयेत् क्रमतस्ततः |<br>समासेन समुद्दिष्टं पीठं ब्रह्मशिलादिकम् || | ||
'''२५८''' सुरधामानि कथ्यन्ते भूपरीक्षादि पूर्वकम् |<br> | '''२५८''' सुरधामानि कथ्यन्ते भूपरीक्षादि पूर्वकम् |<br>इति मोहचूरोत्तरे पीठ ब्रह्मशिलादि प्रख्याने तृतीयः पटलः || | ||
===Kapitel 4: Tempel, Klöster und Siedlungen=== | ===Kapitel 4: Tempel, Klöster und Siedlungen=== | ||
'''२५९''' अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमेश्चैव परिग्रहम् |<br> | '''२५९''' अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमेश्चैव परिग्रहम् |<br>शल्योद्धारादिकं सर्वं वलिकर्म गृहादिकम् || | ||
'''२६०''' सरः सुनलिनीच्छन्नं निरस्तरविरश्मिषु |<br> | '''२६०''' सरः सुनलिनीच्छन्नं निरस्तरविरश्मिषु |<br>हंसकाक्षिक कल्हार वीथी विमलवीचिषु || | ||
'''२६१''' हंसकारण्ड वा क्रौञ्च चक्र वा कविराजिषु |<br> | '''२६१''' हंसकारण्ड वा क्रौञ्च चक्र वा कविराजिषु |<br>पर्यन्त पूरितच्छाया विश्रान्त जलवीचिषु || | ||
'''२६२''' पुण्यक्षेत्रादि शैलेषु निर्हरोपान्त (?) भूमिषु |<br> | '''२६२''' पुण्यक्षेत्रादि शैलेषु निर्हरोपान्त (?) भूमिषु |<br>नदीतीरे तडागे वा वापी पुष्करिणी तटे || | ||
'''२६३''' चत्वरे दीर्घिकाद्यासु शृङ्गाटे च चतुष्पथे |<br> | '''२६३''' चत्वरे दीर्घिकाद्यासु शृङ्गाटे च चतुष्पथे |<br>रमन्ते देवता नित्यं वनेषू पवनेषु च || | ||
'''२६४''' ग्रामखेटपुरादौ तु स्वामित्वं यत्र विद्यते |<br> | '''२६४''' ग्रामखेटपुरादौ तु स्वामित्वं यत्र विद्यते |<br>आदौ परीक्ष्य भूभागं वर्णिनां शुभमिच्छताम् || | ||
'''२६५''' सिताविप्रे नृपे रक्ता पीता वैश्यो सितेतरा |<br> | '''२६५''' सिताविप्रे नृपे रक्ता पीता वैश्यो सितेतरा |<br>दीपखात जले नादौ वर्णानां लक्षयेच्छुभम् || | ||
'''२६६''' पूर्वप्लवा नृपस्योक्ता वैश्ये स्याद् दक्षिणप्लवा |<br> | '''२६६''' पूर्वप्लवा नृपस्योक्ता वैश्ये स्याद् दक्षिणप्लवा |<br>उदक् प्लवाद्विजातीनां शूद्राणां पश्चिम प्लवा || | ||
'''२६७''' पूर्वोत्तरे शतो निम्ना सर्वसाधारणा मही |<br> | '''२६७''' पूर्वोत्तरे शतो निम्ना सर्वसाधारणा मही |<br>उप्तवीजा तु सञ्जाता तृतीये ह्युत्तमा मही || | ||
'''२६८''' पञ्चमे मध्यमा प्रोक्ता सप्तमे वाधमास्मृता |<br> | '''२६८''' पञ्चमे मध्यमा प्रोक्ता सप्तमे वाधमास्मृता |<br>याम्ये न गोधनं चाप्ये सौम्ये सस्यं हरेर्जलम् || | ||
'''२६९''' नाति मृद्दीन कठिना सुखस्पर्शा समाघना |<br> | '''२६९''' नाति मृद्दीन कठिना सुखस्पर्शा समाघना |<br>स्निग्धा गुर्वी दृका शुद्धा सुगन्धा दोषवर्जिता || | ||
'''२७०''' स्वांदूदकान स्फुटिता सुरूपाति मनोहरा |<br> | '''२७०''' स्वांदूदकान स्फुटिता सुरूपाति मनोहरा |<br>स गर्भा सोषराछिद्रा स सत्वा च स शोणिता || | ||
'''२७१''' पूति गन्धादिभिर्दुष्टा ज्ञात्वा सम्यक् त्यजेन् महीम् |<br> | '''२७१''' पूति गन्धादिभिर्दुष्टा ज्ञात्वा सम्यक् त्यजेन् महीम् |<br>एवं परीक्ष्य भूभागङ्गा ह्योदोषविवर्जितः || | ||
'''२७२''' सद्वारतिथिलग्नेन्दु युतेह्नि जपमङ्गलैः |<br> | '''२७२''' सद्वारतिथिलग्नेन्दु युतेह्नि जपमङ्गलैः |<br>एवं परिग्रहेच्छक्र शिवकुम्भ भ्रमेण तु || | ||
'''२७३''' सुमांसुतक्षितां कृत्वा सीमाशुद्धि पुरःसराम् |<br> | '''२७३''' सुमांसुतक्षितां कृत्वा सीमाशुद्धि पुरःसराम् |<br>ततः प्रसारयेत् सूत्रमाचार्यः शिल्पिभिर्वृतः || | ||
'''२७४''' उदीचीं ध्रुववेधेन प्राचीम्वा ध्रुवतारया |<br> | '''२७४''' उदीचीं ध्रुववेधेन प्राचीम्वा ध्रुवतारया |<br>पुष्पपौष्णमघावेधादथ संक्वादि साधनैः || | ||
'''२७५''' एवं पूर्वा परं ज्ञात्वा मध्यें कं पार्श्वयोर्वियत् |<br> | '''२७५''' एवं पूर्वा परं ज्ञात्वा मध्यें कं पार्श्वयोर्वियत् |<br>मतिमान् तुल्य सूत्रेण यथा स्याद् दक्षिणोत्तरम् || | ||
'''२७६''' ततोप्यर्द्धं समादाय विदिक्कोणेषु लाञ्छयेत् |<br> | '''२७६''' ततोप्यर्द्धं समादाय विदिक्कोणेषु लाञ्छयेत् |<br>चतुरस्रन्ततः कृत्वा नवधा विभजेत् पुनः || | ||
'''२७७''' वायव्या नलरक्षेश गतो वंशौ शचीपते |<br> | '''२७७''' वायव्या नलरक्षेश गतो वंशौ शचीपते |<br>रज्वष्टकन्तु कर्तव्यं षट्पदन्त्रिपदं हरे || | ||
'''२७८''' ततः स्रग्वलि धूपाद्यैः पूजयेद् वास्तु गान्सुरान् |<br> | '''२७८''' ततः स्रग्वलि धूपाद्यैः पूजयेद् वास्तु गान्सुरान् |<br>तन्मध्ये पूजयेत् पृथ्वीं धारिकां शक्ति रूपिणीम् || | ||
'''२७९''' वास्तुं संपूजयेत् पश्चाद् ब्रह्माणञ्च शचीपते |<br> | '''२७९''' वास्तुं संपूजयेत् पश्चाद् ब्रह्माणञ्च शचीपते |<br>रन्ध्राधिपं विजानीयान् मरीच्याघारसाधिपाः || | ||
'''२८०''' द्विपदा आपवत् साद्या ज्ञेयाश्चाष्टौ सुराधिप |<br> | '''२८०''' द्विपदा आपवत् साद्या ज्ञेयाश्चाष्टौ सुराधिप |<br>द्वात्रिंशद् देवता बाह्ये हराद्याः पदिका स्थिताः || | ||
'''२८१''' ब्रह्मादिदितिपर्यन्ताश्चत्वारिंशच्च पञ्च च |<br> | '''२८१''' ब्रह्मादिदितिपर्यन्ताश्चत्वारिंशच्च पञ्च च |<br>वास्त्वङ्गे देवतानाञ्च संख्या ह्येषा पुरन्दर || | ||
'''२८२''' वहिरीशादि च रकाद्याः स्कन्दायाः पूर्वतः स्थिताः |<br> | '''२८२''' वहिरीशादि च रकाद्याः स्कन्दायाः पूर्वतः स्थिताः |<br>इत्यष्टौ देवता वाह्ये एवं वास्तु नरः स्थितः || | ||
'''२८३''' रन्द्राद्या लोकपाः पूज्या ये चान्ये तत् समाश्रिता |<br> | '''२८३''' रन्द्राद्या लोकपाः पूज्या ये चान्ये तत् समाश्रिता |<br>भूत वर्गाश्च ये तत्र स्रग्धूपवलिभिर्वरैः || | ||
'''२८४''' सर्व मर्ममयो वास्तुस्तस्यात् पीडान्न कारयेत् |<br> | '''२८४''' सर्व मर्ममयो वास्तुस्तस्यात् पीडान्न कारयेत् |<br>चालयित्वा यवं वार्द्धं किञ्चित् पूर्वोत्तरन्नयेत् || | ||
'''२८५''' वस्तौ प्रचालिते शक्रमर्मौघश्चलितो भवेत् |<br> | '''२८५''' वस्तौ प्रचालिते शक्रमर्मौघश्चलितो भवेत् |<br>एवं यत् क्रियते धामसुराणां वास्तु पूर्वकम् || | ||
'''२८६''' तदिष्ट सिद्धये ज्ञेयमन्यथा तु विपर्ययः |<br> | '''२८६''' तदिष्ट सिद्धये ज्ञेयमन्यथा तु विपर्ययः |<br>शाकुनोक्त्या जनोक्त्या वा प्राणीनां सूत्र लंघने || | ||
'''२८७''' कण्डूप नादि विज्ञानैर्ज्ञात्वा शल्यं समुद्धरेत् |<br> | '''२८७''' कण्डूप नादि विज्ञानैर्ज्ञात्वा शल्यं समुद्धरेत् |<br>कैवल्य ज्ञान सम्पन्नो ज्योतिः शास्त्र विधानवित् || | ||
'''२८८''' अध्यात्म ज्ञान कुशलः शल्योद्धारे लभेद् यशः |<br> | '''२८८''' अध्यात्म ज्ञान कुशलः शल्योद्धारे लभेद् यशः |<br>जलान्तं कर्करान्तं वा खनेद्वारोपरोधतः || | ||
'''२८९''' करापूरैस्तु पाषाणैर्मृत्तिकाष्टाङ्गुलान्तरैः |<br> | '''२८९''' करापूरैस्तु पाषाणैर्मृत्तिकाष्टाङ्गुलान्तरैः |<br>तावदा पूरयेत् खातं यावत् पादोनमागतम् || | ||
'''२९०''' भूतलं सुसमङ्कृत्वा सूत्रयित्वा यथा पुरा |<br> | '''२९०''' भूतलं सुसमङ्कृत्वा सूत्रयित्वा यथा पुरा |<br>शिलान्यासं प्रकुर्वीत तासां संक्षेप लक्षणम् || | ||
'''२९१''' चतुरस्रा हस्तमात्राः पञ्चवस्वऽऽगुलोच्छ्रिताः |<br> | '''२९१''' चतुरस्रा हस्तमात्राः पञ्चवस्वऽऽगुलोच्छ्रिताः |<br>पङ्कजांकाघटाः पञ्चरत्न मध्यादि पूरिताः || | ||
'''२९२''' पञ्चगव्य कषायादि धौताः सुद्धाः सुवेष्टिताः |<br> | '''२९२''' पञ्चगव्य कषायादि धौताः सुद्धाः सुवेष्टिताः |<br>नन्दा भद्रा जया रिक्ता पूर्णाख्याभिः सुपूजिताः || | ||
'''२९३''' धरादि तत्व विन्यस्ता बुद्ध्यन्त पदगर्भिताः |<br> | '''२९३''' धरादि तत्व विन्यस्ता बुद्ध्यन्त पदगर्भिताः |<br>तत्रात्म तत्वं मात्रान्तं विद्या तत्वं मनोत्तरम् || | ||
'''२९४''' गर्वबुद्धी तृतीये तु ततस्तत्वाधिपाभ्यसेत् |<br> | '''२९४''' गर्वबुद्धी तृतीये तु ततस्तत्वाधिपाभ्यसेत् |<br>स लोकपे शिवे यष्टे दूताग्नौ संविभाजिते || | ||
'''२९५''' तर्पितेषु च मन्त्रेषु समस्ता ध्वनि शोधिते |<br> | '''२९५''' तर्पितेषु च मन्त्रेषु समस्ता ध्वनि शोधिते |<br>न्यस्ते तत्र शिलाव्राते कुंभन्यास पुरःसरे || | ||
'''२९६''' पद्मं वाथ महापद्मं शङ्खं मरकतन्तथा |<br> | '''२९६''' पद्मं वाथ महापद्मं शङ्खं मरकतन्तथा |<br>समुद्रं पञ्चमन्तेषु नाममन्त्रैर्विशोधनम् || | ||
'''२९७''' पूजयित्वा पुरा वास्तुं मध्ये शक्तिं निवेशयेत् |<br> | '''२९७''' पूजयित्वा पुरा वास्तुं मध्ये शक्तिं निवेशयेत् |<br>तस्योपरि समुद्राख्यं पूर्णान्तस्योर्द्धतो न्यसेत् || | ||
'''२९८''' वह्न्यादौ विन्यसेच्छक्तिं पद्मादीनान्निवेशनम् |<br> | '''२९८''' वह्न्यादौ विन्यसेच्छक्तिं पद्मादीनान्निवेशनम् |<br>स्थापितव्याः सुनन्दाद्याभित्तिगर्भे सुनिश्चिताः || | ||
'''२९९''' उच्छ्रेयेणोत्तमं पीठं प्रासादार्द्धेन कीर्तितम् |<br> | '''२९९''' उच्छ्रेयेणोत्तमं पीठं प्रासादार्द्धेन कीर्तितम् |<br>मध्यमं पादहीनन्तु उत्तमार्द्धेन कन्यसम् || | ||
'''३००''' एवमाचिनुयात्पीठं सुलेपसन्धिवर्जितम् |<br> | '''३००''' एवमाचिनुयात्पीठं सुलेपसन्धिवर्जितम् |<br>गर्भभित्यादि विन्यासं तदूर्ध्वन्तु शचीपते || | ||
'''Tempelmaße und Tempelformen''' | '''Tempelmaße und Tempelformen''' | ||
'''३०१''' कोणहस्तं समारभ्य कोणवृद्ध्या पुरन्दर |<br> | '''३०१''' कोणहस्तं समारभ्य कोणवृद्ध्या पुरन्दर |<br>ऋतुरामान्तपर्यन्ताः प्रासादाग्रहसंख्यया || | ||
'''३०२''' खरूपाद्भुत वृद्ध्या वा खभूतान्तान दैव तु |<br> | '''३०२''' खरूपाद्भुत वृद्ध्या वा खभूतान्तान दैव तु |<br>नागभक्ते युगैः पीठं गर्भः कार्यो दिवाकरैः || | ||
'''३०३''' भित्तयो वसुवेदैश्च जंघाभित्ति समोच्छ्रिता |<br> | '''३०३''' भित्तयो वसुवेदैश्च जंघाभित्ति समोच्छ्रिता |<br>शिखरन्द्विगुणङ्कार्यं शुकाघ्राशिखरार्द्धगा || | ||
'''३०४''' पृथुत्वं गर्भवत् कार्यं तृतीयांशेन निर्गमम् |<br> | '''३०४''' पृथुत्वं गर्भवत् कार्यं तृतीयांशेन निर्गमम् |<br>पीठं वा लिङ्गमानेन पीठार्द्धेन परिभ्रमः || | ||
'''३०५''' पीठवच्च स्मृतं द्वारं द्विधोच्चं भित्तयोपराः |<br> | '''३०५''' पीठवच्च स्मृतं द्वारं द्विधोच्चं भित्तयोपराः |<br>शुकाघ्रा पूर्ववज्ज्ञेया जंघा शिखरं शतक्रतो || | ||
'''३०६''' चतुरस्रे चतुर्भक्ते वेदगर्भार्द्ध पीठके |<br> | '''३०६''' चतुरस्रे चतुर्भक्ते वेदगर्भार्द्ध पीठके |<br>लिङ्गं पीठसमं द्वारं भित्तयश्च तथा विधाः || | ||
'''३०७''' गर्भवन्नासिका तत्र पीठकोणान्तरोङ्गता |<br> | '''३०७''' गर्भवन्नासिका तत्र पीठकोणान्तरोङ्गता |<br>समण्डपे सरांशेन वेदगर्भार्द्ध निर्गता || | ||
'''३०८''' रन्ध्रभक्ते पदं पीठं गर्भोभित्यन्तरं पुनः |<br> | '''३०८''' रन्ध्रभक्ते पदं पीठं गर्भोभित्यन्तरं पुनः |<br>पदिका च वहिर्भित्तिः शुकाघ्रे च पदोद्गते || | ||
'''३०९''' हेमादि रत्नलिङ्गानामुक्तो पङ्गुप्तिहेतुतः |<br> | '''३०९''' हेमादि रत्नलिङ्गानामुक्तो पङ्गुप्तिहेतुतः |<br>आसादि वाणवृद्धेषु हस्तराशौ द्विधा कृते || | ||
'''३१०''' लिङ्गवत् पीठमर्द्धेन सैकेनावरणत्रयम् |<br> | '''३१०''' लिङ्गवत् पीठमर्द्धेन सैकेनावरणत्रयम् |<br>द्व्यधिकेन वहिर्भित्तिः शुकाघ्रादि पुरोदितम् || | ||
'''३११''' वेदयुग्मादितः कृत्वा कोणहस्तविवृद्धितः |<br> | '''३११''' वेदयुग्मादितः कृत्वा कोणहस्तविवृद्धितः |<br>रसरामान्त पर्यन्तः प्रासादानामनुक्रमात् || | ||
'''३१२''' लिङ्गदैर्घ्य समंपीठं तत्रिभागा वृति त्रयम् |<br> | '''३१२''' लिङ्गदैर्घ्य समंपीठं तत्रिभागा वृति त्रयम् |<br>वहिर्भित्तिश्च पीठार्द्धङ्करराशौ कराहते || | ||
'''३१३''' धामतुल्यन्तु रन्ध्रान्तं भित्यन्तङ्गर्भमानकम् |<br> | '''३१३''' धामतुल्यन्तु रन्ध्रान्तं भित्यन्तङ्गर्भमानकम् |<br>ब्रह्मसूत्र शुकाघ्राद्वाधामकोणाच्च सूत्रयेत् || | ||
'''३१४''' द्वादशैते स्रान्धाराणान्तुर्यास्ताः स्युः पुरन्दर |<br> | '''३१४''' द्वादशैते स्रान्धाराणान्तुर्यास्ताः स्युः पुरन्दर |<br>प्रासाद शतसंस्थाना भुक्तये मुक्तये हिताः || | ||
'''३१५''' इति संक्षेप संसिद्धं लक्षणं सर्वधामसु |<br> | '''३१५''' इति संक्षेप संसिद्धं लक्षणं सर्वधामसु |<br>विशेष व्यक्तयेशक्र पृथग् भूतन्निगद्यते || | ||
'''३१६''' षोडशार्काष्टमं भागं वहिः कृत्वा पुरन्दर |<br> | '''३१६''' षोडशार्काष्टमं भागं वहिः कृत्वा पुरन्दर |<br>ज्येष्ठादीनाङ्क्रमेणैव मेर्वादौ रूपसिद्धये || | ||
'''३१७''' मेरूस्तत्पूर्वविष्कम्भो हिमयुग्भद्रको गजः |<br> | '''३१७''' मेरूस्तत्पूर्वविष्कम्भो हिमयुग्भद्रको गजः |<br>विमानो हरिहंसौ च श्रीवत्सोथ खगाधिपः || | ||
'''३१८''' वडमीतुर्य वस्वस्त्रो विकारास्त्रो गृहाधिपः |<br> | '''३१८''' वडमीतुर्य वस्वस्त्रो विकारास्त्रो गृहाधिपः |<br>वृत्तश्चेन्द्र कलासंख्या स्वाधाराश्च पुरन्द्र || | ||
'''३१९''' भद्रस्तु पञ्चधा ज्ञेयो ज्ञेयो वृत्तश्चतुर्विधः |<br> | '''३१९''' भद्रस्तु पञ्चधा ज्ञेयो ज्ञेयो वृत्तश्चतुर्विधः |<br>श्रीवत्सोपि तथा ज्ञेयस्त्रिविधो मन्दिराधिपः || | ||
'''३२०''' विभज्य लक्षणं स्पष्टं मेर्वादौते निगद्यते |<br> | '''३२०''' विभज्य लक्षणं स्पष्टं मेर्वादौते निगद्यते |<br>सूर्येन्दु भाजिते क्षेत्रे तिर्यग् वेद विभाजिते || | ||
'''३२१''' चतुष्कोणे रसन् त्यक्ता तत् पिण्डी स्याद् विपर्यये |<br> | '''३२१''' चतुष्कोणे रसन् त्यक्ता तत् पिण्डी स्याद् विपर्यये |<br>संवेश निर्गमं शक्र शेषं ज्ञात्वा विवर्तयेत् || | ||
'''३२२''' तुष्टिं वाणानलैर्वेशश्चण्डीवारगुणैर्गतिः |<br> | '''३२२''' तुष्टिं वाणानलैर्वेशश्चण्डीवारगुणैर्गतिः |<br>चतुर्थे यत्र भङ्गाघं कुर्यान्मध्य रथोङ्गतिम् || | ||
'''३२३''' सूर्यदिग्रसभागैस्तु शेषमेवं विवर्तयेत् |<br> | '''३२३''' सूर्यदिग्रसभागैस्तु शेषमेवं विवर्तयेत् |<br>चतुर्द्वारश्चतुर्घ्राणशृङ्गषोडशनासिकः || | ||
'''३२४''' वालवेदानलद्विद्विभूमिकाघाट पञ्चकः |<br> | '''३२४''' वालवेदानलद्विद्विभूमिकाघाट पञ्चकः |<br>कामार्केशदिगष्ठाधि यूति शृङ्गं ततोष्टकम् || | ||
'''३२५''' वेदिकोर्द्धे सहैकेन सपादन्तु शतं भवेत् |<br> | '''३२५''' वेदिकोर्द्धे सहैकेन सपादन्तु शतं भवेत् |<br>वेदी नितम्बयोर्मध्यं खाकाश द्वय भाजितम् || | ||
'''३२६''' तत्राद्या भूमिका कार्या विंशद्भागैस्तदर्द्धतः |<br> | '''३२६''' तत्राद्या भूमिका कार्या विंशद्भागैस्तदर्द्धतः |<br>भागैक ह्रासतो न्यासामुच्छ्रयः क्रमशो हरे || | ||
'''३२७''' भूषणैर्भूषिता कार्याः षोडशैव तु भूमयः |<br> | '''३२७''' भूषणैर्भूषिता कार्याः षोडशैव तु भूमयः |<br>शुकाघ्रार्द्धं चतुर्दिक्षु सुरूपा स्युर्मृगारयः || | ||
'''३२८''' वेदिकोपरि कर्णेषु वेदीव्यास त्रिभागतः |<br> | '''३२८''' वेदिकोपरि कर्णेषु वेदीव्यास त्रिभागतः |<br>मृगारयो विधातव्याः केशरालङ्कृता हरे || | ||
'''३२९''' दंष्ट्रा विकटघोरास्या मस्तकन्यस्त पुच्छकाः |<br> | '''३२९''' दंष्ट्रा विकटघोरास्या मस्तकन्यस्त पुच्छकाः |<br>सर्वावयवसंपूर्णाः सर्वशोभासमन्विताः || | ||
'''३३०''' वेदिकोर्द्धं चतुर्दिक्षु चत्वारो नररूपिणः |<br> | '''३३०''' वेदिकोर्द्धं चतुर्दिक्षु चत्वारो नररूपिणः |<br>दिक्पालैरप्सरोगात् विद्यातद्ग्रहकिन्नरैः || | ||
'''३३१''' मातृभिर्गणविद्येशैर्भूषयेन्नवभूमयः |<br> | '''३३१''' मातृभिर्गणविद्येशैर्भूषयेन्नवभूमयः |<br>गर्भोष्मणा मञ्जरीणां प्रायः पातभयं भवेत् || | ||
'''३३२''' द्वे द्वे रन्ध्रे ततः कुर्याद् भूमौ भूमौ जलान्तरे |<br> | '''३३२''' द्वे द्वे रन्ध्रे ततः कुर्याद् भूमौ भूमौ जलान्तरे |<br>सुरूपः कथितो मेरूर्मन्दरं शृणु साम्प्रतम् || | ||
'''३३३''' वेदवसुभाजिते क्षेत्रे तिर्यग् ब्रह्माननैः कृतैः |<br> | '''३३३''' वेदवसुभाजिते क्षेत्रे तिर्यग् ब्रह्माननैः कृतैः |<br>कर्णं गत्यानलत्यागात् कोण पिण्डीगुणांशकैः || | ||
'''३३४''' संवेशानैर्गमौ कार्यौ ऋतु कोण करैर्हरे |<br> | '''३३४''' संवेशानैर्गमौ कार्यौ ऋतु कोण करैर्हरे |<br>मध्योङ्गमः प्रकर्तव्यो भूभुपवन विभाकरैः || | ||
'''३३५''' अनेन विधिना सर्व वर्तनं सर्ववाहुषु |<br> | '''३३५''' अनेन विधिना सर्व वर्तनं सर्ववाहुषु |<br>भुवश्चतुर्दशैवात्र युक्ताः कोणेष्वया श्रयैः || | ||
'''३३६''' चतुरा घाटकैः सोपि भूतवेदाग्नि लोचनैः |<br> | '''३३६''' चतुरा घाटकैः सोपि भूतवेदाग्नि लोचनैः |<br>वेदी नितम्बयोर्मध्यमेकषष्ट्युत्तरं शतम् || | ||
'''३३७''' प्रथमाष्टा दशैर्भूमि रत्नास्त्वेकैक मर्दनात् |<br> | '''३३७''' प्रथमाष्टा दशैर्भूमि रत्नास्त्वेकैक मर्दनात् |<br>द्वाराण्यस्यापि चत्वारि चतस्रः शुकनासिकाः || | ||
'''३३८''' प्रथमायां त्रयोविंशदेवविंश द्वितीयके |<br> | '''३३८''' प्रथमायां त्रयोविंशदेवविंश द्वितीयके |<br>ऊनविंशत्तृर्तीये तु चतुर्थे दशसप्त च || | ||
'''३३९''' एकं प्राधानिकं शृङ्गं शुकाघ्रासु च षोडश |<br> | '''३३९''' एकं प्राधानिकं शृङ्गं शुकाघ्रासु च षोडश |<br>मन्दिरं वर्तयेदेवं सप्तानवति शृङ्गकम् || | ||
'''३४०''' पूर्वोक्त भूषणैर्युक्तः सुरूपोयं सुराधिप |<br> | '''३४०''' पूर्वोक्त भूषणैर्युक्तः सुरूपोयं सुराधिप |<br>षट्त्रिंश भजिते क्षेत्रे तिर्यग् वेद विभाजिते || | ||
'''३४१''' मध्यदेशे भवेदस्य भागैरष्टभिरुद्गतिः |<br> | '''३४१''' मध्यदेशे भवेदस्य भागैरष्टभिरुद्गतिः |<br>आदौ तिर्यक्त्रयं मध्यादेकं चान्तस्त्रयन्तथा || | ||
'''३४२''' लुप्त्वा विनिर्गतिर्वेदैर्यावत्कोणमवाप्नुयात् |<br> | '''३४२''' लुप्त्वा विनिर्गतिर्वेदैर्यावत्कोणमवाप्नुयात् |<br>ब्रह्मास्यैस्तु ततः कोणः कैलासमिति वर्तयेत् || | ||
'''३४३''' चतुर्द्वारञ्चतुर्नासं चतुर्मण्डप शोभितम् |<br> | '''३४३''' चतुर्द्वारञ्चतुर्नासं चतुर्मण्डप शोभितम् |<br>वेदीनितंवयोर्मध्ये ऋतु द्वन्द्वेन्दु भाजिते || | ||
'''३४४''' भूपांशैः प्रथमा भूमिः शेषास्त्वेकैक विच्युते |<br> | '''३४४''' भूपांशैः प्रथमा भूमिः शेषास्त्वेकैक विच्युते |<br>चतुरा घाटकःपि चतुस्त्रिभृद्विभूमयः || | ||
'''३४५''' वस्विन्दुः प्रथमा घाटे द्वितीये चैव षोडश |<br> | '''३४५''' वस्विन्दुः प्रथमा घाटे द्वितीये चैव षोडश |<br>चतुर्दश तृतीये तु चतुर्थे द्वादशैव तु || | ||
'''३४६''' शुकनासासु शृङ्गाणि षोडशैकन्तु मौलिकम् |<br> | '''३४६''' शुकनासासु शृङ्गाणि षोडशैकन्तु मौलिकम् |<br>प्रासादोयं प्रियः शंभोः सप्तसप्तति शृङ्गकः || | ||
'''३४७''' चतुरस्री कृते क्षेत्रे वसु लोचन भाजिते |<br> | '''३४७''' चतुरस्री कृते क्षेत्रे वसु लोचन भाजिते |<br>कर्णगत्यागुणत्यागात् कोणपिण्डी गुणांशकैः || | ||
'''३४८''' नेत्रांशे न रथो ज्ञेयो गुणांशैरपरस्ततः |<br> | '''३४८''' नेत्रांशे न रथो ज्ञेयो गुणांशैरपरस्ततः |<br>दर्शनांशरथः शक्र स्यादेवं शेष वाहुषु || | ||
'''३४९''' भद्र एष सम्प्रख्यातः कर्तुरिष्ठ विभूतिदः |<br> | '''३४९''' भद्र एष सम्प्रख्यातः कर्तुरिष्ठ विभूतिदः |<br>शिखराकुलः स एवोक्तः सर्वः सर्वार्थसिद्धिदः || | ||
'''३५०''' क्षुद्रभद्रस्वरैर्भक्ते पार्श्वयोर्लोचनच्युतेः |<br> | '''३५०''' क्षुद्रभद्रस्वरैर्भक्ते पार्श्वयोर्लोचनच्युतेः |<br>त्रिमध्यो नलः युक्तस्तु हितोयं नलिनस्तदा |<br>श्रीवत्स शिखरोवायं नन्दनः कर्तृभूतिकृत् |<br>युगास्ते भूतभागेन कर्णाद्धे भ्रमवर्तनात् || | ||
'''३५१''' वृत्तो नतपृष्टोग्रे द्व्यस्रस्तुंगाप्रकोगजः |<br> | '''३५१''' वृत्तो नतपृष्टोग्रे द्व्यस्रस्तुंगाप्रकोगजः |<br>वेदास्ते रूप युग्मांशेरधो मध्ये विपर्यये || | ||
'''३५२''' वेशश्चतुभिरशेनस्तंभो युग्मैस्तु कोणगः |<br> | '''३५२''' वेशश्चतुभिरशेनस्तंभो युग्मैस्तु कोणगः |<br>एवमन्यं च चत्वार आघाटा एक माननम् || | ||
'''३५३''' वेदरामद्विरूपैस्तु आघाटाश्चतुरो मताः |<br> | '''३५३''' वेदरामद्विरूपैस्तु आघाटाश्चतुरो मताः |<br>शुकाघ्रैकेन्दुशालायां नाद्येशस्य विवेशनम् || | ||
'''३५४''' भूताह्न भाजिते शिखरे प्रथमाभूः पुरन्दरैः |<br> | '''३५४''' भूताह्न भाजिते शिखरे प्रथमाभूः पुरन्दरैः |<br>ऊर्ध्वमेकैकसंह्रासाद् भवन्ति दशभूमयः || | ||
'''३५५''' त्रिभान्या सप्तदशतः पञ्चशच्छिखरान्वितः |<br> | '''३५५''' त्रिभान्या सप्तदशतः पञ्चशच्छिखरान्वितः |<br>विमानोयं विमानीभिर्युक्तो वै मानवर्द्धनः || | ||
'''३५६''' चतुरस्री कृते क्षेत्रे पदन्दत्वा तु पृष्ठतः |<br> | '''३५६''' चतुरस्री कृते क्षेत्रे पदन्दत्वा तु पृष्ठतः |<br>वृत्तवद् भ्रामयेद् अग्रे द्वि कोणो वृत्तगर्भकः || | ||
'''३५७''' ततो जंघा प्रदेशे स्यान् निर्गतः किञ्चिद् ऊर्ध्वतः |<br> | '''३५७''' ततो जंघा प्रदेशे स्यान् निर्गतः किञ्चिद् ऊर्ध्वतः |<br>केशरालङ्कृतः सिंहो मुनिमूर्द्धादि भूमिकः || | ||
'''३५८''' प्रियो भवेन् नृसिंहस्य सिंहाकारोग्र नासिकः |<br> | '''३५८''' प्रियो भवेन् नृसिंहस्य सिंहाकारोग्र नासिकः |<br>इभकुंभ कर्णयोर्मध्ये प्रसक्त हरिभूषणः || | ||
'''३५९''' वेदास्ते तुर्यधा भक्ते पार्श्वयोर्जगती युते |<br> | '''३५९''' वेदास्ते तुर्यधा भक्ते पार्श्वयोर्जगती युते |<br>गर्भाश्चैव चतुर्भागैस्त्रयो वृत्तस्तु मध्यगः || | ||
'''३६०''' स्याच्छुकाघ्रायुतो हंसो विमानस्यैव जंघया |<br> | '''३६०''' स्याच्छुकाघ्रायुतो हंसो विमानस्यैव जंघया |<br>भद्रस्यैव नितम्वोस्य श्रीवत्स स्यैव मञ्जरी || | ||
'''३६१''' हंसशोभित शृङ्गाग्रो हंसः केशव भूमिकः |<br> | '''३६१''' हंसशोभित शृङ्गाग्रो हंसः केशव भूमिकः |<br>हितश्चतुल्य धर्माभ्यां सङ्गतं पार्श्वयोर्द्वयोः || | ||
'''३६२''' ब्रह्माब्ज पीठगो मध्ये हरीशौ वाम दक्षिणे |<br> | '''३६२''' ब्रह्माब्ज पीठगो मध्ये हरीशौ वाम दक्षिणे |<br>अथ मध्ये हरः कार्यस्तदा दक्षे पितामहः || | ||
'''३६३''' विपद्रूपांसिते द्वाभ्यां कोणो मध्यरथस्त्रिभिः |<br> | '''३६३''' विपद्रूपांसिते द्वाभ्यां कोणो मध्यरथस्त्रिभिः |<br>सार्द्धतोय रथः शक्र खुराद्यैर्भूषणैर्युतः || | ||
'''३६४''' शृङ्गाण्यस्य तु चत्वारि भुवः पञ्चरथास्तथाः |<br> | '''३६४''' शृङ्गाण्यस्य तु चत्वारि भुवः पञ्चरथास्तथाः |<br>विभूतये सतां ख्यातः श्रीवत्सो वर्द्धमानकः || | ||
'''३६५''' चतुरस्रे सूर्य संछिन्ने त्रिभिः स्यान् मध्यगो रथः |<br> | '''३६५''' चतुरस्रे सूर्य संछिन्ने त्रिभिः स्यान् मध्यगो रथः |<br>भागार्द्धे नान्तरन्त्यक्त्वा द्वाभ्यामुपरथं विदुः || | ||
'''३६६''' तदर्द्ध निर्गतो द्वाभ्यां कोणः सम्पूर्णशालके |<br> | '''३६६''' तदर्द्ध निर्गतो द्वाभ्यां कोणः सम्पूर्णशालके |<br>क्षरकुंभादि संयुक्तमप्सरोगणशोभितम् || | ||
'''३६७''' जंघा मध्ये तु वलयाख्या पट्टिकाभिः सुभूषिता |<br> | '''३६७''' जंघा मध्ये तु वलयाख्या पट्टिकाभिः सुभूषिता |<br>अन्धारिका द्वयो पेता लंघोर्द्धं स्याद्वरण्डिका || | ||
'''३६८''' पट्टिकाभिर्वसन्तैस्तु कण्ठेहारावली युताम् |<br> | '''३६८''' पट्टिकाभिर्वसन्तैस्तु कण्ठेहारावली युताम् |<br>भूषणैश्चन्द्रशालाघैः शृङ्गैरेष सुभूषितः || | ||
'''३६९''' येन सिद्धासुराशक्र यत्र सिद्धः स्वयं शशी |<br> | '''३६९''' येन सिद्धासुराशक्र यत्र सिद्धः स्वयं शशी |<br>लाभभागात्सिते क्षेत्रे खण्डशालेप्ययं विधिः || | ||
'''३७०''' सार्द्धे नोपरथः शक्र विपक्षे यो विनाशकः |<br> | '''३७०''' सार्द्धे नोपरथः शक्र विपक्षे यो विनाशकः |<br>भुक्तये मुक्तये शस्तः श्रीवत्सोयन्तृतीयकः || | ||
'''३७१''' विकारभीजिते क्षेत्रे चतुर्भिर्मध्यगो रथः |<br> | '''३७१''' विकारभीजिते क्षेत्रे चतुर्भिर्मध्यगो रथः |<br>सार्द्धे भागान्तरन्त्यक्ता तथोपरय स्थितिः || | ||
'''३७२''' भागार्द्ध निर्गतिस्तस्य त्रिभिः कोणं पुरन्दर |<br> | '''३७२''' भागार्द्ध निर्गतिस्तस्य त्रिभिः कोणं पुरन्दर |<br>शालवद्भूषणैर्युक्तो विशेषाल्लोक नायकैः || | ||
'''३७३''' रूद्रैः क्रीडा विनोदाघैर्गणैर्यक्षैः सुरैस्तथा |<br> | '''३७३''' रूद्रैः क्रीडा विनोदाघैर्गणैर्यक्षैः सुरैस्तथा |<br>दिव्य भूत्यै हितः कर्तुः श्रीवत्सो नन्दिवर्द्धनः || | ||
'''३७४''' तुर्यभागी कृते क्षेत्रे कोऽतुल्याश्चतुर्दिशम् |<br> | '''३७४''' तुर्यभागी कृते क्षेत्रे कोऽतुल्याश्चतुर्दिशम् |<br>धामविस्तर पादेन निष्कासाः सर्व एव ते || | ||
'''३७५''' षडस्रो मध्यगर्भोस्य स्तंभादि रचना वहिः |<br> | '''३७५''' षडस्रो मध्यगर्भोस्य स्तंभादि रचना वहिः |<br>स सर्प कटिकण्ठोस्य स कुटादश भूमयः || | ||
'''३७६''' विष्णुर्मध्ये शिवो दक्षे वामतस्तु पितामहः |<br> | '''३७६''' विष्णुर्मध्ये शिवो दक्षे वामतस्तु पितामहः |<br>पुच्छे लक्ष्मीः प्रतिष्ठाप्या गरुडोयं हरि प्रियः || | ||
'''३७७''' पेष्टकस्तुङ्ग नासश्च पक्षाग्रस्था हि सूदनः |<br> | '''३७७''' पेष्टकस्तुङ्ग नासश्च पक्षाग्रस्था हि सूदनः |<br>नागांश षोडश त्यागान् माससं वर्द्धिता पतिः || | ||
'''३७८''' युगदानात्पुरः सिद्धः शुकाघ्रो वडभी हरे |<br> | '''३७८''' युगदानात्पुरः सिद्धः शुकाघ्रो वडभी हरे |<br>व्यक्तलिङ्गे स्वयं योज्यश्चण्डिकादौ विशेषतः || | ||
'''३७९''' विस्ताराद् द्विगुणोत् सेधः फांसादि कृत संवृतिः |<br> | '''३७९''' विस्ताराद् द्विगुणोत् सेधः फांसादि कृत संवृतिः |<br>पार्श्वे सिंहद्वयोपेतो मध्ये कलश युतो वरः || | ||
'''३८०''' वेदास्रः स तथैवोक्तः सुरादि भूषणान्वितः |<br> | '''३८०''' वेदास्रः स तथैवोक्तः सुरादि भूषणान्वितः |<br>शिखायाः संवृत्तिः पट्टैर्निर्विकारः शिवः प्रियः || | ||
'''३८१''' चतुरस्री कृते क्षेत्रे कर्णार्द्धाष्टांश विच्युते |<br> | '''३८१''' चतुरस्री कृते क्षेत्रे कर्णार्द्धाष्टांश विच्युते |<br>तत्प्रमाणे च वेदास्रे दिक्षु कर्णमिति क्षिपेत् || | ||
'''३८२''' पातितेषु च सूत्रेषु दिक्ष्वष्टास्रोष्टभूतिदः |<br> | '''३८२''' पातितेषु च सूत्रेषु दिक्ष्वष्टास्रोष्टभूतिदः |<br>मध्यभागे करं कृत्वा अस्टभ्यां मध्यतो ह्वयेत् || | ||
'''३८३''' तन्मानं वाह्यतः कृत्वा द्विगुणाद्व्यप्तृलंघनात् |<br> | '''३८३''' तन्मानं वाह्यतः कृत्वा द्विगुणाद्व्यप्तृलंघनात् |<br>सोपि भूति प्रदो ज्ञेयो भूषणाद्यः पुरन्दर || | ||
'''३८४''' चतुरस्रश्चतुर्भद्रः सान्धारश्च त्रिभूमिकः |<br> | '''३८४''' चतुरस्रश्चतुर्भद्रः सान्धारश्च त्रिभूमिकः |<br>दारूजो गृहराजोयं गृहाकारः प्रशस्यते || | ||
'''३८५''' गृहराजसमः किन्तु विना भद्रैः पुनः पुनः |<br> | '''३८५''' गृहराजसमः किन्तु विना भद्रैः पुनः पुनः |<br>पट्टशालान्वितोप्यर्द्ध गृहराजः प्रकीर्तितः || | ||
'''३८६''' एकभूमिर्द्विभूमिर्वा पट्टशाला विवर्जितः |<br> | '''३८६''' एकभूमिर्द्विभूमिर्वा पट्टशाला विवर्जितः |<br>सर्वदेवालयं शक्र मार्तण्डस्य विशेषतः || | ||
'''३८७''' कर्णार्द्धाष्टांशसन्त्यागात् परिभ्रमणवर्तितः |<br> | '''३८७''' कर्णार्द्धाष्टांशसन्त्यागात् परिभ्रमणवर्तितः |<br>वृत्तः कुंभः सुभूषाढ्यः ख्यातः कुंभः सुराधिप || | ||
'''३८८''' अग्रे शुकाघुपा युक्तो वृषोन्ते चतुरस्रकः |<br> | '''३८८''' अग्रे शुकाघुपा युक्तो वृषोन्ते चतुरस्रकः |<br>स एव वाह्यतो वृत्तः पट्टकैः सुविभूषितः || | ||
'''३८९''' ग्वावृक्षो वृत्त एवस्यान्न भवेद् भवं विनावृषः |<br> | '''३८९''' ग्वावृक्षो वृत्त एवस्यान्न भवेद् भवं विनावृषः |<br>एतद् देवालयं प्रोक्तं मुख्यतस्ते सुराधिप || | ||
'''३९०''' अन्योन्य मिश्र भेदैस्तु फलं मिश्रन्तु यज्वनाम् |<br> | '''३९०''' अन्योन्य मिश्र भेदैस्तु फलं मिश्रन्तु यज्वनाम् |<br>मेर्वादि लघुसंस्थानाः प्रसादाच्छन्दनामकाः || | ||
'''३९१''' चतुर्हस्तादधः शक्र प्रासादाश्चाति क्षुद्रका |<br> | '''३९१''' चतुर्हस्तादधः शक्र प्रासादाश्चाति क्षुद्रका |<br>नवधा भाजितं कृत्वा पीठं भाग समं भवेत् || | ||
'''३९२''' द्विभागं गर्भविस्तारं भित्तयश्च पुरन्दर |<br> | '''३९२''' द्विभागं गर्भविस्तारं भित्तयश्च पुरन्दर |<br>चतुर्हस्तादिवस्वन्ता भूतभागविभाजिताः || | ||
'''३९३''' पीठं भागसमङ्गर्भन्तथा भित्तिः शचीपते |<br> | '''३९३''' पीठं भागसमङ्गर्भन्तथा भित्तिः शचीपते |<br>उच्छ्रितिर्भित्ति हीनानां स जंघा द्विगुणा मता || | ||
'''३९४''' वर्तनां शिखराणाञ्च कथयामि तवाधुना |<br> | '''३९४''' वर्तनां शिखराणाञ्च कथयामि तवाधुना |<br>जंघोर्द्ध द्विगुणोच्छाये पृथुत्वे दशधा कृते || | ||
'''३९५''' उच्छ्रयस्य चतुर्थांशे चतुर्द्धा भाजिते सति |<br> | '''३९५''' उच्छ्रयस्य चतुर्थांशे चतुर्द्धा भाजिते सति |<br>इन्दु कण्ठोपमैः सारः पदे कुंभ समुन्नतिः || | ||
'''३९६''' षड्भिर्वेदी त्रिभिः कण्ठः शेषैः शिखरसंवृतिः |<br> | '''३९६''' षड्भिर्वेदी त्रिभिः कण्ठः शेषैः शिखरसंवृतिः |<br>तिर्यगूर्द्धञ्च भूतांशैस्त्याज्य भागे कृते सति || | ||
'''३९७''' भागभागानुपातेन बहुत्वे च तथा भवेत् |<br> | '''३९७''' भागभागानुपातेन बहुत्वे च तथा भवेत् |<br>तिर्यक् चतुर्गुणं सूत्रं कृत्वा वा वर्तयेद्धरे || | ||
'''३९८''' सान्धारिकाश्रयाणान्तु मेर्वादीनां यथाक्रमम् |<br> | '''३९८''' सान्धारिकाश्रयाणान्तु मेर्वादीनां यथाक्रमम् |<br>अन्धारिका विहीनानां मण्डपान्वितलक्षणम् || | ||
'''३९९''' धामगर्भञ्च तत्कर्णभुकनासा गर्भ कर्णतः |<br> | '''३९९''' धामगर्भञ्च तत्कर्णभुकनासा गर्भ कर्णतः |<br>सूत्रङ्गृहीत्वाऽब्ज योनिः शुकाघ्रा धामकोणतः || | ||
'''४००''' प्रासादस्यार्द्ध विस्तारस्तदग्रे मण्डपः शुभः |<br> | '''४००''' प्रासादस्यार्द्ध विस्तारस्तदग्रे मण्डपः शुभः |<br>शिखरन्त्रिगुणं येषां पादोनं सार्द्धं दृग्गुणम् || | ||
'''४०१''' स पादं द्विगुणं वाथ जंघा तेषां त्रिभागिका |<br> | '''४०१''' स पादं द्विगुणं वाथ जंघा तेषां त्रिभागिका |<br>तदूर्ध्वं तुर्यधा भाज्य शमांशं तुरगांसितम् || | ||
'''४०२''' त्रिभिर्वेदी तदूर्ध्वन्तु कण्ठो द्वाभ्यां शिरोंशतः |<br> | '''४०२''' त्रिभिर्वेदी तदूर्ध्वन्तु कण्ठो द्वाभ्यां शिरोंशतः |<br>पादो न वृत्तवत् कुंभः शेषं पूर्ववदा चरेत् || | ||
'''४०३''' कण्ठादूर्ध्वं चतुर्दिक्षु ध्वजाधाराणि कारयेत् |<br> | '''४०३''' कण्ठादूर्ध्वं चतुर्दिक्षु ध्वजाधाराणि कारयेत् |<br>चतुर्णामेव दण्डानां स्थितिः स्याद् वेदिकोपरिः || | ||
'''४०४''' सर्वेषां मण्डपानान्तु नासिकान्त शिखोच्छ्रितिः |<br> | '''४०४''' सर्वेषां मण्डपानान्तु नासिकान्त शिखोच्छ्रितिः |<br>फांसैः संवरणङ्कार्यमन्तः क्रोडे करोटकैः || | ||
'''४०५''' षड्भिः स्तंभैः स रूचकाद्यैः कुंभाद्यैस्तुर्यधासनैः |<br> | '''४०५''' षड्भिः स्तंभैः स रूचकाद्यैः कुंभाद्यैस्तुर्यधासनैः |<br>चतुर्भिर्नन्दिकाद्यैश्च शिरोभिस्ते विराजिताः || | ||
'''४०६''' स्तंभसंख्या समायुक्ताः पृथुक्त्यंज्ञां भजन्तिते |<br> | '''४०६''' स्तंभसंख्या समायुक्ताः पृथुक्त्यंज्ञां भजन्तिते |<br>चतुःषष्टिसमारभ्य स्तंभ द्वितयवर्जिताः || | ||
'''४०७''' श्रीवत्सादि स सूत्रान्ताः सप्तविंशति मण्डपाः |<br> | '''४०७''' श्रीवत्सादि स सूत्रान्ताः सप्तविंशति मण्डपाः |<br>इदानीं द्वार निर्देशः समासात्ते निगद्यते || | ||
'''४०८''' विकारांश्मं विना तुल्यं वस्वं शोधिक विस्तरम् |<br> | '''४०८''' विकारांश्मं विना तुल्यं वस्वं शोधिक विस्तरम् |<br>द्विगुणञ्च समुच्छेधं ज्येष्ठादौ लिङ्गमानतः || | ||
'''४०९''' कर्णसूत्रे रसैर्भक्ते चतुभिर्वासमुच्छ्रितिः |<br> | '''४०९''' कर्णसूत्रे रसैर्भक्ते चतुभिर्वासमुच्छ्रितिः |<br>क्षुद्रधाम्ना मयं न्यायो द्रष्टव्यः पाकशासन || | ||
'''४१०''' खवेदैकं समारभ्य खमुन्यन्त मनु क्रमात् |<br> | '''४१०''' खवेदैकं समारभ्य खमुन्यन्त मनु क्रमात् |<br>वियदिन्दूच्युते द्वारं भूत षट्कैर्ग्रहान्तिकम् || | ||
'''Türen und Vergegenwärtigung im Bauwerk''' | '''Türen und Vergegenwärtigung im Bauwerk''' | ||
'''४११''' अङ्गुलैर्व्यक्त लिङ्गानां तदर्द्धं विस्तरेण तु |<br> | '''४११''' अङ्गुलैर्व्यक्त लिङ्गानां तदर्द्धं विस्तरेण तु |<br>तत्पादेन स्मृते शाखे तयोः स्थौल्यन्तदर्द्धताः || | ||
'''४१२''' द्विपादन्देहलिश्चार्द्धादुन्नता वसु हानितः |<br> | '''४१२''' द्विपादन्देहलिश्चार्द्धादुन्नता वसु हानितः |<br>ऊर्ध्वस्थाश्च सुरां ध्यक्ष सुविभक्ताः सुसंचिताः || | ||
'''४१३''' प्रतिशाखास्त्रिभागेन न्यूना कार्याः परस्परम् |<br> | '''४१३''' प्रतिशाखास्त्रिभागेन न्यूना कार्याः परस्परम् |<br>शशिरामशरैरश्चैर्नागान्ताः स्युर्यथा क्रमम् || | ||
'''४१४''' तुर्यांशेन प्रतीहारौ नन्दी कालश्च शाखयोः |<br> | '''४१४''' तुर्यांशेन प्रतीहारौ नन्दी कालश्च शाखयोः |<br>सरिद्वयं भार वाहौ मालाविधौ च किन्नरौ || | ||
'''४१५''' गौर्गिरि हस्ति युग्मश्च ततश्च शेष वासुकी |<br> | '''४१५''' गौर्गिरि हस्ति युग्मश्च ततश्च शेष वासुकी |<br>शाखाधिक्येप्ययं न्यासो न्यूने नागादिभिश्च्युतिः || | ||
'''४१६''' इतोन्यत् यत्र वल्यादि यथा शोभं विभूषयेत् |<br> | '''४१६''' इतोन्यत् यत्र वल्यादि यथा शोभं विभूषयेत् |<br>गणं लक्ष्मी यक्ष कन्या विष्ण्वीशौ ग्रहगायकाः || | ||
'''४१७''' नृत्येशो मातरश्चैव क्रमादूर्ध्वं व्यवस्थिताः |<br> | '''४१७''' नृत्येशो मातरश्चैव क्रमादूर्ध्वं व्यवस्थिताः |<br>द्वाराग्रे अर्द्धचन्द्रञ्च शंखयुग्मादि भूषितम् || | ||
'''४१८''' प्रासादाय युतङ्कार्यन्न न्यूनन्नाधिकं हितम् |<br> | '''४१८''' प्रासादाय युतङ्कार्यन्न न्यूनन्नाधिकं हितम् |<br>यजमानानु कूले तु देशिकः सु समाहितः || | ||
'''४१९''' तोषितो यजमानेन द्वारारोपण मारभेत् |<br> | '''४१९''' तोषितो यजमानेन द्वारारोपण मारभेत् |<br>द्वाराङ्गानि कषायादि शुद्धान्याच्छाद्य वाससा || | ||
'''४२०''' न्यस्ता तु धारिकां शक्तिं शाक्तां मूर्तिन्ततः पुनः |<br> | '''४२०''' न्यस्ता तु धारिकां शक्तिं शाक्तां मूर्तिन्ततः पुनः |<br>त्रितत्वन्देवता युक्तं शिवं साङ्गञ्च विन्यसेत् || | ||
'''४२१''' अग्नौ सन्तर्प्य संशोध्य प्रोक्ष्यसंस्पृश्य रोधयेत् |<br> | '''४२१''' अग्नौ सन्तर्प्य संशोध्य प्रोक्ष्यसंस्पृश्य रोधयेत् |<br>सुसङ्गोध्ये प्रतीहाराञ्छिवाज्ञा पदवोधितान् || | ||
'''४२२''' द्वार प्रमाणकं वास्तुं पूजयित्वा प्रतर्पयेत् |<br> | '''४२२''' द्वार प्रमाणकं वास्तुं पूजयित्वा प्रतर्पयेत् |<br>यन्मुकन्तु भवेद्द्वारं तर्पयेत् तद् दिशापतिम् || | ||
'''४२३''' रत्नन्यासं ततः शक्तिं ज्ञात्वा लग्नन्निवेशयेत् |<br> | '''४२३''' रत्नन्यासं ततः शक्तिं ज्ञात्वा लग्नन्निवेशयेत् |<br>पुरामध्यं सुविज्ञाय किञ्चिदुत्तरतो यथा || | ||
'''४२४''' कृत्वा च मन्त्रविन्यासमछिद्रमव धारयेत् |<br> | '''४२४''' कृत्वा च मन्त्रविन्यासमछिद्रमव धारयेत् |<br>द्वारवत्तोरणानाञ्च प्रतिष्ठा स्यात् पुरन्दर || | ||
'''४२५''' वित्तशाठ्यादसौ कर्ता स्थापकादींश्च तर्पयेत् |<br> | '''४२५''' वित्तशाठ्यादसौ कर्ता स्थापकादींश्च तर्पयेत् |<br>प्रासादं घटयेच्छक्र यावद्वेद्यन्तमागतम् || | ||
'''४२६''' शुकनासा समाप्तौ तु वेद्यधो भूमिकान्तरे |<br> | '''४२६''' शुकनासा समाप्तौ तु वेद्यधो भूमिकान्तरे |<br>कृत्वो वरकन्तत्र सुगुप्तञ्च सुशोभनम् || | ||
'''४२७''' रूक्मरौप्यार्कजं वापि रत्नादि पञ्चकान्वितम् |<br> | '''४२७''' रूक्मरौप्यार्कजं वापि रत्नादि पञ्चकान्वितम् |<br>पारदं विन्यसेत् तत्र गन्धस्रग्वस्त्रभूषितम् || | ||
'''४२८''' प्रकृति रूपं घटं ध्यात्वा मध्ये पद्मं विचिन्तयेत् |<br> | '''४२८''' प्रकृति रूपं घटं ध्यात्वा मध्ये पद्मं विचिन्तयेत् |<br>दर्पणादौ कृत स्नानं प्रोक्षयेत् स पिधानकम् || | ||
'''४२९''' न्यस्त्वा तु धारिकां शक्तिं षडुच्छञ्चासनन्ततः |<br> | '''४२९''' न्यस्त्वा तु धारिकां शक्तिं षडुच्छञ्चासनन्ततः |<br>शक्ति मूर्ति समायुक्तन्तत्र कुम्भन्निवेशयेत् || | ||
'''४३०''' तन्मध्ये विन्यसेद् भूय ऐश्वरीं शक्ति मध्ययाम् |<br> | '''४३०''' तन्मध्ये विन्यसेद् भूय ऐश्वरीं शक्ति मध्ययाम् |<br>चैतन्यन्तु समाहूय विन्यसेत् समरसेन तु || | ||
'''४३१''' शक्ति संपुट मध्यस्थं हंसं विन्दु स्वरूपिणम् |<br> | '''४३१''' शक्ति संपुट मध्यस्थं हंसं विन्दु स्वरूपिणम् |<br>दीप्यमानं स्वतेजोभिः सन्धार्याणुचिदंशकात् || | ||
'''४३२''' स्थिरधीः समरसो भूत्वा शिवाज्ञा पद बोधितम् |<br> | '''४३२''' स्थिरधीः समरसो भूत्वा शिवाज्ञा पद बोधितम् |<br>स्वसंवित्या समादाय पूरकेण न्यसेद् घटे || | ||
'''४३३''' तत्कर्मानु ग्रहात्मत्वमधिकारमलान्वितम् |<br> | '''४३३''' तत्कर्मानु ग्रहात्मत्वमधिकारमलान्वितम् |<br>पुरुषार्थ परिज्ञानमुपादे यक्षमं पदम् || | ||
'''४३४''' शिवेनाधिष्ठितं कृत्वा सर्वविघ्न भयङ्करम् |<br> | '''४३४''' शिवेनाधिष्ठितं कृत्वा सर्वविघ्न भयङ्करम् |<br>त्रितत्वं देवता युक्तन्न्यस्त्वा शोध्य निरूध्य च || | ||
'''४३५''' प्रासादस्थिति पर्यन्तं कर्तुः कर्मानुपूरकम् |<br> | '''४३५''' प्रासादस्थिति पर्यन्तं कर्तुः कर्मानुपूरकम् |<br>ज्वलन्वै दृश्यते विघ्नैः प्रासादश्चाति दुःसह || | ||
'''४३६''' ततो भूत वलिं दत्वा तृप्ता भवथ सर्वदा |<br> | '''४३६''' ततो भूत वलिं दत्वा तृप्ता भवथ सर्वदा |<br>वाचयित्वा मतन्तैस्तु तृप्तास्ते सर्वदा वयम् || | ||
'''४३७''' एवं कृते स राष्ट्रस्य राज्ञः कर्तुः समीहितम् |<br> | '''४३७''' एवं कृते स राष्ट्रस्य राज्ञः कर्तुः समीहितम् |<br>फलमुत्पद्यते शीघ्रमारम्भः श्रेयसे सदा || | ||
'''४३८''' विधाय वेदिका बन्धं कण्ठसारादिकञ्च यत् |<br> | '''४३८''' विधाय वेदिका बन्धं कण्ठसारादिकञ्च यत् |<br>मेर्वादि च्छन्दकाः प्रोक्ताः सुविभक्ताः पृथक् पृथक् || | ||
'''४३९''' खुरकुंभादि विन्यासं तेषु लेशान्निगद्यते |<br> | '''४३९''' खुरकुंभादि विन्यासं तेषु लेशान्निगद्यते |<br>उच्छ्रयन्नवधा भाज्यं भागे कुंभादि कल्पना || | ||
'''४४०''' जंघभागद्वये नोक्तावरंडाद्यन्तदूर्ध्वतः |<br> | '''४४०''' जंघभागद्वये नोक्तावरंडाद्यन्तदूर्ध्वतः |<br>सार्द्धलिङ्गञ्च निर्वृत्तन्ततोर्ध्व शिखरं यथा || | ||
'''४४१''' रथानुरथ कोणादि खुरकुंभादि भूषितम् |<br> | '''४४१''' रथानुरथ कोणादि खुरकुंभादि भूषितम् |<br>प्रासादे कारयेद् एतान् प्रधानाङ्गमपीडयन् || | ||
'''४४२''' पीडिते तु प्रधानाङ्गे महान्दोषः प्रजायते |<br> | '''४४२''' पीडिते तु प्रधानाङ्गे महान्दोषः प्रजायते |<br>राज्ञः कर्तुः प्रजानान्तु दुःखं प्राणान्तिकं भवेत् || | ||
'''४४३''' रचना क्षेत्राद्वहिस्तस्याद् पादायं विचक्षणः |<br> | '''४४३''' रचना क्षेत्राद्वहिस्तस्याद् पादायं विचक्षणः |<br>हस्तसंख्याङ्गुलं शक्र न न्यूनन्नाधिकं क्वचित् || | ||
'''४४४''' न्यूनाधिकेपि दोषः स्याद् इत्याह भगवाञ्छिवः |<br> | '''४४४''' न्यूनाधिकेपि दोषः स्याद् इत्याह भगवाञ्छिवः |<br>रूपरामैर्भजेदाघमूर्ध्वं तिर्यग्रसैर्भवेत् || | ||
'''४४५''' भागवेशात्सरैः पादो वेदैः कुंभस्तथा नलैः |<br> | '''४४५''' भागवेशात्सरैः पादो वेदैः कुंभस्तथा नलैः |<br>वेशाद् भागोच्छ्रितः कार्यो वसन्तः सोर्द्ध पट्टिकः || | ||
'''४४६''' वलयाख्या युतः कलशस्तदूर्द्ध्वे वसुनोङ्गतः |<br> | '''४४६''' वलयाख्या युतः कलशस्तदूर्द्ध्वे वसुनोङ्गतः |<br>प्रवेशवद् विनिष्क्रान्तो वृत्ताकारोनुया ततः |<br>कुंभ कलश योर्मध्ये छेदो भाग विपर्ययैः |<br>तदूर्ध्वे तु वसन्ताख्यो यथापूर्वमुदाहृतः || | ||
'''४४७''' ऊर्ध्वङ्कण्ठिक या युक्तो वसन्तो निर्गमात् पुनः |<br> | '''४४७''' ऊर्ध्वङ्कण्ठिक या युक्तो वसन्तो निर्गमात् पुनः |<br>तदूर्ध्वे वेदभागैस्तु पट्टिका चतुरस्रिका || | ||
'''४४८''' कलश पट्टिकयोच्छेदो वेद तुल्यो यथा भवेत् |<br> | '''४४८''' कलश पट्टिकयोच्छेदो वेद तुल्यो यथा भवेत् |<br>भागैक वेशतोच्छ्रायो वसन्तस्त्रिप्रवेशतः || | ||
'''४४९''' ऊर्ध्वपट्टिक या युक्तः पट्टिकोर्द्ध्वन्तु कण्ठिका |<br> | '''४४९''' ऊर्ध्वपट्टिक या युक्तः पट्टिकोर्द्ध्वन्तु कण्ठिका |<br>भाग न्यूनाधिकोर्द्धन्तु वसन्तः स्याद् यथा पुरा || | ||
'''४५०''' वेद भागैस्तथा पट्टिस्तस्योर्द्धमाय संवृतिः |<br> | '''४५०''' वेद भागैस्तथा पट्टिस्तस्योर्द्धमाय संवृतिः |<br>जंघा मध्ये तु निष्कासं तुल्या यद्द्विगुणोन्नत || | ||
'''४५१''' दशधा भाजितञ्चोर्द्धं तिर्यक् पञ्च विभाजितम् |<br> | '''४५१''' दशधा भाजितञ्चोर्द्धं तिर्यक् पञ्च विभाजितम् |<br>भागभाग प्रवेशेन निर्गमान्मेखला त्रयम् || | ||
'''४५२''' चतुर्भिः पट्टिका मध्ये तदूर्ध्वं मेखला त्रयम् |<br> | '''४५२''' चतुर्भिः पट्टिका मध्ये तदूर्ध्वं मेखला त्रयम् |<br>वलयाख्याथ मध्ये तु तदूर्ध्वं स्यादधो यथा || | ||
'''४५३''' जंघोर्द्धमाय निष्काशं दत्वा कार्यं वरण्डकम् |<br> | '''४५३''' जंघोर्द्धमाय निष्काशं दत्वा कार्यं वरण्डकम् |<br>विकार भाजितोच्छ्रायं तिर्यग् वेदविभाजितम् || | ||
'''४५४''' भागैक वेशतः कार्य पट्टिका द्वितयन्ततः |<br> | '''४५४''' भागैक वेशतः कार्य पट्टिका द्वितयन्ततः |<br>पट्टिकैका युतं वाथ वसन्तन्तत्र कारयेत् || | ||
'''४५५''' त्रिभिस्तु कुंभकोच्छ्रायं प्रविष्टन्तद् द्वयेन तु |<br> | '''४५५''' त्रिभिस्तु कुंभकोच्छ्रायं प्रविष्टन्तद् द्वयेन तु |<br>वसन्तैक युतश्चोर्द्ध्वे वेदैः कण्ठसमुद्गमः || | ||
'''४५६''' पट्टिका द्वितयं भागं निर्गमात् कुंभकं पुनः |<br> | '''४५६''' पट्टिका द्वितयं भागं निर्गमात् कुंभकं पुनः |<br>त्रिभिः वा समुच्छ्रितङ्कृत्वा शेषशोभा यथा भवेत् || | ||
'''४५७''' कण्ठे तु कलशाकारो वसन्तः स्यादधोर्ध्वयो |<br> | '''४५७''' कण्ठे तु कलशाकारो वसन्तः स्यादधोर्ध्वयो |<br>पट्टिका भूषितौतौ तु शेषं स्याच्छिखरानुगम् || | ||
'''४५८''' चन्द्रमालादिभिः कूटैर्भूषणैस्तु विभूषयेत् |<br> | '''४५८''' चन्द्रमालादिभिः कूटैर्भूषणैस्तु विभूषयेत् |<br>एवन्तु छन्दकाः सर्वे भूषणैः सुविभूषिता || | ||
'''४५९''' कन्दवेध्या विरोधेन शान्तिः श्रेयस्करा नृणाम् |<br> | '''४५९''' कन्दवेध्या विरोधेन शान्तिः श्रेयस्करा नृणाम् |<br>वसु वेदांसिते धाम्नि सारीसारक भूषणम् || | ||
'''४६०''' सिद्ध्यै मुक्त्यै समस्तास्तु मध्यं लक्षानुरोधतः |<br> | '''४६०''' सिद्ध्यै मुक्त्यै समस्तास्तु मध्यं लक्षानुरोधतः |<br>अधस्तात् पट्टिके वृत्ते सारोर्ध्वं वृत्त पट्टिका || | ||
'''४६१''' तस्योर्ध्वं कुर्परी कार्यास्तदूर्ध्वं कलशं विदुः |<br> | '''४६१''' तस्योर्ध्वं कुर्परी कार्यास्तदूर्ध्वं कलशं विदुः |<br>त्रिशूलन्तु तदूर्ध्वं स्यात् तयोर्लक्षणमुच्यते || | ||
'''४६२''' षड्भानु भाजिते क्षेत्रे कलशं वर्तयेद्धरे |<br> | '''४६२''' षड्भानु भाजिते क्षेत्रे कलशं वर्तयेद्धरे |<br>लिङ्गायाम समायामे तदर्द्धेन तु विस्तरे || | ||
'''४६३''' अङ्गहीनांशतोच्छ्रे धारसांशैस्तु प्रविस्तृता |<br> | '''४६३''' अङ्गहीनांशतोच्छ्रे धारसांशैस्तु प्रविस्तृता |<br>पादपट्टी समुद्दिष्टा भागे नोल्लास निर्मितिः || | ||
'''४६४''' उच्छ्रयो विस्तरस्तस्य वेदभागेन सुव्रत |<br> | '''४६४''' उच्छ्रयो विस्तरस्तस्य वेदभागेन सुव्रत |<br>तत्पट्टीपाद भागोच्चा यथा शोभा प्रविस्तृता || | ||
'''४६५''' कुंभिका तस्य रामांशैर्भागार्द्धेन समुच्छ्रिता |<br> | '''४६५''' कुंभिका तस्य रामांशैर्भागार्द्धेन समुच्छ्रिता |<br>कूर्परं वाम दक्षञ्च सार्द्धवह्यं शतोच्छ्रितम् || | ||
'''४६६''' सूत्र भ्रमेण कर्तव्यन्ततः स्कन्धं विवर्तनम् |<br> | '''४६६''' सूत्र भ्रमेण कर्तव्यन्ततः स्कन्धं विवर्तनम् |<br>कूर्परान्त द्विभागान्ते सव्यस्कन्धो भ्रमाद् भवेत् || | ||
'''४६७''' अपसव्यो भ्रमेणैव द्विभागान्ते शतक्रतो |<br> | '''४६७''' अपसव्यो भ्रमेणैव द्विभागान्ते शतक्रतो |<br>उन्नता विस्तृता ग्रीवासारकर्णांशिका ततः || | ||
'''४६८''' ब्रह्माननैः कपोलः स्यादर्द्धभागसमुच्छ्रितः |<br> | '''४६८''' ब्रह्माननैः कपोलः स्यादर्द्धभागसमुच्छ्रितः |<br>अर्द्धे नैव समुल्लासः पद्मं नेत्रांशकोच्छ्रितम् || | ||
'''४६९''' अन्धालैर्भूषयेत् कुंभं गुणभागावलंवितैः |<br> | '''४६९''' अन्धालैर्भूषयेत् कुंभं गुणभागावलंवितैः |<br>अशोक पल्लवैश्चित्रैर्यद्वा चूत समुद्भवैः || | ||
'''४७०''' कुंभास्यं शोभयेदेतैर्यथा शोभा वलंविभिः |<br> | '''४७०''' कुंभास्यं शोभयेदेतैर्यथा शोभा वलंविभिः |<br>लक्षानुरोधतः कार्यं रूपं न्यूनाधिकं हरे || | ||
'''४७१''' कलश लक्षणं ख्यातं त्रिशूलं वच्मि साम्प्रतम् |<br> | '''४७१''' कलश लक्षणं ख्यातं त्रिशूलं वच्मि साम्प्रतम् |<br>द्वन्द्वानलाङ्गुलं ज्येष्ठे वेद युग्मैस्तु मध्यमे || | ||
'''४७२''' रस चन्द्रैः कनिष्ठेः स्यात् त्रिशूलं सुरसत्तम |<br> | '''४७२''' रस चन्द्रैः कनिष्ठेः स्यात् त्रिशूलं सुरसत्तम |<br>स तारगोलकत्यागादधोदः स्याद् द्वयन्द्वयम् || | ||
'''४७३''' कोणास्रे तुष्टि तुष्ट्यंशे मध्यशूलं ग्रहांशकैः |<br> | '''४७३''' कोणास्रे तुष्टि तुष्ट्यंशे मध्यशूलं ग्रहांशकैः |<br>यक्षांश विस्तृतिर्मध्ये तीक्ष्णाग्र मनुपाततः || | ||
'''४७४''' मूले भागप्रविस्तीर्णं यद्वा शोभानुरूपतः |<br> | '''४७४''' मूले भागप्रविस्तीर्णं यद्वा शोभानुरूपतः |<br>मात्रांश विस्तृतन्दीर्घं रसांशैः सूत्रभ्रमणात् || | ||
'''४७५''' मध्ये हस्तं व्यवस्थाप्य वृत्ताकारं सुशोभनम् |<br> | '''४७५''' मध्ये हस्तं व्यवस्थाप्य वृत्ताकारं सुशोभनम् |<br>वहिर्मध्ये करन्धृत्वा मध्ये सप्तांशसंस्थितम् || | ||
'''४७६''' भ्रामयेद् दक्ष हस्तेन पार्श्वयोः शूलसिद्धये |<br> | '''४७६''' भ्रामयेद् दक्ष हस्तेन पार्श्वयोः शूलसिद्धये |<br>अधो रेखा द्वयं कार्यमर्द्धचन्द्रो पुमं हरे || | ||
'''४७७''' सार्द्धपक्षांश सूत्रेण विस्तृतिर्भागसंमिता |<br> | '''४७७''' सार्द्धपक्षांश सूत्रेण विस्तृतिर्भागसंमिता |<br>शृङ्गयोर्वाह्य रेखिन्यौ वाह्यवृत्तेन विन्यसेत् || | ||
'''४७८''' म्ध्यस्थे चैव रेखे द्वे मध्य वृत्तेन योजयेत् |<br> | '''४७८''' म्ध्यस्थे चैव रेखे द्वे मध्य वृत्तेन योजयेत् |<br>अधोभाग द्वयं किञ्चिद् विभागान्तरसंस्थितम् || | ||
'''४७९''' अर्द्धचन्द्रविधानेन भ्रामयेत् स्याद् यथा गतिः |<br> | '''४७९''' अर्द्धचन्द्रविधानेन भ्रामयेत् स्याद् यथा गतिः |<br>गण्डिका भूषितं मूले कुशन्तुर्यास्रकन्त्वधः || | ||
'''४८०''' शेषरेखा विनाशेन त्रिशूलं परिकीर्तितम् |<br> | '''४८०''' शेषरेखा विनाशेन त्रिशूलं परिकीर्तितम् |<br>पार्श्वयोर्द्धामसूत्रेण विन्यसेत् कलशोपरि || | ||
'''४८१''' अग्रे पृष्ठे च यत् सूत्रं मध्यशूलेन सङ्गतम् |<br> | '''४८१''' अग्रे पृष्ठे च यत् सूत्रं मध्यशूलेन सङ्गतम् |<br>जगती वन्धकं वक्षे दिक्षु देवालयैः सह || | ||
'''४८२''' प्रासादार्द्धेन सा कार्या पादोना वाथ तत्समा |<br> | '''४८२''' प्रासादार्द्धेन सा कार्या पादोना वाथ तत्समा |<br>मण्डपाग्रे च तत् तुल्या चतुरस्रा सुशोभना || | ||
'''४८३''' प्रासादार्द्धेन तद्वाह्ये दिक्ष्वष्टौ देवता लये |<br> | '''४८३''' प्रासादार्द्धेन तद्वाह्ये दिक्ष्वष्टौ देवता लये |<br>तदर्द्धं वाह्यतस्त्यक्ता भित्तिर्वन्धन्तु कारयेत् || | ||
'''४८४''' प्रासादभित्तिवत्कार्यञ्जगत्या भित्ति वन्धनं |<br> | '''४८४''' प्रासादभित्तिवत्कार्यञ्जगत्या भित्ति वन्धनं |<br>प्रासाद समसंस्थानाखुरादि भूषणान्विता || | ||
'''४८५''' ऊर्द्ध्वं वरण्डिका युक्ता यथा वा तुष्टि मा वहेत् |<br> | '''४८५''' ऊर्द्ध्वं वरण्डिका युक्ता यथा वा तुष्टि मा वहेत् |<br>अजं नन्दीं महाकालं प्राचि वा वज्रपाणिनम् || | ||
'''४८६''' अर्द्धनारीश्वरं सूर्यमाग्नेययां वा हुताशनम् |<br> | '''४८६''' अर्द्धनारीश्वरं सूर्यमाग्नेययां वा हुताशनम् |<br>मातृचक्रङ्गणेशम्वा कृतान्तन्दक्षिणे स्थितम् || | ||
'''४८७''' अश्विनौ स्नायु (भृङ्गी)सन्नद्धं निर्-ऋत्यन्नैर्-ऋते न्यसेत् |<br> | '''४८७''' अश्विनौ स्नायु (भृङ्गी)सन्नद्धं निर्-ऋत्यन्नैर्-ऋते न्यसेत् |<br>मृत्युघ्नं योगिनं देवं वारुणे वरुणन्न्यसेत् || | ||
'''४८८''' षण्मुखं विश्वकर्माणं वायव्यामेणगं न्यसेत् |<br> | '''४८८''' षण्मुखं विश्वकर्माणं वायव्यामेणगं न्यसेत् |<br>कुबेरं लोकपैर्युक्तं सौम्ये देवीमुमां न्यसेत् || | ||
'''४८९''' चक्रिणं चण्डनामानमीशानं वा स्वगोचरे |<br> | '''४८९''' चक्रिणं चण्डनामानमीशानं वा स्वगोचरे |<br>प्रासादाभिमुखाः सर्वे मध्यसूत्र विवर्जिताः || | ||
'''Klöster und Königssitze''' | '''Klöster und Königssitze''' | ||
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'''४९०''' मठश्चान्तक दिग्भागे लिङ्गिनां स्थितये हितः |<br> | '''४९०''' मठश्चान्तक दिग्भागे लिङ्गिनां स्थितये हितः |<br>यतस्ते दक्षिणासायां वसेयुः शिवभाविताः || | ||
'''४९१''' प्रासादविस्तरं सूत्रन्तन्मानञ्जगती वहिः |<br> | '''४९१''' प्रासादविस्तरं सूत्रन्तन्मानञ्जगती वहिः |<br>प्राकारङ्कारयेत् त्यक्ता ततश्चाश्रमिणाङ्गृहम् || | ||
'''४९२''' मठाग्रे तत्समन्त्यक्ता सिंहोयं दक्षिणे स्थितम् |<br> | '''४९२''' मठाग्रे तत्समन्त्यक्ता सिंहोयं दक्षिणे स्थितम् |<br>वृषोय पश्चिमे ज्ञेयं ध्वजेयं पूर्वतः स्थितम् || | ||
'''४९३''' विपुलं वा प्रकर्तव्यं कर्तुरिच्छावसेन तु |<br> | '''४९३''' विपुलं वा प्रकर्तव्यं कर्तुरिच्छावसेन तु |<br>चतुरस्रे शरैर्भक्ते मध्यन्त्यक्ता विलोपयेत् || | ||
'''४९४''' गृहाणां स्वेच्छया न्यासः सौम्ये स्याद् वशनिर्गमः |<br> | '''४९४''' गृहाणां स्वेच्छया न्यासः सौम्ये स्याद् वशनिर्गमः |<br>एकभौमं द्विभौमं वा त्रिभौमं वा यथासुखम् || | ||
'''४९५''' दीर्घशाला वृतं वाह्ये प्राचियागालयान्वितम् |<br> | '''४९५''' दीर्घशाला वृतं वाह्ये प्राचियागालयान्वितम् |<br>पाकादि गृह विन्यासं यथायोगं निवेशयेत् || | ||
'''४९६''' पूर्वोक्तमन्तरञ्चार्द्धन्तस्याप्यर्द्धं यथायथम् |<br> | '''४९६''' पूर्वोक्तमन्तरञ्चार्द्धन्तस्याप्यर्द्धं यथायथम् |<br>मठिकैका त्रयङ्कार्यं पट्टशाला चतुष्किका || | ||
'''४९७''' भूमयः पूर्वमुद्दिष्ठा वित्ताभावे कुटी मता |<br> | '''४९७''' भूमयः पूर्वमुद्दिष्ठा वित्ताभावे कुटी मता |<br>समसूत्रं सु संस्थानं वास्तु पूजापुरःसरम् || | ||
'''४९८''' लिङ्गिनाञ्च गृहङ्कार्यम्महापुण्य जिगीषया |<br> | '''४९८''' लिङ्गिनाञ्च गृहङ्कार्यम्महापुण्य जिगीषया |<br>एतदेव महापुण्यङ्कथयामि तवाखिलम् || | ||
'''४९९''' संस्थाप्य स्थावरं लिङ्गम्प्रासादे यद् भवेत् फलम् |<br> | '''४९९''' संस्थाप्य स्थावरं लिङ्गम्प्रासादे यद् भवेत् फलम् |<br>तत्फलं लभते विद्वान् मठे संस्थाप्य जङ्गमम् || | ||
'''५००''' पुरादौ नूतनारम्भे उच्छन्नेवा पुरातने |<br> | '''५००''' पुरादौ नूतनारम्भे उच्छन्नेवा पुरातने |<br>आदौ संपूजयेद् वास्तुं खवियदिन्दु भाजिते || | ||
'''५०१''' चरक्याद्याः शरावस्थाः स्कन्दाद्या वेदसङ्गताः |<br> | '''५०१''' चरक्याद्याः शरावस्थाः स्कन्दाद्या वेदसङ्गताः |<br>दितीशावन्तरिक्षार्चि एण पितृरूजानिलः || | ||
'''५०२''' पदार्द्धार्द्ध भुजः शेषाः पदावस्थाः पुरन्दर |<br> | '''५०२''' पदार्द्धार्द्ध भुजः शेषाः पदावस्थाः पुरन्दर |<br>तद्वदा पादपस्त्वष्टौ मरीचाद्या रसाधिपाः || | ||
'''५०३''' स्वयम्भूर्वेदसंस्थस्तु पूजा होमादि पूर्ववत् |<br> | '''५०३''' स्वयम्भूर्वेदसंस्थस्तु पूजा होमादि पूर्ववत् |<br>आदिलिङ्गैर्गुणाञ्ज्ञात्वा भ्रुवो यत्र गुणोत्कटम् || | ||
'''५०४''' स्थानं भूभृन्निवासाय त्रिविधन्तद्भुत्यपेक्षया |<br> | '''५०४''' स्थानं भूभृन्निवासाय त्रिविधन्तद्भुत्यपेक्षया |<br>वियद्रसग्रहैरेकं वियन्नागयमेन्दुभिः || | ||
'''५०५''' खवियद्रसरूपैस्तु तृतीयं क्षेत्र लक्षणम् |<br> | '''५०५''' खवियद्रसरूपैस्तु तृतीयं क्षेत्र लक्षणम् |<br>चतुरस्रं स्मृतं क्षेत्रं राज्ञामायतनस्य तु || | ||
'''५०६''' दुर्गादौ सन्निवेशे तु पादभागाय तं स्मृतम् |<br> | '''५०६''' दुर्गादौ सन्निवेशे तु पादभागाय तं स्मृतम् |<br>कन्यसं मध्यमञ्ज्येष्ठन्नृपा वासं विभूतितः || | ||
'''५०७''' साधयित्वा पुरा तत्र सूत्रन्तारादि साधनैः |<br> | '''५०७''' साधयित्वा पुरा तत्र सूत्रन्तारादि साधनैः |<br>दिग्विदिक्षु समङ्कृत्वा ज्ञात्वा वै मन्दिरापतिम् || | ||
'''५०८''' प्रासादवद् यजेद् वास्तुं शिलान्यासन्तु कारयेत् |<br> | '''५०८''' प्रासादवद् यजेद् वास्तुं शिलान्यासन्तु कारयेत् |<br>पीठोच्छ्रितिं त्रिधा ज्ञात्वा ज्येष्ठमध्य कनीयसीम् || | ||
'''५०९''' ब्रह्मस्थाने गृहङ्कुर्यान्नागदिक्करमानकम् |<br> | '''५०९''' ब्रह्मस्थाने गृहङ्कुर्यान्नागदिक्करमानकम् |<br>भूतयुग्मैस्ततो वाह्ये प्राकारं परिकल्पयेत् || | ||
'''५१०''' दिशाभिश्चान्तरन्त्यक्ता खवियत्तनुब्बिर्गृहम् |<br> | '''५१०''' दिशाभिश्चान्तरन्त्यक्ता खवियत्तनुब्बिर्गृहम् |<br>दक्षिणे यमरान्नस्तनेदनागैर्जलेशगम् || | ||
'''५११''' उत्तरं रस गोत्रैस्तु पाद संवर्द्धितानि तु |<br> | '''५११''' उत्तरं रस गोत्रैस्तु पाद संवर्द्धितानि तु |<br>पृथक् प्राकार गुप्तानि शेषाण्यर्द्धार्द्धतो भजेत् || | ||
'''५१२''' ध्वजं धूमं तथा सिंहं श्वावृषोखर कुञ्जरौ |<br> | '''५१२''' ध्वजं धूमं तथा सिंहं श्वावृषोखर कुञ्जरौ |<br>ध्वांक्षञ्चैव यथा न्यायं पूर्वादावायसंस्थितिः || | ||
'''५१३''' पूर्ववदन्तरन्त्यक्ता वेदास्रं कारयेद् वहिः |<br> | '''५१३''' पूर्ववदन्तरन्त्यक्ता वेदास्रं कारयेद् वहिः |<br>मूल गृहस्य पादेन नवधा भाजयेत् पुनः || | ||
'''५१४''' ईशादौ कथ्यते न्यासः संक्षिप्तन्ते प्ररन्दर |<br> | '''५१४''' ईशादौ कथ्यते न्यासः संक्षिप्तन्ते प्ररन्दर |<br>शान्ति चिह्नालयन्धर्मस्त्वकान्धान वस्त्रकम् || | ||
'''५१५''' युग्मे पाकञ्च पात्राणां भोजनार्थोपयोगिनाम् |<br> | '''५१५''' युग्मे पाकञ्च पात्राणां भोजनार्थोपयोगिनाम् |<br>वितथे मन्त्रिणां स्थान मन्त्र मार्गोपदेशिनाम् || | ||
'''५१६''' शस्त्रमन्तः पुरङ्गात् कस्तूरी सौच वेश्म च |<br> | '''५१६''' शस्त्रमन्तः पुरङ्गात् कस्तूरी सौच वेश्म च |<br>तां मूलं सङ्ग्रहः स्त्रीणां पाचकान्स्त्री नियामकान् || | ||
'''५१७''' भोज्यं सेनापतिर्मन्त्री वैद्य गन्धोपजीविनाम् |<br> | '''५१७''' भोज्यं सेनापतिर्मन्त्री वैद्य गन्धोपजीविनाम् |<br>मणिपुष्पादि संस्थानं मुख्ये दूत गृहन्ततः || | ||
'''५१८''' राजहस्त्यादि संस्थानं क्षीरार्थं काष्ठिकङ्गृहम् |<br> | '''५१८''' राजहस्त्यादि संस्थानं क्षीरार्थं काष्ठिकङ्गृहम् |<br>उत्सार कालयं चान्ते इत्येवं भूभुजाङ्गृहम् || | ||
'''५१९''' महाराजाधिराजस्य ज्ञेयमेतच्छचीपते |<br> | '''५१९''' महाराजाधिराजस्य ज्ञेयमेतच्छचीपते |<br>विहाय वाह्यगे हानि स्थितिर्मध्य यथा ग्रहैः || | ||
'''५२०''' सामान्यस्य नृपस्यैवं कन्यसस्य विपर्ययैः |<br> | '''५२०''' सामान्यस्य नृपस्यैवं कन्यसस्य विपर्ययैः |<br>न्यूनं वाप्यधिकङ्कार्यं ज्ञात्वा भूति वलावलम् || | ||
'''५२१''' हस्त्यश्वादि कृते शेषं सुभृत्यानां यथा सुखम् |<br> | '''५२१''' हस्त्यश्वादि कृते शेषं सुभृत्यानां यथा सुखम् |<br>प्राकारं कारयेद् वाह्ये शिखाहालादि भूषितम् || | ||
'''५२२''' प्रतोली तुर्य संयुक्तं वेदाम्राद्यैः सुमण्डपैः |<br> | '''५२२''' प्रतोली तुर्य संयुक्तं वेदाम्राद्यैः सुमण्डपैः |<br>अष्ठहस्तोच्छ्रितं कार्यम् पृथुत्वं सुदृढं यथा || | ||
'''५२३''' वहिर्वहिस्थितानान्तु मध्यस्थानां रुचिर्यथा |<br> | '''५२३''' वहिर्वहिस्थितानान्तु मध्यस्थानां रुचिर्यथा |<br>याक्षं जलाधिपंशाक्रं त्रिद्वारं वाहयेत् सदा || | ||
'''५२४''' दक्षद्वारं सदापिहितं सङ्ग्रामेण विना हरे |<br> | '''५२४''' दक्षद्वारं सदापिहितं सङ्ग्रामेण विना हरे |<br>वहिः खाति कपायुक्तन्तद्वहिः शस्त्रिभिर्भटैः || | ||
'''५२५''' सप्तप्राकार युक्तं वा महाराजाधि मन्दिरम् |<br> | '''५२५''' सप्तप्राकार युक्तं वा महाराजाधि मन्दिरम् |<br>द्वारे द्वारे नियोक्तव्याः काष्ठिकाः शस्किणो भटाः || | ||
'''५२६''' दृढं परीक्षितं द्वारं वाह्यतो विशतः क्रमात् |<br> | '''५२६''' दृढं परीक्षितं द्वारं वाह्यतो विशतः क्रमात् |<br>अन्तर्वासो न कस्यास्ति यावन्ना वेदयेन्नृपः || | ||
'''५२७''' राज्ञत्व विदितास्तत्र न विशन्ति कदाचन |<br> | '''५२७''' राज्ञत्व विदितास्तत्र न विशन्ति कदाचन |<br>एवं नित्यनुरक्तस्य कल्याणं नृपतेः सदा || | ||
'''५२८''' द्वारे द्वारे चतुर्दिक्षु हट्टः कार्यः सुशोभनः |<br> | '''५२८''' द्वारे द्वारे चतुर्दिक्षु हट्टः कार्यः सुशोभनः |<br>पूर्व हट्टस्य मध्ये तु आयतः सौम्ययाम्ययोः || | ||
'''५२९''' नगरी निष्काश पर्यन्तं हट्टमार्गः सुशोभनः |<br> | '''५२९''' नगरी निष्काश पर्यन्तं हट्टमार्गः सुशोभनः |<br>एवं दक्षे तथा वरुणे सौम्ये मार्ग चतुष्टयम् || | ||
'''५३०''' उदक् पूर्वादि विप्रादी न्यथा स्थानं निवेशयेत् |<br> | '''५३०''' उदक् पूर्वादि विप्रादी न्यथा स्थानं निवेशयेत् |<br>खरासमादितः कृत्वा कोणकोणकरच्युतम् || | ||
'''५३१''' अष्टादशावसानञ्च दैर्घ्याद् गृह चतुष्टयम् |<br> | '''५३१''' अष्टादशावसानञ्च दैर्घ्याद् गृह चतुष्टयम् |<br>चतुर्णामपि वर्णानां ज्ञात्वा हानिं प्रकल्पयेत् |<br>पूर्वामुखञ्जपं शक्रं पूषा * *? र्व दक्षिणम् |<br>सुग्रीवं पुष्पदन्तञ्च प्रचेतः पश्चिमामुखम् || | ||
'''५३२''' मुख्यं सोमञ्च भल्लाटं द्वारदैर्घ्येण कारयेत् |<br> | '''५३२''' मुख्यं सोमञ्च भल्लाटं द्वारदैर्घ्येण कारयेत् |<br>तद्वाह्ये रक्षसार्थन्तु भृत्यवर्गान्निवेशयेत् || | ||
'''५३३''' प्रजापालः स्मृतो राजा तस्मान्न्याययन्तु रक्षणम् |<br> | '''५३३''' प्रजापालः स्मृतो राजा तस्मान्न्याययन्तु रक्षणम् |<br>वर्णानामनुपूर्वेण धर्मं देशापयेन्नृपः || | ||
'''५३४''' श्रुति स्मृति पुराणानि आगमा धर्म देशकाः |<br> | '''५३४''' श्रुति स्मृति पुराणानि आगमा धर्म देशकाः |<br>एतैर्यो वर्तते राजा स राज्यं भुञ्जते चिरम् || | ||
'''५३५''' पुराणं वाध्यते वेदै रागमैश्च तदुक्तयः |<br> | '''५३५''' पुराणं वाध्यते वेदै रागमैश्च तदुक्तयः |<br>सामान्यञ्च विशेषञ्च शैवं वैशेषिकं व च || | ||
'''५३६''' वाध्यवाधक भावेन नोविकल्पं विचक्षणैः |<br> | '''५३६''' वाध्यवाधक भावेन नोविकल्पं विचक्षणैः |<br>यद्यथावस्थितं वस्तु सर्वज्ञस्तत्तदा व्रदेत् || | ||
'''५३७''' आगमानां वहुत्वे तु यत्र वाक्य द्वयं भवेत् |<br> | '''५३७''' आगमानां वहुत्वे तु यत्र वाक्य द्वयं भवेत् |<br>किं प्रमाणन्तदा ग्राह्यं प्रमाणं शाङ्करं वचः || | ||
'''५३८''' ग्रन्थाद् ग्रन्थान्तरं टीका सापेक्ष निरपेक्षयोः |<br> | '''५३८''' ग्रन्थाद् ग्रन्थान्तरं टीका सापेक्ष निरपेक्षयोः |<br>समाधनन्तपोः कार्यमर्थापत्यादि साधनैः || | ||
'''५३९''' एवं ज्ञात्वा सुराध्यक्ष निर्वृति परमाम्वुज |<br> | '''५३९''' एवं ज्ञात्वा सुराध्यक्ष निर्वृति परमाम्वुज |<br>एवं धर्मान्विते राज्ञि स्वराष्ट्रे सर्वदा शिवम् || | ||
'''५४०''' नृपालयाद्वहिर्दिक्षुर्हट्टानां पार्श्वयोर्द्वयोः |<br> | '''५४०''' नृपालयाद्वहिर्दिक्षुर्हट्टानां पार्श्वयोर्द्वयोः |<br>पृथक्लीमा परिचितात् प्रसादात् कारयेन् नृपः || | ||
'''५४१''' देवताधिष्ठिते स्थाने धर्मवृद्धिर्नृपे यतः |<br> | '''५४१''' देवताधिष्ठिते स्थाने धर्मवृद्धिर्नृपे यतः |<br>सन्मुखा विमुखाः कार्याः कर्तुरिच्छावसेन तु || | ||
'''५४२''' विशेषविमुखानान्तु रूपकसन्मुखं रथे |<br> | '''५४२''' विशेषविमुखानान्तु रूपकसन्मुखं रथे |<br>तद्रूपं भूषणोपेतं तद्वेषायुधधारिणम् || | ||
'''५४३''' वरदाभयपाणिञ्च न्यसेदेवं समाहितः |<br> | '''५४३''' वरदाभयपाणिञ्च न्यसेदेवं समाहितः |<br>तुल्यमेवं द्वयोर्दृष्टं रूपकं सन्मुखं यतः || | ||
'''५४४''' एवं कृते महाशान्तिर्नृपेराष्ट्रे तु सर्वदा |<br> | '''५४४''' एवं कृते महाशान्तिर्नृपेराष्ट्रे तु सर्वदा |<br>तैरेवान्तरितोश्चान्ये प्रसादात् तद्वहिः स्थिताः || | ||
'''५४५''' सन्मुखा विमुखाः कार्याः कर्तुरिच्छा वसेन तु |<br> | '''५४५''' सन्मुखा विमुखाः कार्याः कर्तुरिच्छा वसेन तु |<br>सस्तैरन्तरितास्ते तु नते दोषावहाहरे || | ||
'''५४६''' देवता रूपकैर्युक्ता गुणोत्कर्षं वहन्तिते |<br> | '''५४६''' देवता रूपकैर्युक्ता गुणोत्कर्षं वहन्तिते |<br>तेभ्यो येन्ये वहिर्भूतास्तत्राप्येवं व्यवस्थितिः || | ||
'''५४७''' नगराद्वहिश्चतुर्दिक्षु लक्ष्मी यक्षाधिपौ न्यसेत् |<br> | '''५४७''' नगराद्वहिश्चतुर्दिक्षु लक्ष्मी यक्षाधिपौ न्यसेत् |<br>विभूतिञ्चिन्त्यमानौ तु नृपस्य तन्निवासिनाम् || | ||
'''५४८''' नगराभिमुखौ कार्यौ वरदा भयपाणिनौ |<br> | '''५४८''' नगराभिमुखौ कार्यौ वरदा भयपाणिनौ |<br>नियमस्तत्कृते दृष्टो न सर्वत्र पुरन्दर || | ||
'''५४९''' पूर्वादौ सर्वतो दिक्षुस्वस्थाने ये सुरालयाः |<br> | '''५४९''' पूर्वादौ सर्वतो दिक्षुस्वस्थाने ये सुरालयाः |<br>सन्मुखा विमुखाः कार्याः कर्तुरिच्छावसेन तु || | ||
'''५५०''' पूर्ववल्लक्षणैर्युक्ताः शान्ति श्रेयस्करा नृणाम् |<br> | '''५५०''' पूर्ववल्लक्षणैर्युक्ताः शान्ति श्रेयस्करा नृणाम् |<br>एवं देवालयैर्युक्ते यत्फलन्तन्निगद्यते || | ||
'''५५१''' धर्म वृद्धिर्भवेन्नित्यं कल्याणं सर्वप्राणिषु |<br> | '''५५१''' धर्म वृद्धिर्भवेन्नित्यं कल्याणं सर्वप्राणिषु |<br>राज च वर्तते नित्यं सामात्योवलवाहनैः || | ||
'''५५२''' नोपसर्गभयन्तस्य प्रातिराज्यो न दुर्गतिः |<br> | '''५५२''' नोपसर्गभयन्तस्य प्रातिराज्यो न दुर्गतिः |<br>धर्मवृद्धिर्भवेत् कर्तुः पुत्रपौत्रान्वयैः सह || | ||
'''५५३''' एवं सर्वत्र विज्ञेयं पुरादौ देवता लयात् |<br> | '''५५३''' एवं सर्वत्र विज्ञेयं पुरादौ देवता लयात् |<br>अस्मादि कल्पितानान्तु लिङ्गानां नृस्वरूपिणाम् || | ||
'''५५४''' मानुषैः स्थापितानान्तु नान्येषां पाकशासन |<br> | '''५५४''' मानुषैः स्थापितानान्तु नान्येषां पाकशासन |<br>नायं विधिः स्वयं वयक्ते न वाणे सुरनायक || | ||
'''५५५''' सन्मुखौ विमुखौ कार्यौ सर्वानुग्रहको यतः |<br> | '''५५५''' सन्मुखौ विमुखौ कार्यौ सर्वानुग्रहको यतः |<br>स्वोच्छवाणे सदा देवः सन्निधः स्वेच्छया शिवः || | ||
'''५५६''' प्राणिनामनुकम्पार्थन्न तयोर्नियमः क्वचित् |<br> | '''५५६''' प्राणिनामनुकम्पार्थन्न तयोर्नियमः क्वचित् |<br>प्रासादे द्वार विन्यासे पीठे चैव तु मण्डपे || | ||
'''५५७''' जगती पाद विन्यासे प्रतिष्ठासु न विद्यते |<br> | '''५५७''' जगती पाद विन्यासे प्रतिष्ठासु न विद्यते |<br>महद्भिः स्थापितानान्तु लिङ्गानां घटितात्मनाम् || | ||
'''५५८''' विधिः पूर्वोदितस्तत्र प्रासादादौ न कुत्रचित् |<br> | '''५५८''' विधिः पूर्वोदितस्तत्र प्रासादादौ न कुत्रचित् |<br>भूपरीक्षां समारभ्य प्रासादान्तम्पृथक्पृथक् || | ||
'''५५९''' निःसन्दिग्धं सु संवेद्यं स्फुटार्थं यत् क्रमागतम् |<br> | '''५५९''' निःसन्दिग्धं सु संवेद्यं स्फुटार्थं यत् क्रमागतम् |<br>कथितन्ते सुराध्यक्ष लिङ्गादौ स्थापनं शृणु || | ||
'''५६०''' इति मोहचूरोत्तरे प्रासादप्रख्याने चतुर्थः पटलः || | '''५६०''' इति मोहचूरोत्तरे प्रासादप्रख्याने चतुर्थः पटलः || | ||
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'''५६१''' स्कन्द उवाच || | '''५६१''' स्कन्द उवाच || | ||
'''५६२''' कर्तुश्चैवानुकूलेन नक्षत्रादौ शुभे दिने |<br> | '''५६२''' कर्तुश्चैवानुकूलेन नक्षत्रादौ शुभे दिने |<br>प्रतिष्ठा शुक्लपक्षे तु श्रेष्ठा चोदग्गते रवौ || | ||
'''५६३''' ब्राह्म्यं शैवं जलाध्यक्षमाप्यं विश्वाधि दैवतम् |<br> | '''५६३''' ब्राह्म्यं शैवं जलाध्यक्षमाप्यं विश्वाधि दैवतम् |<br>नागं सौरं हरिं मित्रं सोमं शक्रं सदागतिम् || | ||
'''५६४''' त्वष्टाधि दैवतं पौष्णं वसवञ्च शुभानि तु |<br> | '''५६४''' त्वष्टाधि दैवतं पौष्णं वसवञ्च शुभानि तु |<br>प्रतिष्ठा सर्वदेवानामेतैः कार्या शतक्रतो || | ||
'''५६५''' गुरुः शुक्रो बुधश्चन्द्रो ग्रहाः सौम्याः प्रकीर्तिताः |<br> | '''५६५''' गुरुः शुक्रो बुधश्चन्द्रो ग्रहाः सौम्याः प्रकीर्तिताः |<br>द्रव्यमायुः प्रजापुष्टिं वाञ्छा प्राप्ति करास्त्विमे || | ||
'''५६६''' न न्यूनानाधिका कन्या जलाधारं शिवोद्वहम् |<br> | '''५६६''' न न्यूनानाधिका कन्या जलाधारं शिवोद्वहम् |<br>कोणलग्नं सदाश्रेष्ठं प्रतिष्ठायां शिवागमे || | ||
'''५६७''' छागं युग्मङ्कुलीरञ्च हरिं कीटन्तथैव च |<br> | '''५६७''' छागं युग्मङ्कुलीरञ्च हरिं कीटन्तथैव च |<br>ऋतु रूपानलागैश्च स्वरूपैः शोभनः शशी || | ||
'''५६८''' मैत्रं परममैत्रञ्च संपत्क्षेमञ्च शाश्वतम् |<br> | '''५६८''' मैत्रं परममैत्रञ्च संपत्क्षेमञ्च शाश्वतम् |<br>ववञ्च वालवञ्चैव लौलवन्तै तिलन्तथा || | ||
'''५६९''' ताराकरणं शुभं शक्र सर्वदेव निवेशने |<br> | '''५६९''' ताराकरणं शुभं शक्र सर्वदेव निवेशने |<br>युग्माभूतारसानागा दिशा रुद्रा दिवाकराः || | ||
'''५७०''' कामापूर्णा सुराध्यक्ष तिथयस्तु सुसम्मताः |<br> | '''५७०''' कामापूर्णा सुराध्यक्ष तिथयस्तु सुसम्मताः |<br>भौममन्दौ त्रिषष्ठस्थौ चन्द्रादित्यौ तथा पुनः || | ||
'''५७१''' दशमौ तु मुनिश्चन्द्रौ द्विसप्ताहूः शरैर्गुरुः |<br> | '''५७१''' दशमौ तु मुनिश्चन्द्रौ द्विसप्ताहूः शरैर्गुरुः |<br>युग्मतुर्य रसाष्टैस्तु दशस्थः शोभनो बुधः || | ||
'''५७२''' रससप्त दशार्कस्थ शुक्रस्त्याज्यः प्रयत्नतः |<br> | '''५७२''' रससप्त दशार्कस्थ शुक्रस्त्याज्यः प्रयत्नतः |<br>उत्पातञ्चैव काणञ्च मृत्युयोगं विवर्जयेत् || | ||
'''५७३''' क्षेत्र ऋक्षे ग्रहाः सर्वे यमघण्टेति निश्चिताः |<br> | '''५७३''' क्षेत्र ऋक्षे ग्रहाः सर्वे यमघण्टेति निश्चिताः |<br>यस्मात् ते सर्वकार्यघ्ना प्रतिष्ठायां न योजयेत् || | ||
'''५७४''' क्षीणचन्द्रस्तथादित्य कुजार्किस्तैर्युतो बुधः |<br> | '''५७४''' क्षीणचन्द्रस्तथादित्य कुजार्किस्तैर्युतो बुधः |<br>पापाः पापांशया यस्मात् सर्वकार्ये विवर्जयेत् || | ||
'''५७५''' रजनीं प्राप्य सर्वेषां प्रभावो न यथा दिवा |<br> | '''५७५''' रजनीं प्राप्य सर्वेषां प्रभावो न यथा दिवा |<br>आनन्दामृत सिद्धैस्तु योगैर्नैमित्तिकैः शुभाः || | ||
'''५७६''' प्रशस्ता सर्वकार्यंषु प्रतिष्ठायां विशेषतः |<br> | '''५७६''' प्रशस्ता सर्वकार्यंषु प्रतिष्ठायां विशेषतः |<br>माघ फाल्गुन वैशाखे आषाढे वा शुभे दिने || | ||
'''५७७''' केन्द्रस्थे च गुरौ शुक्रे न लग्ने दोषदा ग्रहाः |<br> | '''५७७''' केन्द्रस्थे च गुरौ शुक्रे न लग्ने दोषदा ग्रहाः |<br>नष्ट चन्द्रे तथा शुक्रे गुरावस्तवनङ्गते || | ||
'''५७८''' प्रतिष्ठादौ शुभारंभं दूरयात्रां न कारयेत् |<br> | '''५७८''' प्रतिष्ठादौ शुभारंभं दूरयात्रां न कारयेत् |<br>सौभाग्यः शोभना युष्मान् सिद्धः साद्ध्यः शिवः शुभः || | ||
'''५७९''' वृद्धिः प्रीतिर्धृतिः सिद्धिर्ध्रुवः शुक्लश्च शोभनाः |<br> | '''५७९''' वृद्धिः प्रीतिर्धृतिः सिद्धिर्ध्रुवः शुक्लश्च शोभनाः |<br>यजमानस्यानुकूलेन प्रासादाग्रे तु कारयेत् || | ||
'''५८०''' उत्तमं वेद युग्मैस्तु वस्वेकेन तु मध्यमम् |<br> | '''५८०''' उत्तमं वेद युग्मैस्तु वस्वेकेन तु मध्यमम् |<br>युग्मेन्दु कन्यसन्धाम ज्ञात्वान्यत्र प्रयोजयेत् || | ||
'''५८१''' चतुरस्रं समङ्कृत्वा वास्तु मिष्ट्वा यथा पुरा |<br> | '''५८१''' चतुरस्रं समङ्कृत्वा वास्तु मिष्ट्वा यथा पुरा |<br>खात्वाशल्योद्धृतिं कृत्वा पूरयित्वा दृढं यथा || | ||
'''५८२''' त्रिभाग वेदिका युक्तं कोणस्तंभ विराजितम् |<br> | '''५८२''' त्रिभाग वेदिका युक्तं कोणस्तंभ विराजितम् |<br>वाह्येप्येव विधं स्तंभैर्यज्ञ वृक्ष समुद्भवैः || | ||
'''५८३''' दशाष्ट षट्करोच्छेधैर्ज्येष्ठादीनां क्रमेण तु |<br> | '''५८३''' दशाष्ट षट्करोच्छेधैर्ज्येष्ठादीनां क्रमेण तु |<br>प्रदेशो वा यदा नास्ति अधो वा सुदृढं यथा || | ||
'''५८४''' यत्रा भावस्तु वृक्षाणान्तत्र यद्रुचितङ्कुरु |<br> | '''५८४''' यत्रा भावस्तु वृक्षाणान्तत्र यद्रुचितङ्कुरु |<br>उच्चा सूर्याङ्गुला वेदी ततोर्द्धाङ्गुल विच्युतिः || | ||
'''५८५''' ज्येष्ठज्येष्ठ्यासुरश्रेष्ठ ज्ञात्वान्यत्र प्रयोजयेत् |<br> | '''५८५''' ज्येष्ठज्येष्ठ्यासुरश्रेष्ठ ज्ञात्वान्यत्र प्रयोजयेत् |<br>विन्दु वेदाङ्गुलं कुण्डं दृक्त्यागात् तु यथाक्रमम् || | ||
'''५८६''' ज्येष्ठादिकन्यसान्तान्तां वेदी पादाद्वहिः कृतम् |<br> | '''५८६''' ज्येष्ठादिकन्यसान्तान्तां वेदी पादाद्वहिः कृतम् |<br>वेद युग्मासितङ्कृत्वा अङ्गुलं भागसंमितम् || | ||
'''५८७''' तावद् भिरङ्गुलैर्हस्तं कुण्डानां परिकल्पयेत् |<br> | '''५८७''' तावद् भिरङ्गुलैर्हस्तं कुण्डानां परिकल्पयेत् |<br>हस्तमात्रं खनेत् तिर्यग् ऊर्ध्वं मेखलया सह || | ||
'''५८८''' वहिः खाताङ्गुलं कण्ठः सर्वकुण्डेष्वयं विधिः |<br> | '''५८८''' वहिः खाताङ्गुलं कण्ठः सर्वकुण्डेष्वयं विधिः |<br>मेखला त्रितयं कार्यं कोणरामयमाङ्गुलैः || | ||
'''५८९''' दैर्घ्यात् सूर्याङ्गुलानाभिस्त्र्यंशो ना विस्तरेण तु |<br> | '''५८९''' दैर्घ्यात् सूर्याङ्गुलानाभिस्त्र्यंशो ना विस्तरेण तु |<br>एकाङ्गुलोच्छ्रिता सा तु प्रतिष्ठाभ्यन्तरे तथा || | ||
'''५९०''' कुंभ द्वय समायुक्ता अश्वत्थदलवद्यथा |<br> | '''५९०''' कुंभ द्वय समायुक्ता अश्वत्थदलवद्यथा |<br>अङुष्ठ मेखला युक्ता मध्ये त्वाज्य धृतिर्यथा || | ||
'''५९१''' दक्षस्था पूर्वयाम्ये तु जलस्था पश्चिमोत्तरे |<br> | '''५९१''' दक्षस्था पूर्वयाम्ये तु जलस्था पश्चिमोत्तरे |<br>दिक्षु वेदास्र वृत्तानि पञ्चमन्त्वीशगोचरे || | ||
'''५९२''' तस्य नाभिर्जले दक्षे यदिष्टन्तत्करिष्यति |<br> | '''५९२''' तस्य नाभिर्जले दक्षे यदिष्टन्तत्करिष्यति |<br>कुण्डानि पञ्च एकं वा कर्तव्यं पूर्वतः स्थितम् || | ||
'''५९३''' चतुर्मुखः प्रकर्तव्यः स्नानाख्यस्तस्य चोत्तरे |<br> | '''५९३''' चतुर्मुखः प्रकर्तव्यः स्नानाख्यस्तस्य चोत्तरे |<br>ईशे प्राच्यथवा कार्यो वेदिकाद्वितयान्वितः || | ||
'''५९४''' न्यग्रोधोदुम्वरोश्वत्थ प्लक्षास्तोरण मूर्तयः |<br> | '''५९४''' न्यग्रोधोदुम्वरोश्वत्थ प्लक्षास्तोरण मूर्तयः |<br>सूर्याङ्गुलाधिकैर्नागैरष्टभिर्मुनिभिः करैः || | ||
'''५९५''' सप्तहस्तादधो यत्तु हस्तहस्त परिच्युतेः |<br> | '''५९५''' सप्तहस्तादधो यत्तु हस्तहस्त परिच्युतेः |<br>तोरणद्वितयं ख्यातन्तदूर्ध्वं तोरण द्वयम् || | ||
'''५९६''' अन्तरालं त्रिधाभाज्य एकत्वेन नवैव तु |<br> | '''५९६''' अन्तरालं त्रिधाभाज्य एकत्वेन नवैव तु |<br>सर्वेषान्तोरणानान्तु पञ्चमांशं प्रवेशयेत् || | ||
'''५९७''' विस्तरेणोच्छ्रयन्तुल्यं वाहुल्येन षडङ्गुलम् |<br> | '''५९७''' विस्तरेणोच्छ्रयन्तुल्यं वाहुल्येन षडङ्गुलम् |<br>पञ्चहस्तादितः कृत्वा वर्द्धयेदङ्गुलाङ्गुलम् || | ||
'''५९८''' उच्छ्रयं पञ्चधाभाज्य शूलं पक्षांश निर्गतिः |<br> | '''५९८''' उच्छ्रयं पञ्चधाभाज्य शूलं पक्षांश निर्गतिः |<br>शाखयोरङ्गुलैश्चूला वसुभिश्चाङ्गुलन्ततः || | ||
'''५९९''' पूर्ववृक्षोद्भवास्तंभा याज्ञिका वा अभावतः |<br> | '''५९९''' पूर्ववृक्षोद्भवास्तंभा याज्ञिका वा अभावतः |<br>द्विगुणं ब्रह्मणो भागात् क्षीरवृक्षसमुद्भवम् || | ||
'''६००''' पद्माङ्कञ्चतुश्चरणं रसैकाङ्गुलमुच्छ्रितम् |<br> | '''६००''' पद्माङ्कञ्चतुश्चरणं रसैकाङ्गुलमुच्छ्रितम् |<br>उपस्करकुटीकार्या वारुण्यां मण्डयार्द्धक || | ||
'''६०१''' स्रुक् स्रुवौ लक्षणो पेतौ यज्ञवृक्षसमुद्भवौ |<br> | '''६०१''' स्रुक् स्रुवौ लक्षणो पेतौ यज्ञवृक्षसमुद्भवौ |<br>उदुम्वरपलाशाम्ररुद्राश्वत्थमधूकतः || | ||
'''६०२''' रसरामाङ्गुला कार्या दोर्दण्डे नाथ वा समा |<br> | '''६०२''' रसरामाङ्गुला कार्या दोर्दण्डे नाथ वा समा |<br>अष्टाङ्गुला स्मृता वेदी कण्ठोङ्गुष्ठः फलं स्वरैः || | ||
'''६०३''' उत्तमामध्यमा कन्या एकैकाङ्गुल हानितः |<br> | '''६०३''' उत्तमामध्यमा कन्या एकैकाङ्गुल हानितः |<br>मध्ये वृत्तन्तु संभ्राम्य त्यक्तैकं पट्टिकाङ्गुलम् || | ||
'''६०४''' तत्समञ्चाध वाहुल्यं समस्तञ्चतुरङ्गुलम् |<br> | '''६०४''' तत्समञ्चाध वाहुल्यं समस्तञ्चतुरङ्गुलम् |<br>पार्श्वयोरङ्गुलं स्थाप्य कुंभाकारमधो यथा || | ||
'''६०५''' अग्रे त्रिभाग विस्तारमाज्यरन्ध्र कनिष्ठया |<br> | '''६०५''' अग्रे त्रिभाग विस्तारमाज्यरन्ध्र कनिष्ठया |<br>गण्डिकाद्व्यङ्गुला दीर्घादण्डादेकाङ्गुलाधिका || | ||
'''६०६''' षडङ्गुल परीणाहं शेषं दण्डस्य दीर्घता |<br> | '''६०६''' षडङ्गुल परीणाहं शेषं दण्डस्य दीर्घता |<br>वृत्तवत्कलशोपेता तदङ्गोहास्तिकः स्रुवः || | ||
'''६०७''' पृष्ठे कुंभ द्वयोपेतः पङ्के गोपदवद्यथा |<br> | '''६०७''' पृष्ठे कुंभ द्वयोपेतः पङ्के गोपदवद्यथा |<br>द्व्यङ्गुलं पुस्करन्तस्य दण्डमेकाङ्गुलं विदुः || | ||
'''६०८''' गण्डिकाद्वियवा तस्य दण्डाग्रे कलशोद्गतिः |<br> | '''६०८''' गण्डिकाद्वियवा तस्य दण्डाग्रे कलशोद्गतिः |<br>वाहुमात्रांकुशैः स्निग्धैः खरामदलवर्तिताः || | ||
'''६०९''' विष्टरास्तु प्रकर्तव्या मूलाग्रे दर्भग्रन्थयः |<br> | '''६०९''' विष्टरास्तु प्रकर्तव्या मूलाग्रे दर्भग्रन्थयः |<br>तत्समा यज्ञ वृक्षोत्था परिधयः सुलक्षणाः || | ||
'''६१०''' प्राक्षेद मात्राः समिधः स्फुटिता दोषवर्जिताः |<br> | '''६१०''' प्राक्षेद मात्राः समिधः स्फुटिता दोषवर्जिताः |<br>अर्कोद्भवापलाशोत्था खदिराङ्गापामार्गजा || | ||
'''६११''' अश्वत्थो दुम्वरोद्भूताः शमीदूर्वा समुद्भवाः |<br> | '''६११''' अश्वत्थो दुम्वरोद्भूताः शमीदूर्वा समुद्भवाः |<br>कुशोत्था ग्रहशान्त्यर्थन्तदभावात्तिलैर्यवैः || | ||
'''६१२''' इन्धनानि चतुष्कानि प्रशस्तान्यग्नि कर्मणि |<br> | '''६१२''' इन्धनानि चतुष्कानि प्रशस्तान्यग्नि कर्मणि |<br>सौवर्णं राजतन्ताम्रं कुक्षिमत्कम्वुकन्धरम् || | ||
'''६१३''' तद्वच्चकर्करी ज्ञेया सुरूपा चारूदर्शना |<br> | '''६१३''' तद्वच्चकर्करी ज्ञेया सुरूपा चारूदर्शना |<br>अभावान्मृद्भवं सर्वं कृष्णावर्तादि वर्जितम् || | ||
'''६१४''' कलशागड्डुकाप्येवं कुंभाश्चैवोपयोगिनः |<br> | '''६१४''' कलशागड्डुकाप्येवं कुंभाश्चैवोपयोगिनः |<br>लोहिताः ससरावाश्च दीपवृक्षादि मल्लिकाः || | ||
'''६१५''' नैवेद्यरन्धनार्थन्तु नानापाक समुच्चयम् |<br> | '''६१५''' नैवेद्यरन्धनार्थन्तु नानापाक समुच्चयम् |<br>अखिलं यागसंभारं यागभूमौ समाहरेत् || | ||
'''६१६''' पञ्चहस्ता ध्वजां कार्या वैपुल्येन द्विहस्तिकाः |<br> | '''६१६''' पञ्चहस्ता ध्वजां कार्या वैपुल्येन द्विहस्तिकाः |<br>सप्तहस्ता पताकास्तु विंशत्यङ्गुल विस्तृताः || | ||
'''६१७''' पञ्चहस्ता ध्वजानान्तु पञ्चमांश प्रवेशिताः |<br> | '''६१७''' पञ्चहस्ता ध्वजानान्तु पञ्चमांश प्रवेशिताः |<br>दशहस्ता पताकानां दण्डाः पञ्चांश वेशिताः || | ||
'''६१८''' सिन्दूरा कर्वुरा धूम्रा धूसरा मेघसन्निभाः |<br> | '''६१८''' सिन्दूरा कर्वुरा धूम्रा धूसरा मेघसन्निभाः |<br>हरिता पाण्डुवर्णा च शुभ्राः पूर्वादितः क्रमात् || | ||
'''६१९''' एवं वर्णाध्वजाः कार्याः पताकापाकशासन |<br> | '''६१९''' एवं वर्णाध्वजाः कार्याः पताकापाकशासन |<br>मध्ये श्वेताथ वा पीता दर्पणाद्युपशोभिता || | ||
'''६२०''' मण्डपान्तं वितानं स्यादथ वा वेदिकोपरि |<br> | '''६२०''' मण्डपान्तं वितानं स्यादथ वा वेदिकोपरि |<br>वस्त्रैरुल्लोचयेत् स्तंभान्तथा तोरण मूर्तयः || | ||
'''६२१''' शान्तः शिशिर पर्यन्य विशोकाप्यायका मृतान् |<br> | '''६२१''' शान्तः शिशिर पर्यन्य विशोकाप्यायका मृतान् |<br>धनश्री शौच स्तम्भाधो द्वौ द्वौ रत्न युतौ न्यसेत् || | ||
'''६२२''' चूतपल्लवशोभाढ्यान्प्रत्येकं कण्ठ वाससान् |<br> | '''६२२''' चूतपल्लवशोभाढ्यान्प्रत्येकं कण्ठ वाससान् |<br>कदली स्तंभ विन्यासैः स्रग्दाम चूत पल्लवैः || | ||
'''६२३''' शोभयित्वा वहिः पश्चात्ततश्चाभ्यन्तरं विशेत् |<br> | '''६२३''' शोभयित्वा वहिः पश्चात्ततश्चाभ्यन्तरं विशेत् |<br>वेदिकोपरि चैशान्यां सर्वधान्यासने स्थितम् || | ||
'''६२४''' वस्त्रयुग्मावृतं कण्ठे चूतपल्लवशोभितम् |<br> | '''६२४''' वस्त्रयुग्मावृतं कण्ठे चूतपल्लवशोभितम् |<br>स रत्नं शिव कुम्भञ्च भूषयन्तं मखालयम् || | ||
'''६२५''' कर्करी तत्सखी वामे भूषितानाल पश्चिमा |<br> | '''६२५''' कर्करी तत्सखी वामे भूषितानाल पश्चिमा |<br>धर्माद्याः कोणसंस्थास्तु रत्नवस्त्रविभूषिताः || | ||
'''६२६''' इन्द्रादि कलशोप्येवं तथा शान्ति घटानपि |<br> | '''६२६''' इन्द्रादि कलशोप्येवं तथा शान्ति घटानपि |<br>एवं निद्रा घटो दृष्टो ब्रह्मलक्ष्मी हरेर्घटाः || | ||
'''६२७''' स्रग्वस्त्रवेष्टितं कुण्डं स्रुक्स्रुवौ तत्समीपगौ |<br> | '''६२७''' स्रग्वस्त्रवेष्टितं कुण्डं स्रुक्स्रुवौ तत्समीपगौ |<br>उपस्कर कुटी मध्ये स्थापयेद् यज्ञसाधनम् || | ||
'''६२८''' ताम्रमयी चरुस्थाली स पिधाना स चट्टुका |<br> | '''६२८''' ताम्रमयी चरुस्थाली स पिधाना स चट्टुका |<br>लोहयन्त्रिकया युक्ता चरुस्थालं तथाविधम् || | ||
'''६२९''' स नालन्ताम्रपात्रञ्च घण्टाधूपक उच्छ्रकम् |<br> | '''६२९''' स नालन्ताम्रपात्रञ्च घण्टाधूपक उच्छ्रकम् |<br>खभूतपलसंख्यन्तु तस्यार्द्धः स्यात् ततोर्द्ध्वतः || | ||
'''६३०''' ज्येष्ठादि कन्यसान्तानान्त्रिधा स्यादर्घपात्रकम् |<br> | '''६३०''' ज्येष्ठादि कन्यसान्तानान्त्रिधा स्यादर्घपात्रकम् |<br>हेमद्रव्यादि निर्वृत्तम् भवादनुरूपतः || | ||
'''६३१''' यन्त्रिका च तथा ज्ञेया प्रति कुण्डेर्घ पात्रकम् |<br> | '''६३१''' यन्त्रिका च तथा ज्ञेया प्रति कुण्डेर्घ पात्रकम् |<br>तथा तिलाज्य पात्राणि गन्धाख्यं स्यात् तथाविधम् || | ||
'''६३२''' पञ्चगव्यस्य पात्राणि पञ्चैव परिकल्पयेत् |<br> | '''६३२''' पञ्चगव्यस्य पात्राणि पञ्चैव परिकल्पयेत् |<br>तथाभ्यङ्गस्य पात्रञ्च लक्षणार्थं मधूद्वहम् || | ||
'''६३३''' रामयुग्मैकमासैस्तु शलाका ज्येष्ठतः क्रमात् |<br> | '''६३३''' रामयुग्मैकमासैस्तु शलाका ज्येष्ठतः क्रमात् |<br>तूलिका द्वितयं कार्यं सोपधानं पटावृतम् || | ||
'''६३४''' शययार्थं स्मृतः पट्टः पट्टाश्चैवोपवेशने |<br> | '''६३४''' शययार्थं स्मृतः पट्टः पट्टाश्चैवोपवेशने |<br>गृहार्थन्तु चरूस्थाली पूर्वलक्षणलक्षिता || | ||
'''६३५''' घटीताम्री तथा पात्रं भोजनार्थं प्रकल्पयेत् |<br> | '''६३५''' घटीताम्री तथा पात्रं भोजनार्थं प्रकल्पयेत् |<br>मार्जनीकण्डनीपेषी गृहोपस्कररणानि च || | ||
'''६३६''' करण्डाड उल्लिका व्यजनं कण्डालाद्यन्तथैव च |<br> | '''६३६''' करण्डाड उल्लिका व्यजनं कण्डालाद्यन्तथैव च |<br>अपर्युषित पुष्पाणि बिल्वपत्रादि पत्रिकाम् || | ||
'''६३७''' धूपार्थं गुग्गुलं साज्यं चन्दनं भोज्य सन्ततिः |<br> | '''६३७''' धूपार्थं गुग्गुलं साज्यं चन्दनं भोज्य सन्ततिः |<br>होमार्थन्तिलयवौसर्पिर्यथा योगं समाहरेत् || | ||
'''६३८''' द्रव्याणामप्य लाभे तु यथा लाभमुपाहरेत् |<br> | '''६३८''' द्रव्याणामप्य लाभे तु यथा लाभमुपाहरेत् |<br>लिङ्गादि शोधनार्थन्तु स्नानद्रव्यं निगद्यते || | ||
'''६३९''' गङ्गातीरमृदो ग्राह्याः कुलाद्रौ तीर्थसङ्गता |<br> | '''६३९''' गङ्गातीरमृदो ग्राह्याः कुलाद्रौ तीर्थसङ्गता |<br>पद्मखण्डे च वल्मीकेन दीनां सङ्गमेपि च || | ||
'''६४०''' उद्धृता दन्तिनान्दन्तैर्वृषैः सानन्ददर्पितैः |<br> | '''६४०''' उद्धृता दन्तिनान्दन्तैर्वृषैः सानन्ददर्पितैः |<br>न्यग्रोधोदुम्वरोश्वत्थ जम्वाम्र त्वक् सुशोभना || | ||
'''६४१''' मुरामांसीवचा कुष्टं शैलजं रजनीयकम् |<br> | '''६४१''' मुरामांसीवचा कुष्टं शैलजं रजनीयकम् |<br>सटीचम्पकमुस्तञ्च सर्वौषधिगणः स्मृतः || | ||
'''६४२''' उशीरञ्चन्दनं लोध्रं तगरं फलिनी जला |<br> | '''६४२''' उशीरञ्चन्दनं लोध्रं तगरं फलिनी जला |<br>लक्षणागिरिकर्णी च क्षीरिणी वृहति शिखा || | ||
'''६४३''' ब्रह्मदण्डी नागकर्णी सहदेवा पुनर्नवा |<br> | '''६४३''' ब्रह्मदण्डी नागकर्णी सहदेवा पुनर्नवा |<br>कुमारी द्रोणपुष्पी च शंखिनी खरमञ्जरी || | ||
'''६४४''' शिवाग्नौ संस्कृतं भस्म वस्त्रेणान्तरितंसितम् |<br> | '''६४४''' शिवाग्नौ संस्कृतं भस्म वस्त्रेणान्तरितंसितम् |<br>गोमूत्रङ्गोमयं क्षीरन्दधिशर्पिः पृथक् पृथक् || | ||
'''६४५''' पञ्चामृतन्तथा भूतं फलानि विविधानि च |<br> | '''६४५''' पञ्चामृतन्तथा भूतं फलानि विविधानि च |<br>रत्नादि पञ्चकञ्चैव सुसंपूर्णं पृथक् पृथक् || | ||
'''६४६''' हैमङ्कूर्मन्तथा पद्मम्पारदंत्वोमतन्दुलाः |<br> | '''६४६''' हैमङ्कूर्मन्तथा पद्मम्पारदंत्वोमतन्दुलाः |<br>इत्येवमादि संभारङ्कुम्भाद्यंयन्न चोदितम् || | ||
'''६४७''' सर्वं सुसम्भृतं कृत्वा ज्ञापयेद् देशिकोत्तमः |<br> | '''६४७''' सर्वं सुसम्भृतं कृत्वा ज्ञापयेद् देशिकोत्तमः |<br>वृणुयाद् देशिकं पूर्वं वस्त्रहेमादि भूषणैः || | ||
'''६४८''' तथानुमूर्तिपान्सर्वानस्तु जापि समन्वितान् |<br> | '''६४८''' तथानुमूर्तिपान्सर्वानस्तु जापि समन्वितान् |<br>ऋत्विजान्वेदनिष्ठांश्च बोधयित्वा च शिल्पिनः || | ||
'''६४९''' श्रद्धाविष्टः शुचिः कर्ता नत्वा विज्ञापयेदिदम् |<br> | '''६४९''' श्रद्धाविष्टः शुचिः कर्ता नत्वा विज्ञापयेदिदम् |<br>त्वत् प्रसादाच्च हे नाथ लिङ्गसंस्थापनं मम || | ||
'''६५०''' हुङ्कारोमीत्यनुज्ञाय नित्यनिर्वर्तितो गुरुः |<br> | '''६५०''' हुङ्कारोमीत्यनुज्ञाय नित्यनिर्वर्तितो गुरुः |<br>आवश्यकन्ततः शौचमिन्द्रियाणाञ्च शोधनम् || | ||
'''६५१''' मलस्नानं विधिस्नानं स सन्ध्यम्भस्मगुण्ठनम् |<br> | '''६५१''' मलस्नानं विधिस्नानं स सन्ध्यम्भस्मगुण्ठनम् |<br>यतिनो गृहिणः पूर्वसन्ध्यादौ समता द्वयोः || | ||
'''Sandhya, Atem und innere Verehrung''' | '''Sandhya, Atem und innere Verehrung''' | ||
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'''६५२''' सन्ध्याया लक्षणं शक्र प्रसङ्गेन निगद्यते |<br> | '''६५२''' सन्ध्याया लक्षणं शक्र प्रसङ्गेन निगद्यते |<br>आद्या शक्तिः पुरानित्या यासा कारणधर्मिणी || | ||
'''६५३''' सा सन्ध्या परमार्थेन बोधेनाव गतात्मनः |<br> | '''६५३''' सा सन्ध्या परमार्थेन बोधेनाव गतात्मनः |<br>ध्याननिष्ठा प्रतिष्ठानां पुंसां लक्षानुरोधतः || | ||
'''६५४''' मृणालसूत्रसङ्काशा पश्चात् स्थूलतराऽभवत् |<br> | '''६५४''' मृणालसूत्रसङ्काशा पश्चात् स्थूलतराऽभवत् |<br>पूर्वकालादि भेदेन भिन्नवर्णाः पृथक् पृथक् || | ||
'''६५५''' रक्ताशुक्ला तथा श्यामा चतुर्थी रूपविच्युता |<br> | '''६५५''' रक्ताशुक्ला तथा श्यामा चतुर्थी रूपविच्युता |<br>श्यामवर्णाथ वा सन्ध्या पश्चिमासुरसत्तम || | ||
'''६५६''' लक्षमात्रधराः सर्वालक्षणैस्ता विवर्जिताः |<br> | '''६५६''' लक्षमात्रधराः सर्वालक्षणैस्ता विवर्जिताः |<br>सत्वं रजस्तमश्चैव त्रयाणान्तु गुणत्रयम् || | ||
'''६५७''' निर्गुणा च निराकारा त्वन्तिमा परमार्थतः |<br> | '''६५७''' निर्गुणा च निराकारा त्वन्तिमा परमार्थतः |<br>हृदये च तथा विन्दौ ब्रह्मरन्ध्रे निरास्पदे || | ||
'''६५८''' चतसृणां समुद्दिष्टन्ध्यानस्थानं शतक्रतो |<br> | '''६५८''' चतसृणां समुद्दिष्टन्ध्यानस्थानं शतक्रतो |<br>ज्ञानिनाङ्कथितङ्किञ्चिद् योगिनां कथ्यते हरे || | ||
'''६५९''' अन्ते सूर्यस्य चन्द्रस्य द्वे सन्ध्ये प्राणयोगिनाम् |<br> | '''६५९''' अन्ते सूर्यस्य चन्द्रस्य द्वे सन्ध्ये प्राणयोगिनाम् |<br>परयोगेन कथितात्वन्यथा मम शूलिना || | ||
'''६६०''' शुद्ध बोध पदावस्था आत्मनो या शचीपते |<br> | '''६६०''' शुद्ध बोध पदावस्था आत्मनो या शचीपते |<br>सन्ध्यान्तामपरां विद्धि शून्यरूपां परां पुनः || | ||
'''६६१''' यथाकाल क्रमेणैव सन्ध्यां ध्यात्वा स्वभावतः |<br> | '''६६१''' यथाकाल क्रमेणैव सन्ध्यां ध्यात्वा स्वभावतः |<br>मन्त्रैः शिवात्मकैः पश्चात् कुर्यात् तीर्थं सुभावितः || | ||
'''६६२''' मार्जनं संहिता मन्त्रैः कृत्वा दक्षकरे स्थितम् |<br> | '''६६२''' मार्जनं संहिता मन्त्रैः कृत्वा दक्षकरे स्थितम् |<br>बोधरूपन्तु तत्तोयमिडाया कर्षयेत् ततः || | ||
'''६६३''' कुंभकस्थस्तदातिष्टेद् यावन्नोद्गच्छते रविः |<br> | '''६६३''' कुंभकस्थस्तदातिष्टेद् यावन्नोद्गच्छते रविः |<br>पिङ्गयारविवाहिण्या कारयेदघमर्षणम् || | ||
'''६६४''' शिवमन्त्रं मृणन्मन्त्रि स्वाहान्तमुदकाञ्जलिम् |<br> | '''६६४''' शिवमन्त्रं मृणन्मन्त्रि स्वाहान्तमुदकाञ्जलिम् |<br>दत्वा शिवाय गायत्रीञ्जपेत् पश्चात् सुभावितः || | ||
'''६६५''' जप्त्वा निवेद्य देवाय तर्पणङ्कारयेत् ततः |<br> | '''६६५''' जप्त्वा निवेद्य देवाय तर्पणङ्कारयेत् ततः |<br>मन्त्रा देवाश्च ऋषये मनुष्याः कुणपास्तथा || | ||
'''६६६''' पितरो मातरश्चैव मन्त्रैर्वै जाति योजितैः |<br> | '''६६६''' पितरो मातरश्चैव मन्त्रैर्वै जाति योजितैः |<br>एतान् सन्तर्प्य मेधावी मेधावी आचमेत् पाकशासन || | ||
'''६६७''' आदित्यं पूजयित्वा तु पश्चाद् गच्छेन् मखालयम् |<br> | '''६६७''' आदित्यं पूजयित्वा तु पश्चाद् गच्छेन् मखालयम् |<br>अभ्यर्च्य तोरणा नादौ द्वाराध्यक्षान् यथाक्रमम् || | ||
'''६६८''' आरोग्यं शान्ति भूतिञ्च वलं सौम्यादितः क्रमात् |<br> | '''६६८''' आरोग्यं शान्ति भूतिञ्च वलं सौम्यादितः क्रमात् |<br>धनश्री शौच शान्तादि युग्मयुग्मन्निवेशयेत् || | ||
'''६६९''' देवीश्चैव तु चण्डीशं नन्दिनं कालमेव च |<br> | '''६६९''' देवीश्चैव तु चण्डीशं नन्दिनं कालमेव च |<br>भृङ्गीशञ्च गणाध्यक्षं दुर्मुखं स्कन्दमेव च || | ||
'''६७०''' गन्धैः पुष्पैश्च संपूज्य शिवाज्ञां संविधाय च |<br> | '''६७०''' गन्धैः पुष्पैश्च संपूज्य शिवाज्ञां संविधाय च |<br>यज्ञस्य रक्षकत्वेन स्थातव्यमां हितादरैः || | ||
'''६७१''' वज्रादीनि पताकासु कुमुदाद्यं ध्वजेषु च |<br> | '''६७१''' वज्रादीनि पताकासु कुमुदाद्यं ध्वजेषु च |<br>स्फुरतो विन्यसेद् विद्वान् सर्वविघ्न भयङ्करान् || | ||
'''६७२''' पिधाय सर्वद्वाराणि पश्चाद् द्वारेणसंविशेत् |<br> | '''६७२''' पिधाय सर्वद्वाराणि पश्चाद् द्वारेणसंविशेत् |<br>द्वारदेशे ततः स्थित्वा स्मरन्नस्त्रं सुभास्वरम् || | ||
'''६७३''' विलोक्ययाग संभारं भूमौ पादाहतिं त्रिधा |<br> | '''६७३''' विलोक्ययाग संभारं भूमौ पादाहतिं त्रिधा |<br>विद्युत्पुञ्जनिभं पुष्पन्तन्मध्ये हेतिनाक्षिपेत् || | ||
'''६७४''' तत् तेजः पूरितन्धाम निरस्ता विघ्नसंहतिः |<br> | '''६७४''' तत् तेजः पूरितन्धाम निरस्ता विघ्नसंहतिः |<br>दुःसहं परमं ह्येतदहो विस्मयमा गताः || | ||
'''६७५''' तर्जयत् संविशेन्मध्यं गणान्वै विघ्नरूपिणः |<br> | '''६७५''' तर्जयत् संविशेन्मध्यं गणान्वै विघ्नरूपिणः |<br>हेतिना विन्यसेत् पुष्पञ्ज्वलन्तन्द्वाररक्षकम् || | ||
'''६७६''' प्रदक्षिण क्रमेणैवमुप विशेद्वेदिकोपरि |<br> | '''६७६''' प्रदक्षिण क्रमेणैवमुप विशेद्वेदिकोपरि |<br>दक्ष हस्तन्ततो वा मन्तयोः पृष्ठञ्च हेतिना || | ||
'''६७७''' संशोध्य विन्यसेच्छक्तिम्सुधारूपं शिवेन तु |<br> | '''६७७''' संशोध्य विन्यसेच्छक्तिम्सुधारूपं शिवेन तु |<br>मूर्तिं शिवन्तदङ्गानि कनिष्ठाद्या सुयोजयेत् || | ||
'''६७८''' परमी कृतिन्तयोः कृत्वा धर्मगुप्तिन्ततः पुनः |<br> | '''६७८''' परमी कृतिन्तयोः कृत्वा धर्मगुप्तिन्ततः पुनः |<br>शोधयेद् भूतसङ्घातन्धारणाभिश्च पञ्चभिः || | ||
'''६७९''' उद्यानैः पञ्चभिः पूर्वन्ततोन्यत्रैक विच्युतिः |<br> | '''६७९''' उद्यानैः पञ्चभिः पूर्वन्ततोन्यत्रैक विच्युतिः |<br>शून्यं शून्ये तु विन्यस्य न किञ्चिदपि चिन्तयेत् || | ||
'''६८०''' अमृतञ्चिन्तयेत् पश्चाल्लब्ध्वानन्दगुणोदयः |<br> | '''६८०''' अमृतञ्चिन्तयेत् पश्चाल्लब्ध्वानन्दगुणोदयः |<br>ततश्च शाक्तां मूर्ति शक्तां वीक्षं स्वके न्यसेत् || | ||
'''६८१''' वक्त्रे वक्त्रं हृदिघोरं गुह्यं वाममधस्त्वजम् |<br> | '''६८१''' वक्त्रे वक्त्रं हृदिघोरं गुह्यं वाममधस्त्वजम् |<br>ततः शिवं षडङ्गञ्च यथा स्थानन्निवेशयेत् || | ||
'''६८२''' परत्वञ्च महामुद्रां पादादारभ्य विन्यसेत् |<br> | '''६८२''' परत्वञ्च महामुद्रां पादादारभ्य विन्यसेत् |<br>एवं कृत्वा पुराशक्र अन्तर्यागमथारभेत् || | ||
'''६८३''' तडित्पुञ्जनिभन्ध्यात्वा ज्वलद् द्वीपशिखा कृतिम् |<br> | '''६८३''' तडित्पुञ्जनिभन्ध्यात्वा ज्वलद् द्वीपशिखा कृतिम् |<br>तुषारदानरूपं वा शुद्ध स्फटिक रूपि वा || | ||
'''६८४''' एषामेकतमन्ध्यत्वा यस्मिंल्लक्ष्ये व्रजेन्मनः |<br> | '''६८४''' एषामेकतमन्ध्यत्वा यस्मिंल्लक्ष्ये व्रजेन्मनः |<br>पुष्पभावः क्षमाचार्घं दीपममलात्मकं विदुः |<br>अध्यवसायात्मिका बुद्धिः पुंसिलक्षस्य वेदने |<br>एवं विलेपनं शक्र येनाणुः स्यादलेपकः || | ||
'''६८५''' अग्निः प्राणामतः पात्रं गर्वो धूपशिखा कुलः |<br> | '''६८५''' अग्निः प्राणामतः पात्रं गर्वो धूपशिखा कुलः |<br>भावितस्तत्वाभावेन यदा लक्षं व्रजेत् पुमान् || | ||
'''६८६''' स्वसम्वित्तौ शिवत्वेन तदा गवीयते किल |<br> | '''६८६''' स्वसम्वित्तौ शिवत्वेन तदा गवीयते किल |<br>धूप एष समाख्यातो नैवेद्यं विषयाः स्मृताः || | ||
'''६८७''' आसनं प्रकृतिर्ज्ञेया पूजकः पुरुषः स्मृतः |<br> | '''६८७''' आसनं प्रकृतिर्ज्ञेया पूजकः पुरुषः स्मृतः |<br>नाद समना समायोगात् स्वभावं व्रजते यदा || | ||
'''६८८''' तदा जपः समुद्दिष्टो येनाणुः स्याच्छिवः स्वयम् |<br> | '''६८८''' तदा जपः समुद्दिष्टो येनाणुः स्याच्छिवः स्वयम् |<br>नाभावेवन्तु सम्पूज्य प्राणाग्नौ तेज सान्निधौ || | ||
'''६८९''' परमामृतरूपेण विषयाञ्जुहुयात् समाहितः |<br> | '''६८९''' परमामृतरूपेण विषयाञ्जुहुयात् समाहितः |<br>होम एष समाख्यातो हुत्वा केवलतां व्रजेत् || | ||
'''६९०''' निस्तरङ्गे परे तत्त्वे व्यापके भाववर्जिते |<br> | '''६९०''' निस्तरङ्गे परे तत्त्वे व्यापके भाववर्जिते |<br>तल्लयत्वङ्गत आत्मा ध्यानमेतत् प्रकीर्तितम् || | ||
'''६९१''' प्राकारश्चैव दिग्बन्धस्तर्जनं खातिका तथा |<br> | '''६९१''' प्राकारश्चैव दिग्बन्धस्तर्जनं खातिका तथा |<br>शक्तिजालञ्च विज्ञेयं पञ्चमन्तत्सुदुःसहम् || | ||
'''६९२''' अस्त्राभि मन्त्रितां करकीं तेजो रूपां सुदुःसहाम् |<br> | '''६९२''' अस्त्राभि मन्त्रितां करकीं तेजो रूपां सुदुःसहाम् |<br>तदम्वु प्रोक्षितं सर्वं द्रव्यजातमदोषकृत् || | ||
'''६९३''' प्रक्ष्याल्य चार्घपात्रन्तु पूरयेद्ध्यानमाश्रितः |<br> | '''६९३''' प्रक्ष्याल्य चार्घपात्रन्तु पूरयेद्ध्यानमाश्रितः |<br>न्यस्त्वा शक्तिं शिवं साङ्गं परत्वं मुद्रया कृतम् || | ||
'''६९४''' विशोद्ध्य द्रव्यसंभारमात्मपूजां प्रकल्पयेत् |<br> | '''६९४''' विशोद्ध्य द्रव्यसंभारमात्मपूजां प्रकल्पयेत् |<br>सव्यहस्ते शिवञ्चेष्ट्वा तत्त्वन्यासपुरःसरम् || | ||
'''६९५''' तेजोरूपं न्यसेद्ध्यात्वा समस्ते निष्कलं शिवम् |<br> | '''६९५''' तेजोरूपं न्यसेद्ध्यात्वा समस्ते निष्कलं शिवम् |<br>लिङ्गादि वेशने पत्युः सामर्थ्यं मद्वशं यतः || | ||
'''६९६''' भावयित्वा धिया सर्वं यज्ञारंभं समारभेत् |<br> | '''६९६''' भावयित्वा धिया सर्वं यज्ञारंभं समारभेत् |<br>ऋतुरामदलनिर्वृत्तं ज्ञानासिन्ताल सम्मितम् || | ||
'''६९७''' सप्ताभि मन्त्रितं कृत्वा वाम कक्षे निवेशितम् |<br> | '''६९७''' सप्ताभि मन्त्रितं कृत्वा वाम कक्षे निवेशितम् |<br>पञ्चगव्यन्ततः कुर्याद् विकरादभि मन्त्र्य च || | ||
'''६९८''' इष्ट्वा वास्तुं विकीर्याथ नानाशस्त्र स्वरूपिणः |<br> | '''६९८''' इष्ट्वा वास्तुं विकीर्याथ नानाशस्त्र स्वरूपिणः |<br>लाजा चन्दन सिद्धार्थ भस्म पुष्प कुशाक्षतान् || | ||
'''६९९''' सुगन्धैर्गन्धपुष्पाद्यैः पूजयेत् कलशंवरम् |<br> | '''६९९''' सुगन्धैर्गन्धपुष्पाद्यैः पूजयेत् कलशंवरम् |<br>सासनेन सदेहेन शिवेन समधिष्ठितम् || | ||
'''७००''' एवमस्त्रालुकं चेष्ट्वा लोकपान्पूजयेत् क्रमात् |<br> | '''७००''' एवमस्त्रालुकं चेष्ट्वा लोकपान्पूजयेत् क्रमात् |<br>शिवयागः समारब्धस्त्वद्भक्तानां शिवाज्ञया || | ||
'''७०१''' रक्षणीयोन्तरायेभ्यो लोकपाः सुसमाहितैः |<br> | '''७०१''' रक्षणीयोन्तरायेभ्यो लोकपाः सुसमाहितैः |<br>इत्याज्ञां श्रावयेत् कुंभान् भ्रामयेदग्रतोस्त्रकम् || | ||
'''७०२''' प्रदक्षिण क्रमेणाथ स्थापयेत् कलशालुके |<br> | '''७०२''' प्रदक्षिण क्रमेणाथ स्थापयेत् कलशालुके |<br>दत्वा स्थिरासनं पूर्वं विन्यसेत् कलशालुके || | ||
'''७०३''' दत्वा स्थिरासनं पूर्वं विन्यसेत् तदनन्तरम् |<br> | '''७०३''' दत्वा स्थिरासनं पूर्वं विन्यसेत् तदनन्तरम् |<br>धारिकादि क्रमेणैव यावत् स्याद् विमलासनम् || | ||
'''७०४''' प्राप्तिं व्यप्तिञ्च सामर्थ्यं मन्त्राणां परिणति क्रमम् |<br> | '''७०४''' प्राप्तिं व्यप्तिञ्च सामर्थ्यं मन्त्राणां परिणति क्रमम् |<br>यत् स्वरूपञ्च विन्यासं येन तत्कार्यसाधनम् || | ||
'''७०५''' एवं ज्ञात्वा पृथक् सर्वन्ततो मन्त्रन्नियोजयेत् |<br> | '''७०५''' एवं ज्ञात्वा पृथक् सर्वन्ततो मन्त्रन्नियोजयेत् |<br>आसनङ्कारणान्तन्तु मूर्तिः शक्ति स्वरूपिणी || | ||
'''७०६''' शोध्याध्यानन्न्यसेत् पश्चात् सृष्टिमार्ग क्रमेण तु |<br> | '''७०६''' शोध्याध्यानन्न्यसेत् पश्चात् सृष्टिमार्ग क्रमेण तु |<br>इच्छाशक्ति मयीं मूर्तिं कल्पयेच्छां भवस्य तु || | ||
'''७०७''' आवाहयेत् ततो देवं सूर्याग्नि चन्द्रयोगतः |<br> | '''७०७''' आवाहयेत् ततो देवं सूर्याग्नि चन्द्रयोगतः |<br>सन्निधानन्निरोधञ्च कृत्वा वेदावगुण्ठनम् || | ||
'''७०८''' अमृतीकरणं योज्यमर्चान्तार्घञ्च चन्दनम् |<br> | '''७०८''' अमृतीकरणं योज्यमर्चान्तार्घञ्च चन्दनम् |<br>स्नानं प्रकल्प्य * * * संपूज्य धूपयेत् ततः || | ||
'''७०९''' अङ्गान्याहूय संस्कृत्य पूजयित्वा विधानतः |<br> | '''७०९''' अङ्गान्याहूय संस्कृत्य पूजयित्वा विधानतः |<br>धूपदीपादिनैवेद्यमुपचारान्निवेदयेत् || | ||
'''७१०''' तोयं पवित्र दानञ्च परमीकरणन्ततः |<br> | '''७१०''' तोयं पवित्र दानञ्च परमीकरणन्ततः |<br>यथोक्तन्तु जपङ्कृत्वा वर्द्धन्यामखिलन्त्विदम् || | ||
'''Vorbereitung und Einsetzung des Lingams''' | '''Vorbereitung und Einsetzung des Lingams''' | ||
'''७११''' प्रणिपत्य पुनश्चेष्टा ततो विज्ञापयेदिदम् |<br> | '''७११''' प्रणिपत्य पुनश्चेष्टा ततो विज्ञापयेदिदम् |<br>त्वन्मुखोक्त विधानेन रक्षितोयं मयामख || | ||
'''७१२''' इदानीमन्तरायेभ्यः संकानो त्वत् प्रसादतः |<br> | '''७१२''' इदानीमन्तरायेभ्यः संकानो त्वत् प्रसादतः |<br>तस्मात् प्रबोधनि स्त्रिं शंगृहाणाज्ञां प्रदेहि मे || | ||
'''७१३''' लिङ्गादि साधनं देव शोध्य बोध्यत्वमागतम् |<br> | '''७१३''' लिङ्गादि साधनं देव शोध्य बोध्यत्वमागतम् |<br>ममाज्ञया कुरुष्वेवं लिङ्गादौ शोध्यसन्निधिः || | ||
'''७१४''' उक्तं शिवेन संभाव्य ततः कुण्डान्तिकं व्रजेत् |<br> | '''७१४''' उक्तं शिवेन संभाव्य ततः कुण्डान्तिकं व्रजेत् |<br>निरीक्ष्य प्रोक्ष्य संभाव्य अभ्युक्ष्य च यथाक्रमम् || | ||
'''७१५''' खात्वाविकीर्य तत्पूर्य समीकृत्याभिषेचयेत् |<br> | '''७१५''' खात्वाविकीर्य तत्पूर्य समीकृत्याभिषेचयेत् |<br>निरूढ्य मार्जनं कृत्वा लेपनं कुण्ड कल्पना || | ||
'''७१६''' परिधानं त्रिसूत्रेण रेखा तुर्यश्चतुष्पथम् |<br> | '''७१६''' परिधानं त्रिसूत्रेण रेखा तुर्यश्चतुष्पथम् |<br>सर्व मन्त्रेणवस्वेक संस्कारं कुण्डकर्मणि || | ||
'''७१७''' वर्मणा त्वक्षपाटन्तु विस्तरं चत्वरे हृदा |<br> | '''७१७''' वर्मणा त्वक्षपाटन्तु विस्तरं चत्वरे हृदा |<br>वागीशौ पूजयेत् तत्र वृषस्यन्तौ सुयौवनौ || | ||
'''७१८''' ताम्रे नालयुते वह्निं वीक्षणाद्यैर्विशोधयेत् |<br> | '''७१८''' ताम्रे नालयुते वह्निं वीक्षणाद्यैर्विशोधयेत् |<br>भागं पलाशिनां त्यक्ता तदैकत्वं यथा त्रिधा || | ||
'''७१९''' तद्वीजं विन्यसेत् तत्र षडङ्गे नाभि मन्त्रयेत् |<br> | '''७१९''' तद्वीजं विन्यसेत् तत्र षडङ्गे नाभि मन्त्रयेत् |<br>गृहीत्वा भ्रामयित्वा तु ईश वीज स्वरूपिणम् || | ||
'''७२०''' गर्भनाड्यां क्षिपेच्छक्तेर्दत्वा तोयन्तयोस्ततः |<br> | '''७२०''' गर्भनाड्यां क्षिपेच्छक्तेर्दत्वा तोयन्तयोस्ततः |<br>गर्भाधानमजे नैव पुंस्त्वेवामं नियोजयेत् || | ||
'''७२१''' सीमन्ते बहुरूपन्तु वक्त्रम्वै जातकर्मणि |<br> | '''७२१''' सीमन्ते बहुरूपन्तु वक्त्रम्वै जातकर्मणि |<br>अर्घोदकेन संप्रोक्ष्य सदिध्याः पञ्चहोमयेत् || | ||
'''७२२''' पूर्वादौ विष्टरन्यासं ब्रह्मादींल्लोकपान्यजेत् |<br> | '''७२२''' पूर्वादौ विष्टरन्यासं ब्रह्मादींल्लोकपान्यजेत् |<br>स्रुक्स्रुवौ वीक्ष्य संप्रोक्ष्य शक्तिं शंभुञ्च विन्यसेत् || | ||
'''७२३''' शुद्धाज्येन मुखाघारं सन्धानमेकतान्ततः |<br> | '''७२३''' शुद्धाज्येन मुखाघारं सन्धानमेकतान्ततः |<br>नाम्नी त्वीशञ्च सन्धाय पितरा विष्ट्वा विसर्जयेत् || | ||
'''७२४''' विभज्य पञ्चधा पश्चाद् यथा कुण्डे नियोजयेत् |<br> | '''७२४''' विभज्य पञ्चधा पश्चाद् यथा कुण्डे नियोजयेत् |<br>धूपाद्यर्थं पृथक् त्यक्ता वह्निं संपूज्य तर्पयेत् || | ||
'''७२५''' तद्धृदयाम्बुजे पश्चाल्लब्ध्वानुज्ञो यजेच्छिवम् |<br> | '''७२५''' तद्धृदयाम्बुजे पश्चाल्लब्ध्वानुज्ञो यजेच्छिवम् |<br>समूर्तिञ्चासनन्न्यस्त्वा शोध्या ध्यानञ्च विन्यसेत् || | ||
'''७२६''' शिवं साङ्गं ततः त्वेष्ट्वा नाडी सन्धान पूर्वकम् |<br> | '''७२६''' शिवं साङ्गं ततः त्वेष्ट्वा नाडी सन्धान पूर्वकम् |<br>मन्त्रसन्तर्पणं कृत्वा पूर्णां दत्वा निवेद्य च || | ||
'''७२७''' देशकाल निमित्ताक्ष्यै दुर्निमित्त प्रशान्तये |<br> | '''७२७''' देशकाल निमित्ताक्ष्यै दुर्निमित्त प्रशान्तये |<br>शतंशतन्तु होतव्यं पूर्णाच्छिन्नं शत क्रतो || | ||
'''७२८''' अधिवास लग्नयोर्मध्यं ज्ञात्वा कृत्यं समारभेत् |<br> | '''७२८''' अधिवास लग्नयोर्मध्यं ज्ञात्वा कृत्यं समारभेत् |<br>अत्यारंभमनारंभं तथारंभं न कारयेत् || | ||
'''७२९''' वक्त्रं वर्मयुतं प्राचि दक्षे घोरं शिखायुतम् |<br> | '''७२९''' वक्त्रं वर्मयुतं प्राचि दक्षे घोरं शिखायुतम् |<br>सद्यो हृदा युतं पश्चात् सौम्ये वामं शिरो युतम् || | ||
'''७३०''' शिवं सर्वैस्तु सामान्यं सन्धानं मन्त्र तर्पणम् |<br> | '''७३०''' शिवं सर्वैस्तु सामान्यं सन्धानं मन्त्र तर्पणम् |<br>मूर्तिपानामिदङ्कर्म सर्वकृद्देशिकोत्तमः || | ||
'''७३१''' दत्वा पूर्णाहुतिं पश्चाच्छिवं विज्ञाप्य देशिकः |<br> | '''७३१''' दत्वा पूर्णाहुतिं पश्चाच्छिवं विज्ञाप्य देशिकः |<br>निरस्य विघ्नसंघातं गत्वा लिङ्गान्तिकन्ततः || | ||
'''७३२''' भद्रपीठे तु संस्थाप्य कृत्वा चिह्नं सुचिह्नितम् |<br> | '''७३२''' भद्रपीठे तु संस्थाप्य कृत्वा चिह्नं सुचिह्नितम् |<br>मृद्भिर्गोमय गोमूत्रैः स्नापयेदस्त्र वारिणा || | ||
'''७३३''' वस्त्रयुग्मा वृतं कृत्वा स्वस्ति वाच्य प्रचालयेत् |<br> | '''७३३''' वस्त्रयुग्मा वृतं कृत्वा स्वस्ति वाच्य प्रचालयेत् |<br>ततः स यजमानस्तु श्रद्धा विष्टः समाहितः || | ||
'''७३४''' अग्रतः पृष्ठतो गच्छन्मुच्यते सर्वपातकैः |<br> | '''७३४''' अग्रतः पृष्ठतो गच्छन्मुच्यते सर्वपातकैः |<br>प्रदक्षिण क्रमेणैव पुरप्रासाद मण्डपे || | ||
'''७३५''' जप शब्दैः समानीय वेशयेत् स्नान मण्डपम् |<br> | '''७३५''' जप शब्दैः समानीय वेशयेत् स्नान मण्डपम् |<br>निरीक्ष्य प्रोक्ष्य सन्ताड्य कुशैरुल्लिख्य मण्डपम् || | ||
'''७३६''' अक्षतै स्वस्तिकं वेद्यां भद्रपीठं न्यसेत् ततः |<br> | '''७३६''' अक्षतै स्वस्तिकं वेद्यां भद्रपीठं न्यसेत् ततः |<br>प्रणवे नासनन्दत्वा ततो लिङ्गन्निवेशयेत् || | ||
'''७३७''' निरीक्ष्य प्रोक्ष्य सन्ताड्य शोध्य मृद्गोमयादिभिः |<br> | '''७३७''' निरीक्ष्य प्रोक्ष्य सन्ताड्य शोध्य मृद्गोमयादिभिः |<br>द्वितीय वेदिकायान्तु आसनन्तूलिकोपरि || | ||
'''७३८''' तस्योपरि न्यसेल्लिङ्गं सघृतं पायसं पुनः |<br> | '''७३८''' तस्योपरि न्यसेल्लिङ्गं सघृतं पायसं पुनः |<br>शिरोदेशे व्यवस्थाप्य ततो लक्षणामालिखेत् || | ||
'''७३९''' लक्षणेन विनिर्मुक्तं यतो लिङ्गमलक्षणम् |<br> | '''७३९''' लक्षणेन विनिर्मुक्तं यतो लिङ्गमलक्षणम् |<br>देशदेशाधिपानान्तु सर्वदास्याद्भयङ्करम् || | ||
'''७४०''' तस्मात् प्रयत्नमास्थाय कुर्याल्लिङ्गं स लक्षणम् |<br> | '''७४०''' तस्मात् प्रयत्नमास्थाय कुर्याल्लिङ्गं स लक्षणम् |<br>येन सर्वफलावाप्तिर्जायते साधकस्य तु || | ||
'''७४१''' नोर्द्धं भाग द्वयात् कार्यं लक्षणं भूतिमिच्छताम् |<br> | '''७४१''' नोर्द्धं भाग द्वयात् कार्यं लक्षणं भूतिमिच्छताम् |<br>ऋत्वेकभाजितायामे रूपे रामतनूच्युते || | ||
'''७४२''' लक्षरेखाङ्गुला ज्येष्ठे तारैकांशच्युतेन्यतः |<br> | '''७४२''' लक्षरेखाङ्गुला ज्येष्ठे तारैकांशच्युतेन्यतः |<br>भागद्वयादधः पक्ष रेखास्याद्वसुभाजिते || | ||
'''७४३''' भ्रमाद्भागद्वयोर्द्धन्तु पृष्ठतः सङ्गमं तयोः |<br> | '''७४३''' भ्रमाद्भागद्वयोर्द्धन्तु पृष्ठतः सङ्गमं तयोः |<br>ऊर्ध्वन्तु कुण्डलाकारं द्वेष्ठष्ठे ग्रन्थ्यधः स्थिते || | ||
'''७४४''' यथा लिङ्गशिरः प्रोक्तन्तथा लक्ष शिरोहितम् |<br> | '''७४४''' यथा लिङ्गशिरः प्रोक्तन्तथा लक्ष शिरोहितम् |<br>सर्वसिद्धिप्रदं धन्यं सर्वविघ्नभयङ्करम् || | ||
'''७४५''' सर्वसाधारणं शक्रलक्षणं शुभलक्षणम् |<br> | '''७४५''' सर्वसाधारणं शक्रलक्षणं शुभलक्षणम् |<br>अनुच्छ्रितेन हस्तेन गुरुर्हेमशलाकया || | ||
'''७४६''' आलिखेल्लक्षणं विद्वाञ्छिल्पीशस्त्रेण चोत्किरेत् |<br> | '''७४६''' आलिखेल्लक्षणं विद्वाञ्छिल्पीशस्त्रेण चोत्किरेत् |<br>जपन्मृत्युजितं मन्त्रं पूरयेन्मधुसर्पिषा || | ||
'''७४७''' रोचनां दधिदूर्वाञ्च दत्वा कृत्वा वधारणम् |<br> | '''७४७''' रोचनां दधिदूर्वाञ्च दत्वा कृत्वा वधारणम् |<br>आरोप्य भद्रपीठे तु शोध्य मृद्गोमयादिभिः || | ||
'''७४८''' अस्त्रतोयेन संस्नाप्य मन्त्रन्यासन्तु कारयेत् |<br> | '''७४८''' अस्त्रतोयेन संस्नाप्य मन्त्रन्यासन्तु कारयेत् |<br>इष्ट्वासाध्याणुना सिद्ध्यैर्मन्त्रैर्वा ब्रह्मवाचकैः || | ||
'''७४९''' संशोध्य द्रव्य संघातं स्नानमन्त्रैः पुरोदितैः |<br> | '''७४९''' संशोध्य द्रव्य संघातं स्नानमन्त्रैः पुरोदितैः |<br>मृद्भिर्गोमय गोमूत्रैर्भस्मना सलिलान्तरैः || | ||
'''७५०''' पञ्चगव्य कषायैश्च ततः पञ्चामृतेन तु |<br> | '''७५०''' पञ्चगव्य कषायैश्च ततः पञ्चामृतेन तु |<br>हेमसस्यफलैः स्नानं रत्नौ षध्यन्ततः पुनः || | ||
'''७५१''' सर्वौषधि युतञ्चान्ते सर्वमङ्गलसाधनम् |<br> | '''७५१''' सर्वौषधि युतञ्चान्ते सर्वमङ्गलसाधनम् |<br>क्षाराद्यैरष्टभिः स्नाप्यमार्जयेन्मृदुवाससा || | ||
'''७५२''' विलिप्य चन्दनाद्यैस्तु वर्म जप्ते तु वा ससी |<br> | '''७५२''' विलिप्य चन्दनाद्यैस्तु वर्म जप्ते तु वा ससी |<br>परिधाप्य ततो विद्वान् भूषयेत् कुसुमादिभिः || | ||
'''७५३''' देशिकं दक्षयित्वा तु तोषयित्वा च शिल्पिनम् |<br> | '''७५३''' देशिकं दक्षयित्वा तु तोषयित्वा च शिल्पिनम् |<br>सुयन्त्रितन्ततो लिङ्गं रथे कृत्वा सुभावितः || | ||
'''७५४''' जपशब्दादि निर्घोषैर्वेदध्वनि विमिश्रितैः |<br> | '''७५४''' जपशब्दादि निर्घोषैर्वेदध्वनि विमिश्रितैः |<br>जपन्पाशुपतं मन्त्रं देशिकः सुसमाहितः || | ||
'''७५५''' रथयात्रान्ततः कृत्वा आनयेन्मण्डपाग्रतः |<br> | '''७५५''' रथयात्रान्ततः कृत्वा आनयेन्मण्डपाग्रतः |<br>भद्रपीठन्तु संस्थाप्य तत्र लिङ्गन्निवेशयेत् || | ||
'''७५६''' स्थिरो भवभवेत्युक्ता स्वपञ्चाभ्यन्तरं विशेत् |<br> | '''७५६''' स्थिरो भवभवेत्युक्ता स्वपञ्चाभ्यन्तरं विशेत् |<br>वीक्षणादिभिः संशोध्य कुशैरुल्लिख्य वेदिकाम् || | ||
'''७५७''' अक्षतैः स्वस्तिकं कृत्वा तत्र पट्टं स तूलिकम् |<br> | '''७५७''' अक्षतैः स्वस्तिकं कृत्वा तत्र पट्टं स तूलिकम् |<br>सोपधान पटच्छन्नं न्यस्त्वानन्तासनं न्यसेत् || | ||
'''७५८''' अर्घ्यं दत्वा तु देवस्य मण्डपं संप्रवेशयेत् |<br> | '''७५८''' अर्घ्यं दत्वा तु देवस्य मण्डपं संप्रवेशयेत् |<br>विन्यस्य तूलिकोर्द्धन्तु न्यसेन् मन्त्रान्यथा क्रमम् || | ||
'''७५९''' पिण्डिकायास्त्विदं कर्म मन्त्रैः शाक्तैस्तु तद्भवेत् |<br> | '''७५९''' पिण्डिकायास्त्विदं कर्म मन्त्रैः शाक्तैस्तु तद्भवेत् |<br>लक्षणन्तु भगाकारं स्नानाघं लिङ्ग च यथा || | ||
'''७६०''' एवं ब्रह्मशिलायान्तु कूर्माख्याया मयं विधिः |<br> | '''७६०''' एवं ब्रह्मशिलायान्तु कूर्माख्याया मयं विधिः |<br>आनीय मण्डपान्तस्तु यथा स्थानन्निवेशयेत् || | ||
'''Die vier Bereiche und die Gegenwart der Gottheit''' | '''Die vier Bereiche und die Gegenwart der Gottheit''' | ||
'''७६१''' पाददेशे गुरुः स्थिता मूर्त्यादि न्यासमारभेत् |<br> | '''७६१''' पाददेशे गुरुः स्थिता मूर्त्यादि न्यासमारभेत् |<br>ज्ञात्वा सम्यक्परं भावमपरं लक्षणान्वितम् || | ||
'''७६२''' योजानाति परं भावं तस्य लक्षं चतुर्विधम् |<br> | '''७६२''' योजानाति परं भावं तस्य लक्षं चतुर्विधम् |<br>चतुर्गोचरसंस्थानं यत्स्वरूपं क्रियाक्रमम् || | ||
'''७६३''' स एवाराधकस्तस्य स्थापकस्तु न चापरः |<br> | '''७६३''' स एवाराधकस्तस्य स्थापकस्तु न चापरः |<br>शिवाच्छैवं शिखं शक्तेर्विन्दोर्ज्योतिरधस्ततः || | ||
'''७६४''' नादात्सावित्र संज्ञञ्च एभ्यः शास्त्र समुच्चयम् |<br> | '''७६४''' नादात्सावित्र संज्ञञ्च एभ्यः शास्त्र समुच्चयम् |<br>स्वभावावस्थितं शैवं शिखं संवित्तिलक्षणम् || | ||
'''७६५''' प्रकाशस्थं स्मृतञ्ज्योतिः स्पष्टविज्ञान लक्षणम् |<br> | '''७६५''' प्रकाशस्थं स्मृतञ्ज्योतिः स्पष्टविज्ञान लक्षणम् |<br>सावित्रन्नादसंस्थानं ध्वनिः संवित्तिलक्षणम् || | ||
'''७६६''' शिखाकुलास्थितिः साकेकुशे सावित्रि संज्ञकात् |<br> | '''७६६''' शिखाकुलास्थितिः साकेकुशे सावित्रि संज्ञकात् |<br>चतुर्णां संस्थितिः क्रौञ्चे चतुर्वर्ण व्यवस्थया || | ||
'''७६७''' शिवाख्याच्छाल्मली द्वीपे पुस्करे ज्योति संज्ञकान् |<br> | '''७६७''' शिवाख्याच्छाल्मली द्वीपे पुस्करे ज्योति संज्ञकान् |<br>प्रजानुग्रह हेत्वर्थमेवं कुल चतुष्टयम् || | ||
'''७६८''' दीक्षाद्यवस्थितौ शक्र सप्तद्वीपे त्वियं स्थितिः |<br> | '''७६८''' दीक्षाद्यवस्थितौ शक्र सप्तद्वीपे त्वियं स्थितिः |<br>लक्षलक्षणयोर्भेद विज्ञानन्तुर्यगोचरे || | ||
'''७६९''' सम्यज्ज्ञात्वा त्रिधावस्थं ततो यजनमारभेत् |<br> | '''७६९''' सम्यज्ज्ञात्वा त्रिधावस्थं ततो यजनमारभेत् |<br>आधारं लक्षणं विद्धि आधेयं लक्षरूपिणम् || | ||
'''७७०''' लक्षणं वेदना रहितं द्विविधं लक्षं स वेदनम् |<br> | '''७७०''' लक्षणं वेदना रहितं द्विविधं लक्षं स वेदनम् |<br>समनञ्चोन्मनं विद्धि चतुर्लक्षेष्वियं स्थितिः || | ||
'''७७१''' स्वरूपं यस्य यो वेत्ति तल्लयं याति स ध्रुवम् |<br> | '''७७१''' स्वरूपं यस्य यो वेत्ति तल्लयं याति स ध्रुवम् |<br>चतुर्णामपि सामान्यं स देशे यजनं विदुः || | ||
'''७७२''' लक्षं सदा शिवाकारं लिङ्गमूर्तौ नियोजयेत् |<br> | '''७७२''' लक्षं सदा शिवाकारं लिङ्गमूर्तौ नियोजयेत् |<br>क्रमो यमादि सर्गस्य ज्ञात्वान्यत्र प्रयोजयेत् || | ||
'''७७३''' इच्छाशक्तिमयीं मूर्ति कल्पयेत् कारणस्य तु |<br> | '''७७३''' इच्छाशक्तिमयीं मूर्ति कल्पयेत् कारणस्य तु |<br>कलान्यासं पुरा कृत्वा तत्व न्यासं सदैवतम् || | ||
'''७७४''' तत्वानां पञ्चकं तद्वत्त्रितत्वं साधि दैवतम् |<br> | '''७७४''' तत्वानां पञ्चकं तद्वत्त्रितत्वं साधि दैवतम् |<br>मूर्ति वक्त्राणि विन्यस्य अङ्गभङ्गा न्यसेत् पुनः || | ||
'''७७५''' आवाहयेत् ततो देवं शिवं परम कारणम् |<br> | '''७७५''' आवाहयेत् ततो देवं शिवं परम कारणम् |<br>अङ्गन्यासं यथा स्थानं कृत्वा देवं न्यसेत् पुनः || | ||
'''७७६''' उपचारन्ततः कृत्वा भूषयेद् भूषणैस्ततः |<br> | '''७७६''' उपचारन्ततः कृत्वा भूषयेद् भूषणैस्ततः |<br>सुगन्धैः कुसुमैरिष्ट्वा स घृतङ्गुग्गुलन्दहेत् || | ||
'''७७७''' लेह्य चोष्यादि भक्ष्याणि नैवेद्यानि निवेदयेत् |<br> | '''७७७''' लेह्य चोष्यादि भक्ष्याणि नैवेद्यानि निवेदयेत् |<br>भुक्तान्प्रतिसरान्दत्वा प्रतिभाग प्रदर्शकान् || | ||
'''७७८''' मुद्रां वध्वा नमस्कृत्य वस्त्रेणाच्छादयेत् ततः |<br> | '''७७८''' मुद्रां वध्वा नमस्कृत्य वस्त्रेणाच्छादयेत् ततः |<br>छत्राद्युपस्करं सर्वन्तस्मिन् काले निवेदयेत् || | ||
'''७७९''' निद्रा कलशं शिरो देशे शिवे नैव निवेशयेत् |<br> | '''७७९''' निद्रा कलशं शिरो देशे शिवे नैव निवेशयेत् |<br>अभ्यङ्गं पाददेशे तु ततः शोधनमारभेत् || | ||
'''७८०''' पिण्डिकानि कटङ्गत्वा शक्तिमन्त्रन्निवेशयेत् |<br> | '''७८०''' पिण्डिकानि कटङ्गत्वा शक्तिमन्त्रन्निवेशयेत् |<br>शिवविद्यात्मतत्वन्तु इच्छा ज्ञानक्रियान्वितम् || | ||
'''७८१''' शक्ति भावं परङ्कृत्वा नैवेद्यानि निवेदयेत् |<br> | '''७८१''' शक्ति भावं परङ्कृत्वा नैवेद्यानि निवेदयेत् |<br>एवम्ब्रह्मशिलायान्तु कूर्माख्यायां मयं विधिः || | ||
'''७८२''' आधाराधेय भावेन तयोर्भेदम्पृथक् पृथक् |<br> | '''७८२''' आधाराधेय भावेन तयोर्भेदम्पृथक् पृथक् |<br>शिवं सम्पूज्य विज्ञाप्य तत्वशुद्धिं सभारभेत् || | ||
'''७८३''' भूतानां वलिदानार्थमादिशेद् देशिकोत्तमम् |<br> | '''७८३''' भूतानां वलिदानार्थमादिशेद् देशिकोत्तमम् |<br>तत्त्वोपस्थापनङ्कृत्वा यायात् कुण्डान्तिकङ्गुरुः || | ||
'''७८४''' इष्ट्वा शिवं विशेषेण प्रतिष्ठा होममाचरेत् |<br> | '''७८४''' इष्ट्वा शिवं विशेषेण प्रतिष्ठा होममाचरेत् |<br>शतं सहस्रमर्द्धम्वा हुत्वा मूर्तिधरैः सह || | ||
'''७८५''' दत्वा पूर्णाहुतिं पश्चाल्लिङ्गं शान्ति घटाम्भसा |<br> | '''७८५''' दत्वा पूर्णाहुतिं पश्चाल्लिङ्गं शान्ति घटाम्भसा |<br>सम्प्रोक्ष्य संस्पृशेद्धर्भैर्होम संख्यं जपेदणुम् || | ||
'''७८६''' तत्व सन्धिन्ततः कृत्वा तत्वोपस्थापनम् भवेत् |<br> | '''७८६''' तत्व सन्धिन्ततः कृत्वा तत्वोपस्थापनम् भवेत् |<br>तथा होमस्तथा स्पर्शः पुनर्होमस्तथा जपः || | ||
'''७८७''' एवन्त्रिष्वपि संपाद्य विधिं भागेष्वनु क्रमात् |<br> | '''७८७''' एवन्त्रिष्वपि संपाद्य विधिं भागेष्वनु क्रमात् |<br>शिवाद्यवनिपर्यन्तमध्वानं सन्धयेत् ततः || | ||
'''७८८''' व्यापकन्तन्मयन्ध्यात्वा होमयेन्मूर्तिपैः सह |<br> | '''७८८''' व्यापकन्तन्मयन्ध्यात्वा होमयेन्मूर्तिपैः सह |<br>पूर्णाहुतिन्ततो दत्वा शिवाय विनिवेदयेत् || | ||
'''७८९''' एवं पीठ संशुद्धिमुमामन्त्रेण कारयेत् |<br> | '''७८९''' एवं पीठ संशुद्धिमुमामन्त्रेण कारयेत् |<br>ब्रह्मकूर्मशिलायान्तु ततश्छिद्रन्निरस्य च || | ||
'''७९०''' शान्ति होमन्ततो हुत्वा घृतेन मधुना सह |<br> | '''७९०''' शान्ति होमन्ततो हुत्वा घृतेन मधुना सह |<br>प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने प्रत्येकं रूपिणा शतम् || | ||
'''७९१''' हुत्वा पूर्णवच्छिन्नं शिवाय विनिवेदयेत् |<br> | '''७९१''' हुत्वा पूर्णवच्छिन्नं शिवाय विनिवेदयेत् |<br>शिवं सम्पूज्य विज्ञाप्य निच्छिद्रमव धारयेत् || | ||
'''७९२''' प्रासादन्तुरुतोगच्छेज्जपन्नस्त्रं समूर्तिपः |<br> | '''७९२''' प्रासादन्तुरुतोगच्छेज्जपन्नस्त्रं समूर्तिपः |<br>महास्रतेज सा दग्धं सर्वविघ्नसमुच्चयम् || | ||
'''७९३''' प्रासादं प्रोक्षयेद्ध्यात्वा शस्त्ररूपेण वारिणा |<br> | '''७९३''' प्रासादं प्रोक्षयेद्ध्यात्वा शस्त्ररूपेण वारिणा |<br>ब्रह्मस्थाने तथाश्वभ्रं कूर्म ब्रह्मशिलोच्छ्रयम् || | ||
'''७९४''' प्रवेशं ब्रह्मभागस्य ज्ञात्वाश्वभ्रं प्रकल्पयेत् |<br> | '''७९४''' प्रवेशं ब्रह्मभागस्य ज्ञात्वाश्वभ्रं प्रकल्पयेत् |<br>वस्वंशं पादभागञ्च त्रिभागं वा द्वयन्तथा || | ||
'''७९५''' अर्द्धं समस्तकं वापि ब्रह्मभागम्प्रवेशयेत् |<br> | '''७९५''' अर्द्धं समस्तकं वापि ब्रह्मभागम्प्रवेशयेत् |<br>पृथक् फल विभेदेन ज्ञात्वा श्वभ्रं प्रकल्पयेत् || | ||
'''७९६''' इष्ट्वा वास्तु गतान् देवान् पूर्ववत् पदयोगतः |<br> | '''७९६''' इष्ट्वा वास्तु गतान् देवान् पूर्ववत् पदयोगतः |<br>मध्यं सुचिह्नितं कृत्वा न्यसेत् कूर्मशिलान्ततः || | ||
'''७९७''' तस्योपरि न्यसेत् कूर्म्मं हैमं द्वारस्य सन्मुखम् |<br> | '''७९७''' तस्योपरि न्यसेत् कूर्म्मं हैमं द्वारस्य सन्मुखम् |<br>ऋतुमात्रेन्दु संभक्ते द्वारव्यासे शतक्रतो || | ||
'''७९८''' मध्यादेकं वहिस्त्यक्ता तेन मध्यं विवर्जयेत् |<br> | '''७९८''' मध्यादेकं वहिस्त्यक्ता तेन मध्यं विवर्जयेत् |<br>पूर्वोत्तरेण तन्मध्ये शिलामध्यं निवेशयेत् || | ||
'''७९९''' मध्यं सुनिश्चितङ्कृत्वा शक्तिमन्त्रं स्मरेद् गुरुः |<br> | '''७९९''' मध्यं सुनिश्चितङ्कृत्वा शक्तिमन्त्रं स्मरेद् गुरुः |<br>कशिलान् निवेशयेन् मध्ये धारिकाशक्ति रूपिणीम् || | ||
'''८००''' आद्याशक्तिस्त्वमीशस्य सर्वदा धाररूपिणी |<br> | '''८००''' आद्याशक्तिस्त्वमीशस्य सर्वदा धाररूपिणी |<br>तदाज्ञया त्वया तस्मात् स्थातव्यमिह सर्वदा || | ||
'''८०१''' परावस्थान्ततः कृत्वा रत्नादि न्यासमाचरेत् |<br> | '''८०१''' परावस्थान्ततः कृत्वा रत्नादि न्यासमाचरेत् |<br>वज्रं सूर्योपलं नीलमतिनीलञ्च मौक्तिकम् || | ||
'''८०२''' पद्मरागञ्च वैदूर्यं शक्तिं प्राकाशिकां स्मरेत् |<br> | '''८०२''' पद्मरागञ्च वैदूर्यं शक्तिं प्राकाशिकां स्मरेत् |<br>रुक्मार्क लोहवङ्गञ्च चन्द्रारं कांक्षपन्नगम् || | ||
'''८०३''' मध्ये समस्तकान्येव शक्तिं शारीरिकां स्मरेत् |<br> | '''८०३''' मध्ये समस्तकान्येव शक्तिं शारीरिकां स्मरेत् |<br>हरितालं शिलांतोरीं हरि सूताग्नि गैरिकाम् || | ||
'''८०४''' वलिंवसा गगनं चैव स्मृति शक्त्यात्मकां न्यसेत् |<br> | '''८०४''' वलिंवसा गगनं चैव स्मृति शक्त्यात्मकां न्यसेत् |<br>चन्दनन्तच्च रक्ताह्वमगुरुञ्चाञ्जन मूलकम् || | ||
'''८०५''' उशीरञ्चक्रिणीं देवीं लक्ष्यशक्तिमनुस्मरन् |<br> | '''८०५''' उशीरञ्चक्रिणीं देवीं लक्ष्यशक्तिमनुस्मरन् |<br>गोधूमयव स तिलान्मुद्गवीवारश्यामकान् || | ||
'''८०६''' सर्षपान्याज्ञिकान्धान्यान् तृप्तिशक्तिं स्मरन्न्यसेत् |<br> | '''८०६''' सर्षपान्याज्ञिकान्धान्यान् तृप्तिशक्तिं स्मरन्न्यसेत् |<br>एतैः सर्वैः समायुक्तं मध्ये पद्मन्निवेशयेत् || | ||
'''८०७''' गुग्गुलं पायसं वाथ रन्ध्राणां लेपने हितम् |<br> | '''८०७''' गुग्गुलं पायसं वाथ रन्ध्राणां लेपने हितम् |<br>एतेषामप्य लाभे तु यथा स्थानन्निवेशयेत् || | ||
'''८०८''' वज्रन्तालं सुवर्णञ्च सहदेवां यवैः सह |<br> | '''८०८''' वज्रन्तालं सुवर्णञ्च सहदेवां यवैः सह |<br>अभावात् पद्मरागन्तु काञ्चनं वाथपारदम् || | ||
'''८०९''' रन्ध्रं सुलेपितङ्कृत्वा सम्यग्ब्रह्मशिलातलम् |<br> | '''८०९''' रन्ध्रं सुलेपितङ्कृत्वा सम्यग्ब्रह्मशिलातलम् |<br>शिवा सनन्न्यसेत् तत्र श्वभ्रे ब्रह्मशिलात्मके || | ||
'''८१०''' प्राप्ति व्याप्ती च सामर्थ्यं सर्वं ज्ञात्वा पृथक् पृथक् |<br> | '''८१०''' प्राप्ति व्याप्ती च सामर्थ्यं सर्वं ज्ञात्वा पृथक् पृथक् |<br>कन्दान्तं पार्थिवन्तत्वन्नालं मायान्त गोचरम् || | ||
'''८११''' तदूर्ध्वञ्च रणाच्छदने पद्ममीशावधिष्ठितम् |<br> | '''८११''' तदूर्ध्वञ्च रणाच्छदने पद्ममीशावधिष्ठितम् |<br>अतोर्ध्वङ्कर्णिकाज्ञेया वामाद्यैः शक्तिभिर्वृता || | ||
'''८१२''' शक्तिं शिवा सनन्ध्यात्वा सूर्यकोटि समप्रभम् |<br> | '''८१२''' शक्तिं शिवा सनन्ध्यात्वा सूर्यकोटि समप्रभम् |<br>प्रीणयन्तञ्जगत्सर्वं व्यापयन्तं शिवासनम् || | ||
'''८१३''' गन्धधूपादिभिः पूज्य दत्वा कुण्डान्तिकं व्रजेत् |<br> | '''८१३''' गन्धधूपादिभिः पूज्य दत्वा कुण्डान्तिकं व्रजेत् |<br>शिवं सम्पूज्य विज्ञाप्य मन्त्रान्सन्तर्प्य देशिकः || | ||
'''८१४''' सन्धानं पूर्णया सहितङ्कृत्वा विज्ञापयेच्छिवम् |<br> | '''८१४''' सन्धानं पूर्णया सहितङ्कृत्वा विज्ञापयेच्छिवम् |<br>लब्ध्वानुज्ञस्ततो गच्छेत् प्रासादं मन्त्र विग्रहः || | ||
'''८१५''' दक्षिणस्यां दिशि स्थित्वा न्यसेन् मन्त्रान् यथाक्रमम् |<br> | '''८१५''' दक्षिणस्यां दिशि स्थित्वा न्यसेन् मन्त्रान् यथाक्रमम् |<br>सर्वशक्ति मयन्ध्यात्वा आसनन्त्वा सनाधिपम् || | ||
'''८१६''' निरोध्य पूजयित्वा च शनैः पूजां समुद्धरेत् |<br> | '''८१६''' निरोध्य पूजयित्वा च शनैः पूजां समुद्धरेत् |<br>शोधयित्वा तु तच्छूभ्रं चन्दनादि विलेपितम् || | ||
'''८१७''' रक्षितन्तत्पटच्छन्नङ्कृत्वा यागालयं व्रजेत् |<br> | '''८१७''' रक्षितन्तत्पटच्छन्नङ्कृत्वा यागालयं व्रजेत् |<br>शिवं संपूज्य विज्ञाप्य मूर्तिपैः शिल्पिभिः सह || | ||
'''८१८''' पूर्वसङ्केतितैर्धीरैः सहायैर्वलवत्तरैः |<br> | '''८१८''' पूर्वसङ्केतितैर्धीरैः सहायैर्वलवत्तरैः |<br>शुभे लग्ने हृदोत्थाप्य लिङ्गमर्घ्यं प्रचालयेत् || | ||
'''८१९''' तदग्रतो गुरुर्यायाद्ध्याना विष्टः शिवं स्मरन् |<br> | '''८१९''' तदग्रतो गुरुर्यायाद्ध्याना विष्टः शिवं स्मरन् |<br>स्वदिक्स्थामूर्तिपाः सर्वे स्वमन्त्राहित चेतसा || | ||
'''८२०''' कर्ता च स्वजनैः सार्द्धञ्छुद्धाविष्टः स्पृशञ्छिवम् |<br> | '''८२०''' कर्ता च स्वजनैः सार्द्धञ्छुद्धाविष्टः स्पृशञ्छिवम् |<br>वेदगीत स्वरैर्दिव्यैर्माङ्गल्यैश्च महोत्सवैः || | ||
'''८२१''' क्षिपन्रत्नादिकङ्कर्ता प्रासाद द्वारमानयेत् |<br> | '''८२१''' क्षिपन्रत्नादिकङ्कर्ता प्रासाद द्वारमानयेत् |<br>द्वारदेशे तु विश्राम्य किञ्चिद् द्वारस्य सन्मुखम् || | ||
'''८२२''' विनाद्वारेण देवेशं तन्मार्गेण प्रवेशयेत् |<br> | '''८२२''' विनाद्वारेण देवेशं तन्मार्गेण प्रवेशयेत् |<br>द्वारार्द्धेन शिखाशून्ये शिखे शान्ति पुरः स्मरन् || | ||
'''८२३''' प्रविष्टभद्र * * * * * * * * * * * ? |<br> | '''८२३''' प्रविष्टभद्र * * * * * * * * * * * ? |<br>* * * * * * * * * * * * * * * * ? || | ||
'''८२४''' * * * ? त्वा तु देवस्य प्रोक्ष्य ब्रह्मशिलातलम् |<br> | '''८२४''' * * * ? त्वा तु देवस्य प्रोक्ष्य ब्रह्मशिलातलम् |<br>तदूर्ध्वं यन्त्रितन्धार्यं सुलग्नं यावदा गतम् || | ||
'''Vereinigung von Shiva und Shakti''' | '''Vereinigung von Shiva und Shakti''' | ||
'''८२५''' चिह्नमध्यं सुविज्ञाय लिङ्ग मध्यं सुनिश्चितम् |<br> | '''८२५''' चिह्नमध्यं सुविज्ञाय लिङ्ग मध्यं सुनिश्चितम् |<br>शक्तिशक्तिमतोर्ध्यात्वा अभेदं धर्मधर्मिणोः || | ||
'''८२६''' स्वभावस्थं स्मरन्मन्त्रन्त्यक्तैश्वर्यलय स्थितम् |<br> | '''८२६''' स्वभावस्थं स्मरन्मन्त्रन्त्यक्तैश्वर्यलय स्थितम् |<br>सृष्ट्या सदेश संस्थानं सम्यग् लिङ्गन्निवेशयेत् || | ||
'''८२७''' रुक्मरौप्यर्किनागादिकं विभिः सुदृढं यथा |<br> | '''८२७''' रुक्मरौप्यर्किनागादिकं विभिः सुदृढं यथा |<br>मन्त्रन्यासन्ततः कृत्वा शिवमावाहयेत् सुधीः || | ||
'''८२८''' कृत्वा चाङ्गादि विन्यासं पूजयेच्छिवमादरात् |<br> | '''८२८''' कृत्वा चाङ्गादि विन्यासं पूजयेच्छिवमादरात् |<br>मन्त्रन्यासे कृते शक्र शिलामध्यान्न चालयेत् || | ||
'''८२९''' प्रमादाच्चालिते देवे राष्ट्रभङ्गः प्रजायते |<br> | '''८२९''' प्रमादाच्चालिते देवे राष्ट्रभङ्गः प्रजायते |<br>ततः सञ्चिनुयात्पीठञ्छिला श्वभ्रसमं यथा || | ||
'''८३०''' वालुकापुरितं लिप्तन्तस्यार्द्धे पिण्डिकान्न्यसेत् |<br> | '''८३०''' वालुकापुरितं लिप्तन्तस्यार्द्धे पिण्डिकान्न्यसेत् |<br>दिक् चिह्नैश्चिह्नितङ्कृत्वा देवीमुद्वोधयेत् क्रियाम् || | ||
'''८३१''' आनीयपूर्ववत् सर्वं मन्त्रं शक्त्यन्तिकं स्मरन् |<br> | '''८३१''' आनीयपूर्ववत् सर्वं मन्त्रं शक्त्यन्तिकं स्मरन् |<br>सुलग्ने लम्वनैः प्रगुणां सृष्टिमार्गेण विन्यसेत् || | ||
'''८३२''' शक्तिमूर्तेर्महेशस्य पृथक् शक्ति समर्पणम् |<br> | '''८३२''' शक्तिमूर्तेर्महेशस्य पृथक् शक्ति समर्पणम् |<br>साम्प्रतन्तु तयोर्योगस्तत्त्वमानन्द लक्षणम् || | ||
'''८३३''' दिक्चिह्नैः संस्थिताङ्कृत्वा सन्धिलेपं समाचरेत् |<br> | '''८३३''' दिक्चिह्नैः संस्थिताङ्कृत्वा सन्धिलेपं समाचरेत् |<br>शङ्खचूर्णं मलं लौहं तथा सर्वरसं पयः || | ||
'''८३४''' पपित्वा लेपयेत् तेन मन्त्रन्यासं यथा पुरा |<br> | '''८३४''' पपित्वा लेपयेत् तेन मन्त्रन्यासं यथा पुरा |<br>मुष्टिं वद्ध्वा ततो विद्वाञ्छिवशक्ति स्वरूपिणीम् || | ||
'''८३५''' पिण्डिकायां न्यसेल्लिङ्गमङ्गुष्ठेन स्पृशेत् ततः |<br> | '''८३५''' पिण्डिकायां न्यसेल्लिङ्गमङ्गुष्ठेन स्पृशेत् ततः |<br>उमामहेशमन्त्राभ्यां सन्धानं मुक्तिकाङ्क्षिणाम् || | ||
'''८३६''' शिवोमामन्त्रयोगेन सन्धानं भूतिमिच्छिताम् |<br> | '''८३६''' शिवोमामन्त्रयोगेन सन्धानं भूतिमिच्छिताम् |<br>शान्तिकुंभांभ सा स्नाप्य तथा पञ्चामृतैरपि || | ||
'''८३७''' विलिप्य कुङ्कुमाद्यैस्तु मन्त्रन्यासन्तु कारयेत् |<br> | '''८३७''' विलिप्य कुङ्कुमाद्यैस्तु मन्त्रन्यासन्तु कारयेत् |<br>आसनस्थान्यथा स्थानं मूर्त्यादींल्लिङ्गविग्रहे || | ||
'''८३८''' प्रत्येकं विन्यसेन् मन्त्री ध्यानयुक्तसमाहितः |<br> | '''८३८''' प्रत्येकं विन्यसेन् मन्त्री ध्यानयुक्तसमाहितः |<br>लिङ्गे निवेशयेद् वोधं क्रियाह्वां पीठरूपिणीम् || | ||
'''८३९''' परत्वन्तु तयोर्ध्यात्वा भिन्नाभिन्न स्वरूपयोः |<br> | '''८३९''' परत्वन्तु तयोर्ध्यात्वा भिन्नाभिन्न स्वरूपयोः |<br>व्यक्ति रूपन्तयोर्ध्यात्वा स्नानं विविधमाचरेत् || | ||
'''८४०''' विलिप्य पूर्ववत् ताभ्यां कृत्वा पूजां पृथक् पृथक् |<br> | '''८४०''' विलिप्य पूर्ववत् ताभ्यां कृत्वा पूजां पृथक् पृथक् |<br>जपङ्कृत्वा तयोर्दत्वा प्रणिपत्य क्षमापयेत् || | ||
'''८४१''' न्यूनातिरिक्तशान्त्यर्थं रूपिणा होममाचरेत् |<br> | '''८४१''' न्यूनातिरिक्तशान्त्यर्थं रूपिणा होममाचरेत् |<br>विज्ञापयेत् ततो देवं लोकानुग्रह हेतुतः || | ||
'''८४२''' सूर्याचन्द्रमसौ यावत् स्थिति लोके प्रवर्तते |<br> | '''८४२''' सूर्याचन्द्रमसौ यावत् स्थिति लोके प्रवर्तते |<br>तावत्तात्कालं महादेव लिङ्गेस्मिन् वरदो भव || | ||
'''८४३''' लब्ध्वानुज्ञां विभोर्लिङ्गे ध्यायन्तीशन्निरोधयेत् |<br> | '''८४३''' लब्ध्वानुज्ञां विभोर्लिङ्गे ध्यायन्तीशन्निरोधयेत् |<br>निरोध्यैवं नमस्कृत्वा पुनर्विज्ञापयेदिदम् || | ||
'''८४४''' ज्ञानतो ज्ञानतो वापि यच्चोक्तन्न कृतं मया |<br> | '''८४४''' ज्ञानतो ज्ञानतो वापि यच्चोक्तन्न कृतं मया |<br>तत्सर्वं पूर्णमेवास्तु त्वत्प्रसादान्महेश्वर || | ||
'''८४५''' यजमानस्य यन्नाम योजयेद् ईश्वरेण तु |<br> | '''८४५''' यजमानस्य यन्नाम योजयेद् ईश्वरेण तु |<br>ततः स यजमानस्तु पूजयेद् देशिकोत्तमम् || | ||
'''८४६''' वित्तशाठ्यादसौ कर्ता ग्रामाद्यं सन्निवेदयेत् |<br> | '''८४६''' वित्तशाठ्यादसौ कर्ता ग्रामाद्यं सन्निवेदयेत् |<br>मूर्तिपेभ्योस्त्र जापिभ्यो विप्रेभ्यो गणकाय च || | ||
'''८४७''' सूत्रधाराय शिल्पेभ्यो दक्षिणा स्यात् स संभ्रमा |<br> | '''८४७''' सूत्रधाराय शिल्पेभ्यो दक्षिणा स्यात् स संभ्रमा |<br>महोत्सवं महानन्दङ्कुर्याद् दिनचतुष्टयम् || | ||
'''८४८''' प्रायश्चित्तं द्वितीयेह्नि शान्तिश्चैव तृतीयके |<br> | '''८४८''' प्रायश्चित्तं द्वितीयेह्नि शान्तिश्चैव तृतीयके |<br>देशिकाद्याश्चतुर्थेह्नि कुर्युश्चातुर्थिकाह्निकम् || | ||
'''८४९''' सुस्थाल्यान्तु विशुद्धायां ब्रह्माङ्गैः साधयेच्चरुम् |<br> | '''८४९''' सुस्थाल्यान्तु विशुद्धायां ब्रह्माङ्गैः साधयेच्चरुम् |<br>संपाताभिहुतङ्कृत्वा प्रतिकुण्डं यथाक्रमम् || | ||
'''८५०''' अग्रन्निवेद्य देवाय तर्पयेच्चरुणा शिवम् |<br> | '''८५०''' अग्रन्निवेद्य देवाय तर्पयेच्चरुणा शिवम् |<br>स्थिराद्या हुतयः सप्त प्रदद्याद्वन संख्यया || | ||
'''८५१''' पूर्णान्दत्वा शिवं ज्ञाप्य कृत्वा शान्तिं प्रवाचनम् |<br> | '''८५१''' पूर्णान्दत्वा शिवं ज्ञाप्य कृत्वा शान्तिं प्रवाचनम् |<br>लोकपाल वलिं दत्वा क्षेत्ररक्षां प्रवाचयेत् || | ||
'''८५२''' अन्येषामपि देवानाञ्चतुर्थेह्नि चतुर्थिका |<br> | '''८५२''' अन्येषामपि देवानाञ्चतुर्थेह्नि चतुर्थिका |<br>ततः संपूजयेद् देवं स्नानादि विधि विस्तरैः || | ||
'''८५३''' विहायलिङ्गविन्यासं न्यस्ताणुं संविसर्जयेत् |<br> | '''८५३''' विहायलिङ्गविन्यासं न्यस्ताणुं संविसर्जयेत् |<br>शक्तिभावो विसर्गः स्याद् व्यक्तिरावाहनं हरे || | ||
'''८५४''' शिवकुंभविधानेन कृत्वा कुभ द्वयं गुरुः |<br> | '''८५४''' शिवकुंभविधानेन कृत्वा कुभ द्वयं गुरुः |<br>एकेन स्नापयेद् देवं पूजयित्वा यथा पुरा || | ||
'''८५५''' कर्तारमपरेणैव ततः कुर्यात् फलार्पणम् |<br> | '''८५५''' कर्तारमपरेणैव ततः कुर्यात् फलार्पणम् |<br>ततस्तु स्थापको दृष्ठो यजमानेन पूजितः || | ||
'''८५६''' प्रतिष्ठायाः फलं कर्त्तुर्यथा दद्यात् तदुच्यते |<br> | '''८५६''' प्रतिष्ठायाः फलं कर्त्तुर्यथा दद्यात् तदुच्यते |<br>मूलमन्त्रं समुच्चार्य यावच्छक्त्यन्त गोचरम् || | ||
'''८५७''' कारणत्यागयोगेन लब्ध्वानन्दस्तु देशिकः |<br> | '''८५७''' कारणत्यागयोगेन लब्ध्वानन्दस्तु देशिकः |<br>तेजो रूपनिधिं ध्यात्वा पुण्यराशिं स्वरेकरे || | ||
'''८५८''' विद्यातत्त्व प्रचारेण करे कर्तुः समर्पयेत् |<br> | '''८५८''' विद्यातत्त्व प्रचारेण करे कर्तुः समर्पयेत् |<br>तत्फलं भुक्तिमुक्त्याख्यं लिङ्गाराधन तस्त्रिधा || | ||
'''८५९''' लिङ्गे संस्थापिते मोक्षो भूतयश्च निरन्तराः |<br> | '''८५९''' लिङ्गे संस्थापिते मोक्षो भूतयश्च निरन्तराः |<br>ततो विज्ञाप्य देवेशं यजेच्चण्डेश्वरं गुरुः || | ||
'''८६०''' चण्डमन्त्रैः समावाह्य ताराद्यैः फट्कृतान्तकैः |<br> | '''८६०''' चण्डमन्त्रैः समावाह्य ताराद्यैः फट्कृतान्तकैः |<br>स्नानं पूजा जपो होमो नैवेद्यादि यथा पुरा || | ||
'''Weitere Einsetzungen und Bannerweihe''' | '''Weitere Einsetzungen und Bannerweihe''' | ||
'''८६१''' कृष्णवर्णञ्चतुर्वक्त्रं त्र्यक्षं चण्डा हि भूषणम् |<br> | '''८६१''' कृष्णवर्णञ्चतुर्वक्त्रं त्र्यक्षं चण्डा हि भूषणम् |<br>शूलटङ्ककरं भीमं कमण्डल्वक्षमालिनम् || | ||
'''८६२''' एतद् रूपं सदाध्यातुः सर्वविघ्नविनाशनम् |<br> | '''८६२''' एतद् रूपं सदाध्यातुः सर्वविघ्नविनाशनम् |<br>आधारशक्ति कमले मूर्तिवक्त्राङ्गसंयुतम् || | ||
'''८६३''' स्वस्थाने प्राणमार्गेण कृत्वात्मस्थं निवेशयेत् |<br> | '''८६३''' स्वस्थाने प्राणमार्गेण कृत्वात्मस्थं निवेशयेत् |<br>ब्रूयादेनं शिवं द्रव्यं रक्षंस्तिष्ठञ्छिवान्तिके || | ||
'''८६४''' सम्पूज्यगन्धपुष्पाद्यैर्लिङ्गस्थन्तन्निरुध्य च |<br> | '''८६४''' सम्पूज्यगन्धपुष्पाद्यैर्लिङ्गस्थन्तन्निरुध्य च |<br>पृथक् पीठञ्चलं लिङ्गं पूर्ववत्सन्निवेशयेत् || | ||
'''८६५''' किन्तु रत्नादि विन्यासं पीठगर्भे स शक्तिकम् |<br> | '''८६५''' किन्तु रत्नादि विन्यासं पीठगर्भे स शक्तिकम् |<br>एकपीठन्त्वभेदेन रत्नाद्यं चेतसा न्यसेत् || | ||
'''८६६''' पूर्ववच्च स्मृतङ्कर्म किन्तु चण्डेश्वरं विना |<br> | '''८६६''' पूर्ववच्च स्मृतङ्कर्म किन्तु चण्डेश्वरं विना |<br>वाणक्षेत्रोद्भवं वाणं सर्वप्रासादपीठगम् || | ||
'''८६७''' पीठस्य संस्कृतन्तत्र स्वयं व्यक्तेप्ययं विधिः |<br> | '''८६७''' पीठस्य संस्कृतन्तत्र स्वयं व्यक्तेप्ययं विधिः |<br>स मन्त्रं स्थापयेद्रौहं सर्वप्रासादपीठगम् || | ||
'''८६८''' वाणवच्च विधिः ख्यात ऋषिर्देवादि कल्पिते |<br> | '''८६८''' वाणवच्च विधिः ख्यात ऋषिर्देवादि कल्पिते |<br>प्रतिष्ठा व्यक्तलिङ्गानां क्रियाशक्ति पुरःसरा || | ||
'''८६९''' रत्नाढ्यं पिण्डिका गर्ते विधिश्चण्डेश्वरं विना |<br> | '''८६९''' रत्नाढ्यं पिण्डिका गर्ते विधिश्चण्डेश्वरं विना |<br>सर्वेषामेव देवानां स्नानाद्यं पूर्ववद्यथा || | ||
'''८७०''' स्वमन्त्रैः स्थापनं कार्यं ज्ञात्वा व्याप्तिं पृथक् पृथक् |<br> | '''८७०''' स्वमन्त्रैः स्थापनं कार्यं ज्ञात्वा व्याप्तिं पृथक् पृथक् |<br>दर्पणे विहितं स्नानं लेयचित्रागमेषु च || | ||
'''८७१''' प्रतिष्ठा पूर्ववत् कार्या पीठाद्यं शक्तिकल्पितम् |<br> | '''८७१''' प्रतिष्ठा पूर्ववत् कार्या पीठाद्यं शक्तिकल्पितम् |<br>पूजा तेषामधः कार्या धूपमात्रन्न दुष्यति || | ||
'''८७२''' प्रतिष्ठा चूलकादीनां पूर्वोक्त लिङ्गवद्यथा |<br> | '''८७२''' प्रतिष्ठा चूलकादीनां पूर्वोक्त लिङ्गवद्यथा |<br>न तत्र लक्षणोद्धारञ्चतुर्थी चण्डकल्पना || | ||
'''८७३''' प्रवेशो ब्रह्मणोर्द्धेन शक्तिरत्नादि पूर्वकम् |<br> | '''८७३''' प्रवेशो ब्रह्मणोर्द्धेन शक्तिरत्नादि पूर्वकम् |<br>मूर्तिवक्त्राङ्ग विन्यासः सदेशाकार रूपधृक् || | ||
'''८७४''' कुम्भे प्येवं त्रिशूले तु त्रिशक्तिं व्यापिनं शिवम् |<br> | '''८७४''' कुम्भे प्येवं त्रिशूले तु त्रिशक्तिं व्यापिनं शिवम् |<br>निष्पन्नं शिखरं दृष्ट्वा ध्वजशून्यन्न धारयेत् || | ||
'''८७५''' ध्वजशून्यन्तु प्रासादं समाश्रित्य विनायकाः |<br> | '''८७५''' ध्वजशून्यन्तु प्रासादं समाश्रित्य विनायकाः |<br>जनयन्ति भयं घोरं तस्मात् कार्यो महाध्वजः || | ||
'''८७६''' प्रासाद दैर्घ्यदीर्घस्तु द्विहस्तो विस्तरेण तु |<br> | '''८७६''' प्रासाद दैर्घ्यदीर्घस्तु द्विहस्तो विस्तरेण तु |<br>जघान्तो वाथ कर्तव्यो यथा लाभमथापि वा || | ||
'''८७७''' अथवा प्रदक्षिणी कृत्य यथा लिङ्गन्तु वेष्ठ्यते |<br> | '''८७७''' अथवा प्रदक्षिणी कृत्य यथा लिङ्गन्तु वेष्ठ्यते |<br>शिखरत्र्यंशतो ज्येष्ठे मध्यमे पादवर्जिते || | ||
'''८७८''' कन्यसे चोत्तमोर्द्धेन समग्रन्थिस्तु वैणवः |<br> | '''८७८''' कन्यसे चोत्तमोर्द्धेन समग्रन्थिस्तु वैणवः |<br>मुक्तये विषमः शस्तो दृढः सद्दारूजोथवा || | ||
'''८७९''' समाहृत्य द्वयं कार्यं स्नानाद्यञ्च यथा पुरा |<br> | '''८७९''' समाहृत्य द्वयं कार्यं स्नानाद्यञ्च यथा पुरा |<br>मूर्त्यादि तत्व विन्यासस्तथा किन्त्वस्त्र सन्निधिः || | ||
'''८८०''' पूजा होम जपस्पर्शन्तथा कार्यं मखाधिप |<br> | '''८८०''' पूजा होम जपस्पर्शन्तथा कार्यं मखाधिप |<br>प्रासादो वाह्यलिङ्गन्तु जगती पिण्डिकाहरे || | ||
'''८८१''' तत्प्रतिष्ठा प्रकर्तव्या यथा पूर्वमुदाहृता |<br> | '''८८१''' तत्प्रतिष्ठा प्रकर्तव्या यथा पूर्वमुदाहृता |<br>दण्डाधारे न्यसेच्छक्ति रत्नाद्यं पञ्चकन्तथा || | ||
'''८८२''' ध्वज युक्तन्न्यसेद् दण्डमस्त्रालङ्कृतविग्रहम् |<br> | '''८८२''' ध्वज युक्तन्न्यसेद् दण्डमस्त्रालङ्कृतविग्रहम् |<br>सूर्यकोटिसहस्राभं ज्वलन्तमति भीषणम् || | ||
'''८८३''' सुरासुर प्रदुष्टानां दुःप्रेक्ष्यं दर्पनाशकम् |<br> | '''८८३''' सुरासुर प्रदुष्टानां दुःप्रेक्ष्यं दर्पनाशकम् |<br>महापातकिनो ये तु तेपि दृष्ट्वा ध्वजोच्छ्रयम् || | ||
'''८८४''' तत्क्षणादेव निष्पायाः किन्नकर्तुः कुलद्वयम् |<br> | '''८८४''' तत्क्षणादेव निष्पायाः किन्नकर्तुः कुलद्वयम् |<br>लिङ्गादि परमाणूनां संख्यायावच्छिवालये || | ||
'''८८५''' तावत् कल्प सहस्राणि वसेत् कर्ता च तत्पुरे |<br> | '''८८५''' तावत् कल्प सहस्राणि वसेत् कर्ता च तत्पुरे |<br>ध्वजोच्छ्रये कृते शक्र भवेत् कोटिगुणं फलम् || | ||
'''८८६''' मन्दिरेपि प्रकर्तव्यं प्रतिष्ठाद्यं ध्वजोच्छ्रयम् |<br> | '''८८६''' मन्दिरेपि प्रकर्तव्यं प्रतिष्ठाद्यं ध्वजोच्छ्रयम् |<br>अनुषङ्गात् प्रवक्ष्यामि मन्दिरेपि ध्वजोच्छ्रयम् || | ||
'''८८७''' ज्ञात्वा मन्दिरमादौ तु दण्डमानञ्च कारयेत् |<br> | '''८८७''' ज्ञात्वा मन्दिरमादौ तु दण्डमानञ्च कारयेत् |<br>एकभौमं द्विभौमम्वा त्रिभौमं मन्दिरं हरे || | ||
'''८८८''' कन्यसं मध्यमं ज्येष्ठं तेषां दण्डमिति शृणु |<br> | '''८८८''' कन्यसं मध्यमं ज्येष्ठं तेषां दण्डमिति शृणु |<br>गायत्री तुष्टि भुवनैः करैर्दण्डन्तु कारयेत् || | ||
'''८८९''' अन्यथा वा प्रकर्तव्या गृहदण्डमिति शुभा |<br> | '''८८९''' अन्यथा वा प्रकर्तव्या गृहदण्डमिति शुभा |<br>वेश्म व्यास त्रिभागस्थन्तत्पादोनं द्वितीयकम् || | ||
'''८९०''' तृतीयमर्द्धभागेन दण्डमानमुदाहृतम् |<br> | '''८९०''' तृतीयमर्द्धभागेन दण्डमानमुदाहृतम् |<br>ध्वजान्वितं समादाय प्रोक्ष्यास्त्रेण पटावृतम् || | ||
'''८९१''' शिवतत्व विभागेन त्रितत्वन्तत्व या न्यसेत् |<br> | '''८९१''' शिवतत्व विभागेन त्रितत्वन्तत्व या न्यसेत् |<br>अस्त्रं न्यस्त्वा ततो विद्धान्सन्निदेहो ममाचरेत् || | ||
'''८९२''' मन्दिरे च यथा न्यासस्तं वक्ष्येहं शतक्रतो |<br> | '''८९२''' मन्दिरे च यथा न्यासस्तं वक्ष्येहं शतक्रतो |<br>मन्दिरे विन्यसेत् तत्त्वं शक्तिं विन्यस्य धारिकाम् || | ||
'''८९३''' आत्मतत्वमधोभागे ब्रह्माण्डो वधि विन्यसेत् |<br> | '''८९३''' आत्मतत्वमधोभागे ब्रह्माण्डो वधि विन्यसेत् |<br>विधातत्त्वन्न्यसेन्मध्ये बुद्धितत्व पदानुगम् || | ||
'''८९४''' ऊर्ध्वं वै शिवतत्त्वं स्याच्छुद्ध विद्यावसानिकम् |<br> | '''८९४''' ऊर्ध्वं वै शिवतत्त्वं स्याच्छुद्ध विद्यावसानिकम् |<br>कारण त्रितयं न्यस्त्वा शिवं साङ्गञ्च विन्यसेत् || | ||
'''८९५''' तत्त्वोपस्थापनं शुद्धिः प्रोक्षण स्पर्शनं जपः |<br> | '''८९५''' तत्त्वोपस्थापनं शुद्धिः प्रोक्षण स्पर्शनं जपः |<br>सान्निध्यं रोधनं पूजा सन्धानं प्रतितत्त्वतः || | ||
'''८९६''' एवं सर्वत्र विधिवद्विधानं पूर्णतां व्रजेत् |<br> | '''८९६''' एवं सर्वत्र विधिवद्विधानं पूर्णतां व्रजेत् |<br>शुभलग्नं समासाद्य विन्यसेद् ध्वजमादरात् || | ||
'''८९७''' मन्दिरं स्नपयेत् पश्चात् फलाद्यैः शुभवस्तुभिः |<br> | '''८९७''' मन्दिरं स्नपयेत् पश्चात् फलाद्यैः शुभवस्तुभिः |<br>काष्ठिका तृणनिर्वृत्ते गृहे न्यासस्तु कथ्यते || | ||
'''८९८''' कंवीषु पृथिवीतत्त्वं तृणेष्वाप्यं नियोजयेत् |<br> | '''८९८''' कंवीषु पृथिवीतत्त्वं तृणेष्वाप्यं नियोजयेत् |<br>तेज सम्बन्धतोद्देशे दण्डकेषु च वायवम् || | ||
'''८९९''' स्थूणासु व्योमतत्त्वन्तु शिवं साङ्गञ्च विन्यसेत् |<br> | '''८९९''' स्थूणासु व्योमतत्त्वन्तु शिवं साङ्गञ्च विन्यसेत् |<br>जीर्णेपि संस्कृते पुण्यं कर्तुः स्यान्मौलिकं यतः || | ||
'''Erneuerung beschädigter Heiligtümer''' | '''Erneuerung beschädigter Heiligtümer''' | ||
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[[Datei:Shakti nach der Verehrung.jpeg|thumb|Verehrung und Erneuerung des heiligen Ortes.]] | [[Datei:Shakti nach der Verehrung.jpeg|thumb|Verehrung und Erneuerung des heiligen Ortes.]] | ||
'''९००''' ततो जीर्णं समुद्धृत्य गुणवद् विन्यसेत् सुधीः |<br> | '''९००''' ततो जीर्णं समुद्धृत्य गुणवद् विन्यसेत् सुधीः |<br>महाभयकरन्नित्यमत्यन्तं क्रूररूपधृक् || | ||
'''९०१''' दोषं करोति वहुधा राष्ट्रे राजनि सर्वदा |<br> | '''९०१''' दोषं करोति वहुधा राष्ट्रे राजनि सर्वदा |<br>दुष्टलिङ्गे स्थिते राष्ट्रे प्रजामारीनिरन्तरम् || | ||
'''९०२''' राजा च दुःखशोकार्तः क्षीयते वलवाहनैः |<br> | '''९०२''' राजा च दुःखशोकार्तः क्षीयते वलवाहनैः |<br>आत्मशून्यं यथा देहं संप्रविश्येहराक्षसाः || | ||
'''९०३''' भयमुत्पादयन्त्याशु दुस्तरं मरणान्तिकम् |<br> | '''९०३''' भयमुत्पादयन्त्याशु दुस्तरं मरणान्तिकम् |<br>तथैव देवताः शून्यं दृष्ट्वालिङ्गं गुणोज्झितम् || | ||
'''९०४''' यजताञ्च समाश्रित्य जनयन्ति महद्भयम् |<br> | '''९०४''' यजताञ्च समाश्रित्य जनयन्ति महद्भयम् |<br>हीनञ्जीर्णङ्कृशं दग्धं स्थूलं मानाधिकं हरे || | ||
'''९०५''' लक्ष्मशून्यञ्च गर्भाढ्यं संपुटं स्फुटितन्तथा |<br> | '''९०५''' लक्ष्मशून्यञ्च गर्भाढ्यं संपुटं स्फुटितन्तथा |<br>भग्नञ्च स क्षतञ्चैव तथा वज्रहतं पुनः || | ||
'''९०६''' एवमादीनि चान्यानि लिङ्गानि परिवर्जयेत् |<br> | '''९०६''' एवमादीनि चान्यानि लिङ्गानि परिवर्जयेत् |<br>जीर्णाद्यैः प्रोचितैरेतैस्त्याज्यार्चा पिण्डिकादिकम् || | ||
'''९०७''' चलितञ्चालितं लिङ्गं पतितं पातितं हरे |<br> | '''९०७''' चलितञ्चालितं लिङ्गं पतितं पातितं हरे |<br>मध्यस्थं विषमं निम्नं दिङ्मूढमति चोच्छ्रितम् || | ||
'''९०८''' स्थापनीयानि तत्रैव यद्येतान्ये व्रणानि च |<br> | '''९०८''' स्थापनीयानि तत्रैव यद्येतान्ये व्रणानि च |<br>परित्यक्त शिलायोगं निर्व्रणञ्चललक्षणम् || | ||
'''९०९''' संसक्तामुद्धरेद्वेवीं तत्रैव स्थापनाय च |<br> | '''९०९''' संसक्तामुद्धरेद्वेवीं तत्रैव स्थापनाय च |<br>जीर्णाद्यं पूजितं हन्ति निहन्ति तदपूजितम् || | ||
'''९१०''' तस्मात् तदुद्धरेल्लिङ्गं शास्त्रविद्विधि पूर्वकम् |<br> | '''९१०''' तस्मात् तदुद्धरेल्लिङ्गं शास्त्रविद्विधि पूर्वकम् |<br>विधिं विनोद्धृतं लिङ्गमशास्त्रज्ञैस्तु देशिकैः || | ||
'''९११''' राष्ट्रं राष्ट्राधि पञ्चैव द्रुतमुच्छादयेद्धरे |<br> | '''९११''' राष्ट्रं राष्ट्राधि पञ्चैव द्रुतमुच्छादयेद्धरे |<br>उद्धृतं विधिना लिङ्गं देशिकैः समयच्युतैः || | ||
'''९१२''' तेन दोष विपाकेन गजवाजिक्षयो भवेत् |<br> | '''९१२''' तेन दोष विपाकेन गजवाजिक्षयो भवेत् |<br>दक्षे मण्डपस्त्वीशे वा आप्यद्वारैक तोरणः || | ||
'''९१३''' अत्रापि द्वारपूजादि स्थण्डिले तु शिवार्चनम् |<br> | '''९१३''' अत्रापि द्वारपूजादि स्थण्डिले तु शिवार्चनम् |<br>मन्त्र सन्तर्पणं कृत्वा दीपनादि यथा पुरा || | ||
'''९१४''' शिवं तु लिङ्गिनो भोज्या विष्ण्वादौ द्विजसत्तमाः |<br> | '''९१४''' शिवं तु लिङ्गिनो भोज्या विष्ण्वादौ द्विजसत्तमाः |<br>भूतादिभ्यो वलिं दत्वा शिवमध्येष्य शान्तिकम् || | ||
'''९१५''' क्षीराज्य मधुदूर्वाभिः समिद्भिर्वा विधाय च |<br> | '''९१५''' क्षीराज्य मधुदूर्वाभिः समिद्भिर्वा विधाय च |<br>गत्वा लिङ्गान्तिकं मन्त्री तदा स्नाप्य प्रपूजयेत् || | ||
'''९१६''' ओं व्यापकेश्वरा येति नमोन्तो मूलवाचकः |<br> | '''९१६''' ओं व्यापकेश्वरा येति नमोन्तो मूलवाचकः |<br>ओं व्यापक हृदयाय नाभ्यन्तं हृदयं स्मृतम् || | ||
'''९१७''' एवं शिरो ज्वालिनी वर्मनेत्रास्त्राणि क्रमेण तु |<br> | '''९१७''' एवं शिरो ज्वालिनी वर्मनेत्रास्त्राणि क्रमेण तु |<br>एभिस्तारासने लिङ्गं स्थण्डिलन्तु प्रपूजयेत् || | ||
'''९१८''' ततस्तत्राश्रितं सत्त्वं श्रावयेदस्त्र मुच्चरेत् |<br> | '''९१८''' ततस्तत्राश्रितं सत्त्वं श्रावयेदस्त्र मुच्चरेत् |<br>सत्वः कोपी हयः कश्चिल्लिङ्गमाश्रित्य तिष्ठति || | ||
'''९१९''' लिङ्गन्त्यक्ता स यत्रेष्टं तत्र या तु शिवाज्ञया |<br> | '''९१९''' लिङ्गन्त्यक्ता स यत्रेष्टं तत्र या तु शिवाज्ञया |<br>एवमुक्ता महास्त्रेण दत्वा चार्घ्यं विसर्जयेत् || | ||
'''९२०''' ततः पाशुपतास्त्रेण प्रतिभागे स्वशक्तितः |<br> | '''९२०''' ततः पाशुपतास्त्रेण प्रतिभागे स्वशक्तितः |<br>हुत्वाहरे ततोभ्युक्ष्य शान्ति कुम्भस्य वारिणा || | ||
'''९२१''' ततो दर्भेण संस्पृश्य जप्त्वास्त्रं होमसंख्यया |<br> | '''९२१''' ततो दर्भेण संस्पृश्य जप्त्वास्त्रं होमसंख्यया |<br>अर्घंपराङ्मुखं दत्वा विसृजेत् तत्त्व तत्त्वपान् || | ||
'''९२२''' दृक् क्रिये पीठमन्त्राश्च भागत्रयमनूनपि |<br> | '''९२२''' दृक् क्रिये पीठमन्त्राश्च भागत्रयमनूनपि |<br>शिवं साङ्गं त्रिखण्डाध्व पतीनथ समायुतान् || | ||
'''९२३''' चण्डनाथं खनित्रेण हैमेनास्त्राणुनाखनेत् |<br> | '''९२३''' चण्डनाथं खनित्रेण हैमेनास्त्राणुनाखनेत् |<br>वद्ध्वाकाञ्चन पाशेन वालरज्वा च यत्नतः || | ||
'''९२४''' स्कन्ध स्थितया वृषयोर्लिङ्ग पीठ शिलामपि |<br> | '''९२४''' स्कन्ध स्थितया वृषयोर्लिङ्ग पीठ शिलामपि |<br>द्वयमेकं समस्तं वा यत्नादेषां समुद्धरेत् || | ||
'''९२५''' शिवमंत्रं गृणंल्लोकैः प्रक्षिपेत् तज्जले गुरुः |<br> | '''९२५''' शिवमंत्रं गृणंल्लोकैः प्रक्षिपेत् तज्जले गुरुः |<br>भूयः पुष्ट्यर्थकं हुत्वा दिक्पतीनां प्रतर्पणे || | ||
'''९२६''' प्रासाद वास्तु शुद्ध्यर्थं होतव्यञ्च शतं शतम् |<br> | '''९२६''' प्रासाद वास्तु शुद्ध्यर्थं होतव्यञ्च शतं शतम् |<br>महापाशुपतं शक्र प्रासादरक्ष्णे न्यसेत् || | ||
'''९२७''' यावन्नैवा परं लिङ्गं स्थापयेद् विधिना पुनः |<br> | '''९२७''' यावन्नैवा परं लिङ्गं स्थापयेद् विधिना पुनः |<br>पूर्वमानान्वितं लिङ्गन्तद्रूपं संस्कृतन्तथा || | ||
'''९२८''' स्वस्थाने सन्निवेश्यापि विधिना पूजयेत् ततः |<br> | '''९२८''' स्वस्थाने सन्निवेश्यापि विधिना पूजयेत् ततः |<br>असुरैर्मुनिभिर्देवैस्तत्त्वविद्भिः प्रतिष्ठितम् || | ||
'''९२९''' भग्नम्वाप्यथ जीर्णम्वा विधिनापि न चालयेत् |<br> | '''९२९''' भग्नम्वाप्यथ जीर्णम्वा विधिनापि न चालयेत् |<br>विधिमेतम् प्रकुर्वीत जीर्णधाम समुद्धृतौ || | ||
'''९३०''' निस्त्रिंशे विन्यसेन् मन्त्रान् दर्पणे वा सुनिर्मले |<br> | '''९३०''' निस्त्रिंशे विन्यसेन् मन्त्रान् दर्पणे वा सुनिर्मले |<br>अपरन्त्वारभेत् पश्चात् पूर्वरूपं यथा भवेत् || | ||
'''९३१''' समाप्ते मन्त्रसंयोगः प्रतिष्ठा पूर्ववत् स्मृता |<br> | '''९३१''' समाप्ते मन्त्रसंयोगः प्रतिष्ठा पूर्ववत् स्मृता |<br>वाह्यं चैवेष्टकं कार्यमैष्टकत्वौ पलं हरे || | ||
'''९३२''' हीनधामोत्तमैर्द्रव्यैः कुर्याद्वातन्मयं शुभम् |<br> | '''९३२''' हीनधामोत्तमैर्द्रव्यैः कुर्याद्वातन्मयं शुभम् |<br>यो यथा संस्थितो वास्तुर्दीर्घो वा समविस्तरः || | ||
'''९३३''' तस्मिंस्तु कल्पयेद् भित्तिं हानिर्वृद्धिं विवर्जयेत् |<br> | '''९३३''' तस्मिंस्तु कल्पयेद् भित्तिं हानिर्वृद्धिं विवर्जयेत् |<br>हानौ सत्यां भवेन्मृत्युर्वृद्धौ द्रव्य क्षयो भवेत् || | ||
'''९३४''' तस्मात् सर्वप्रयत्नेन हानिं वृद्धिं न कारयेत् |<br> | '''९३४''' तस्मात् सर्वप्रयत्नेन हानिं वृद्धिं न कारयेत् |<br>दक्षिणां वस्त्र हेमाद्यैर्दत्वा सन्तोष यद्गुरुम् || | ||
'''९३५''' क्षमस्त्वेति वदेद्वाक्यं शिवं सोपि वदेत् ततः |<br> | '''९३५''' क्षमस्त्वेति वदेद्वाक्यं शिवं सोपि वदेत् ततः |<br>इति क्रिया समोपेतं लिङ्गमन्त्रि स साधकः || | ||
'''Vergänglichkeit und tägliche Praxis''' | '''Vergänglichkeit und tägliche Praxis''' | ||
'''९३६''' लभतेभि मतां सिद्धिं मोक्षं मोक्षपरायणः |<br> | '''९३६''' लभतेभि मतां सिद्धिं मोक्षं मोक्षपरायणः |<br>पत्रपत्रे यथातोयं वातोद्धृतं सुचञ्चलम् || | ||
'''९३७''' तद्वत्सु चञ्चलं शक्र प्राणिनां हतजीवितम् |<br> | '''९३७''' तद्वत्सु चञ्चलं शक्र प्राणिनां हतजीवितम् |<br>अस्थिरं यौवनं शक्र द्रव्यमस्थिरमेव च || | ||
'''९३८''' अस्थिरं पुत्रपौत्राघं रम्भासारसमोपमम् |<br> | '''९३८''' अस्थिरं पुत्रपौत्राघं रम्भासारसमोपमम् |<br>तस्मात् पुत्रकलत्राणि सुदृन्मित्रधनानि च || | ||
'''९३९''' विहाय मोहजालानि कुर्याल्लिङ्ग परिग्रहम् |<br> | '''९३९''' विहाय मोहजालानि कुर्याल्लिङ्ग परिग्रहम् |<br>कालिञ्जरे महीन्द्रे वा सह्ये वाम लयेपि वा || | ||
'''९४०''' गङ्गा तटे समुद्रे वा श्रीशैले सरितां तटे |<br> | '''९४०''' गङ्गा तटे समुद्रे वा श्रीशैले सरितां तटे |<br>पत्र पुष्प फलोपेते मृत्कुशोपचिते शुभे || | ||
'''९४१''' माहेश्वर जनाक्रान्ते सर्वदोष विवर्जिते |<br> | '''९४१''' माहेश्वर जनाक्रान्ते सर्वदोष विवर्जिते |<br>सुतिथौ च सुनक्षत्रे सुयोगे करणान्विते || | ||
'''९४२''' सम्पूज्य देवदेवेशं कुर्याल्लिङ्ग परिग्रहम् |<br> | '''९४२''' सम्पूज्य देवदेवेशं कुर्याल्लिङ्ग परिग्रहम् |<br>स्थापितं ऋषिभिः पूर्वं सर्वलक्षणसंयुतम् || | ||
'''९४३''' आश्रये सिद्धिदं लिङ्गं स्वयम्वा परिकल्पितम् |<br> | '''९४३''' आश्रये सिद्धिदं लिङ्गं स्वयम्वा परिकल्पितम् |<br>कीलितं वर्जयेद्विद्वान् स्कन्द विष्ण्विन्द्र मातृभिः || | ||
'''९४४''' उपर्यु परिलिङ्गञ्च वर्जयेत् साधकः सदा |<br> | '''९४४''' उपर्यु परिलिङ्गञ्च वर्जयेत् साधकः सदा |<br>पूर्वास्यं पश्चिमास्यन्तु श्रेष्ठं लिङ्ग द्वयं हरे || | ||
'''९४५''' याम्यं कौवेर चक्रन्तु न सिद्धा विष्यते बुधैः |<br> | '''९४५''' याम्यं कौवेर चक्रन्तु न सिद्धा विष्यते बुधैः |<br>परिगृह्येक्षितं लिङ्गं यथाशास्त्रं शतक्रतो || | ||
'''९४६''' पूजयेत् सततं मन्त्री ज्ञात्वा देहमशाश्वतम् |<br> | '''९४६''' पूजयेत् सततं मन्त्री ज्ञात्वा देहमशाश्वतम् |<br>पूजाहोम परो नित्यं ध्वजध्यान परायणः || | ||
'''९४७''' सर्व कार्येषु कुशलः साधकः स्याज्जितेन्द्रियः |<br> | '''९४७''' सर्व कार्येषु कुशलः साधकः स्याज्जितेन्द्रियः |<br>क्षेत्रान्ते रक्षणं पूजा वलिं दानञ्च कारयेत् || | ||
'''९४८''' रक्षा गृहेपि कर्तव्या यथा क्षेत्रे पुरन्दर |<br> | '''९४८''' रक्षा गृहेपि कर्तव्या यथा क्षेत्रे पुरन्दर |<br>पर्वकालेषु सर्वेषु निमित्तेष्वखिलेषु च || | ||
'''९४९''' पूजां विशेषतः कुर्याज्जपाद्यं द्विगुणञ्चरेत् |<br> | '''९४९''' पूजां विशेषतः कुर्याज्जपाद्यं द्विगुणञ्चरेत् |<br>शिवपूजापवित्रञ्च कर्तव्यं सर्वदा हरे || | ||
'''९५०''' पवित्रेण विना पूजा तामसी परिकीर्तिता |<br> | '''९५०''' पवित्रेण विना पूजा तामसी परिकीर्तिता |<br>राजसी च भवेदिन्द्र परमीकरणाद्विना || | ||
'''९५१''' तस्मात् पूजा पवित्रञ्च परमीकरणन्तथा |<br> | '''९५१''' तस्मात् पूजा पवित्रञ्च परमीकरणन्तथा |<br>कर्तव्यं सततं सद्भिः संसार भयभीरूभिः || | ||
'''९५२''' पत्रिकाभिः प्रसूनैर्वा कुशैर्वा परिकल्पयेत् |<br> | '''९५२''' पत्रिकाभिः प्रसूनैर्वा कुशैर्वा परिकल्पयेत् |<br>पवित्रं प्रत्यहंशभोर्महापुण्यजिगीषया || | ||
'''Pavitra: das Fest der rituellen Erneuerung''' | '''Pavitra: das Fest der rituellen Erneuerung''' | ||
'''९५३''' इति नित्यक्रियाख्याता शृणु नैमित्तिकी पुनः |<br> | '''९५३''' इति नित्यक्रियाख्याता शृणु नैमित्तिकी पुनः |<br>आषाढस्यसिताविश्वा श्रावणस्य सितासिता || | ||
'''९५४''' सप्तम्योथ त्रयोदश्यस्तत्र गन्ध पवित्रकम् |<br> | '''९५४''' सप्तम्योथ त्रयोदश्यस्तत्र गन्ध पवित्रकम् |<br>त्रयोदश्यां प्रकर्तव्यं पवित्रं गन्धसंज्ञितम् || | ||
'''९५५''' पवित्रमथ भूतायामाषाढं नियमः स्मृतः |<br> | '''९५५''' पवित्रमथ भूतायामाषाढं नियमः स्मृतः |<br>दीक्षादि स्थापनञ्चैव पवित्रादि शतक्रतो || | ||
'''९५६''' अधिमासेन कुर्वीत यदीच्छेच्छुभमात्मनः |<br> | '''९५६''' अधिमासेन कुर्वीत यदीच्छेच्छुभमात्मनः |<br>दर्शद्वयं भवेद् यत्र रविसंक्रान्ति वर्जितम् || | ||
'''९५७''' अधिमासः स विज्ञेयो विष्णुः स्वपितिकर्कटे |<br> | '''९५७''' अधिमासः स विज्ञेयो विष्णुः स्वपितिकर्कटे |<br>तुल्यमासेधि मासे वा कर्तव्यन्तु पवित्रकम् || | ||
'''९५८''' सुप्ते चैव हृषीइकेशे दोषभागं यथा भवेत्? |<br> | '''९५८''' सुप्ते चैव हृषीइकेशे दोषभागं यथा भवेत्? |<br>कन्यया कर्तितं सूत्रं कर्तितन्त्वात्मनापि वा || | ||
'''९५९''' ग्रन्थिकेश विनिर्मुक्तं सर्वदोष विवर्जितम् |<br> | '''९५९''' ग्रन्थिकेश विनिर्मुक्तं सर्वदोष विवर्जितम् |<br>कृत्वा नवगुणं शक्र क्षालयेद् विधिना ततः || | ||
'''९६०''' कुर्यात् तत्कन्दुकाकारमन्तः सूत्रं प्रयत्नतः |<br> | '''९६०''' कुर्यात् तत्कन्दुकाकारमन्तः सूत्रं प्रयत्नतः |<br>अङ्गविन्द्विन्दुमारभ्य यावन्नागयमावधि || | ||
'''९६१''' ज्येष्ठादि कन्य स प्रान्तेन वलिङ्गे मया तव |<br> | '''९६१''' ज्येष्ठादि कन्य स प्रान्तेन वलिङ्गे मया तव |<br>दशह्रासान्मयाख्याता सूत्रसंख्या पुरन्दर || | ||
'''९६२''' घटितानां विधिः ख्यातो नान्येषान्तु कदाचन |<br> | '''९६२''' घटितानां विधिः ख्यातो नान्येषान्तु कदाचन |<br>स्थण्डिले चल लिङ्गे च वाणलिङ्गे स्वयम्भुवि || | ||
'''९६३''' रौहादौ नियमो नास्ति यथा पूर्वमुदाहृतः |<br> | '''९६३''' रौहादौ नियमो नास्ति यथा पूर्वमुदाहृतः |<br>अष्टोत्तरशतादूर्द्धन्न कर्तव्यं कदाचन || | ||
'''९६४''' सर्वेषां नियमः शक्र इत्याज्ञा पारमेश्वरी |<br> | '''९६४''' सर्वेषां नियमः शक्र इत्याज्ञा पारमेश्वरी |<br>अष्टोत्तर शतैः कुर्यात् स्थण्डिलादौ पवित्रकम् || | ||
'''९६५''' तस्यार्द्धेन तदर्द्धेन यथा लाभेन वा हरे |<br> | '''९६५''' तस्यार्द्धेन तदर्द्धेन यथा लाभेन वा हरे |<br>दर्भमुञ्जादिभिश्चैव सूत्रा भावात् पवित्रकम् || | ||
'''९६६''' कर्तव्यं स्वेश्वरैर्लोकैः प्रायश्चित्तमतोन्यथा |<br> | '''९६६''' कर्तव्यं स्वेश्वरैर्लोकैः प्रायश्चित्तमतोन्यथा |<br>कर्तव्यं वलयाकारं पवित्रत्रितयं हरे || | ||
'''९६७''' समान्तराः प्रकर्तव्याः प्रत्येकं समग्रन्थयः |<br> | '''९६७''' समान्तराः प्रकर्तव्याः प्रत्येकं समग्रन्थयः |<br>पिण्डिकास्पृक्प्रकर्तव्यं गङ्गाख्यन्तदुदाहृतम् || | ||
'''९६८''' तत्रापि कथ्यते संख्या ग्रन्थीनान्ते निराकुलम् |<br> | '''९६८''' तत्रापि कथ्यते संख्या ग्रन्थीनान्ते निराकुलम् |<br>विन्दुवाणं समारभ्य यावत् स्यान्नाग चन्द्रकम् || | ||
'''९६९''' युगह्रासान् समाख्याता ग्रन्थयः सुरसत्तम |<br> | '''९६९''' युगह्रासान् समाख्याता ग्रन्थयः सुरसत्तम |<br>ज्येष्ठादि कन्यसे प्रान्ते पवित्रे सार्वदैविके || | ||
'''९७०''' ग्रन्थिसंख्यासमुद्दिष्टा क्रमात् तेषु निराकुला |<br> | '''९७०''' ग्रन्थिसंख्यासमुद्दिष्टा क्रमात् तेषु निराकुला |<br>सार्वदैविक संयुक्तन्त्रयं शम्भोः पवित्रकम् || | ||
'''९७१''' आदित्यानलचण्डानां सम्पत्तौ स्याच्चतुष्टयम् |<br> | '''९७१''' आदित्यानलचण्डानां सम्पत्तौ स्याच्चतुष्टयम् |<br>एकैकं द्वारपालानामेकञ्चिअवात्म मूर्तये || | ||
'''९७२''' वाह्यान्तर्वलि देवानामेकैकं परिकल्पयेत् |<br> | '''९७२''' वाह्यान्तर्वलि देवानामेकैकं परिकल्पयेत् |<br>एकैकं लोकपालानामेकं पीठे निवेशयेत् || | ||
'''९७३''' वद्ध्वा सर्वपवित्राणि रञ्जयेत् तदनन्तरम् |<br> | '''९७३''' वद्ध्वा सर्वपवित्राणि रञ्जयेत् तदनन्तरम् |<br>ग्रन्थिस्थाने ततः शक्र पवित्रं मण्डयेत् सुधीः || | ||
'''९७४''' कुङ्कुमेनेन्दु युक्तेन चन्दनेनारुणेन च |<br> | '''९७४''' कुङ्कुमेनेन्दु युक्तेन चन्दनेनारुणेन च |<br>मण्डयेद् गोमृदासूत्रं रजन्यां शिलयाथवा || | ||
'''९७५''' धातुना मण्डयेद् वाथ सर्वा भावात् सुराधिप |<br> | '''९७५''' धातुना मण्डयेद् वाथ सर्वा भावात् सुराधिप |<br>पार्थिवं दारुवञ्चैव पात्रव्रातञ्च वंशजम् || | ||
'''९७६''' विहायस्रुक्स्रुवौ शक्र त्यजेत् सर्वं पुरातनम् |<br> | '''९७६''' विहायस्रुक्स्रुवौ शक्र त्यजेत् सर्वं पुरातनम् |<br>सर्वोत् पादित संभारः कृतस्नान विधिक्रियः || | ||
'''९७७''' सन्ध्यां नैमित्तिकीं स्मृत्वा कुर्यात् कर्म तदुच्यते |<br> | '''९७७''' सन्ध्यां नैमित्तिकीं स्मृत्वा कुर्यात् कर्म तदुच्यते |<br>यागधामादिकं सर्वं कुम्भान्तं यद्व्यवस्थितम् || | ||
'''९७८''' त्रिवृत्सूत्रेण तत्सर्वं वेष्टयेत् कवचाणुना |<br> | '''९७८''' त्रिवृत्सूत्रेण तत्सर्वं वेष्टयेत् कवचाणुना |<br>सूर्यं संपूज्य विज्ञाप्य द्वारपालान्यजेत् ततः || | ||
'''९७९''' कृत्वा परिग्रहं भूमेः पूर्ववत् पूजयेच्छिवम् |<br> | '''९७९''' कृत्वा परिग्रहं भूमेः पूर्ववत् पूजयेच्छिवम् |<br>अग्निं सञ्जनयेत् कुण्डे कुण्डसंस्कारपूर्वकम् || | ||
'''९८०''' आवाहयेत् ततो देवं पूजयेत् तर्पयेत् ततः |<br> | '''९८०''' आवाहयेत् ततो देवं पूजयेत् तर्पयेत् ततः |<br>पूर्णां दत्वा क्रियाच्छिद्रन्निरस्य तदनन्तरम् || | ||
'''९८१''' ऐन्द्रान्तु विन्यसेत् काष्ठं सुशुद्धं भस्मदक्षिणे |<br> | '''९८१''' ऐन्द्रान्तु विन्यसेत् काष्ठं सुशुद्धं भस्मदक्षिणे |<br>मृत्तिकां विन्यसेच्छक्र पात्रस्थामाप्य गोचरे || | ||
'''९८२''' सजलाञ्च न्यसेद्धात्रीं कौवेर्या सुरनायक |<br> | '''९८२''' सजलाञ्च न्यसेद्धात्रीं कौवेर्या सुरनायक |<br>वर्मणा शिखया चैव हृदा च शिरसा हरे || | ||
'''९८३''' गङ्गोदकन्न्यसेदैशे मूलमन्त्रमनुस्मरन् |<br> | '''९८३''' गङ्गोदकन्न्यसेदैशे मूलमन्त्रमनुस्मरन् |<br>मन्त्रैरेतैर्नमोन्तैश्च ढौकयेच्छिव सन्निधौ || | ||
'''९८४''' पुष्पैरञ्जलिमापूर्य प्रत्येकं क्षीरमुद्रया |<br> | '''९८४''' पुष्पैरञ्जलिमापूर्य प्रत्येकं क्षीरमुद्रया |<br>स्वाहा युतेन मूलेन सुतृप्तिम्भावयेच्छिवे || | ||
'''९८५''' पुटं निवेद्य पूतात्मा कुर्यात् सूत्रस्य संस्थितिः |<br> | '''९८५''' पुटं निवेद्य पूतात्मा कुर्यात् सूत्रस्य संस्थितिः |<br>ताम्रपात्रादि संस्थानि निकटीकृत्यकुण्डतः || | ||
'''९८६''' तत्त्व दृष्ट्या समालोक्य प्रोक्ष्ययेच्छिव वारिणा |<br> | '''९८६''' तत्त्व दृष्ट्या समालोक्य प्रोक्ष्ययेच्छिव वारिणा |<br>मन्त्रितः संहिता मन्त्रैश्छन्नं पात्रान्तरेण तु || | ||
'''९८७''' संपाताभिहुतं कुर्याच्छिवं वर्षात्मकं स्मरन् |<br> | '''९८७''' संपाताभिहुतं कुर्याच्छिवं वर्षात्मकं स्मरन् |<br>घृतपूर्णं श्रुवं कृत्वा स्वेत्यग्नौ भागमाक्षिपेत् || | ||
'''९८८''' हेतिं युञ्ज्यात् पवित्रेषु संपातः कथितो हरे |<br> | '''९८८''' हेतिं युञ्ज्यात् पवित्रेषु संपातः कथितो हरे |<br>मूलेन हृदये नैव शिरसा शिखया तथा || | ||
'''९८९''' कवचेनास्त्र मन्त्रेण एकैकामाहुतिं क्षिपेत् |<br> | '''९८९''' कवचेनास्त्र मन्त्रेण एकैकामाहुतिं क्षिपेत् |<br>एवं संशोध्य दातव्यं पवित्रं गन्धसंज्ञकम् || | ||
'''९९०''' सर्वौषधि समालब्धं मानोन्मान विवर्जितम् |<br> | '''९९०''' सर्वौषधि समालब्धं मानोन्मान विवर्जितम् |<br>सामान्यं सर्वदेवानामेकग्रन्थि शतक्रतो || | ||
'''९९१''' आदित्य द्वारपालादीन्ततो गणपतिं गुरुम् |<br> | '''९९१''' आदित्य द्वारपालादीन्ततो गणपतिं गुरुम् |<br>अर्चयित्वा पवित्रेण शिवमामन्त्रयेत् सुधीः || | ||
'''९९२''' गन्ध पवित्रमादाय पुष्पगन्धोपशोभितम् |<br> | '''९९२''' गन्ध पवित्रमादाय पुष्पगन्धोपशोभितम् |<br>आमन्त्रितोसि देवेश सर्वच्छिद्रमच्छिद्रताम् || | ||
'''९९३''' त्वत्प्रसादात् समभ्ये तु पठित्वा मन्त्रमुच्चरन् |<br> | '''९९३''' त्वत्प्रसादात् समभ्ये तु पठित्वा मन्त्रमुच्चरन् |<br>ब्रह्मादि कारणत्यागाल्लयान्तं सुसमाहितः || | ||
'''९९४''' समारोप्य ववित्रन्तु पतिपत्यक्षमापयेत् |<br> | '''९९४''' समारोप्य ववित्रन्तु पतिपत्यक्षमापयेत् |<br>वह्नावपि समारोप्य पवित्रं संपुटेत् ततः || | ||
'''९९५''' अस्त्रं वर्महृदं पात्रे न्यस्त्वा दत्वा पवित्रकम् |<br> | '''९९५''' अस्त्रं वर्महृदं पात्रे न्यस्त्वा दत्वा पवित्रकम् |<br>मन्त्रयेत् संहितामन्त्रैर्हृदं वर्मास्त्रकं पुनः || | ||
'''९९६''' न्यस्त्वा संवेष्ट्यसूत्रेण हृदाभ्यर्च्य समर्पयेत् |<br> | '''९९६''' न्यस्त्वा संवेष्ट्यसूत्रेण हृदाभ्यर्च्य समर्पयेत् |<br>क्रिया समर्पणं कृत्वा क्षपेद्रात्रिं शिवाग्रतः || | ||
'''९९७''' जपध्यान परो भूत्वा स्तुतिगीतपरोपि वा |<br> | '''९९७''' जपध्यान परो भूत्वा स्तुतिगीतपरोपि वा |<br>प्रातःकाले समुत्पन्ने कृत्वा चावश्यकादिकम् || | ||
'''९९८''' स्नात्वा सन्ध्यामुपास्यैव पवित्रमाहरेद् विभोः |<br> | '''९९८''' स्नात्वा सन्ध्यामुपास्यैव पवित्रमाहरेद् विभोः |<br>ततो विसर्जयेद् देवमष्टपुष्पा पुरार्चितम् || | ||
'''९९९''' अथाह्निक द्वयं कृत्वा कुर्यान्नैमित्तिकं हरे |<br> | '''९९९''' अथाह्निक द्वयं कृत्वा कुर्यान्नैमित्तिकं हरे |<br>सूर्यादीनां ततो दत्वा मन्त्रैः स्वैः स्वैर्यथोदितैः || | ||
'''१०००''' आत्मानम्पूजयेच्छक्र पवित्रेण गणं गुरुम् |<br> | '''१०००''' आत्मानम्पूजयेच्छक्र पवित्रेण गणं गुरुम् |<br>विशेषस्नपनोपेतं विस्तरं पूजयेच्छिवम् || | ||
'''१००१''' विशेषा तर्पयेद्वह्निं दत्वा पूर्णाहुतिन्ततः |<br> | '''१००१''' विशेषा तर्पयेद्वह्निं दत्वा पूर्णाहुतिन्ततः |<br>गन्धपुष्पसमोपेतं दूर्वाक्षतसमन्वितम् || | ||
'''१००२''' पवित्रमादाय देवं ततो विज्ञापयेदिदम् |<br> | '''१००२''' पवित्रमादाय देवं ततो विज्ञापयेदिदम् |<br>सर्वदेह स्थितो देवः सर्वज्ञः सर्वगो विभुः || | ||
'''१००३''' हीनाधिकं विभो कर्म त्वया दृष्टम्मया कृतम् |<br> | '''१००३''' हीनाधिकं विभो कर्म त्वया दृष्टम्मया कृतम् |<br>तदनेन पवित्रेण संपूर्णन् त्वत् प्रसादतः || | ||
'''१००४''' एवं विज्ञाप्य देवेशं पवित्रमधिरोपयेत् |<br> | '''१००४''' एवं विज्ञाप्य देवेशं पवित्रमधिरोपयेत् |<br>पवित्रारोपणे शक्र प्रयोगमधुना शृणु || | ||
'''१००५''' शिवमन्त्रं समुच्चार्यमायान्तत् सुसमाहितः |<br> | '''१००५''' शिवमन्त्रं समुच्चार्यमायान्तत् सुसमाहितः |<br>आत्मतत्त्वाधिपाय शिवाय तदधिरोपयेत् || | ||
'''१००६''' भूयो मन्त्रं समुच्चार्य स देशान्तं शतक्रतो |<br> | '''१००६''' भूयो मन्त्रं समुच्चार्य स देशान्तं शतक्रतो |<br>विद्यातत्वाधिपाय शिवाय तदधि रोपयेत् || | ||
'''१००७''' पुनर्मन्त्रं समुच्चार्य शक्त्यन्तं पाकशासन |<br> | '''१००७''' पुनर्मन्त्रं समुच्चार्य शक्त्यन्तं पाकशासन |<br>शिवतत्वाधिपाय शिवाय तदधि रोपयेत् || | ||
'''१००८''' पश्चान्मन्त्रं समुच्चार्य लयान्तं सुप्रसन्नधीः |<br> | '''१००८''' पश्चान्मन्त्रं समुच्चार्य लयान्तं सुप्रसन्नधीः |<br>सर्वतत्त्वाधिपाय शिवाय तदधि रोपयेत् || | ||
'''१००९''' आरोपयेत् पवित्राणि जाति युक्तानि सर्वदा |<br> | '''१००९''' आरोपयेत् पवित्राणि जाति युक्तानि सर्वदा |<br>अधुना जातिं प्रवक्ष्यामि पवित्रारोपणायते || | ||
'''१०१०''' प्राणान्तामृत संविष्टमालिखेद् वीजमादरात् |<br> | '''१०१०''' प्राणान्तामृत संविष्टमालिखेद् वीजमादरात् |<br>ब्रह्मवर्गद्वितीयेन मूर्द्ध्निभिन्नं यथा भवेत् || | ||
'''१०११''' अंवरं योजयेत् पश्चाद् द्वितीय स्वरभेदितम् |<br> | '''१०११''' अंवरं योजयेत् पश्चाद् द्वितीय स्वरभेदितम् |<br>जातिरेखा समाख्याता पवित्रारोपणायते || | ||
'''१०१२''' इत्यारोप्य पवित्राणि अर्घपञ्चसुभूर्द्धसु |<br> | '''१०१२''' इत्यारोप्य पवित्राणि अर्घपञ्चसुभूर्द्धसु |<br>योजयेत् सर्वदा विद्वान् सर्वकामार्थ सिद्धये || | ||
'''१०१३''' स्थिरबुद्धिं प्रकुर्वीत परमीकरणन्ततः |<br> | '''१०१३''' स्थिरबुद्धिं प्रकुर्वीत परमीकरणन्ततः |<br>पश्चात् कुर्याज्जपं विद्वान् यथा पूर्वमुदाहृतम् || | ||
'''१०१४''' जपं कृत्वा महावाहो संपुटी कृत्यपूर्ववत् |<br> | '''१०१४''' जपं कृत्वा महावाहो संपुटी कृत्यपूर्ववत् |<br>निवेदयेत् प्रयोगेण यथा वक्ष्यामि लक्षणम् || | ||
'''१०१५''' आत्मतत्त्वमधः कृत्वा शिवतत्त्वञ्च कारयेत् |<br> | '''१०१५''' आत्मतत्त्वमधः कृत्वा शिवतत्त्वञ्च कारयेत् |<br>विद्यातत्त्व प्रभावेण यदा निष्कल गोचरम् || | ||
'''१०१६''' शिवाय च पदञ्चान्यत् स्वाहान्तं समुदीरयेत् |<br> | '''१०१६''' शिवाय च पदञ्चान्यत् स्वाहान्तं समुदीरयेत् |<br>जपं निवेदये देवं सर्वकर्मकरं वरम् || | ||
'''१०१७''' आत्मतत्त्वं विजानीयात् पूरकं सुरनायक |<br> | '''१०१७''' आत्मतत्त्वं विजानीयात् पूरकं सुरनायक |<br>कुम्भकं शिवतत्त्वञ्च विद्याख्यं रेचकं हरे || | ||
'''१०१८''' वह्नावपि समारोप्य पवित्रं पूर्ववद् यथा |<br> | '''१०१८''' वह्नावपि समारोप्य पवित्रं पूर्ववद् यथा |<br>वलिना स पवित्रेण रुद्रादीन् पूजयेत् ततः || | ||
'''१०१९''' स्तुत्वा प्रणम्य नियमं प्रतिज्ञां श्रावयेत् ततः |<br> | '''१०१९''' स्तुत्वा प्रणम्य नियमं प्रतिज्ञां श्रावयेत् ततः |<br>चतुर्मासं द्विमासम्वा मासैकं पक्षमेव वा || | ||
'''१०२०''' दशाहं सप्तरात्रम्वा पञ्चाहम्वा दिन त्रयम् |<br> | '''१०२०''' दशाहं सप्तरात्रम्वा पञ्चाहम्वा दिन त्रयम् |<br>दिनद्वयमथैकम्वा प्रतिज्ञां कारयेत् सुधीः || | ||
'''१०२१''' वित्तशाठ्यं विना विद्वान् गुरुं सम्पूजयेदथ |<br> | '''१०२१''' वित्तशाठ्यं विना विद्वान् गुरुं सम्पूजयेदथ |<br>भोजयेल्लिङ्गिनः पश्चाद् दद्याद् वस्त्रं सदक्षिणम् || | ||
'''१०२२''' दीनानाथादिकान् सर्वान् तद् दिने भोजयेद्धरे |<br> | '''१०२२''' दीनानाथादिकान् सर्वान् तद् दिने भोजयेद्धरे |<br>रात्रौ महोत्सवः कार्यः शिवाग्रे गीतनर्तनैः || | ||
'''१०२३''' प्रभाते तु समुत्पन्ने पवित्रं पूर्ववद्धरे |<br> | '''१०२३''' प्रभाते तु समुत्पन्ने पवित्रं पूर्ववद्धरे |<br>अवतार्य धारयेद् यत्नात् ततो देवं विसर्जयेत् || | ||
'''१०२४''' नित्यकर्मोत्तरं शक्र चण्डनाथं प्रपूजयेत् |<br> | '''१०२४''' नित्यकर्मोत्तरं शक्र चण्डनाथं प्रपूजयेत् |<br>पूर्ववन् मन्त्रविन्यासं गन्धधूपस्रगादिभिः || | ||
'''१०२५''' समारोप्य पवित्रन्तु तन्मन्त्रेणैव देशिकः |<br> | '''१०२५''' समारोप्य पवित्रन्तु तन्मन्त्रेणैव देशिकः |<br>शिवस्य पुष्पधूपादि निर्माल्यं स पवित्रकम् || | ||
'''१०२६''' अर्पयेच्चण्डनाथस्य क्षमस्वेति वदेत् ततः |<br> | '''१०२६''' अर्पयेच्चण्डनाथस्य क्षमस्वेति वदेत् ततः |<br>प्रत्यहम्पूजयेद्यस्तु न स पापैः प्रलिप्यते || | ||
'''१०२७''' हीनम्वाप्यधिकम्वापि यन्मया मोहतः कृतम् |<br> | '''१०२७''' हीनम्वाप्यधिकम्वापि यन्मया मोहतः कृतम् |<br>सर्वन्तदस्तु सम्पूर्णं चण्डनाथतवाज्ञया || | ||
'''१०२८''' निर्माल्यमपनीयाथ भूमिं संशोध्य यत्नतः |<br> | '''१०२८''' निर्माल्यमपनीयाथ भूमिं संशोध्य यत्नतः |<br>नद्यां नद ह्रदादौ च निर्माल्यं प्रक्षिपेत् ततः || | ||
'''१०२९''' नदी सरः समुद्रेषु अन्धकूपनदी ह्रदे |<br> | '''१०२९''' नदी सरः समुद्रेषु अन्धकूपनदी ह्रदे |<br>पञ्चस्थाने ष्वदुष्टं स्यात् सर्वत्रान्यत्र दुष्यति || | ||
'''१०३०''' न गन्तव्यं सहस्राक्ष पवित्रे त्वविसर्जिते |<br> | '''१०३०''' न गन्तव्यं सहस्राक्ष पवित्रे त्वविसर्जिते |<br>विसर्जिते तु गन्तव्यं स्वेच्छम्वै यत्र रोचयेत् || | ||
'''Sühne, Reinheit und Lebensführung''' | '''Sühne, Reinheit und Lebensführung''' | ||
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[[Datei:Samsara 2.jpg|thumb|Vergänglichkeit und religiöse Lebensführung.]] | [[Datei:Samsara 2.jpg|thumb|Vergänglichkeit und religiöse Lebensführung.]] | ||
'''१०३१''' प्रायश्चित्तम्प्रवक्ष्यामि साम्प्रतन्तु शचीपते |<br> | '''१०३१''' प्रायश्चित्तम्प्रवक्ष्यामि साम्प्रतन्तु शचीपते |<br>दोषव्यपोहनार्थाय धर्मस्य स्थितये पुनः || | ||
'''१०३२''' मोहादज्ञानतो वापि अप्रसुप्ते जनार्दने |<br> | '''१०३२''' मोहादज्ञानतो वापि अप्रसुप्ते जनार्दने |<br>पवित्रं कारयेद् यस्तु स पापी पापमोहितः || | ||
'''१०३३''' पञ्चदिनमनाहारो जप्त्वा पञ्चायुतं हरे |<br> | '''१०३३''' पञ्चदिनमनाहारो जप्त्वा पञ्चायुतं हरे |<br>शुद्धिमेवं समभ्येति नान्यथा तु कदाचन || | ||
'''१०३४''' भाद्रादूर्द्धं न कुर्वीत सिद्धान्ते दोषभाग् भवेत् |<br> | '''१०३४''' भाद्रादूर्द्धं न कुर्वीत सिद्धान्ते दोषभाग् भवेत् |<br>लक्षद्वयमघोरेण जप्त्वा चैव विशुद्ध्यति || | ||
'''१०३५''' दैवादज्ञानतो वापि नाषाढादि त्रये कृतम् |<br> | '''१०३५''' दैवादज्ञानतो वापि नाषाढादि त्रये कृतम् |<br>तत्राप्येवं विनिर्देश्यं प्रायश्चित्तं पुरन्दर || | ||
'''१०३६''' सुशास्त्रे वर्तनन्नित्यं समयाचार पालनम् |<br> | '''१०३६''' सुशास्त्रे वर्तनन्नित्यं समयाचार पालनम् |<br>सुपरीक्ष्य प्रकर्तव्यं निषिद्धाचार वर्जनम् || | ||
'''१०३७''' यथाश्रुतं यथा दृष्टन्निवद्धं गुरुभिर्यथा |<br> | '''१०३७''' यथाश्रुतं यथा दृष्टन्निवद्धं गुरुभिर्यथा |<br>स्वसिद्धान्ता विरोधेन तद्विलंघ्य विलङ्घनम् || | ||
'''१०३८''' सकृत्सन्ध्या विलोपे तु अजातस्य शतन्जपेत् |<br> | '''१०३८''' सकृत्सन्ध्या विलोपे तु अजातस्य शतन्जपेत् |<br>त्रिकाललोपात्त्रिगुणं सोपवासं स कामतः || | ||
'''१०३९''' एककालार्चने लुप्ते सहस्रं दक्षिणञ्जपेत् |<br> | '''१०३९''' एककालार्चने लुप्ते सहस्रं दक्षिणञ्जपेत् |<br>एककालं द्विकालम्वा त्रिकालं सार्द्धरात्रिकम् || | ||
'''१०४०''' उपवास समोपेतं कर्मलोपे कृते सति |<br> | '''१०४०''' उपवास समोपेतं कर्मलोपे कृते सति |<br>देवार्थे चैव गुर्वर्थे काललोपेन दोषभाक् || | ||
'''१०४१''' शास्त्रनिन्दा गुरोर्निन्दा लिङ्गादीनां यत्र वर्तते |<br> | '''१०४१''' शास्त्रनिन्दा गुरोर्निन्दा लिङ्गादीनां यत्र वर्तते |<br>तस्मात् स्थानाद् व्रजेद् दूरं सद्योजातं शतञ्जपेत् || | ||
'''१०४२''' महापातकसंयुक्ता ये चान्ये पापकर्मिणः |<br> | '''१०४२''' महापातकसंयुक्ता ये चान्ये पापकर्मिणः |<br>पतिताश्चाभि शप्ताश्च ते तु वर्ज्याः प्रयत्नतः || | ||
'''१०४३''' अज्ञानात् सङ्गतिं कृत्वा दक्षिणस्या युतञ्जपेत् |<br> | '''१०४३''' अज्ञानात् सङ्गतिं कृत्वा दक्षिणस्या युतञ्जपेत् |<br>न लङ्घयेद् गुरोश्छायां न शिवस्य न लिङ्गिनाम् || | ||
'''१०४४''' त्रिशतं रूपिणा जप्त्वा गोकन्या स द्विजे शतम् |<br> | '''१०४४''' त्रिशतं रूपिणा जप्त्वा गोकन्या स द्विजे शतम् |<br>सहस्राल्लुठिते लिङ्गे वर्तिते द्विगुणाच्छुचिः || | ||
'''१०४५''' अयुतं त्रिचतुर्लुठिते च्युते श्वभ्रे दशायुतान् |<br> | '''१०४५''' अयुतं त्रिचतुर्लुठिते च्युते श्वभ्रे दशायुतान् |<br>गड्डूकाद्यभिघाते च द्व्ययुताल्लद्यूतद्दलात् || | ||
'''१०४६''' स्तुत्यादौ श्लेष्म संस्पर्शे दक्षिणस्या युत त्रयात् |<br> | '''१०४६''' स्तुत्यादौ श्लेष्म संस्पर्शे दक्षिणस्या युत त्रयात् |<br>इष्टलिङ्गे हृतेनष्टे वह्निलीढे प्रमादतः || | ||
'''१०४७''' जप्त्वा लक्षमघोरेण तद्रूपस्थापनाच्छुचिः |<br> | '''१०४७''' जप्त्वा लक्षमघोरेण तद्रूपस्थापनाच्छुचिः |<br>साधारे पतिते लिङ्गे ताले ताले युतञ्जपेत् || | ||
'''१०४८''' निराधारे तु द्विगुणं कल्प्यं न्यूनाधिकन्ततः |<br> | '''१०४८''' निराधारे तु द्विगुणं कल्प्यं न्यूनाधिकन्ततः |<br>अक्षसूत्रापराधे तु उक्तपादञ्चरेद् बुधः || | ||
'''१०४९''' अविसर्जित पात्रे तु भङ्गे वाथ विवर्तिते |<br> | '''१०४९''' अविसर्जित पात्रे तु भङ्गे वाथ विवर्तिते |<br>शतद्वयात् सहस्रान्ते तदर्द्धात् क्रमतः शुचिः || | ||
'''१०५०''' द्विगुणं स्थण्डिले प्राहुः प्रायश्चित्तम्मखाधिप |<br> | '''१०५०''' द्विगुणं स्थण्डिले प्राहुः प्रायश्चित्तम्मखाधिप |<br>निर्वाणे स शिवे वह्नौ त्रिरात्र समुपोषितः || | ||
'''१०५१''' अयुतं रूपिणां जप्त्वा शुद्धिमिच्छन्त्य संशयः |<br> | '''१०५१''' अयुतं रूपिणां जप्त्वा शुद्धिमिच्छन्त्य संशयः |<br>रक्षितेपि हि निर्वाणे अहोरात्रमुपोषितः || | ||
'''१०५२''' सहस्रं वहुरूपेण जप्त्वा शुद्ध्यति साधकः |<br> | '''१०५२''' सहस्रं वहुरूपेण जप्त्वा शुद्ध्यति साधकः |<br>पूर्वाह्णं चैव मध्याह्नं समाप्य स्थितये तनौ || | ||
'''१०५३''' चरेन्माधुकरीं भिक्षां भुक्ति मुक्ति समीहकः |<br> | '''१०५३''' चरेन्माधुकरीं भिक्षां भुक्ति मुक्ति समीहकः |<br>भिक्षां याचयित्वा तु किञ्चित् स्थित्वान्यतो व्रजेत् || | ||
'''१०५४''' अनिवर्तितं भ्रमेद् भिक्षां ज्ञात्वा वृत्तञ्च वर्णिनाम् |<br> | '''१०५४''' अनिवर्तितं भ्रमेद् भिक्षां ज्ञात्वा वृत्तञ्च वर्णिनाम् |<br>स्थितिं बुद्धाश्रमङ्गच्छेच्छुचि स्थाने निधाय च || | ||
'''१०५५''' मृद्भिः संशोध्य चरणौ करौ क्षाल्या चमेत्ततः |<br> | '''१०५५''' मृद्भिः संशोध्य चरणौ करौ क्षाल्या चमेत्ततः |<br>भस्मस्नानन्ततः कृत्वा मन्त्रकायोद्य कृत् स्मरन् || | ||
'''१०५६''' अस्त्रं दीप्तोक्तया प्लाव्य प्रोक्ष्यतां त्रिर्विभज्य च |<br> | '''१०५६''' अस्त्रं दीप्तोक्तया प्लाव्य प्रोक्ष्यतां त्रिर्विभज्य च |<br>शिवाय गुरुवे दत्वा भुञ्जीत विधिपूर्वकम् || | ||
'''१०५७''' आचान्तः पूर्ववत् स्नातः स्मृत्वानत्वा शिवं गुरूम् |<br> | '''१०५७''' आचान्तः पूर्ववत् स्नातः स्मृत्वानत्वा शिवं गुरूम् |<br>अयाचितैः स्थितिं कुर्यात् स्वधनैर्वा क्रमागतैः || | ||
'''१०५८''' स्वजाति दीक्षितैः स्पृष्टः स्नात्वा चम्य शतञ्जपेत् |<br> | '''१०५८''' स्वजाति दीक्षितैः स्पृष्टः स्नात्वा चम्य शतञ्जपेत् |<br>तस्मिन् न दीक्षिते स्पृष्टे स्नात्वा चम्य शतद्वयम् || | ||
'''१०५९''' समीप दीक्षिते स्पृष्टे स्नात्वा चम्य शतद्वयम् |<br> | '''१०५९''' समीप दीक्षिते स्पृष्टे स्नात्वा चम्य शतद्वयम् |<br>तस्मिन् न दीक्षिते स्पृष्टे सोप वासो जपो मतः || | ||
'''१०६०''' एवं बुद्ध्वा प्रकर्तव्यमितरैः पादवर्जितम् |<br> | '''१०६०''' एवं बुद्ध्वा प्रकर्तव्यमितरैः पादवर्जितम् |<br>पुरुषाघोर वामाजा जातीशा ब्राह्मणादितः || | ||
'''१०६१''' त्रिरात्रमन्त्यज स्पर्शादं घोरस्या युताच्छुचिः |<br> | '''१०६१''' त्रिरात्रमन्त्यज स्पर्शादं घोरस्या युताच्छुचिः |<br>स कृच्छ्रं त्र्ययुतं शक्रचण्डाल स्पर्शने दिशेत् || | ||
'''१०६२''' ज्ञात्वा न्यत्र प्रकर्तव्यं प्रायश्चित्तं सुराधिप |<br> | '''१०६२''' ज्ञात्वा न्यत्र प्रकर्तव्यं प्रायश्चित्तं सुराधिप |<br>अन्नाघ्रं मदिरा स्पृष्टं यदि भुङ्क्तेत्व कामतः || | ||
'''१०६३''' विण्मूत्र रेतसा दुष्टं लीढं वा काककुक्कुरैः |<br> | '''१०६३''' विण्मूत्र रेतसा दुष्टं लीढं वा काककुक्कुरैः |<br>कपि ग्राह शिवादक्षैर्विड्वराहैश्च दूषितम् || | ||
'''१०६४''' शूद्रादुच्छिष्टसंपृक्तं पृष्टं वा त्वन्त जातिभिः |<br> | '''१०६४''' शूद्रादुच्छिष्टसंपृक्तं पृष्टं वा त्वन्त जातिभिः |<br>कृत्वा स्नानन्निराहारः पञ्चगव्यं समाचरेत् || | ||
'''१०६५''' प्रतिसन्ध्यं सहस्रन्तु जपेदघोरं समाहितः |<br> | '''१०६५''' प्रतिसन्ध्यं सहस्रन्तु जपेदघोरं समाहितः |<br>त्रिदिनन्नक्तभोजी स्यात् त्रिःस्नायी ध्यान तत्परः || | ||
'''१०६६''' देवमिष्ट्वा चतुर्थेह्नि सहस्रं होमयेत् ततः |<br> | '''१०६६''' देवमिष्ट्वा चतुर्थेह्नि सहस्रं होमयेत् ततः |<br>उपवासस्तथा नक्तं पञ्चगव्यं विशुद्धये || | ||
'''१०६७''' क्षत्रिये ध्यान निष्ठे तु शुद्धिमेवं विनिर्दिशेत् |<br> | '''१०६७''' क्षत्रिये ध्यान निष्ठे तु शुद्धिमेवं विनिर्दिशेत् |<br>त्रिकालात् प्लवनं वैश्य सकृच्छूद्रे विनिर्दिशेत् || | ||
'''१०६८''' अकामाद् द्विगुणं कामात् सर्वेषां परिकीर्तितम् |<br> | '''१०६८''' अकामाद् द्विगुणं कामात् सर्वेषां परिकीर्तितम् |<br>गृञ्जनालावुलशुनं पलाण्डुकवकानि च || | ||
'''१०६९''' अमेद्ध्योद्भवमांसं भुक्ता स्यान् निरसनस्त्र्यहम् |<br> | '''१०६९''' अमेद्ध्योद्भवमांसं भुक्ता स्यान् निरसनस्त्र्यहम् |<br>मत्स्यकण्टक साम्वूक नखञ्चैव कपर्दिका || | ||
'''१०७०''' पीत्वा नवोदकं मन्त्री पञ्चगव्योप वासकम् |<br> | '''१०७०''' पीत्वा नवोदकं मन्त्री पञ्चगव्योप वासकम् |<br>कृमिकीटाभिसंपृक्तं भुक्ता कान्तेन शुद्ध्यति || | ||
'''१०७१''' मक्षिका कीटकेशैस्तु दुष्टं त्यक्ताल्प मोदनम् |<br> | '''१०७१''' मक्षिका कीटकेशैस्तु दुष्टं त्यक्ताल्प मोदनम् |<br>भस्म संस्पृश्य संप्रोक्ष्य शेषं भोज्यन्न दुष्यति || | ||
'''१०७२''' पीतशेषन्तु यत्तोयं प्रमादाद्यदि तत् पिवेत् |<br> | '''१०७२''' पीतशेषन्तु यत्तोयं प्रमादाद्यदि तत् पिवेत् |<br>उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुद्ध्यति || | ||
'''१०७३''' पिवन्तोयं पतत्पन्ने तदन्नं योन्ति मोहितः |<br> | '''१०७३''' पिवन्तोयं पतत्पन्ने तदन्नं योन्ति मोहितः |<br>सहस्रं रूपिणी जप्त्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति || | ||
'''१०७४''' भुञ्जानस्य गुदस्रावे उच्छिष्टस्येन्द्रिय शुर्ते |<br> | '''१०७४''' भुञ्जानस्य गुदस्रावे उच्छिष्टस्येन्द्रिय शुर्ते |<br>आदौ शौचन्ततः स्नानमाचान्तः पुनराचमेत् || | ||
'''१०७५''' सहस्रं रूपिणा जप्त्वा सोप वासो विशुद्ध्यति |<br> | '''१०७५''' सहस्रं रूपिणा जप्त्वा सोप वासो विशुद्ध्यति |<br>अनाचान्तः पिवेत् तोयं भक्षयेद् वाथ मूत्रयेत् || | ||
'''१०७६''' अजप्त्वाघोरं विनाहारः पञ्चगव्येन शुद्ध्यति |<br> | '''१०७६''' अजप्त्वाघोरं विनाहारः पञ्चगव्येन शुद्ध्यति |<br>अधोच्छिष्टो यदा मन्त्री विष्टामद्यादि नाहतः || | ||
'''१०७७''' स्नात्वो पोष्य जपेद् घोरं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति |<br> | '''१०७७''' स्नात्वो पोष्य जपेद् घोरं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति |<br>विना यज्ञोपवीतेन पिवति भुङ्क्ते यदा नरः || | ||
'''१०७८''' पञ्चगव्य निराहारो जप्त्वा घोरं विशुद्ध्यति |<br> | '''१०७८''' पञ्चगव्य निराहारो जप्त्वा घोरं विशुद्ध्यति |<br>उच्छिष्टस्तु यदा स्पृष्ट उच्छिष्टैर्वेणुकादिभिः || | ||
'''१०७९''' स्नानं शौच निराहारः पञ्चगव्य जपाच्छुचिः |<br> | '''१०७९''' स्नानं शौच निराहारः पञ्चगव्य जपाच्छुचिः |<br>घोषार्करुक्मरौप्याणां वङ्गसीसकयोरपि || | ||
'''१०८०''' भस्माम्लवारिणा शुद्धिर्निर्लयं स्याद् यदा हरे |<br> | '''१०८०''' भस्माम्लवारिणा शुद्धिर्निर्लयं स्याद् यदा हरे |<br>शङ्खशाम्वूक शुक्तीनां तेजसवच्छुद्धिरिष्यते || | ||
'''१०८१''' क्वथितं शुद्ध्यते क्षीरं दधि शुद्धिर्निगद्यते |<br> | '''१०८१''' क्वथितं शुद्ध्यते क्षीरं दधि शुद्धिर्निगद्यते |<br>दधिपात्रान्तरे धृत्वा वीक्षयेत् तदनन्तरम् || | ||
'''१०८२''' अन्नादि लेपनिर्मुक्तं प्रोक्षणाच्छुद्ध्यते दधि |<br> | '''१०८२''' अन्नादि लेपनिर्मुक्तं प्रोक्षणाच्छुद्ध्यते दधि |<br>सुतप्तस्य श्रुतस्याथ शुद्धिराज्यस्य कीर्तिता || | ||
'''१०८३''' एवम्मधुगुडादीनाम् प्रोक्षणादग्नि योगतः |<br> | '''१०८३''' एवम्मधुगुडादीनाम् प्रोक्षणादग्नि योगतः |<br>स तृणा चैव स क्षोदा सोच्छिष्टा तु स लेपिका || | ||
'''१०८४''' सतृणा प्रोक्षणाच्छुद्धा सक्षोदामार्जनाधिका |<br> | '''१०८४''' सतृणा प्रोक्षणाच्छुद्धा सक्षोदामार्जनाधिका |<br>सोच्छिष्टा गोमयोद्वृष्टा पूर्वसंस्कार शोधिता || | ||
'''१०८५''' स लेपान्तक्षितां कृत्वा घृष्ट्वा गोमय वारिणा |<br> | '''१०८५''' स लेपान्तक्षितां कृत्वा घृष्ट्वा गोमय वारिणा |<br>मार्जयेत् प्रोक्षयेत् पश्चाद् भूमि शुद्धिरुदाहृता || | ||
'''१०८६''' अन्यच्छुद्ध्यन्तरं वक्ष्ये समासात् पाकशासन |<br> | '''१०८६''' अन्यच्छुद्ध्यन्तरं वक्ष्ये समासात् पाकशासन |<br>सुस्नातश्च समाचन्तः शुद्धवासाः शुचिः पुमान् || | ||
'''१०८७''' पितृदेवोपयुक्तानाम् प्रत्यहं शौचमिष्यते |<br> | '''१०८७''' पितृदेवोपयुक्तानाम् प्रत्यहं शौचमिष्यते |<br>त्यागे परिधान वस्त्राणां प्रावरणस्य मलागमे || | ||
'''१०८८''' रजक क्षालितं वस्त्रं पुनर्द्धौतं विशुद्ध्यति |<br> | '''१०८८''' रजक क्षालितं वस्त्रं पुनर्द्धौतं विशुद्ध्यति |<br>वर्मणां रज्जु वस्त्राणां शुद्धिः स्यात् क्षार वारिणा || | ||
'''१०८९''' कौशेयाविकयोरुषैः क्षौमाणां गौरसर्षपैः |<br> | '''१०८९''' कौशेयाविकयोरुषैः क्षौमाणां गौरसर्षपैः |<br>श्रीफलैरंशु पट्टानां कुतपानामरिष्टकैः || | ||
'''१०९०''' तृणकाष्ठादिकं सर्वं प्रोक्षणाच्छुद्धिमेति हि |<br> | '''१०९०''' तृणकाष्ठादिकं सर्वं प्रोक्षणाच्छुद्धिमेति हि |<br>शुद्धानां संहतानान्तु प्रोक्षणाच्छुद्धिरिष्यते || | ||
'''१०९१''' संहतानां वहूनान्तु यद्यल्लेपेन दूषितम् |<br> | '''१०९१''' संहतानां वहूनान्तु यद्यल्लेपेन दूषितम् |<br>तत्तत्त्यक्ता तृणादीनां शोधयेत् स्याद् यथा शुचिः || | ||
'''१०९२''' कारूहस्ताकरं द्रव्यं शुद्धं पुण्यं प्रसारितम् |<br> | '''१०९२''' कारूहस्ताकरं द्रव्यं शुद्धं पुण्यं प्रसारितम् |<br>फलानां क्षालनाच्छुद्धिर्विनादोषं पुरन्दर || | ||
'''१०९३''' दशाहाच्छुद्ध्यते विप्रो द्वादशाहेन भूमिपः |<br> | '''१०९३''' दशाहाच्छुद्ध्यते विप्रो द्वादशाहेन भूमिपः |<br>वैश्यः पञ्चदशाहेन शुद्धिः शूद्रस्य मासिका || | ||
'''१०९४''' अनुष्ठान विहीनानां याति मात्रात् पुरन्दर |<br> | '''१०९४''' अनुष्ठान विहीनानां याति मात्रात् पुरन्दर |<br>वेदवेदाङ्ग सम्पन्नस्त्वाहिताग्निस्तु स द्विजः || | ||
'''१०९५''' शुद्ध्यते तत्क्षणात् स्नानाज्ज्ञात्वान्यत्र प्रकल्पयेत् |<br> | '''१०९५''' शुद्ध्यते तत्क्षणात् स्नानाज्ज्ञात्वान्यत्र प्रकल्पयेत् |<br>अमद्यपाः कुलीनाश्च नित्यं धर्मपरायणाः || | ||
'''१०९६''' शूद्राः शुद्ध्यन्ति पक्षेण नात्र कार्या विचारणा |<br> | '''१०९६''' शूद्राः शुद्ध्यन्ति पक्षेण नात्र कार्या विचारणा |<br>उद्वाहिताश्च तस्रो वै ब्राह्मणेन यदास्त्रियः || | ||
'''१०९७''' सूतकन्तु क्रमात् तासां दशषट् द्व्येक वासरम् |<br> | '''१०९७''' सूतकन्तु क्रमात् तासां दशषट् द्व्येक वासरम् |<br>शवेन शुद्ध्यते वृद्धिर्न वृद्ध्या शुद्ध्यते शवः || | ||
'''१०९८''' सर्वेषां वृद्धि वद्धानौ प्रवेश्यां नास्ति सूतकम् |<br> | '''१०९८''' सर्वेषां वृद्धि वद्धानौ प्रवेश्यां नास्ति सूतकम् |<br>नृपाणां कारुकाणाञ्च दासीनाञ्च सूतकम् || | ||
'''१०९९''' मृतके तु पृथक् पाकं कुर्याद् योगं नतैः सह |<br> | '''१०९९''' मृतके तु पृथक् पाकं कुर्याद् योगं नतैः सह |<br>त्यक्तुं न चेदसौ याति तदा शुद्धिर्भवे त्र्यहात् || | ||
'''११००''' संसनात् पूर्ण गर्भस्य स्नाना देव विशुद्ध्यति |<br> | '''११००''' संसनात् पूर्ण गर्भस्य स्नाना देव विशुद्ध्यति |<br>जीवन्यातो यदि श्रेयान् मृतो वा जायते यदि || | ||
'''११०१''' शावाशौचं न कर्तव्यं सूतीशौचं समारभेत् |<br> | '''११०१''' शावाशौचं न कर्तव्यं सूतीशौचं समारभेत् |<br>आनामकरणात् सद्य एकाहो दन्त जन्मनः || | ||
'''११०२''' चूडायास्त्रिदिनम्प्रोक्तं तत्राग्न्यधिकमव्रतात् |<br> | '''११०२''' चूडायास्त्रिदिनम्प्रोक्तं तत्राग्न्यधिकमव्रतात् |<br>अतोर्द्ध्वं पूर्वच्छुद्धिः सर्ववर्णेष्वियं स्थितिः || | ||
'''११०३''' अहस्त्वदन्त कन्याया दन्ताया द्विदिनम् भवेत् |<br> | '''११०३''' अहस्त्वदन्त कन्याया दन्ताया द्विदिनम् भवेत् |<br>खभ्रादिषु च विज्ञेयं मातुलान् पाञ्च मातुले || | ||
'''११०४''' देशान्तरे पृथक् पिण्डे स्नानं स्यात् तद्गुरुम्विना |<br> | '''११०४''' देशान्तरे पृथक् पिण्डे स्नानं स्यात् तद्गुरुम्विना |<br>पशुत्वं संस्कृतं येषां सम्यग् निर्वाण दीक्षया || | ||
'''११०५''' तस्य सम्पर्क शून्यस्य न स्यातां मृतसूतके |<br> | '''११०५''' तस्य सम्पर्क शून्यस्य न स्यातां मृतसूतके |<br>अतश्च परतो देवः सम्पूज्यः सूतके सति || | ||
'''११०६''' परान्नभोजना नित्यं परान्नद्रविण क्रियः |<br> | '''११०६''' परान्नभोजना नित्यं परान्नद्रविण क्रियः |<br>गृहस्थः सर्वकर्माणि नित्यादन्यानि वर्जयेत् || | ||
'''११०७''' द्रव्यैः सङ्कल्पितैः पूर्वं सूतकान् मृतकादपि |<br> | '''११०७''' द्रव्यैः सङ्कल्पितैः पूर्वं सूतकान् मृतकादपि |<br>धर्मार्थ दीक्षितैः पूजा कार्या चोत्पादितैस्तथा || | ||
'''११०८''' पृथक्पाकं विनापुंभिर्लोकदीक्षानुसारिभिः |<br> | '''११०८''' पृथक्पाकं विनापुंभिर्लोकदीक्षानुसारिभिः |<br>अन्तर्यागः प्रकर्तव्यो जपः स्नानादिकाः क्रियाः || | ||
'''११०९''' प्रायश्चित्तं समादेश्यमन्यथा निश्चिता स्थितिम् |<br> | '''११०९''' प्रायश्चित्तं समादेश्यमन्यथा निश्चिता स्थितिम् |<br>एवं हि वर्त्तमानस्य त्रिधा सिद्धिर्न दूरतः || | ||
'''१११०''' दुःस्वप्न दर्शने स्नानं रेतोत्सर्गे शतक्रतो |<br> | '''१११०''' दुःस्वप्न दर्शने स्नानं रेतोत्सर्गे शतक्रतो |<br>अघोराष्ट शतञ्जाप्यन्तथा संभाष्य चाधमम् || | ||
'''११११''' अद्भिः संशुद्ध्यते गात्रं सलेपन्तन्मृदाम्बुभिः |<br> | '''११११''' अद्भिः संशुद्ध्यते गात्रं सलेपन्तन्मृदाम्बुभिः |<br>देवचण्डगुरोर्द्रव्यं भक्षितं यद्य कामतः || | ||
'''१११२''' लक्षपादन्तदादेयाद् द्विगुणन्नैष्ठिके मतम् |<br> | '''१११२''' लक्षपादन्तदादेयाद् द्विगुणन्नैष्ठिके मतम् |<br>अथाक्रम्य तु निर्माल्यञ्जपेत् पञ्चशतानि तु || | ||
'''१११३''' त्रिगुणङ्कामतो ज्ञेयं पञ्चगव्यसमन्वितम् |<br> | '''१११३''' त्रिगुणङ्कामतो ज्ञेयं पञ्चगव्यसमन्वितम् |<br>यन्निर्माल्ये न संस्पृष्टन्तदाहारोपजीविना || | ||
'''१११४''' अष्टांशोनन्तु निर्माल्यं दानलङ्घन भक्षणात् |<br> | '''१११४''' अष्टांशोनन्तु निर्माल्यं दानलङ्घन भक्षणात् |<br>लङ्घयेद् यस्तु निर्माल्यं दद्याद ज्ञानतोपि वा || | ||
'''१११५''' गुणायुतञ्जपेद् घोरं तथा पोष्य विशुद्ध्यति |<br> | '''१११५''' गुणायुतञ्जपेद् घोरं तथा पोष्य विशुद्ध्यति |<br>निर्माल्य स्पर्शने त्याज्यं पुण्यद्रव्यन्तथौषधम् || | ||
'''१११६''' स विकारं पयस्तोयन्तथेक्षु हिङ्गुजीरकम् |<br> | '''१११६''' स विकारं पयस्तोयन्तथेक्षु हिङ्गुजीरकम् |<br>सैन्धवाद्यं स कर्पूरं कटुकाद्यं स तण्डुलम् || | ||
'''१११७''' घृष्टं स चन्दनं भस्म वेणुमृण्मय दारवम् |<br> | '''१११७''' घृष्टं स चन्दनं भस्म वेणुमृण्मय दारवम् |<br>सर्वं त्याज्य समुद्दिष्टं धान्याद्यं प्रोक्षितं शुचि || | ||
'''१११८''' एवमन्यत्र वोद्धव्यं ज्ञात्वा द्रव्य वलावलम् |<br> | '''१११८''' एवमन्यत्र वोद्धव्यं ज्ञात्वा द्रव्य वलावलम् |<br>शोधयेत् सर्वदा धीमान शुद्धे वन्धनं ध्रुवम् || | ||
'''१११९''' हुतं यस्यापवर्गेच्छा स शुद्धौ कृत निश्चयः |<br> | '''१११९''' हुतं यस्यापवर्गेच्छा स शुद्धौ कृत निश्चयः |<br>शुद्धि निष्ठ प्रतिष्ठस्य सिद्धिमुक्ती न दूरतः || | ||
'''Rücksicht auf die Kräfte des Menschen''' | '''Rücksicht auf die Kräfte des Menschen''' | ||
'''११२०''' अशीतिर्यस्य वर्षाणि वालो वाप्यू न षोडशः |<br> | '''११२०''' अशीतिर्यस्य वर्षाणि वालो वाप्यू न षोडशः |<br>प्रायश्चित्तार्द्धमर्हन्ति स्त्रियो व्याध्यादि पीडिताः || | ||
'''११२१''' तत्रापि च परिक्लेशं ज्ञात्वार्द्धार्द्धम् प्रकल्पयेत् |<br> | '''११२१''' तत्रापि च परिक्लेशं ज्ञात्वार्द्धार्द्धम् प्रकल्पयेत् |<br>सुदुष्करं स्वयङ्कर्तुमक्षमाद् द्विगुणोन्यतः || | ||
'''११२२''' दशोर्द्धं त्रिशतं यावज्जपात् स्नानेन शुद्ध्यति |<br> | '''११२२''' दशोर्द्धं त्रिशतं यावज्जपात् स्नानेन शुद्ध्यति |<br>स नक्तम्पञ्चमं यावत् सोपवासन्तदूर्द्ध्वतः || | ||
'''११२३''' तत्त्रिधायुत सञ्जापे तद्वृद्ध्याद्विगुणन्ततः |<br> | '''११२३''' तत्त्रिधायुत सञ्जापे तद्वृद्ध्याद्विगुणन्ततः |<br>तदर्द्धेन तु संयोगी तस्याप्यर्द्धन्तु शङ्करे || | ||
'''११२४''' देशं कालं वयः शक्तिञ्जाति भक्तिङ्क्रियाक्रमम् |<br> | '''११२४''' देशं कालं वयः शक्तिञ्जाति भक्तिङ्क्रियाक्रमम् |<br>सुविचार्य प्रदातव्यं नोपवासोरुगन्विते || | ||
'''११२५''' शिवार्पितैक चित्तानां सुवृत्तानाम् पुरन्दर |<br> | '''११२५''' शिवार्पितैक चित्तानां सुवृत्तानाम् पुरन्दर |<br>प्रायश्चित्तं समाख्यातं नोकुवृत्ति स्थितात्मनाम् || | ||
'''Abschluss der Unterweisung''' | '''Abschluss der Unterweisung''' | ||
'''११२६''' सप्तकोटि प्रविस्तीर्णान् मोहचूरान्मया तव |<br> | '''११२६''' सप्तकोटि प्रविस्तीर्णान् मोहचूरान्मया तव |<br>व्याख्यातं सारमादाय लक्षग्रन्थेन सुव्रत || | ||
'''११२७''' पुनः पृष्टः समासेन त्वयाहं सुरनायक |<br> | '''११२७''' पुनः पृष्टः समासेन त्वयाहं सुरनायक |<br>तदाख्यातन्तदर्द्धेन मोहचूरम्मयाहरे || | ||
'''११२८''' सिद्धिसारसहस्रैस्तु युग्मचन्द्रैस्तदन्ततः |<br> | '''११२८''' सिद्धिसारसहस्रैस्तु युग्मचन्द्रैस्तदन्ततः |<br>योगज्ञानादि संयुक्तं व्याख्यातं शास्त्रमुत्तमम् || | ||
'''११२९''' सुसंक्षेपं सुगम्भीरम् प्रतिष्ठा तन्त्रमुत्तमम् |<br> | '''११२९''' सुसंक्षेपं सुगम्भीरम् प्रतिष्ठा तन्त्रमुत्तमम् |<br>चतुर्गोचर सम्बद्धं भूयः ख्यातन्तदन्तरम् || | ||
'''११३०''' न देयं दुष्टसत्वानां निन्दातर्कानु वर्तिनाम् |<br> | '''११३०''' न देयं दुष्टसत्वानां निन्दातर्कानु वर्तिनाम् |<br>गुरुदेव द्विषां शक्र देशिकादि द्विषान्तथा || | ||
'''११३१''' एते चान्ये च ये केचिद् दुष्टसत्वाः पुरन्दर |<br> | '''११३१''' एते चान्ये च ये केचिद् दुष्टसत्वाः पुरन्दर |<br>तेषां शास्त्रं सदारक्ष्यम् प्रायश्चित्तमतो न्यथा || | ||
'''११३२''' गुरुदेवाग्नि भक्ताय श्रद्दधानाय सुव्रत |<br> | '''११३२''' गुरुदेवाग्नि भक्ताय श्रद्दधानाय सुव्रत |<br>तस्मै देयमिदं शास्त्रमित्याह भगवाञ्छिवः || | ||
'''११३३''' इत्याग्ने ये महातन्त्रे प्रतिष्ठा तन्त्रं मोहचूडोत्तरम् |<br> | '''११३३''' इत्याग्ने ये महातन्त्रे प्रतिष्ठा तन्त्रं मोहचूडोत्तरम् |<br>सम्पूर्णम् || शुभम् || शिवम्भूयात् || | ||
'''Abschreibervermerk''' | '''Abschreibervermerk''' | ||
Aktuelle Version vom 16. September 2026, 10:58 Uhr
Mohacurottara Sanskrit Devanagari (मोहचूरोत्तर, auch मोहचूडोत्तर) erschließt eine shaivische Lehre, in der äußere Verehrung und innere Sammlung einander durchdringen. Lingam und Tempel werden zu Orten der Gegenwart Shivas; Shakti erscheint als tragende und wirkende Kraft. Der Sanskritwortlaut verbindet diese spirituelle Sicht mit ausführlichen Anweisungen zu Gestaltung, Weihe und Mantra.
Der vorhandene Bestand reicht vom Eingangsdialog bis zum Schlussvermerk, ist aber stellenweise lückenhaft und sprachlich beschädigt. Die Ausfälle bleiben sichtbar. Eine vollständig gesicherte Gesamtausgabe des Werkes wird damit nicht behauptet. Die deutsche Übersetzung und Einordnung stehen unter Mohacurottara, ausgewählte deutsche Textstellen unter Mohacurottara 108 Verse und Mantras.

Zum Lesen und Rezitieren
Die Zahlen entsprechen den Referenznummern des Hauptartikels; die Vorlage hat keine fortlaufenden Versnummern. Die ersten vier Kapitel sind durch ihre überlieferten Abschlüsse bezeichnet. Die späteren fett gesetzten Titel dienen der Orientierung. Sternchen und Fragezeichen gehören zu den überlieferten Unsicherheitsmarkierungen. Beschädigte Lautbeschreibungen eignen sich nicht zur selbstständigen Bildung von Mantras.
Sanskritstudium kann eine Form achtsamer Meditation begleiten: langsam lesen, die Bedeutung im Hauptartikel nachschlagen und bei einem verständlichen Abschnitt verweilen. Eine ergänzende heutige Betrachtung über Sammlung und Samadhi:
Mohacurottara – Sanskrit in Devanagari
Kapitel 1: Lingam und inneres Bewusstsein
१ ओं नमः शिवाय ||
२ स्कन्दं ब्रह्मविदं शान्तं सर्वज्ञपदसंस्थितम् |
प्रणिपत्य हरिः प्राह जानुभ्यामवनौ स्थितः ||
३ शक्र उवाच ||
४ त्वत्प्रसादात् परिज्ञातम् मोहचूडं मया प्रभो |
तत्रासूचि त्वया लिङ्गं प्रासादाश्च समासतः ||
५ समासेन यतः प्रोक्तन्तस्मान्नैवावधारितम् |
मोहचूरोत्तरं शास्त्रन्तदर्थं वक्तुमर्हसि ||
६ इति तस्य गिरं श्रुत्वा जगाद हिमजासुतः |
लिङ्गादिकं प्रवक्ष्यामि शृणु तस्माच्छतक्रतो ||
७ देवासुरनरा यक्षा मुनयो वीतमत्सराः |
लिङ्गाराधनतः सिद्धागता मुक्तिञ्च साश्वतीम् ||
८ भुक्तिमुक्तिपरिप्राप्तिकारणं वचनन्ततः |
श्रुत्वां तद्विविजिज्ञासुः साधको वक्तुमुद्यतः ||
९ किं स्वरूपं भवेल्लिङ्गं विधिभेदाश्च लिङ्गकाः |
आचार्यवनयागञ्च दारुपाषाणलक्षणं ||
१० लिङ्गलक्षणमप्यन्तं प्रतिमालक्षणन्तथा |
पिण्डिकालक्षणं ब्रूहि धरित्रीलक्षणं प्रभो ||
११ परिग्रहो यथा तस्या वास्तुलक्षणपूजने |
शिलान्यासं पीठबन्धं प्रासादानाञ्च लक्षणम् ||
१२ मण्डपानपि मे ब्रूहि स्नान द्रव्यं समासतः |
वेदीप्रमाणमुन्मानं कुण्डलक्षण संयुतम् ||
१३ एतत् सर्वं समाचक्ष्व प्रसादादम्विकात्मज |
यन्न पृष्टम् मया नाथ बुद्धिहीनान्तरात्मना ||
१४ तत्सर्वं मम गाङ्गेय प्रसादाद् वक्तुमर्हसि |
श्रीस्कन्द उवाच ||
१५ अक्ष्ममृल्लोहमुद्दारुरत्नद्रव्यादि सम्भवम् |
विधिना हृत्प्रतिष्ठं स्याल्लिङ्गं भुक्तिविमुक्तिदम् ||
१६ तत् सिद्ध्यर्थं व्रजेद् विद्वान् देशिकः शिल्पिभिः सह |
भूधरं विपिनञ्चैव पुण्यक्षेत्रमथापि वा ||
१७ चीर्णविद्याव्रतो मन्त्री ज्ञानवान् सुसमाहितः |
भस्मनिष्ठो यतिः ख्यातस्तद् विना भौतिको वरः ||
१८ सुतिथौ वारनक्षत्रेसु लग्ने करणान्विते |
अस्त्रं संस्मृत्य मेधावी वनयात्रां समारभेत् ||
१९ शिलां शुभां समासाद्य तस्याः सौम्ये यजेच्छिवम् |
हुताशनं ततो विद्वान् हरेद् भूतबलिं बहिः ||
२० असिना प्रोक्ष्य पाषाणं वर्मणा वेष्ठ्य पूजयेत् |
तेनैव प्रोक्षयेत् तत्र शिल्पिनं सुकुलोद्भवम् ||
२१ सहायानपि संप्रोक्ष्य कुठारं टङ्कमुद्गरान् |
पूजयेदस्त्र राजेन स्वपेन्मेध्यासनस्ततः ||
२२ भुक्तिमुक्तिप्रसिद्ध्यर्थं पूर्व व * सिरा गुरुः |
ध्यात्वा महेश्वरं देवं स्वप्नमन्त्रञ्जपन् बुधः ||
२३ स्वप्नमन्त्रं प्रवक्ष्यामि साम्प्रतन्ते शचीपते |
वाग्विशुद्धं महावीजं नेत्रमण्डलभेदितम् ||
२४ सीतयं भेदयेत् पश्चा * * * * पुरन्दर |
छेदनेनाहतं कुर्याद् भूतवीजं सुरेश्वर ||
२५ ब्रह्मपूर्वाहतं वीजन्निश्चलन्तदनन्तरम् |
वृकोदरयुतं भद्रं वीजं ताराधिपन्ततः ||
२६ शुद्धं पयोधरं पश्चाज्ज्योस्नान्तसृष्टियोजितम् |
अभिन्नं भीषणं साधो यकारञ्छेदनीहतम् ||
२७ स्वाहान्तः प्रणवादिश्च प्रोक्तः स्वप्नाधिपो मनुः |
सुस्वप्नं कथयेदिष्टे दुःस्वप्नेः शान्तिमाचरेत् ||
२८ प्रातः संपूज्य देवेशं शिलामाकोटयेत् त्रिधाः |
रुद्राशाद् ब्रह्मणो वापि भोगमोक्षाभिकांक्षया ||
२९ शिलां रथे समारोप्य सिद्धयात्रामुपक्रमेत् |
अनेनैव विधानेन गृह्णीयात् तत् संभवम् ||
३० अधुना कारयेल्लिङ्गं व्यक्ताव्यक्तोभयात्मकम् |
ज्येष्ठादि क्रमभेदेन कर्तुर्वित्तानुसारतः ||
Das innere und das äußere Lingam
३१ निस्कलं सकलञ्चैव तृतीयं सकलाकलम् |
लिङ्गव्यूहं समाख्यातञ्चित्तव्यूहात् पुरन्दर ||
३२ उच्छृसन्तं परन्तत्वन्न च केनापि खण्डितम् |
तल्लिङ्गं सकलं प्रोक्तं नादरूपं हृदं व्रजे ||
३३ चैतन्यं चित्तया युक्तं चित्तेनैव सहैकतः |
बोधरूपं यदा याति तदा लिङ्गं परापरम् ||
३४ बोधरूपं यदा शान्ते निस्तरङ्गे विलीयते |
तदा लिङ्गं परं प्रोक्तं मोक्षदन्तदुदाहृतम् ||
३५ एतदाभ्यन्तरं लिङ्गं वाह्यमन्यत् प्रचक्षते |
व्यक्तिस्थान तया भाक्ते तच्छन्दः संप्रवर्तते ||
३६ शिलामृद्दारुलोहोत्थं तुष्ठिग्रहरसानलैः |
ज्येष्ठज्येष्ठं करैर्लिङ्गं चतुर्द्रव्यविभेदतः ||
३७ तत् तृतीयांश सन्त्यागान् मध्यमस्योत्तमं भवेत् |
कन्यसाग्र्यं दलादस्य त्रिधा लिङ्गमुदाहृतम् ||
३८ भिद्यन्ते स्वस्वरामांसैर्नवलिङ्गं यथा भवेत् |
ज्येष्ठादिकन्यसान्तानि लिङ्गानि कथितानि ते ||
३९ नागभक्ते च लिङ्गार्द्धे रसवाणकृतैर्भवेत् |
आ * * * ? सुर ज्येष्ठविष्कम्भः सर्वतः समे ||
४० सन्त्रिभागैर्भवेद् दक्षैर्ब्रह्मांशश्चतुरस्रकः |
तत् कर्णार्द्धे तरस्यागान्मङ्गलास्त्रं शतक्रतो ||
४१ मुनित्रयेण मध्यं स्यान्ध्रासस्तु करसंख्यया |
षोडशास्त्रमथैवं स्यात् समं पश्चात् प्रवर्त्तयेत् ||
४२ लिङ्गमुक्तं शिरस्तस्य वक्षे सामान्यतो हरे |
पुण्डरीकं विशालञ्च श्रीवत्सं शत्रुमर्दकम् ||
४३ त्रपुषं कुक्कुयण्डञ्च खण्डचन्द्रं शचीपते |
इति सप्तशिरः प्रोक्तं वर्तनामधुना शृणु ||
४४ अर्चाष्टांशे युगैर्भक्ते पुण्डरीकं तनुक्षयात् |
कर्णक्षयाद् विशालञ्च श्रीवत्सङ्गुणसंक्षयात् ||
४५ कोणक्षयाद् विजानीयाच्चतुर्थं शत्रुमर्दकं |
रसभक्ते क्षपादांशसांतनान् त्रपुषाकृति ||
४६ श्रुत्यंशस्य परित्यागात् कुक्कुटाण्डम् भवेच्छिरः |
गुणभक्तेंशसन्त्यागाद् वालेन्दुः स्यात् परिस्फुटम् ||
४७ व्यक्ताव्यक्तन्तथा कुर्यादेकत्रिश्चतुरास्यकम् |
शक्तिभक्ते च रुद्राङ्गे वह्निभागादधः शिरः ||
४८ ललाटन्नासिका वक्त्रं चिवुकादि पुरन्दर |
कल्पनीयं हरे सम्यक् लिङ्गविष्कम्भवाह्यतः ||
४९ लिङ्गदैर्घ्यविकारांशं लिङ्गविस्तरवाह्यतः |
चतुरास्ये चतुर्दिक्षु निर्गमाय प्रदापयेत् ||
५० भागान् प्रकल्प्य कुर्वीत रूपकं व्यक्तलिङ्गवत् |
उपरिभागञ्च लिङ्गाभं मूलविष्कंभविस्तृतम् ||
५१ भागाभ्यां मुकुटं कुर्याज्जटाबन्धान्वितं शुभम् |
गुणास्य कारयेद् विद्वान् भवांशे रसभाजिते ||
५२ भागखण्डभुजस्कन्धौ ऋत्वङ्गुलविनिःसृतौ |
ग्रीवास्याद् रामभागो ना * *? मात् तदूर्ध्वतः ||
५३ पादात् पादात् प्रकर्तव्यं मुकुटं पूर्वलक्षणम् |
लिङ्गदैर्घ्यार्द्धमुत्यंशे लिङ्गव्यासवहिष्कृतेः ||
५४ कर्णनासाकपोलाघं तत्र सर्वम् प्रकल्पयेत् |
अथैकवक्त्रैके लिङ्गे भवांशे तु भवाजिते ||
५५ अधोभागं द्विधा कुर्यात् पुनरर्द्धमधः स्थितम् |
स्कन्धौ ग्रीवां च भागाभ्यां मध्ये सार्द्ध पुनर्युगैः ||
५६ भागैकैकेन वक्त्रादि मस्तकान्तं विवर्तयेत् |
तदूर्ध्वे तु गुणैर्भक्ते द्वाभ्यां मौलिं प्रकल्पयेत् ||
५७ भागेनैव तु लिङ्गाभं वक्त्रनिर्गतिरुच्यते |
लिङ्गदैर्घ्यार्कभागेन निर्गमः शुभकारकः ||
५८ व्यक्ताव्यक्तं समुद्दिष्टमुभयार्थप्रसाधकम् |
गङ्गादिसरितो याता पुरा पक्षेन्न समुद्भवा ||
५९ तया तु घटयेल्लिङ्गं यथा वक्ष्यामि लक्षणम् |
मृत्स्नां * * * * कृत्वा त्रिफलाचूर्णसंयुताम् ||
६० कुनदीतालसिन्दूररसगन्धकयोजिताम् |
सुवर्णगैरिकयुतां किञ्चिद् गुग्गुलुमिश्रिताम् ||
६१ मर्दयेत् सुपरिश्राव्यपदेनानुविचक्षणः |
शणमाषातसीविल्वसौराष्ट्रीरसमिश्रिताम् ||
६२ कषायोदकसंक्लिन्नां सप्तरात्रमथोषिताम् |
सुगन्धि गन्धमिश्रेण तथा सर्जरसेन च ||
६३ मर्दयेत् सर्वतो येन स कषायेन यत्नतः |
ततो लिङ्गं प्रकुर्वीत यथोक्तलक्षणं शुभम् ||
६४ पक्वापक्वं सुराध्यक्ष यथा मनसि वाञ्छितम् |
मरकतं पद्मरागं च वज्रवैदूर्यमौक्तिकम् ||
६५ चन्द्रप्रियं पुष्परागं महानीलादिटिट्टिभम् |
भिन्नाभिन्न गुणास्त्वेषां स्फाटिकं सर्वकामदम् ||
६६ सरित्सलिलसंकाशं स्वच्छं स्निग्धं प्रभान्वितम् |
तुषारकणिकाहीनं सर्वदोषविवर्जितम् ||
६७ स्फाटिकं लिङ्गमासाद्य केन सिद्धाः शतक्रतो |
वाणे लौहे स्वयं व्यक्ते दैवे च ऋषिकल्पिते ||
६८ असुरैः स्थापिते लिङ्गे लक्षणं न पुरोदितम् |
मानोन्मानयुतं लिङ्गं मण्डलादिविदूषितम् ||
६९ प्रतिकूलं विजानीयात् सर्वेषामपि प्राणिनाम् |
शिलायास्थे दान यत्नात् तक्षणे घर्षणे पि च ||
७० निष्पन्नावपि ज्ञातव्यं गर्भमण्डलकादिकम् |
माञ्जिष्ठे कपिले रक्ते सालूराखुकृकालकाः ||
७१ कृष्णासिगुडकर्णेषु सर्प आपस्तथोपलः |
कपोतभस्मचित्रेषु गोधिकासिकतालिनः ||
७२ पीतभृङ्गाभके गोधाविषञ्चैव विनिर्दिशेत् |
नीले च मण्डले श्यामे गोनासे मानुषन्तथा ||
७३ चाषाभ पक्षिणं विधाच्छ्याम चाषनृपक्षिणम् |
द्विके द्विके द्विरूपञ्च यद्रूपन्तत् तदादिशेत् ||
७४ वाह्यतो लक्षणाभावे लेपं युञ्जित भ्रान्तितः |
सौराष्ट्री वालकास्वघ्न ऋद्धिवृद्धी द्विजन्तथा ||
७५ आरनालेन पिष्ट्वैनमुपलं लेपयेन्निशि |
आर्द्रता सिमिकाक्लेदो वाष्पोत्थानमनुक्रमात् ||
७६ द्विजं महीतं तथा मीनं कृष्णं ज्ञात्वानु तान् त्यजेत् |
अतो दोषविनिर्मुक्ते पृष्टेशाणादिभिर्वुधाः ||
७७ धौतदेहे ततो लिङ्गे चिह्नं लक्षं शुभाशुभम् |
हयेभवृष शंखाब्जस्वस्तिकच्छत्रभूधरैः ||
७८ मृगारिध्वजभृङ्गारमुद्गरा * शाचामरैः |
कूर्मोर्मीमत्सश्रीवत्सचक्रनेत्रपवित्रकैः ||
७९ सिद्धिमेभिर्विजानीयान्निर्वाणन्तदनन्तरम् |
व्याघ्रमार्जारभल्लूककबन्धकाककङ्ककैः ||
८० संदंसर्पासगृध्रोष्ट्र उलूकवकपेचकैः |
एभिः सर्वैर्युतं लिङ्गं वर्णैश्चाग्नेयमारुतैः ||
८१ यजमानप्रजाराज्ञां दुःखमृत्युप्रदं भवेत् |
अव्यक्तमुखलिङ्गानि समासात् कथितानि ते ||
८२ साम्प्रतं कथ्यते व्यक्तन्निःसन्दिग्धं शचीपते |
इति मोहचूरोत्तरे अव्यक्तमुखलिङ्गप्रख्याने प्रथमः पटलः ||
Kapitel 2: Gestalten der Gottheiten
८३ प्रतिमालक्षणं वक्षे माने द्वारकरात्मके |
तिर्यग्भक्तगुणैर्द्वारे द्वाभ्यामर्चोत्तमोत्तमम् ||
८४ पीठं भागेन कर्तव्यं मध्योत्कृष्टन्निगद्यते |
नन्दवद् भाजिते दैर्घ्ये त्यक्ता भागं पुनस्त्रिधा ||
८५ भागाभ्यां प्रतिमा कार्या भागं पीठाय कल्पयेत् |
सिद्धिभक्ते पुनर्द्वारि तनुभागं परित्यजेत् ||
८६ विभज्य गुणवच्छेषं द्वाभ्यां जीवप्रकल्पना |
अंशैकेन भवेत् पीठं प्रत्येकाद् वा द्वयन्द्वयम् ||
८७ ज्येष्ठादिभेदतः शक्रद्वार्मानात् प्रतिमानव |
करमेकं सभारभ्य यावत् स्यादङ्कगोचरम् ||
८८ लिङ्गवन्मानमेतासां संख्या तद्वत् पुरन्दर |
आयामार्द्धरसैर्भक्ते षष्ठांशस्य नवांशके ||
८९ अङ्गुलं स्वकमुद्दिष्टन्तेनाङ्गोपाङ्गवर्तना |
नव तालाः सुरा ज्ञेया ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ||
९० तालैकादशभिः कार्या भूतवेतालराक्षसाः |
किङ्कराः सप्ततालाश्च पञ्च तालाश्च वामनाः ||
९१ पङ्गुकुब्जौ च भूतांशैः कुष्माण्डा युगतालिकः |
रुचितं रूपकायामं विभज्य नवभागिकम् ||
९२ रूपकं वर्तयेत् तत्र यस्य देवस्य यद् भवेत् |
विकाराङ्गुलमुत्सेधो मुकुटे पाकशासन ||
९३ आस्यं तालसमं प्रोक्तं ग्रीवा वेदाङ्गुला ततः |
ग्रीवाधस्ताद् विजानीयाद् हृदयं नाभिमण्डलम् ||
९४ जठरं तालतालेन ज्येष्ठायाः कारणं विना |
दैर्घ्यात् कामकला १३ ऊरूजानू पालीकृताङ्गुले ||
९५ जङ्घे रुद्रकले कार्ये गुल्फे वेदाङ्गुले ततः |
मङ्गलदिगङ्गुलाज्ञेया प्रतिमा तु पराहरः ||
९६ ऊर्द्ध्वमानं समाख्यातं तिर्यङ्मानादिकं शृणु |
भाग त्रयञ्च वदने वक्त्रञ्चिवुक संयुतम् ||
९७ नासा वंश ललाटं * * * * स्यात्स ताङ्गुलम् |
सिद्ध्यङ्गुलं ललाटञ्च तिर्यक् स्यात् पाकशासन ||
९८ ललाटाधोङ्गुला शक्ते सुभुवौ सार्द्धलोचने |
मूलेद्वियवविस्तीर्णे पादहीने ततः क्रमात् ||
९९ प्रान्तेयवार्द्ध विस्तारे वक्त्रे वै कार्मुका कृती |
मात्रा श्यामे शुभे कार्ये लोचने त्र्यंशतारके ||
१०० मीनोदरनिभे तारे भूतांशे ज्योतिषी शुभे |
अङ्गुले पृथुनी मध्ये शेषं ज्ञात्वा प्रयोजयेत् ||
१०१ यथा हिमवतं रूपन्तथा दृष्टिन्नियोजयेत् |
अग्रे समुच्छ्रिता नासा अङ्गुल्याभ्यां शचीपते ||
१०२ पार्श्वे यवाधिकासाधो मूले तारक विच्युते |
निष्पावदलवद् वाह्ये पुटौ तारकविस्तृतौ ||
१०३ द्व्यर्द्धयवदलौ कार्यौ नासा रन्ध्रे चतुर्यवे |
अपाङ्गे द्विकले ख्याते श्रुती वक्त्र समासके ||
१०४ यवाधिकेर्द्ध विस्तीर्णे वर्तीयुग्म यवे मते |
शष्कुल्यौद्वियवे कार्ये ककुनी तु चतुर्यवे ||
१०५ खल पत्रं कलामान मायामर्द्धि न विस्तृतम् |
तुदूकावङ्गुलं दीर्घौ पार्श्वौ भूषानुरोधतः ||
१०६ कर्णान्तरं समुद्दिष्टङ्ग्रहगोलकमानकम् |
ललाटान्तात्तुदुयावत्तद्विन्द्यात् पङ्क्ति गोलकम् ||
१०७ दलं सार्द्धयवं कर्णे त्रिनाला वेष्टितं शिरः |
हनू दशाङ्गुलौ कर्णात् सन्धानं गोलकन्तयोः ||
१०८ मुखन्तु द्विदलं दैर्घ्याद्विस्तृतं सार्द्धमङ्गुलम् |
अविस्तृतं समुद्दिष्टं विस्तृतन्त्वन लाङ्गुलम् ||
१०९ कलार्द्धमधरे मा * * * * * परं विदुः |
तस्याधोङ्गुल वद्गर्तागोजीतत्रार्द्धमङ्गुलम् ||
११० ऊर्द्ध्वगोजीतुना साधो द्वियवादलविस्तृतः |
सृक्किणौ दृष्टि सूत्रेण कविरौ पुटसूत्रगौ ||
१११ मध्यवक्त्रो * * साधू चिवुकाश्चैव सूत्रगाः |
ग्रीवावस्वङ्गुला कार्या वेष्टनेनार्क गोलिका ||
११२ स्कन्धौ त्रिगोलकौ कार्यौ विकाराङ्गुल वेष्टनौ |
वाहू भूया वद * * वुप वाहू पुरन्दर ||
११३ वसु रूपाङ्गुलायामौ ग्रन्थिं विन्द्यात् कलार्द्धतः |
तद्वत्कर प्रवाहोश्च दैर्घ्यान्युन्यङ्गुलन्तलम् ||
११४ तिर्यक्काणाङ्गुलं मध्यत् तद्वत् सूना यवं विना |
तर्जन्यनामिकेताभ्यां कलार्द्धो नाच कन्यसा ||
११५ दैर्घ्य तस्तत् समाङ्गुष्ठो देसिन्यास्त्र्यङ्गुलो ह्यधः |
मूले वह्नि कलो ज्ञेयः सस्यन्द्रेण परिच्युतः ||
११६ वाहन्ते च तथा शक्र किन्तु राम यवोसितः |
अक्षाङ्गुलादि कोणान्तो विष्कम्भस्त्रिगुणा वृतिः ||
११७ मांसलौचकरौ श्रेष्ठा वङ्गुल्येद्वर्तुलाहरे |
सार नेत्र सरैर्हीनं मध्या या गोलकं यवैः ||
११८ दैर्घ्यं स्वपर्वणो न्यासां पङ्क्ति मांस परिच्युते |
चतुर्थांशं विना कन्या प्रान्ते यर्वार्द्ध जानखाः ||
११९ मूले च त्र्यङ्गुलो मध्या मध्ये चैव यवोह्रिताः |
गुण यवोह्रितः प्रान्ते स्वायामादन्यतः पुनः ||
१२० कन्दे ग्रन्थौ तथा मध्ये रसभूतकृताङ्गुलः |
पर्वणः सयवाङ्गुष्ठे च्युतश्च्युततराग्रतः ||
१२१ कण्ठकूप स * * * * * ? कौरस गोलकौ |
अन्तरञ्च तदेव स्यात् तयोः पक्षौ षडङ्गुलौ ||
१२२ मण्डलं द्वियवं प्रोक्तं मध्यस्थं यवमानकम् |
व्यासश्चैव समस्तस्य विपर्यय यविर्भवेत् ||
१२३ * * ? कौ तु समुद्दिष्टौ नाभिमानमथोच्यते |
नाभिः स्याद् दक्षिणावर्ता गंभीरा तु चतुर्यवैः ||
१२४ विस्तृतैकाङ्गुले नैव वेष्टनन्त्रिगुणं हरे |
अधुनासंप्रवक्ष्यामि नाभि देशादि विस्तरम् ||
१२५ विस्तृतिन्नाभि देशे तु कुर्याद्वृत्यङ्गुलैर्बुधः |
दुःखा२१ङ्गुलैस्ततो धस्तात् कटिदेशे जिनाङ्गुलैः ||
१२६ मेहनं द्विकलञ्चाधो वृषणौ नेत्रमानकौ |
विष्कंभः कलया मूले स त्र्यंशा विकलापुरः ||
१२७ वेष्टनन्त्रिगुणं सर्वं हस्तपादादिकं विना |
षण्मात्रविस्तृता ब्रूहू ज्ञात्वा हासन्ततोन्ततः ||
१२८ त्रिकला जानुकन्देस्याज्जंघाकन्दे तथैव च |
तद्रन्थौ गोलकाधिक्य मत्स्या पादाङ्गुलेन तु ||
१२९ त्रिगुणा प्रावृतिः ख्याता पूर्ववतशतक्रतो |
पादौ मन्त्रङ्गुलौ कार्यौ पार्ष्णीं कृत्यङ्गुलौ ततः ||
१३० पादो नस्त्र्यङ्गुलोङ्गुष्टो वहीना प्रदेशिनी |
पादपादविहीनाः स्युरङ्गुल्योन्यां शतक्रतो ||
१३१ कन्दे भूताङ्गुलो नाभो मध्ये तु विकलाच्युतः |
सार्द्धविपर्ययाङ्गुष्ठे च्युतश्च्युततरः क्रमात् ||
१३२ रामाङ्गुलस्तु देशिन्याः कण्ठाभ्यासे करा * * |
* वा व्यस्त ग्रतोऽन्यासो माय ८ भोग परिच्युतम् ||
१३३ मूल निम्नं न स्वङ्कुर्यात् किञ्चिदग्रे समुन्नतम् |
पुन्नारी लक्षणं प्रोक्तं लेसान्नमुचि सूदन ||
१३४ अधुनासंप्रवक्ष्यामि यथामानं भवेस्त्रियः |
नार्यष्ट तालिका तन्वी नेत्र श्रोणीस्तनाधिका ||
१३५ भ्रुवौ यवाधिका नासा यवहीना समुच्छ्रयात् |
दस्राङ्गुल * * * र्घ्यतच्च्युतं विस्तरेण तु ||
१३६ तेन हीनौ सुभावङ्गौ स्यातां नभ्रौ मनो रमौ |
ग्रीवामष्ट यवैर्हीनां तिर्यक्कृत्वौर्द्धतो न्यसेत् ||
१३७ एवमक्षाङ्गुलैर्दैर्घ्य विस्तृता करणाङ्गुलैः |
द्वन्द्व गोलकमादाय प्रवाहुभ्यां शतक्रतो ||
१३८ ऊरू जानुक पिण्डीषु दद्यादर्द्धार्द्धमङ्गुलम् |
उच्चैस्त्वे पादयोर्दद्यात् पादौ समतलौ पुनः ||
१३९ चतुरङ्गुलमादाय वाह्वायामाद्विवर्द्धितौ |
पीनौ वृत्तौ स्फिचौ कार्या वङ्गुली मानमुच्यते ||
१४० नागांशं स्वस्वमादाय विस्तारेणोर्द्धतो न्यसेत् |
* * कूर्मोन्नतञ्चैव भगं कुर्यात् स लक्षणम् ||
१४१ तन्मध्यतस्त्वधो भागे रन्ध्रं स्यात् कुञ्जरोष्ठवत् |
प्रतिमै तन्मानतः कार्या करण स्थानकान्विता ||
१४२ * * * * प्रदाधन्यास्यादतोन्यान शोभना |
हीनाधिकं भवेल्लक्ष्य यत्र यद्युक्तमाचरेत् ||
१४३ युक्तादवाप्यते यस्मात् पारलौहिकिकं फलम् |
सम्पत् करीदारुमयी मृण्मयी सुखदा सदा ||
१४४ पुष्टिप्रदा हेममयी धन्यारत्नमयी मता |
वर्ण क्रमाच्छुभाशैली क्षेम्यातां भ्रमयी तथा ||
१४५ जयदाराजती साधोरैतीरतिकरी नृणाम् |
सौभाग्यान्नाद्य पशुदा कांस्यपित्तलसंभवा ||
१४६ वलदासी स जातास्यान्न कार्या लोह संभवा |
क्षुद्भयं दीर्घजठरा धनहानिः कृशोदरी ||
१४७ रोगङ्करोति हीनाङ्गी दिर्घाङ्गी च नृपाद्भयम् |
भर्तारं दक्षिणनता हन्ति वामनतास्त्रियम् ||
१४८ करोति स क्षता मृत्युं स गर्भा रुग्भयं नृप |
ऊर्ध्व दृष्टिस्तथा व्याधिर्मधो दृष्टिर्जनक्षयम् ||
१४९ निम्नोन्नतोष्ठी कलहं मुखरोगं महामुखी |
नेत्रहीना तु वैकल्यमवक्त्रावक्त्रशोणितम् ||
१५० वधिरत्वमकर्णा तु हीनाङ्गा च यशः क्षयम् |
हीनास्या शिल्पिनं हन्ति रौद्राङ्गी स्वामिनन्तथा ||
१५१ हीन पादकरा नित्यं वालानाञ्च विनाशनी |
हीनजंघा च जापाघ्नी जानु हीनारि वर्द्धनी ||
१५२ सत्रासाक्षि भयङ्कुर्यात् स रेखा सर्पसंभवम् |
कटिहीना पशुं हन्ति नृपं हन्ति महाभुजा ||
१५३ स विन्दुका सदोन्मादं कुरुते नात्र संशयः |
पुरुहूत समाख्याता दोषास्त्वेते समासतः ||
Shiva und weitere Gottheitsgestalten
१५४ मूर्तिभेद मतो वक्षे यानास्त्रादि विभेदतः |
स देशानः सरोजस्थो दिग्वाहु स्थिति लोचनः ||
१५५ पञ्चवक्त्रो हिमाभश्च हारकुण्डलमण्डितः |
खट्वाङ्गमुत्पलन्नागमभयं वीजपूरकम् ||
१५६ आयुधंगम हस्तस्य दक्षिणेत् वधुना शृणु |
वरदं शक्तिशूलञ्च सूत्रं डमरूकन्तथा ||
१५७ स देशानः समाख्यातो ह्यर्द्ध नारीश्वरं शृणु |
अर्द्धनारीश्वरः कार्यो ह्यर्द्धार्द्ध कृति लक्षितः ||
१५८ अर्द्धमिन्दु जटाभारमर्द्धसतिलकालकम् |
कुण्डलं दक्षिणे कर्णे वामेस्या वालि कादिकम् ||
१५९ ग्रीवाव्यालार्द्ध हाराङ्गीस्तनमेकञ्च वामतः |
कपालन्दक्षिणे हस्ते वामे चैवोत्पलन्न्यसेत् ||
१६० अर्द्धनारीश्वरः ख्यात उमेशः कथ्यते धुना |
उमेशावुपविष्ठाङ्गौ पुंस्त्री रूपौ शतक्ततो ||
१६१ सोरगेन्द्र जटाभार धरस्त्र्यक्षो हरः परम् |
ग्रीवा साभररगा कार्या करार्गै कुण्डल मण्डितौ ||
१६२ द्विभुजः सोपवीताङ्ग अर्द्धवीरासन स्थितः |
वामोरुसंस्थिता गौरीमुखालोक न तत्परा ||
१६३ वाम वाहूप गूढाङ्गी ललाटतिलकोज्वला |
कर्तव्यः केश विन्यासः सुबन्धः कुसुमाविलः ||
१६४ कर्णौ साभरणौ कार्यौ पादौ नूपुर मण्डितौ |
दर्शयेद् दक्षिणन्देव्या देव स्कन्धे भुजं हरे ||
१६५ वामे च दर्पणन्दद्यात् कट्यां सूत्रं समेखलम् |
देवहस्तं पुनर्दक्षन्देवी चिवुके निवेशयेत् ||
१६६ सुनासिका सुवदनासु नेत्रीसु पयोधरा |
सुवाहु लतिका भद्रा केयूर कटकाङ्किता ||
१६७ उमेश्वर समाख्यातो हर नारायणं शृणु |
हरनारायणं रूपञ्जटा केशार्द्ध मस्तकम् ||
१६८ ललाटे चार्द्ध नयनं मुद्रा कुण्डल मण्डितम् |
चतुर्भुजः समाख्यातो हरनारायणस्तव ||
१६९ कपालखड्गखट्वाङ्ग चक्रं स्याद्वामदक्षयोः |
वृषं तार्क्ष्यो तथा भव्या श्रीर्दक्षिणोत्तरस्थिता ||
१७० हरनारायणः ख्यातो नृत्येशं कथ्यते धुना |
नृत्य रुद्रं प्रकुर्वीत चन्द्रार्द्ध कृत मस्तकम् ||
१७१ वैशाख स्थानकन्धरन्नाग यज्ञोपवीतिनम् |
सौम्याननं जटाजूट धारिणं व्याल मेखलम् ||
१७२ पीनवक्षोरुजघनं सर्वलक्षणसंयुतम् |
द्विपि चर्मधरं साधो वृषारूढं स्मिताननम् ||
१७३ सुभव्यं षोडश भुजं कुर्याद् वा द्विभुजं शुभम् |
वेणूवीणा मृदङ्गादि वाद्यसंघोपशोभितम् ||
१७४ वामं प्रसारित भुजं द्वितीयमभयप्रदम् |
अक्षसूत्रेषु दण्डासि शूलशक्ति वरङ्करैः ||
१७५ कपालपाशखट्वाङ्ग खेटचर्माङ्कुशान्वितम् |
एकञ्चापधरं तद्वत्सुसारितमथोत्तरम् ||
१७६ भव्या ब्रह्माहरिस्कन्दो नन्दी कालादयश्चये |
वीक्ष्यमाणाः शिवं नृत्यं भृङ्गी कार्योग्रतः स्थितः ||
१७७ मालाखड्गभृतो ये तु सिद्धा यक्षादयस्तथा |
बाह्यस्थाच्च प्रकर्तव्या नृत्येशः कथितस्तव ||
१७८ त्रिधा विष्णुं प्रवक्ष्यामि वासुदेवं द्विवाहुकं |
प्रोच्यते लक्षणन्तस्य समासे नैव सुव्रत ||
१७९ सुनाससु कपोलञ्च स रत्न मुकुटोज्वलम् |
ललाट तिलकोपेतं श्यामं पीताम्बरं हरे ||
१८० गदा खड्गाम्वुजं दक्षे स्यात् तुर्यः शान्तिदः करः |
शङ्ख चक्र धनुः खेट वामे चाष्ट भुजे हरौ ||
१८१ शङ्ख चक्रं प्रदातव्यं वामहस्ते चतुर्भुजे |
दक्षिणे तु करे पद्मं गदा त्रैलोक्य तर्जनी ||
१८२ द्विभुजे शङ्ख भृद्वामे दक्षिणः शान्तिदः करः |
विष्णुरेय समाख्यातो ब्रह्माणमधुना शृणु ||
१८३ पितामहश्चतुर्वक्त्रो लम्बकूर्चश्चतुर्भुजः |
आपिङ्गल जटाबन्ध हंसस्थो पंकजासनः ||
१८४ दक्षिणे च भुजे तस्य दण्डः स्यादक्षसूत्रकम् |
कमण्डलुं करे वामे वर्हिराज्यादिकन्तथा ||
१८५ सावित्री दक्षिणे कार्या वामे चैव सरस्वती |
इति ब्रह्मासमाख्यातः कथ्यते ते दिवाकरः ||
१८६ एकचक्रो रतः सप्ततुरगोरुण सारथिः |
तत्रस्थो भास्करो देवो मणि कुण्डलमण्डितः ||
१८७ त्रपूषाङ्घ्रि सुरक्ताङ्गः सर्वाङ्ग कवचा वृतः |
सुकेशो वा किरीटी वा त्रिनेत्रो वा द्विनेत्रकः ||
१८८ स पत्र नालपद्मौ च कराभ्यां स्कन्धयोर्वहन् |
पार्श्वे प्रतीहार युतः स्त्रीभिरग्ने विभूषितः ||
१८९ साक्षसूत्रं सितं सोमं सुरूपं स कमण्डलुम् |
रक्ताक्षं रक्तवर्णञ्च कुजं शक्त्यक्षमालिनम् ||
१९० बुधञ्चापधरं पीतं रूपाढ्यं शान्त लोचनम् |
वृद्धाकारङ्गुरुङ्गौरं साक्षसूत्र कमण्डलुम् ||
१९१ दक्षैकाक्षं सितं शुक्रं कुण्डिका जपमालिनम् |
भानुपुत्रमधो दृष्टिं वक्र पादं सुभीषणम् ||
१९२ क्रूरं महाभुजञ्चैव खिङ्खिरी जपमालिनम् |
राहुं व्यात्ताननं घोरं कृष्णमर्द्धाङ्ग भूषणम् ||
१९३ अर्द्धचन्द्रधरं साधो कथितं राहुरूपकम् |
त्रिभोग भूषितं धूम्रन्नर नागार्द्ध रूपिणम् ||
१९४ खड्गखेटधरं केतुं कुर्याद्वाथ कृताञ्जलिम् |
हेरम्वो वामनाकारो हस्ति वक्त्रत्वदन्तभृत् ||
१९५ महोदरो महाकायः सालङ्कारश्चतुर्भुजः |
सर्पयज्ञोपवीती च त्र्यक्षः खण्डेन्दु शेखरः ||
१९६ पुरन्दराङ्गुल विस्तारं दैर्घ्याद्भूयाङ्गुलं भवेत् |
तस्यास्यं वसुविस्तीर्णङ्ग्रिवा स्यात्त्र्यङ्गुलोच्छ्रया ||
१९७ रसरामाङ्गुलं शुण्डं मूलन्तस्यदिगङ्गुलम् |
अन्ते कृताङ्गुलं यावन्मध्ये सूत्रानुया ततः ||
१९८ स रन्ध्राद्व्यङ्गुला नाभिर्व्यासान्मासाङ्गुलौ ततः |
आदौ समुन्नतौ वान्ते कुंभो निविडमस्तकः ||
१९९ नन्दनन्दाङ्गुलौ कुंभौ तन्मध्ये सूत्रमानतः |
दन्तकोशो भवेत् तस्य घ्राणं सार्द्धाङ्गुलंविलम् ||
२०० कर्णौ दृगन्त विस्तीर्णौ वाहुल्ये नाङ्गुलौ मतौ |
सर्वावयवसम्पूर्ण सर्वशोभासमन्वितः ||
२०१ गणाधिपः समाख्यातः शरजन्मानिगद्यते |
रसवक्त्रः शिशुर्वेशः स्यात् केशवा १२ क्षस्तथा भुजः ||
२०२ शक्तिघण्टा पताकाब्ज पाश कुक्कुटदण्डकान् |
वराभयं धनुर्वाणं परशुं तत्करे न्यसेत् ||
२०३ चतुर्भुजं द्विवाहुम्वा कारयेच्छिखिवाहनम् |
त्र्यक्षो जटान्वितो नन्दी श्रुति वाहुर्युवा स्मृतः ||
२०४ शूलसूत्रधरः कार्यो वराभयसमन्वितः |
मुण्डमाली विशालाक्ष्यः श्रुति वाहुर्महोदरः ||
२०५ त्रिनेत्रः पीतकृष्णाङ्गो वक्रश्मश्रुशिरोरुहः |
मुण्डखड्गौ न्यसेद् दक्षे वामे खेट त्रिशूलकम् ||
२०६ महाकालः समाख्यातः शृण्वपर्णां पुरन्दर |
कन्यारूपात्व पर्णा च भूता तप परिग्रहा ||
२०७ चतुर्वाहुस्तपोनिष्ठा ध्यायमाना महेश्वरम् |
दण्डङ्कुण्डी न्यसेद् वामे दक्षे सूत्र वरन्तथा ||
२०८ तपो गौरी समाख्याता वच्मि दुर्गान्त वा धुना |
कुर्याद् दुर्गां प्रसन्नास्यां दिग्भुजां सारलोचनाम् ||
२०९ सुकेश पाश विन्यासां पीनोन्नतपयोधराम् |
सर्वलक्षणसम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम् ||
२१० स नूपुर पदाक्रान्त तलस्थ महिषासुराम् |
तच्छीर्षच्चेदनोत्पन्नां स खड्गनर भेदिनीम् ||
२११ शूलच्छेदोच्छलद्रक्त धारोक्षित धरातलाम् |
त्रिशूलमाशुगं खड्गं शक्तिञ्चक्रं शतक्रतो ||
२१२ टङ्कपाशाङ्कुशं खेटमानतज्यन्धनुस्तथा |
सव्यासव्ये करे देव्या न्यसेद् एतत् सदा युधम् ||
२१३ इति दुर्गा सहस्राक्ष कथ्यते ते सरस्वती |
शुभपद्म स्थिता शुभ्रा शुभ्रभूषणभूषिता ||
२१४ सुप्रस्ताक्ष करमास्ता वीणाभृत्स्यात् सरस्वती |
अन्ये ये वहवो भेदा मूर्तीनान्तु शतक्रतो ||
२१५ सम्यक्ता न योजयेज्ज्ञात्वा स्थानमानादि भेदतः |
समासेन समुद्दिष्टं प्रतिमा लक्षणं मया ||
२१६ पुनः संक्षेपतो वक्ष्ये पिण्डिकायाश्च वर्तनाम् |
इति मोहचूरोत्तरे व्यक्तलिङ्ग प्रख्याने द्वितीयः पटलः ||
Kapitel 3: Sockel und tragende Kraft

२१७ ययाव्या मोहितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमन् |
शक्तिक्रिया ह्वयाशक्र पिण्डिका सैव कीर्तिता ||
२१८ ज्ञात्वा तस्मात् परं पीठं देहस्थं सुसमाहितः |
अपरं वर्तये सश्चान्नाममानादि भेदतः ||
२१९ विधिना स्थापितं लिङ्गं पिण्डिका रहितं यदा |
तदा पूजान्न गृह्णाति सान्निध्यन्नैव गच्छति ||
२२० तस्मात् पीठं प्रकर्तव्यं यत्नमास्थाय सुव्रत |
येन सर्वफलावाप्तिर्जायते साधकस्य तु ||
२२१ स्थूलतां पिण्डिकायाश्च त्यागमष्टाम्र कस्य तु |
आत्मभूतागवेशञ्च ज्ञात्वा पीठं प्रकल्पयेत् ||
२२२ व्यक्ताव्यक्ते च सुव्यक्ते अव्यक्ते पांकशासन |
यथा तेषां भवेत् पीठं तथा ते कथ्यते धुना ||
२२३ लिङ्गदैर्घ्येण विस्तीर्णं हरिभागान्त मुच्छ्रितम् |
अव्यक्ते मुखलिङ्गे च पीठमानमुदाहृतम् ||
२२४ स्वायामेन भवेत् पीठन्तदर्द्धाद्विस्मृतं मतम् |
उच्छ्रितिः पूर्वमाख्याता सुव्यक्ते पीठ कल्पना ||
२२५ पीठ व्यास चतुर्थांश प्रणालं वाह्यनिर्गतम् |
मूले तन्मान विस्तीर्णं कुर्यादग्रे तदर्द्धतः ||
२२६ विस्तरस्य त्रिभागेन तोय मार्ग प्रकल्पयेत् |
कुशस्वभ्रान्विता कार्या पिण्डिका लक्षणान्विता ||
२२७ पिण्डिकापार्द्ध वाहुल्यं कुशदैर्घ्यं पुरन्दर |
कुश वाहुल्यरूपेण पीठे स्वभ्रं प्रकल्पयेत् ||
२२८ मोहचूरोत्तरे शास्त्रे पिण्डिका वसुसंख्यया |
तासान्नामानि कथ्यन्ते सांप्रतन्ते शचीपते ||
२२९ प्रथमा कमला तत्र द्वितीया च पयोधरा |
तृतीया च भवेद् वापी चतुर्थी वज्रसंज्ञिता ||
२३० चन्द्राख्या पञ्चमीख्याता षष्ठी चैवामृता भवेत् |
सम्वर्ता सप्तमी शक्र नन्दिकाख्या तु चाष्टमी ||
२३१ लिङ्गदैर्घ्यस्य सूर्यांशं मेखलार्थं प्रकल्पयेत् |
लिङ्गाश्रयश्च सूर्यांशं शेषं पश्चाद् विवर्तयेत् ||
२३२ भूतेन्दु भाजिते क्षेत्रे पादपद्मन्तथाम्वुजम् |
कर्णिका कण्ठदेशञ्च वर्तयेत् सुसमाहितः ||
२३३ रूपवेदकरे चन्द्रे राम भागैर्यथा क्रमम् |
चन्द्रद्वन्द्वाब्दैर्जलजे तुल्ये पूर्वा परे हिते ||
२३४ जया सिद्धा सुरा दैत्या मुनयो वीतमत्सराः |
एषां पद्मेति विख्याता महासिद्धि निधानभूः ||
२३५ भूपांशे * य कोणाग्नि क्ष्माग्नि भागैर्यथा क्रमम् |
योजगत्कुम्भवेद्यः स्यात् कण्ठो रूपांशवेशतः ||
२३६ श्रुति पट्टीपयोधात्र्या वाप्याश्चैव पुरन्दर |
पुरन्दर * * दासा वापी ज्ञेया तदा यता ||
२३७ भानुभक्ते च पीठार्द्धे क्ष्माग्नि द्विक्षान्ति युग्मकैः |
पादोर्जगती घटो वेदी ग्रीवास्यादेकवेशतः ||
२३८ एकेनोत्तर वेदी च भागाभ्यां पट्टिके नृप |
वज्रामेवं विजानीयात् पुत्रराज्य प्रदायिनी ||
२३९ नागांशभाजितोत्सेधे रूपमात्राब्द नेत्रकैः |
अङ्घ्रिजङ्घा तथा धारः कण्ठश्चैवोर्द्ध पट्टिके ||
२४० शान्तिपुष्टि प्रदाधन्या सर्वसिद्धि प्रदायिनी |
एषा चन्द्रकला साम्रिश्च्युतापश्चामृता मता ||
२४१ षड्भागभाजिते क्षेत्रे जङ्घा कुम्भोर्द्ध पट्टिका |
कण्ठोपकण्ठ पट्टः स्यात् संवर्ता पिण्डिका हरे ||
२४२ अष्टां १६ शभाजितोच्छ्राये यक्षौ तुरग भाजितौ |
पादमारभ्यग्रीवान्तमेकैकं ह्रासयेत् पदम् ||
२४३ ग्रीवा द्वाभ्यान्तथा जङ्घा प्रवेशो मुनि संख्यया |
निर्गमो ऋतुभागेन यथा पीठानुमानतः ||
२४४ सर्वसिद्धिप्रदा भद्रा सर्वेषां सर्वदाहिता |
नन्दावर्ताङ्किता भद्रा नन्दावर्तेति विश्रुता ||
२४५ इति पिण्डीसमाख्याता वक्ष्ये ब्रह्मशिलान्तव |
ब्रह्मभागसमाभद्रा कार्या ब्रह्मशिला शुभा ||
२४६ दिगङ्गुलैर्यथा व्यासादधिका ज्येष्ठज्येष्ठके |
एकैकाङ्गुलमन्येषां ह्रासयेत् क्रमतो हरे ||
२४७ तन्मानामेखला कार्या खातं मेखल या समम् |
गंभीरन्तत्समुद्दिष्टं व्यासं वच्मि तवाधुना ||
२४८ ब्रह्मव्यासेन विस्तीर्णमधिकं षड्यवं वहिः |
यवार्द्धार्द्धन्तु चान्येषां ह्रासयेत् क्रमतः पुनः ||
२४९ अधिकं विस्तरेणैव कन्यसेद्वियवं भवेत् |
सूत्रेण संमितं कृत्वा वर्तयेत् सुतलं समम् ||
२५० खात मध्ये तु पत्नेन रत्नाधाराणि चोत्किरेत् |
दिग्विदिक्षु ततो मध्ये वृत्तवत् परिकल्पयेत् ||
२५१ यथा ब्रह्मशिला कार्या ब्रह्मभागाधिका हरे |
तथा कूर्म शिलाङ्कुर्यात् किन्तु ब्रह्मशिलाधिकाम् ||
२५२ इति ब्रह्मशिला चैव प्रणालमधुनोच्यते |
स प्रणालं भवेत् पीठं लौहं शैलञ्च रत्नजम् ||
२५३ पार्थिवं दारुजं प्रोक्तं प्रणाल रहितं हितम् |
रुद्रभागसमायामः प्रान्ते तदर्द्धविस्तरः ||
२५४ कण्ठादूर्द्ध सदाश्रेष्ठः स्वत्रिभागाम्बुनिर्गमः |
कण्ठोर्द्ध कर्म सम्पन्नः प्रणालं सुखदो यतः ||
२५५ ततो न्यूनाधिकः पुंसां दुःखदः स्याच्छत क्रतो |
श्रुत्यसाष्टाम्रकं पीठे ब्रह्माच्युत विभागतः ||
२५६ लिङ्गस्थौल्य प्रमाणेन रन्ध्रं स्यात् कशिलाखवत् |
वस्वसञ्चोत्तमे लिङ्गे दृश्यं भूत यवं भवेत् ||
२५७ यवार्द्धार्द्धन्तु चान्येषां ह्रासयेत् क्रमतस्ततः |
समासेन समुद्दिष्टं पीठं ब्रह्मशिलादिकम् ||
२५८ सुरधामानि कथ्यन्ते भूपरीक्षादि पूर्वकम् |
इति मोहचूरोत्तरे पीठ ब्रह्मशिलादि प्रख्याने तृतीयः पटलः ||
Kapitel 4: Tempel, Klöster und Siedlungen
२५९ अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमेश्चैव परिग्रहम् |
शल्योद्धारादिकं सर्वं वलिकर्म गृहादिकम् ||
२६० सरः सुनलिनीच्छन्नं निरस्तरविरश्मिषु |
हंसकाक्षिक कल्हार वीथी विमलवीचिषु ||
२६१ हंसकारण्ड वा क्रौञ्च चक्र वा कविराजिषु |
पर्यन्त पूरितच्छाया विश्रान्त जलवीचिषु ||
२६२ पुण्यक्षेत्रादि शैलेषु निर्हरोपान्त (?) भूमिषु |
नदीतीरे तडागे वा वापी पुष्करिणी तटे ||
२६३ चत्वरे दीर्घिकाद्यासु शृङ्गाटे च चतुष्पथे |
रमन्ते देवता नित्यं वनेषू पवनेषु च ||
२६४ ग्रामखेटपुरादौ तु स्वामित्वं यत्र विद्यते |
आदौ परीक्ष्य भूभागं वर्णिनां शुभमिच्छताम् ||
२६५ सिताविप्रे नृपे रक्ता पीता वैश्यो सितेतरा |
दीपखात जले नादौ वर्णानां लक्षयेच्छुभम् ||
२६६ पूर्वप्लवा नृपस्योक्ता वैश्ये स्याद् दक्षिणप्लवा |
उदक् प्लवाद्विजातीनां शूद्राणां पश्चिम प्लवा ||
२६७ पूर्वोत्तरे शतो निम्ना सर्वसाधारणा मही |
उप्तवीजा तु सञ्जाता तृतीये ह्युत्तमा मही ||
२६८ पञ्चमे मध्यमा प्रोक्ता सप्तमे वाधमास्मृता |
याम्ये न गोधनं चाप्ये सौम्ये सस्यं हरेर्जलम् ||
२६९ नाति मृद्दीन कठिना सुखस्पर्शा समाघना |
स्निग्धा गुर्वी दृका शुद्धा सुगन्धा दोषवर्जिता ||
२७० स्वांदूदकान स्फुटिता सुरूपाति मनोहरा |
स गर्भा सोषराछिद्रा स सत्वा च स शोणिता ||
२७१ पूति गन्धादिभिर्दुष्टा ज्ञात्वा सम्यक् त्यजेन् महीम् |
एवं परीक्ष्य भूभागङ्गा ह्योदोषविवर्जितः ||
२७२ सद्वारतिथिलग्नेन्दु युतेह्नि जपमङ्गलैः |
एवं परिग्रहेच्छक्र शिवकुम्भ भ्रमेण तु ||
२७३ सुमांसुतक्षितां कृत्वा सीमाशुद्धि पुरःसराम् |
ततः प्रसारयेत् सूत्रमाचार्यः शिल्पिभिर्वृतः ||
२७४ उदीचीं ध्रुववेधेन प्राचीम्वा ध्रुवतारया |
पुष्पपौष्णमघावेधादथ संक्वादि साधनैः ||
२७५ एवं पूर्वा परं ज्ञात्वा मध्यें कं पार्श्वयोर्वियत् |
मतिमान् तुल्य सूत्रेण यथा स्याद् दक्षिणोत्तरम् ||
२७६ ततोप्यर्द्धं समादाय विदिक्कोणेषु लाञ्छयेत् |
चतुरस्रन्ततः कृत्वा नवधा विभजेत् पुनः ||
२७७ वायव्या नलरक्षेश गतो वंशौ शचीपते |
रज्वष्टकन्तु कर्तव्यं षट्पदन्त्रिपदं हरे ||
२७८ ततः स्रग्वलि धूपाद्यैः पूजयेद् वास्तु गान्सुरान् |
तन्मध्ये पूजयेत् पृथ्वीं धारिकां शक्ति रूपिणीम् ||
२७९ वास्तुं संपूजयेत् पश्चाद् ब्रह्माणञ्च शचीपते |
रन्ध्राधिपं विजानीयान् मरीच्याघारसाधिपाः ||
२८० द्विपदा आपवत् साद्या ज्ञेयाश्चाष्टौ सुराधिप |
द्वात्रिंशद् देवता बाह्ये हराद्याः पदिका स्थिताः ||
२८१ ब्रह्मादिदितिपर्यन्ताश्चत्वारिंशच्च पञ्च च |
वास्त्वङ्गे देवतानाञ्च संख्या ह्येषा पुरन्दर ||
२८२ वहिरीशादि च रकाद्याः स्कन्दायाः पूर्वतः स्थिताः |
इत्यष्टौ देवता वाह्ये एवं वास्तु नरः स्थितः ||
२८३ रन्द्राद्या लोकपाः पूज्या ये चान्ये तत् समाश्रिता |
भूत वर्गाश्च ये तत्र स्रग्धूपवलिभिर्वरैः ||
२८४ सर्व मर्ममयो वास्तुस्तस्यात् पीडान्न कारयेत् |
चालयित्वा यवं वार्द्धं किञ्चित् पूर्वोत्तरन्नयेत् ||
२८५ वस्तौ प्रचालिते शक्रमर्मौघश्चलितो भवेत् |
एवं यत् क्रियते धामसुराणां वास्तु पूर्वकम् ||
२८६ तदिष्ट सिद्धये ज्ञेयमन्यथा तु विपर्ययः |
शाकुनोक्त्या जनोक्त्या वा प्राणीनां सूत्र लंघने ||
२८७ कण्डूप नादि विज्ञानैर्ज्ञात्वा शल्यं समुद्धरेत् |
कैवल्य ज्ञान सम्पन्नो ज्योतिः शास्त्र विधानवित् ||
२८८ अध्यात्म ज्ञान कुशलः शल्योद्धारे लभेद् यशः |
जलान्तं कर्करान्तं वा खनेद्वारोपरोधतः ||
२८९ करापूरैस्तु पाषाणैर्मृत्तिकाष्टाङ्गुलान्तरैः |
तावदा पूरयेत् खातं यावत् पादोनमागतम् ||
२९० भूतलं सुसमङ्कृत्वा सूत्रयित्वा यथा पुरा |
शिलान्यासं प्रकुर्वीत तासां संक्षेप लक्षणम् ||
२९१ चतुरस्रा हस्तमात्राः पञ्चवस्वऽऽगुलोच्छ्रिताः |
पङ्कजांकाघटाः पञ्चरत्न मध्यादि पूरिताः ||
२९२ पञ्चगव्य कषायादि धौताः सुद्धाः सुवेष्टिताः |
नन्दा भद्रा जया रिक्ता पूर्णाख्याभिः सुपूजिताः ||
२९३ धरादि तत्व विन्यस्ता बुद्ध्यन्त पदगर्भिताः |
तत्रात्म तत्वं मात्रान्तं विद्या तत्वं मनोत्तरम् ||
२९४ गर्वबुद्धी तृतीये तु ततस्तत्वाधिपाभ्यसेत् |
स लोकपे शिवे यष्टे दूताग्नौ संविभाजिते ||
२९५ तर्पितेषु च मन्त्रेषु समस्ता ध्वनि शोधिते |
न्यस्ते तत्र शिलाव्राते कुंभन्यास पुरःसरे ||
२९६ पद्मं वाथ महापद्मं शङ्खं मरकतन्तथा |
समुद्रं पञ्चमन्तेषु नाममन्त्रैर्विशोधनम् ||
२९७ पूजयित्वा पुरा वास्तुं मध्ये शक्तिं निवेशयेत् |
तस्योपरि समुद्राख्यं पूर्णान्तस्योर्द्धतो न्यसेत् ||
२९८ वह्न्यादौ विन्यसेच्छक्तिं पद्मादीनान्निवेशनम् |
स्थापितव्याः सुनन्दाद्याभित्तिगर्भे सुनिश्चिताः ||
२९९ उच्छ्रेयेणोत्तमं पीठं प्रासादार्द्धेन कीर्तितम् |
मध्यमं पादहीनन्तु उत्तमार्द्धेन कन्यसम् ||
३०० एवमाचिनुयात्पीठं सुलेपसन्धिवर्जितम् |
गर्भभित्यादि विन्यासं तदूर्ध्वन्तु शचीपते ||
Tempelmaße und Tempelformen
३०१ कोणहस्तं समारभ्य कोणवृद्ध्या पुरन्दर |
ऋतुरामान्तपर्यन्ताः प्रासादाग्रहसंख्यया ||
३०२ खरूपाद्भुत वृद्ध्या वा खभूतान्तान दैव तु |
नागभक्ते युगैः पीठं गर्भः कार्यो दिवाकरैः ||
३०३ भित्तयो वसुवेदैश्च जंघाभित्ति समोच्छ्रिता |
शिखरन्द्विगुणङ्कार्यं शुकाघ्राशिखरार्द्धगा ||
३०४ पृथुत्वं गर्भवत् कार्यं तृतीयांशेन निर्गमम् |
पीठं वा लिङ्गमानेन पीठार्द्धेन परिभ्रमः ||
३०५ पीठवच्च स्मृतं द्वारं द्विधोच्चं भित्तयोपराः |
शुकाघ्रा पूर्ववज्ज्ञेया जंघा शिखरं शतक्रतो ||
३०६ चतुरस्रे चतुर्भक्ते वेदगर्भार्द्ध पीठके |
लिङ्गं पीठसमं द्वारं भित्तयश्च तथा विधाः ||
३०७ गर्भवन्नासिका तत्र पीठकोणान्तरोङ्गता |
समण्डपे सरांशेन वेदगर्भार्द्ध निर्गता ||
३०८ रन्ध्रभक्ते पदं पीठं गर्भोभित्यन्तरं पुनः |
पदिका च वहिर्भित्तिः शुकाघ्रे च पदोद्गते ||
३०९ हेमादि रत्नलिङ्गानामुक्तो पङ्गुप्तिहेतुतः |
आसादि वाणवृद्धेषु हस्तराशौ द्विधा कृते ||
३१० लिङ्गवत् पीठमर्द्धेन सैकेनावरणत्रयम् |
द्व्यधिकेन वहिर्भित्तिः शुकाघ्रादि पुरोदितम् ||
३११ वेदयुग्मादितः कृत्वा कोणहस्तविवृद्धितः |
रसरामान्त पर्यन्तः प्रासादानामनुक्रमात् ||
३१२ लिङ्गदैर्घ्य समंपीठं तत्रिभागा वृति त्रयम् |
वहिर्भित्तिश्च पीठार्द्धङ्करराशौ कराहते ||
३१३ धामतुल्यन्तु रन्ध्रान्तं भित्यन्तङ्गर्भमानकम् |
ब्रह्मसूत्र शुकाघ्राद्वाधामकोणाच्च सूत्रयेत् ||
३१४ द्वादशैते स्रान्धाराणान्तुर्यास्ताः स्युः पुरन्दर |
प्रासाद शतसंस्थाना भुक्तये मुक्तये हिताः ||
३१५ इति संक्षेप संसिद्धं लक्षणं सर्वधामसु |
विशेष व्यक्तयेशक्र पृथग् भूतन्निगद्यते ||
३१६ षोडशार्काष्टमं भागं वहिः कृत्वा पुरन्दर |
ज्येष्ठादीनाङ्क्रमेणैव मेर्वादौ रूपसिद्धये ||
३१७ मेरूस्तत्पूर्वविष्कम्भो हिमयुग्भद्रको गजः |
विमानो हरिहंसौ च श्रीवत्सोथ खगाधिपः ||
३१८ वडमीतुर्य वस्वस्त्रो विकारास्त्रो गृहाधिपः |
वृत्तश्चेन्द्र कलासंख्या स्वाधाराश्च पुरन्द्र ||
३१९ भद्रस्तु पञ्चधा ज्ञेयो ज्ञेयो वृत्तश्चतुर्विधः |
श्रीवत्सोपि तथा ज्ञेयस्त्रिविधो मन्दिराधिपः ||
३२० विभज्य लक्षणं स्पष्टं मेर्वादौते निगद्यते |
सूर्येन्दु भाजिते क्षेत्रे तिर्यग् वेद विभाजिते ||
३२१ चतुष्कोणे रसन् त्यक्ता तत् पिण्डी स्याद् विपर्यये |
संवेश निर्गमं शक्र शेषं ज्ञात्वा विवर्तयेत् ||
३२२ तुष्टिं वाणानलैर्वेशश्चण्डीवारगुणैर्गतिः |
चतुर्थे यत्र भङ्गाघं कुर्यान्मध्य रथोङ्गतिम् ||
३२३ सूर्यदिग्रसभागैस्तु शेषमेवं विवर्तयेत् |
चतुर्द्वारश्चतुर्घ्राणशृङ्गषोडशनासिकः ||
३२४ वालवेदानलद्विद्विभूमिकाघाट पञ्चकः |
कामार्केशदिगष्ठाधि यूति शृङ्गं ततोष्टकम् ||
३२५ वेदिकोर्द्धे सहैकेन सपादन्तु शतं भवेत् |
वेदी नितम्बयोर्मध्यं खाकाश द्वय भाजितम् ||
३२६ तत्राद्या भूमिका कार्या विंशद्भागैस्तदर्द्धतः |
भागैक ह्रासतो न्यासामुच्छ्रयः क्रमशो हरे ||
३२७ भूषणैर्भूषिता कार्याः षोडशैव तु भूमयः |
शुकाघ्रार्द्धं चतुर्दिक्षु सुरूपा स्युर्मृगारयः ||
३२८ वेदिकोपरि कर्णेषु वेदीव्यास त्रिभागतः |
मृगारयो विधातव्याः केशरालङ्कृता हरे ||
३२९ दंष्ट्रा विकटघोरास्या मस्तकन्यस्त पुच्छकाः |
सर्वावयवसंपूर्णाः सर्वशोभासमन्विताः ||
३३० वेदिकोर्द्धं चतुर्दिक्षु चत्वारो नररूपिणः |
दिक्पालैरप्सरोगात् विद्यातद्ग्रहकिन्नरैः ||
३३१ मातृभिर्गणविद्येशैर्भूषयेन्नवभूमयः |
गर्भोष्मणा मञ्जरीणां प्रायः पातभयं भवेत् ||
३३२ द्वे द्वे रन्ध्रे ततः कुर्याद् भूमौ भूमौ जलान्तरे |
सुरूपः कथितो मेरूर्मन्दरं शृणु साम्प्रतम् ||
३३३ वेदवसुभाजिते क्षेत्रे तिर्यग् ब्रह्माननैः कृतैः |
कर्णं गत्यानलत्यागात् कोण पिण्डीगुणांशकैः ||
३३४ संवेशानैर्गमौ कार्यौ ऋतु कोण करैर्हरे |
मध्योङ्गमः प्रकर्तव्यो भूभुपवन विभाकरैः ||
३३५ अनेन विधिना सर्व वर्तनं सर्ववाहुषु |
भुवश्चतुर्दशैवात्र युक्ताः कोणेष्वया श्रयैः ||
३३६ चतुरा घाटकैः सोपि भूतवेदाग्नि लोचनैः |
वेदी नितम्बयोर्मध्यमेकषष्ट्युत्तरं शतम् ||
३३७ प्रथमाष्टा दशैर्भूमि रत्नास्त्वेकैक मर्दनात् |
द्वाराण्यस्यापि चत्वारि चतस्रः शुकनासिकाः ||
३३८ प्रथमायां त्रयोविंशदेवविंश द्वितीयके |
ऊनविंशत्तृर्तीये तु चतुर्थे दशसप्त च ||
३३९ एकं प्राधानिकं शृङ्गं शुकाघ्रासु च षोडश |
मन्दिरं वर्तयेदेवं सप्तानवति शृङ्गकम् ||
३४० पूर्वोक्त भूषणैर्युक्तः सुरूपोयं सुराधिप |
षट्त्रिंश भजिते क्षेत्रे तिर्यग् वेद विभाजिते ||
३४१ मध्यदेशे भवेदस्य भागैरष्टभिरुद्गतिः |
आदौ तिर्यक्त्रयं मध्यादेकं चान्तस्त्रयन्तथा ||
३४२ लुप्त्वा विनिर्गतिर्वेदैर्यावत्कोणमवाप्नुयात् |
ब्रह्मास्यैस्तु ततः कोणः कैलासमिति वर्तयेत् ||
३४३ चतुर्द्वारञ्चतुर्नासं चतुर्मण्डप शोभितम् |
वेदीनितंवयोर्मध्ये ऋतु द्वन्द्वेन्दु भाजिते ||
३४४ भूपांशैः प्रथमा भूमिः शेषास्त्वेकैक विच्युते |
चतुरा घाटकःपि चतुस्त्रिभृद्विभूमयः ||
३४५ वस्विन्दुः प्रथमा घाटे द्वितीये चैव षोडश |
चतुर्दश तृतीये तु चतुर्थे द्वादशैव तु ||
३४६ शुकनासासु शृङ्गाणि षोडशैकन्तु मौलिकम् |
प्रासादोयं प्रियः शंभोः सप्तसप्तति शृङ्गकः ||
३४७ चतुरस्री कृते क्षेत्रे वसु लोचन भाजिते |
कर्णगत्यागुणत्यागात् कोणपिण्डी गुणांशकैः ||
३४८ नेत्रांशे न रथो ज्ञेयो गुणांशैरपरस्ततः |
दर्शनांशरथः शक्र स्यादेवं शेष वाहुषु ||
३४९ भद्र एष सम्प्रख्यातः कर्तुरिष्ठ विभूतिदः |
शिखराकुलः स एवोक्तः सर्वः सर्वार्थसिद्धिदः ||
३५० क्षुद्रभद्रस्वरैर्भक्ते पार्श्वयोर्लोचनच्युतेः |
त्रिमध्यो नलः युक्तस्तु हितोयं नलिनस्तदा |
श्रीवत्स शिखरोवायं नन्दनः कर्तृभूतिकृत् |
युगास्ते भूतभागेन कर्णाद्धे भ्रमवर्तनात् ||
३५१ वृत्तो नतपृष्टोग्रे द्व्यस्रस्तुंगाप्रकोगजः |
वेदास्ते रूप युग्मांशेरधो मध्ये विपर्यये ||
३५२ वेशश्चतुभिरशेनस्तंभो युग्मैस्तु कोणगः |
एवमन्यं च चत्वार आघाटा एक माननम् ||
३५३ वेदरामद्विरूपैस्तु आघाटाश्चतुरो मताः |
शुकाघ्रैकेन्दुशालायां नाद्येशस्य विवेशनम् ||
३५४ भूताह्न भाजिते शिखरे प्रथमाभूः पुरन्दरैः |
ऊर्ध्वमेकैकसंह्रासाद् भवन्ति दशभूमयः ||
३५५ त्रिभान्या सप्तदशतः पञ्चशच्छिखरान्वितः |
विमानोयं विमानीभिर्युक्तो वै मानवर्द्धनः ||
३५६ चतुरस्री कृते क्षेत्रे पदन्दत्वा तु पृष्ठतः |
वृत्तवद् भ्रामयेद् अग्रे द्वि कोणो वृत्तगर्भकः ||
३५७ ततो जंघा प्रदेशे स्यान् निर्गतः किञ्चिद् ऊर्ध्वतः |
केशरालङ्कृतः सिंहो मुनिमूर्द्धादि भूमिकः ||
३५८ प्रियो भवेन् नृसिंहस्य सिंहाकारोग्र नासिकः |
इभकुंभ कर्णयोर्मध्ये प्रसक्त हरिभूषणः ||
३५९ वेदास्ते तुर्यधा भक्ते पार्श्वयोर्जगती युते |
गर्भाश्चैव चतुर्भागैस्त्रयो वृत्तस्तु मध्यगः ||
३६० स्याच्छुकाघ्रायुतो हंसो विमानस्यैव जंघया |
भद्रस्यैव नितम्वोस्य श्रीवत्स स्यैव मञ्जरी ||
३६१ हंसशोभित शृङ्गाग्रो हंसः केशव भूमिकः |
हितश्चतुल्य धर्माभ्यां सङ्गतं पार्श्वयोर्द्वयोः ||
३६२ ब्रह्माब्ज पीठगो मध्ये हरीशौ वाम दक्षिणे |
अथ मध्ये हरः कार्यस्तदा दक्षे पितामहः ||
३६३ विपद्रूपांसिते द्वाभ्यां कोणो मध्यरथस्त्रिभिः |
सार्द्धतोय रथः शक्र खुराद्यैर्भूषणैर्युतः ||
३६४ शृङ्गाण्यस्य तु चत्वारि भुवः पञ्चरथास्तथाः |
विभूतये सतां ख्यातः श्रीवत्सो वर्द्धमानकः ||
३६५ चतुरस्रे सूर्य संछिन्ने त्रिभिः स्यान् मध्यगो रथः |
भागार्द्धे नान्तरन्त्यक्त्वा द्वाभ्यामुपरथं विदुः ||
३६६ तदर्द्ध निर्गतो द्वाभ्यां कोणः सम्पूर्णशालके |
क्षरकुंभादि संयुक्तमप्सरोगणशोभितम् ||
३६७ जंघा मध्ये तु वलयाख्या पट्टिकाभिः सुभूषिता |
अन्धारिका द्वयो पेता लंघोर्द्धं स्याद्वरण्डिका ||
३६८ पट्टिकाभिर्वसन्तैस्तु कण्ठेहारावली युताम् |
भूषणैश्चन्द्रशालाघैः शृङ्गैरेष सुभूषितः ||
३६९ येन सिद्धासुराशक्र यत्र सिद्धः स्वयं शशी |
लाभभागात्सिते क्षेत्रे खण्डशालेप्ययं विधिः ||
३७० सार्द्धे नोपरथः शक्र विपक्षे यो विनाशकः |
भुक्तये मुक्तये शस्तः श्रीवत्सोयन्तृतीयकः ||
३७१ विकारभीजिते क्षेत्रे चतुर्भिर्मध्यगो रथः |
सार्द्धे भागान्तरन्त्यक्ता तथोपरय स्थितिः ||
३७२ भागार्द्ध निर्गतिस्तस्य त्रिभिः कोणं पुरन्दर |
शालवद्भूषणैर्युक्तो विशेषाल्लोक नायकैः ||
३७३ रूद्रैः क्रीडा विनोदाघैर्गणैर्यक्षैः सुरैस्तथा |
दिव्य भूत्यै हितः कर्तुः श्रीवत्सो नन्दिवर्द्धनः ||
३७४ तुर्यभागी कृते क्षेत्रे कोऽतुल्याश्चतुर्दिशम् |
धामविस्तर पादेन निष्कासाः सर्व एव ते ||
३७५ षडस्रो मध्यगर्भोस्य स्तंभादि रचना वहिः |
स सर्प कटिकण्ठोस्य स कुटादश भूमयः ||
३७६ विष्णुर्मध्ये शिवो दक्षे वामतस्तु पितामहः |
पुच्छे लक्ष्मीः प्रतिष्ठाप्या गरुडोयं हरि प्रियः ||
३७७ पेष्टकस्तुङ्ग नासश्च पक्षाग्रस्था हि सूदनः |
नागांश षोडश त्यागान् माससं वर्द्धिता पतिः ||
३७८ युगदानात्पुरः सिद्धः शुकाघ्रो वडभी हरे |
व्यक्तलिङ्गे स्वयं योज्यश्चण्डिकादौ विशेषतः ||
३७९ विस्ताराद् द्विगुणोत् सेधः फांसादि कृत संवृतिः |
पार्श्वे सिंहद्वयोपेतो मध्ये कलश युतो वरः ||
३८० वेदास्रः स तथैवोक्तः सुरादि भूषणान्वितः |
शिखायाः संवृत्तिः पट्टैर्निर्विकारः शिवः प्रियः ||
३८१ चतुरस्री कृते क्षेत्रे कर्णार्द्धाष्टांश विच्युते |
तत्प्रमाणे च वेदास्रे दिक्षु कर्णमिति क्षिपेत् ||
३८२ पातितेषु च सूत्रेषु दिक्ष्वष्टास्रोष्टभूतिदः |
मध्यभागे करं कृत्वा अस्टभ्यां मध्यतो ह्वयेत् ||
३८३ तन्मानं वाह्यतः कृत्वा द्विगुणाद्व्यप्तृलंघनात् |
सोपि भूति प्रदो ज्ञेयो भूषणाद्यः पुरन्दर ||
३८४ चतुरस्रश्चतुर्भद्रः सान्धारश्च त्रिभूमिकः |
दारूजो गृहराजोयं गृहाकारः प्रशस्यते ||
३८५ गृहराजसमः किन्तु विना भद्रैः पुनः पुनः |
पट्टशालान्वितोप्यर्द्ध गृहराजः प्रकीर्तितः ||
३८६ एकभूमिर्द्विभूमिर्वा पट्टशाला विवर्जितः |
सर्वदेवालयं शक्र मार्तण्डस्य विशेषतः ||
३८७ कर्णार्द्धाष्टांशसन्त्यागात् परिभ्रमणवर्तितः |
वृत्तः कुंभः सुभूषाढ्यः ख्यातः कुंभः सुराधिप ||
३८८ अग्रे शुकाघुपा युक्तो वृषोन्ते चतुरस्रकः |
स एव वाह्यतो वृत्तः पट्टकैः सुविभूषितः ||
३८९ ग्वावृक्षो वृत्त एवस्यान्न भवेद् भवं विनावृषः |
एतद् देवालयं प्रोक्तं मुख्यतस्ते सुराधिप ||
३९० अन्योन्य मिश्र भेदैस्तु फलं मिश्रन्तु यज्वनाम् |
मेर्वादि लघुसंस्थानाः प्रसादाच्छन्दनामकाः ||
३९१ चतुर्हस्तादधः शक्र प्रासादाश्चाति क्षुद्रका |
नवधा भाजितं कृत्वा पीठं भाग समं भवेत् ||
३९२ द्विभागं गर्भविस्तारं भित्तयश्च पुरन्दर |
चतुर्हस्तादिवस्वन्ता भूतभागविभाजिताः ||
३९३ पीठं भागसमङ्गर्भन्तथा भित्तिः शचीपते |
उच्छ्रितिर्भित्ति हीनानां स जंघा द्विगुणा मता ||
३९४ वर्तनां शिखराणाञ्च कथयामि तवाधुना |
जंघोर्द्ध द्विगुणोच्छाये पृथुत्वे दशधा कृते ||
३९५ उच्छ्रयस्य चतुर्थांशे चतुर्द्धा भाजिते सति |
इन्दु कण्ठोपमैः सारः पदे कुंभ समुन्नतिः ||
३९६ षड्भिर्वेदी त्रिभिः कण्ठः शेषैः शिखरसंवृतिः |
तिर्यगूर्द्धञ्च भूतांशैस्त्याज्य भागे कृते सति ||
३९७ भागभागानुपातेन बहुत्वे च तथा भवेत् |
तिर्यक् चतुर्गुणं सूत्रं कृत्वा वा वर्तयेद्धरे ||
३९८ सान्धारिकाश्रयाणान्तु मेर्वादीनां यथाक्रमम् |
अन्धारिका विहीनानां मण्डपान्वितलक्षणम् ||
३९९ धामगर्भञ्च तत्कर्णभुकनासा गर्भ कर्णतः |
सूत्रङ्गृहीत्वाऽब्ज योनिः शुकाघ्रा धामकोणतः ||
४०० प्रासादस्यार्द्ध विस्तारस्तदग्रे मण्डपः शुभः |
शिखरन्त्रिगुणं येषां पादोनं सार्द्धं दृग्गुणम् ||
४०१ स पादं द्विगुणं वाथ जंघा तेषां त्रिभागिका |
तदूर्ध्वं तुर्यधा भाज्य शमांशं तुरगांसितम् ||
४०२ त्रिभिर्वेदी तदूर्ध्वन्तु कण्ठो द्वाभ्यां शिरोंशतः |
पादो न वृत्तवत् कुंभः शेषं पूर्ववदा चरेत् ||
४०३ कण्ठादूर्ध्वं चतुर्दिक्षु ध्वजाधाराणि कारयेत् |
चतुर्णामेव दण्डानां स्थितिः स्याद् वेदिकोपरिः ||
४०४ सर्वेषां मण्डपानान्तु नासिकान्त शिखोच्छ्रितिः |
फांसैः संवरणङ्कार्यमन्तः क्रोडे करोटकैः ||
४०५ षड्भिः स्तंभैः स रूचकाद्यैः कुंभाद्यैस्तुर्यधासनैः |
चतुर्भिर्नन्दिकाद्यैश्च शिरोभिस्ते विराजिताः ||
४०६ स्तंभसंख्या समायुक्ताः पृथुक्त्यंज्ञां भजन्तिते |
चतुःषष्टिसमारभ्य स्तंभ द्वितयवर्जिताः ||
४०७ श्रीवत्सादि स सूत्रान्ताः सप्तविंशति मण्डपाः |
इदानीं द्वार निर्देशः समासात्ते निगद्यते ||
४०८ विकारांश्मं विना तुल्यं वस्वं शोधिक विस्तरम् |
द्विगुणञ्च समुच्छेधं ज्येष्ठादौ लिङ्गमानतः ||
४०९ कर्णसूत्रे रसैर्भक्ते चतुभिर्वासमुच्छ्रितिः |
क्षुद्रधाम्ना मयं न्यायो द्रष्टव्यः पाकशासन ||
४१० खवेदैकं समारभ्य खमुन्यन्त मनु क्रमात् |
वियदिन्दूच्युते द्वारं भूत षट्कैर्ग्रहान्तिकम् ||
Türen und Vergegenwärtigung im Bauwerk
४११ अङ्गुलैर्व्यक्त लिङ्गानां तदर्द्धं विस्तरेण तु |
तत्पादेन स्मृते शाखे तयोः स्थौल्यन्तदर्द्धताः ||
४१२ द्विपादन्देहलिश्चार्द्धादुन्नता वसु हानितः |
ऊर्ध्वस्थाश्च सुरां ध्यक्ष सुविभक्ताः सुसंचिताः ||
४१३ प्रतिशाखास्त्रिभागेन न्यूना कार्याः परस्परम् |
शशिरामशरैरश्चैर्नागान्ताः स्युर्यथा क्रमम् ||
४१४ तुर्यांशेन प्रतीहारौ नन्दी कालश्च शाखयोः |
सरिद्वयं भार वाहौ मालाविधौ च किन्नरौ ||
४१५ गौर्गिरि हस्ति युग्मश्च ततश्च शेष वासुकी |
शाखाधिक्येप्ययं न्यासो न्यूने नागादिभिश्च्युतिः ||
४१६ इतोन्यत् यत्र वल्यादि यथा शोभं विभूषयेत् |
गणं लक्ष्मी यक्ष कन्या विष्ण्वीशौ ग्रहगायकाः ||
४१७ नृत्येशो मातरश्चैव क्रमादूर्ध्वं व्यवस्थिताः |
द्वाराग्रे अर्द्धचन्द्रञ्च शंखयुग्मादि भूषितम् ||
४१८ प्रासादाय युतङ्कार्यन्न न्यूनन्नाधिकं हितम् |
यजमानानु कूले तु देशिकः सु समाहितः ||
४१९ तोषितो यजमानेन द्वारारोपण मारभेत् |
द्वाराङ्गानि कषायादि शुद्धान्याच्छाद्य वाससा ||
४२० न्यस्ता तु धारिकां शक्तिं शाक्तां मूर्तिन्ततः पुनः |
त्रितत्वन्देवता युक्तं शिवं साङ्गञ्च विन्यसेत् ||
४२१ अग्नौ सन्तर्प्य संशोध्य प्रोक्ष्यसंस्पृश्य रोधयेत् |
सुसङ्गोध्ये प्रतीहाराञ्छिवाज्ञा पदवोधितान् ||
४२२ द्वार प्रमाणकं वास्तुं पूजयित्वा प्रतर्पयेत् |
यन्मुकन्तु भवेद्द्वारं तर्पयेत् तद् दिशापतिम् ||
४२३ रत्नन्यासं ततः शक्तिं ज्ञात्वा लग्नन्निवेशयेत् |
पुरामध्यं सुविज्ञाय किञ्चिदुत्तरतो यथा ||
४२४ कृत्वा च मन्त्रविन्यासमछिद्रमव धारयेत् |
द्वारवत्तोरणानाञ्च प्रतिष्ठा स्यात् पुरन्दर ||
४२५ वित्तशाठ्यादसौ कर्ता स्थापकादींश्च तर्पयेत् |
प्रासादं घटयेच्छक्र यावद्वेद्यन्तमागतम् ||
४२६ शुकनासा समाप्तौ तु वेद्यधो भूमिकान्तरे |
कृत्वो वरकन्तत्र सुगुप्तञ्च सुशोभनम् ||
४२७ रूक्मरौप्यार्कजं वापि रत्नादि पञ्चकान्वितम् |
पारदं विन्यसेत् तत्र गन्धस्रग्वस्त्रभूषितम् ||
४२८ प्रकृति रूपं घटं ध्यात्वा मध्ये पद्मं विचिन्तयेत् |
दर्पणादौ कृत स्नानं प्रोक्षयेत् स पिधानकम् ||
४२९ न्यस्त्वा तु धारिकां शक्तिं षडुच्छञ्चासनन्ततः |
शक्ति मूर्ति समायुक्तन्तत्र कुम्भन्निवेशयेत् ||
४३० तन्मध्ये विन्यसेद् भूय ऐश्वरीं शक्ति मध्ययाम् |
चैतन्यन्तु समाहूय विन्यसेत् समरसेन तु ||
४३१ शक्ति संपुट मध्यस्थं हंसं विन्दु स्वरूपिणम् |
दीप्यमानं स्वतेजोभिः सन्धार्याणुचिदंशकात् ||
४३२ स्थिरधीः समरसो भूत्वा शिवाज्ञा पद बोधितम् |
स्वसंवित्या समादाय पूरकेण न्यसेद् घटे ||
४३३ तत्कर्मानु ग्रहात्मत्वमधिकारमलान्वितम् |
पुरुषार्थ परिज्ञानमुपादे यक्षमं पदम् ||
४३४ शिवेनाधिष्ठितं कृत्वा सर्वविघ्न भयङ्करम् |
त्रितत्वं देवता युक्तन्न्यस्त्वा शोध्य निरूध्य च ||
४३५ प्रासादस्थिति पर्यन्तं कर्तुः कर्मानुपूरकम् |
ज्वलन्वै दृश्यते विघ्नैः प्रासादश्चाति दुःसह ||
४३६ ततो भूत वलिं दत्वा तृप्ता भवथ सर्वदा |
वाचयित्वा मतन्तैस्तु तृप्तास्ते सर्वदा वयम् ||
४३७ एवं कृते स राष्ट्रस्य राज्ञः कर्तुः समीहितम् |
फलमुत्पद्यते शीघ्रमारम्भः श्रेयसे सदा ||
४३८ विधाय वेदिका बन्धं कण्ठसारादिकञ्च यत् |
मेर्वादि च्छन्दकाः प्रोक्ताः सुविभक्ताः पृथक् पृथक् ||
४३९ खुरकुंभादि विन्यासं तेषु लेशान्निगद्यते |
उच्छ्रयन्नवधा भाज्यं भागे कुंभादि कल्पना ||
४४० जंघभागद्वये नोक्तावरंडाद्यन्तदूर्ध्वतः |
सार्द्धलिङ्गञ्च निर्वृत्तन्ततोर्ध्व शिखरं यथा ||
४४१ रथानुरथ कोणादि खुरकुंभादि भूषितम् |
प्रासादे कारयेद् एतान् प्रधानाङ्गमपीडयन् ||
४४२ पीडिते तु प्रधानाङ्गे महान्दोषः प्रजायते |
राज्ञः कर्तुः प्रजानान्तु दुःखं प्राणान्तिकं भवेत् ||
४४३ रचना क्षेत्राद्वहिस्तस्याद् पादायं विचक्षणः |
हस्तसंख्याङ्गुलं शक्र न न्यूनन्नाधिकं क्वचित् ||
४४४ न्यूनाधिकेपि दोषः स्याद् इत्याह भगवाञ्छिवः |
रूपरामैर्भजेदाघमूर्ध्वं तिर्यग्रसैर्भवेत् ||
४४५ भागवेशात्सरैः पादो वेदैः कुंभस्तथा नलैः |
वेशाद् भागोच्छ्रितः कार्यो वसन्तः सोर्द्ध पट्टिकः ||
४४६ वलयाख्या युतः कलशस्तदूर्द्ध्वे वसुनोङ्गतः |
प्रवेशवद् विनिष्क्रान्तो वृत्ताकारोनुया ततः |
कुंभ कलश योर्मध्ये छेदो भाग विपर्ययैः |
तदूर्ध्वे तु वसन्ताख्यो यथापूर्वमुदाहृतः ||
४४७ ऊर्ध्वङ्कण्ठिक या युक्तो वसन्तो निर्गमात् पुनः |
तदूर्ध्वे वेदभागैस्तु पट्टिका चतुरस्रिका ||
४४८ कलश पट्टिकयोच्छेदो वेद तुल्यो यथा भवेत् |
भागैक वेशतोच्छ्रायो वसन्तस्त्रिप्रवेशतः ||
४४९ ऊर्ध्वपट्टिक या युक्तः पट्टिकोर्द्ध्वन्तु कण्ठिका |
भाग न्यूनाधिकोर्द्धन्तु वसन्तः स्याद् यथा पुरा ||
४५० वेद भागैस्तथा पट्टिस्तस्योर्द्धमाय संवृतिः |
जंघा मध्ये तु निष्कासं तुल्या यद्द्विगुणोन्नत ||
४५१ दशधा भाजितञ्चोर्द्धं तिर्यक् पञ्च विभाजितम् |
भागभाग प्रवेशेन निर्गमान्मेखला त्रयम् ||
४५२ चतुर्भिः पट्टिका मध्ये तदूर्ध्वं मेखला त्रयम् |
वलयाख्याथ मध्ये तु तदूर्ध्वं स्यादधो यथा ||
४५३ जंघोर्द्धमाय निष्काशं दत्वा कार्यं वरण्डकम् |
विकार भाजितोच्छ्रायं तिर्यग् वेदविभाजितम् ||
४५४ भागैक वेशतः कार्य पट्टिका द्वितयन्ततः |
पट्टिकैका युतं वाथ वसन्तन्तत्र कारयेत् ||
४५५ त्रिभिस्तु कुंभकोच्छ्रायं प्रविष्टन्तद् द्वयेन तु |
वसन्तैक युतश्चोर्द्ध्वे वेदैः कण्ठसमुद्गमः ||
४५६ पट्टिका द्वितयं भागं निर्गमात् कुंभकं पुनः |
त्रिभिः वा समुच्छ्रितङ्कृत्वा शेषशोभा यथा भवेत् ||
४५७ कण्ठे तु कलशाकारो वसन्तः स्यादधोर्ध्वयो |
पट्टिका भूषितौतौ तु शेषं स्याच्छिखरानुगम् ||
४५८ चन्द्रमालादिभिः कूटैर्भूषणैस्तु विभूषयेत् |
एवन्तु छन्दकाः सर्वे भूषणैः सुविभूषिता ||
४५९ कन्दवेध्या विरोधेन शान्तिः श्रेयस्करा नृणाम् |
वसु वेदांसिते धाम्नि सारीसारक भूषणम् ||
४६० सिद्ध्यै मुक्त्यै समस्तास्तु मध्यं लक्षानुरोधतः |
अधस्तात् पट्टिके वृत्ते सारोर्ध्वं वृत्त पट्टिका ||
४६१ तस्योर्ध्वं कुर्परी कार्यास्तदूर्ध्वं कलशं विदुः |
त्रिशूलन्तु तदूर्ध्वं स्यात् तयोर्लक्षणमुच्यते ||
४६२ षड्भानु भाजिते क्षेत्रे कलशं वर्तयेद्धरे |
लिङ्गायाम समायामे तदर्द्धेन तु विस्तरे ||
४६३ अङ्गहीनांशतोच्छ्रे धारसांशैस्तु प्रविस्तृता |
पादपट्टी समुद्दिष्टा भागे नोल्लास निर्मितिः ||
४६४ उच्छ्रयो विस्तरस्तस्य वेदभागेन सुव्रत |
तत्पट्टीपाद भागोच्चा यथा शोभा प्रविस्तृता ||
४६५ कुंभिका तस्य रामांशैर्भागार्द्धेन समुच्छ्रिता |
कूर्परं वाम दक्षञ्च सार्द्धवह्यं शतोच्छ्रितम् ||
४६६ सूत्र भ्रमेण कर्तव्यन्ततः स्कन्धं विवर्तनम् |
कूर्परान्त द्विभागान्ते सव्यस्कन्धो भ्रमाद् भवेत् ||
४६७ अपसव्यो भ्रमेणैव द्विभागान्ते शतक्रतो |
उन्नता विस्तृता ग्रीवासारकर्णांशिका ततः ||
४६८ ब्रह्माननैः कपोलः स्यादर्द्धभागसमुच्छ्रितः |
अर्द्धे नैव समुल्लासः पद्मं नेत्रांशकोच्छ्रितम् ||
४६९ अन्धालैर्भूषयेत् कुंभं गुणभागावलंवितैः |
अशोक पल्लवैश्चित्रैर्यद्वा चूत समुद्भवैः ||
४७० कुंभास्यं शोभयेदेतैर्यथा शोभा वलंविभिः |
लक्षानुरोधतः कार्यं रूपं न्यूनाधिकं हरे ||
४७१ कलश लक्षणं ख्यातं त्रिशूलं वच्मि साम्प्रतम् |
द्वन्द्वानलाङ्गुलं ज्येष्ठे वेद युग्मैस्तु मध्यमे ||
४७२ रस चन्द्रैः कनिष्ठेः स्यात् त्रिशूलं सुरसत्तम |
स तारगोलकत्यागादधोदः स्याद् द्वयन्द्वयम् ||
४७३ कोणास्रे तुष्टि तुष्ट्यंशे मध्यशूलं ग्रहांशकैः |
यक्षांश विस्तृतिर्मध्ये तीक्ष्णाग्र मनुपाततः ||
४७४ मूले भागप्रविस्तीर्णं यद्वा शोभानुरूपतः |
मात्रांश विस्तृतन्दीर्घं रसांशैः सूत्रभ्रमणात् ||
४७५ मध्ये हस्तं व्यवस्थाप्य वृत्ताकारं सुशोभनम् |
वहिर्मध्ये करन्धृत्वा मध्ये सप्तांशसंस्थितम् ||
४७६ भ्रामयेद् दक्ष हस्तेन पार्श्वयोः शूलसिद्धये |
अधो रेखा द्वयं कार्यमर्द्धचन्द्रो पुमं हरे ||
४७७ सार्द्धपक्षांश सूत्रेण विस्तृतिर्भागसंमिता |
शृङ्गयोर्वाह्य रेखिन्यौ वाह्यवृत्तेन विन्यसेत् ||
४७८ म्ध्यस्थे चैव रेखे द्वे मध्य वृत्तेन योजयेत् |
अधोभाग द्वयं किञ्चिद् विभागान्तरसंस्थितम् ||
४७९ अर्द्धचन्द्रविधानेन भ्रामयेत् स्याद् यथा गतिः |
गण्डिका भूषितं मूले कुशन्तुर्यास्रकन्त्वधः ||
४८० शेषरेखा विनाशेन त्रिशूलं परिकीर्तितम् |
पार्श्वयोर्द्धामसूत्रेण विन्यसेत् कलशोपरि ||
४८१ अग्रे पृष्ठे च यत् सूत्रं मध्यशूलेन सङ्गतम् |
जगती वन्धकं वक्षे दिक्षु देवालयैः सह ||
४८२ प्रासादार्द्धेन सा कार्या पादोना वाथ तत्समा |
मण्डपाग्रे च तत् तुल्या चतुरस्रा सुशोभना ||
४८३ प्रासादार्द्धेन तद्वाह्ये दिक्ष्वष्टौ देवता लये |
तदर्द्धं वाह्यतस्त्यक्ता भित्तिर्वन्धन्तु कारयेत् ||
४८४ प्रासादभित्तिवत्कार्यञ्जगत्या भित्ति वन्धनं |
प्रासाद समसंस्थानाखुरादि भूषणान्विता ||
४८५ ऊर्द्ध्वं वरण्डिका युक्ता यथा वा तुष्टि मा वहेत् |
अजं नन्दीं महाकालं प्राचि वा वज्रपाणिनम् ||
४८६ अर्द्धनारीश्वरं सूर्यमाग्नेययां वा हुताशनम् |
मातृचक्रङ्गणेशम्वा कृतान्तन्दक्षिणे स्थितम् ||
४८७ अश्विनौ स्नायु (भृङ्गी)सन्नद्धं निर्-ऋत्यन्नैर्-ऋते न्यसेत् |
मृत्युघ्नं योगिनं देवं वारुणे वरुणन्न्यसेत् ||
४८८ षण्मुखं विश्वकर्माणं वायव्यामेणगं न्यसेत् |
कुबेरं लोकपैर्युक्तं सौम्ये देवीमुमां न्यसेत् ||
४८९ चक्रिणं चण्डनामानमीशानं वा स्वगोचरे |
प्रासादाभिमुखाः सर्वे मध्यसूत्र विवर्जिताः ||
Klöster und Königssitze

४९० मठश्चान्तक दिग्भागे लिङ्गिनां स्थितये हितः |
यतस्ते दक्षिणासायां वसेयुः शिवभाविताः ||
४९१ प्रासादविस्तरं सूत्रन्तन्मानञ्जगती वहिः |
प्राकारङ्कारयेत् त्यक्ता ततश्चाश्रमिणाङ्गृहम् ||
४९२ मठाग्रे तत्समन्त्यक्ता सिंहोयं दक्षिणे स्थितम् |
वृषोय पश्चिमे ज्ञेयं ध्वजेयं पूर्वतः स्थितम् ||
४९३ विपुलं वा प्रकर्तव्यं कर्तुरिच्छावसेन तु |
चतुरस्रे शरैर्भक्ते मध्यन्त्यक्ता विलोपयेत् ||
४९४ गृहाणां स्वेच्छया न्यासः सौम्ये स्याद् वशनिर्गमः |
एकभौमं द्विभौमं वा त्रिभौमं वा यथासुखम् ||
४९५ दीर्घशाला वृतं वाह्ये प्राचियागालयान्वितम् |
पाकादि गृह विन्यासं यथायोगं निवेशयेत् ||
४९६ पूर्वोक्तमन्तरञ्चार्द्धन्तस्याप्यर्द्धं यथायथम् |
मठिकैका त्रयङ्कार्यं पट्टशाला चतुष्किका ||
४९७ भूमयः पूर्वमुद्दिष्ठा वित्ताभावे कुटी मता |
समसूत्रं सु संस्थानं वास्तु पूजापुरःसरम् ||
४९८ लिङ्गिनाञ्च गृहङ्कार्यम्महापुण्य जिगीषया |
एतदेव महापुण्यङ्कथयामि तवाखिलम् ||
४९९ संस्थाप्य स्थावरं लिङ्गम्प्रासादे यद् भवेत् फलम् |
तत्फलं लभते विद्वान् मठे संस्थाप्य जङ्गमम् ||
५०० पुरादौ नूतनारम्भे उच्छन्नेवा पुरातने |
आदौ संपूजयेद् वास्तुं खवियदिन्दु भाजिते ||
५०१ चरक्याद्याः शरावस्थाः स्कन्दाद्या वेदसङ्गताः |
दितीशावन्तरिक्षार्चि एण पितृरूजानिलः ||
५०२ पदार्द्धार्द्ध भुजः शेषाः पदावस्थाः पुरन्दर |
तद्वदा पादपस्त्वष्टौ मरीचाद्या रसाधिपाः ||
५०३ स्वयम्भूर्वेदसंस्थस्तु पूजा होमादि पूर्ववत् |
आदिलिङ्गैर्गुणाञ्ज्ञात्वा भ्रुवो यत्र गुणोत्कटम् ||
५०४ स्थानं भूभृन्निवासाय त्रिविधन्तद्भुत्यपेक्षया |
वियद्रसग्रहैरेकं वियन्नागयमेन्दुभिः ||
५०५ खवियद्रसरूपैस्तु तृतीयं क्षेत्र लक्षणम् |
चतुरस्रं स्मृतं क्षेत्रं राज्ञामायतनस्य तु ||
५०६ दुर्गादौ सन्निवेशे तु पादभागाय तं स्मृतम् |
कन्यसं मध्यमञ्ज्येष्ठन्नृपा वासं विभूतितः ||
५०७ साधयित्वा पुरा तत्र सूत्रन्तारादि साधनैः |
दिग्विदिक्षु समङ्कृत्वा ज्ञात्वा वै मन्दिरापतिम् ||
५०८ प्रासादवद् यजेद् वास्तुं शिलान्यासन्तु कारयेत् |
पीठोच्छ्रितिं त्रिधा ज्ञात्वा ज्येष्ठमध्य कनीयसीम् ||
५०९ ब्रह्मस्थाने गृहङ्कुर्यान्नागदिक्करमानकम् |
भूतयुग्मैस्ततो वाह्ये प्राकारं परिकल्पयेत् ||
५१० दिशाभिश्चान्तरन्त्यक्ता खवियत्तनुब्बिर्गृहम् |
दक्षिणे यमरान्नस्तनेदनागैर्जलेशगम् ||
५११ उत्तरं रस गोत्रैस्तु पाद संवर्द्धितानि तु |
पृथक् प्राकार गुप्तानि शेषाण्यर्द्धार्द्धतो भजेत् ||
५१२ ध्वजं धूमं तथा सिंहं श्वावृषोखर कुञ्जरौ |
ध्वांक्षञ्चैव यथा न्यायं पूर्वादावायसंस्थितिः ||
५१३ पूर्ववदन्तरन्त्यक्ता वेदास्रं कारयेद् वहिः |
मूल गृहस्य पादेन नवधा भाजयेत् पुनः ||
५१४ ईशादौ कथ्यते न्यासः संक्षिप्तन्ते प्ररन्दर |
शान्ति चिह्नालयन्धर्मस्त्वकान्धान वस्त्रकम् ||
५१५ युग्मे पाकञ्च पात्राणां भोजनार्थोपयोगिनाम् |
वितथे मन्त्रिणां स्थान मन्त्र मार्गोपदेशिनाम् ||
५१६ शस्त्रमन्तः पुरङ्गात् कस्तूरी सौच वेश्म च |
तां मूलं सङ्ग्रहः स्त्रीणां पाचकान्स्त्री नियामकान् ||
५१७ भोज्यं सेनापतिर्मन्त्री वैद्य गन्धोपजीविनाम् |
मणिपुष्पादि संस्थानं मुख्ये दूत गृहन्ततः ||
५१८ राजहस्त्यादि संस्थानं क्षीरार्थं काष्ठिकङ्गृहम् |
उत्सार कालयं चान्ते इत्येवं भूभुजाङ्गृहम् ||
५१९ महाराजाधिराजस्य ज्ञेयमेतच्छचीपते |
विहाय वाह्यगे हानि स्थितिर्मध्य यथा ग्रहैः ||
५२० सामान्यस्य नृपस्यैवं कन्यसस्य विपर्ययैः |
न्यूनं वाप्यधिकङ्कार्यं ज्ञात्वा भूति वलावलम् ||
५२१ हस्त्यश्वादि कृते शेषं सुभृत्यानां यथा सुखम् |
प्राकारं कारयेद् वाह्ये शिखाहालादि भूषितम् ||
५२२ प्रतोली तुर्य संयुक्तं वेदाम्राद्यैः सुमण्डपैः |
अष्ठहस्तोच्छ्रितं कार्यम् पृथुत्वं सुदृढं यथा ||
५२३ वहिर्वहिस्थितानान्तु मध्यस्थानां रुचिर्यथा |
याक्षं जलाधिपंशाक्रं त्रिद्वारं वाहयेत् सदा ||
५२४ दक्षद्वारं सदापिहितं सङ्ग्रामेण विना हरे |
वहिः खाति कपायुक्तन्तद्वहिः शस्त्रिभिर्भटैः ||
५२५ सप्तप्राकार युक्तं वा महाराजाधि मन्दिरम् |
द्वारे द्वारे नियोक्तव्याः काष्ठिकाः शस्किणो भटाः ||
५२६ दृढं परीक्षितं द्वारं वाह्यतो विशतः क्रमात् |
अन्तर्वासो न कस्यास्ति यावन्ना वेदयेन्नृपः ||
५२७ राज्ञत्व विदितास्तत्र न विशन्ति कदाचन |
एवं नित्यनुरक्तस्य कल्याणं नृपतेः सदा ||
५२८ द्वारे द्वारे चतुर्दिक्षु हट्टः कार्यः सुशोभनः |
पूर्व हट्टस्य मध्ये तु आयतः सौम्ययाम्ययोः ||
५२९ नगरी निष्काश पर्यन्तं हट्टमार्गः सुशोभनः |
एवं दक्षे तथा वरुणे सौम्ये मार्ग चतुष्टयम् ||
५३० उदक् पूर्वादि विप्रादी न्यथा स्थानं निवेशयेत् |
खरासमादितः कृत्वा कोणकोणकरच्युतम् ||
५३१ अष्टादशावसानञ्च दैर्घ्याद् गृह चतुष्टयम् |
चतुर्णामपि वर्णानां ज्ञात्वा हानिं प्रकल्पयेत् |
पूर्वामुखञ्जपं शक्रं पूषा * *? र्व दक्षिणम् |
सुग्रीवं पुष्पदन्तञ्च प्रचेतः पश्चिमामुखम् ||
५३२ मुख्यं सोमञ्च भल्लाटं द्वारदैर्घ्येण कारयेत् |
तद्वाह्ये रक्षसार्थन्तु भृत्यवर्गान्निवेशयेत् ||
५३३ प्रजापालः स्मृतो राजा तस्मान्न्याययन्तु रक्षणम् |
वर्णानामनुपूर्वेण धर्मं देशापयेन्नृपः ||
५३४ श्रुति स्मृति पुराणानि आगमा धर्म देशकाः |
एतैर्यो वर्तते राजा स राज्यं भुञ्जते चिरम् ||
५३५ पुराणं वाध्यते वेदै रागमैश्च तदुक्तयः |
सामान्यञ्च विशेषञ्च शैवं वैशेषिकं व च ||
५३६ वाध्यवाधक भावेन नोविकल्पं विचक्षणैः |
यद्यथावस्थितं वस्तु सर्वज्ञस्तत्तदा व्रदेत् ||
५३७ आगमानां वहुत्वे तु यत्र वाक्य द्वयं भवेत् |
किं प्रमाणन्तदा ग्राह्यं प्रमाणं शाङ्करं वचः ||
५३८ ग्रन्थाद् ग्रन्थान्तरं टीका सापेक्ष निरपेक्षयोः |
समाधनन्तपोः कार्यमर्थापत्यादि साधनैः ||
५३९ एवं ज्ञात्वा सुराध्यक्ष निर्वृति परमाम्वुज |
एवं धर्मान्विते राज्ञि स्वराष्ट्रे सर्वदा शिवम् ||
५४० नृपालयाद्वहिर्दिक्षुर्हट्टानां पार्श्वयोर्द्वयोः |
पृथक्लीमा परिचितात् प्रसादात् कारयेन् नृपः ||
५४१ देवताधिष्ठिते स्थाने धर्मवृद्धिर्नृपे यतः |
सन्मुखा विमुखाः कार्याः कर्तुरिच्छावसेन तु ||
५४२ विशेषविमुखानान्तु रूपकसन्मुखं रथे |
तद्रूपं भूषणोपेतं तद्वेषायुधधारिणम् ||
५४३ वरदाभयपाणिञ्च न्यसेदेवं समाहितः |
तुल्यमेवं द्वयोर्दृष्टं रूपकं सन्मुखं यतः ||
५४४ एवं कृते महाशान्तिर्नृपेराष्ट्रे तु सर्वदा |
तैरेवान्तरितोश्चान्ये प्रसादात् तद्वहिः स्थिताः ||
५४५ सन्मुखा विमुखाः कार्याः कर्तुरिच्छा वसेन तु |
सस्तैरन्तरितास्ते तु नते दोषावहाहरे ||
५४६ देवता रूपकैर्युक्ता गुणोत्कर्षं वहन्तिते |
तेभ्यो येन्ये वहिर्भूतास्तत्राप्येवं व्यवस्थितिः ||
५४७ नगराद्वहिश्चतुर्दिक्षु लक्ष्मी यक्षाधिपौ न्यसेत् |
विभूतिञ्चिन्त्यमानौ तु नृपस्य तन्निवासिनाम् ||
५४८ नगराभिमुखौ कार्यौ वरदा भयपाणिनौ |
नियमस्तत्कृते दृष्टो न सर्वत्र पुरन्दर ||
५४९ पूर्वादौ सर्वतो दिक्षुस्वस्थाने ये सुरालयाः |
सन्मुखा विमुखाः कार्याः कर्तुरिच्छावसेन तु ||
५५० पूर्ववल्लक्षणैर्युक्ताः शान्ति श्रेयस्करा नृणाम् |
एवं देवालयैर्युक्ते यत्फलन्तन्निगद्यते ||
५५१ धर्म वृद्धिर्भवेन्नित्यं कल्याणं सर्वप्राणिषु |
राज च वर्तते नित्यं सामात्योवलवाहनैः ||
५५२ नोपसर्गभयन्तस्य प्रातिराज्यो न दुर्गतिः |
धर्मवृद्धिर्भवेत् कर्तुः पुत्रपौत्रान्वयैः सह ||
५५३ एवं सर्वत्र विज्ञेयं पुरादौ देवता लयात् |
अस्मादि कल्पितानान्तु लिङ्गानां नृस्वरूपिणाम् ||
५५४ मानुषैः स्थापितानान्तु नान्येषां पाकशासन |
नायं विधिः स्वयं वयक्ते न वाणे सुरनायक ||
५५५ सन्मुखौ विमुखौ कार्यौ सर्वानुग्रहको यतः |
स्वोच्छवाणे सदा देवः सन्निधः स्वेच्छया शिवः ||
५५६ प्राणिनामनुकम्पार्थन्न तयोर्नियमः क्वचित् |
प्रासादे द्वार विन्यासे पीठे चैव तु मण्डपे ||
५५७ जगती पाद विन्यासे प्रतिष्ठासु न विद्यते |
महद्भिः स्थापितानान्तु लिङ्गानां घटितात्मनाम् ||
५५८ विधिः पूर्वोदितस्तत्र प्रासादादौ न कुत्रचित् |
भूपरीक्षां समारभ्य प्रासादान्तम्पृथक्पृथक् ||
५५९ निःसन्दिग्धं सु संवेद्यं स्फुटार्थं यत् क्रमागतम् |
कथितन्ते सुराध्यक्ष लिङ्गादौ स्थापनं शृणु ||
५६० इति मोहचूरोत्तरे प्रासादप्रख्याने चतुर्थः पटलः ||
Weihe, Verehrung und Erneuerung
५६१ स्कन्द उवाच ||
५६२ कर्तुश्चैवानुकूलेन नक्षत्रादौ शुभे दिने |
प्रतिष्ठा शुक्लपक्षे तु श्रेष्ठा चोदग्गते रवौ ||
५६३ ब्राह्म्यं शैवं जलाध्यक्षमाप्यं विश्वाधि दैवतम् |
नागं सौरं हरिं मित्रं सोमं शक्रं सदागतिम् ||
५६४ त्वष्टाधि दैवतं पौष्णं वसवञ्च शुभानि तु |
प्रतिष्ठा सर्वदेवानामेतैः कार्या शतक्रतो ||
५६५ गुरुः शुक्रो बुधश्चन्द्रो ग्रहाः सौम्याः प्रकीर्तिताः |
द्रव्यमायुः प्रजापुष्टिं वाञ्छा प्राप्ति करास्त्विमे ||
५६६ न न्यूनानाधिका कन्या जलाधारं शिवोद्वहम् |
कोणलग्नं सदाश्रेष्ठं प्रतिष्ठायां शिवागमे ||
५६७ छागं युग्मङ्कुलीरञ्च हरिं कीटन्तथैव च |
ऋतु रूपानलागैश्च स्वरूपैः शोभनः शशी ||
५६८ मैत्रं परममैत्रञ्च संपत्क्षेमञ्च शाश्वतम् |
ववञ्च वालवञ्चैव लौलवन्तै तिलन्तथा ||
५६९ ताराकरणं शुभं शक्र सर्वदेव निवेशने |
युग्माभूतारसानागा दिशा रुद्रा दिवाकराः ||
५७० कामापूर्णा सुराध्यक्ष तिथयस्तु सुसम्मताः |
भौममन्दौ त्रिषष्ठस्थौ चन्द्रादित्यौ तथा पुनः ||
५७१ दशमौ तु मुनिश्चन्द्रौ द्विसप्ताहूः शरैर्गुरुः |
युग्मतुर्य रसाष्टैस्तु दशस्थः शोभनो बुधः ||
५७२ रससप्त दशार्कस्थ शुक्रस्त्याज्यः प्रयत्नतः |
उत्पातञ्चैव काणञ्च मृत्युयोगं विवर्जयेत् ||
५७३ क्षेत्र ऋक्षे ग्रहाः सर्वे यमघण्टेति निश्चिताः |
यस्मात् ते सर्वकार्यघ्ना प्रतिष्ठायां न योजयेत् ||
५७४ क्षीणचन्द्रस्तथादित्य कुजार्किस्तैर्युतो बुधः |
पापाः पापांशया यस्मात् सर्वकार्ये विवर्जयेत् ||
५७५ रजनीं प्राप्य सर्वेषां प्रभावो न यथा दिवा |
आनन्दामृत सिद्धैस्तु योगैर्नैमित्तिकैः शुभाः ||
५७६ प्रशस्ता सर्वकार्यंषु प्रतिष्ठायां विशेषतः |
माघ फाल्गुन वैशाखे आषाढे वा शुभे दिने ||
५७७ केन्द्रस्थे च गुरौ शुक्रे न लग्ने दोषदा ग्रहाः |
नष्ट चन्द्रे तथा शुक्रे गुरावस्तवनङ्गते ||
५७८ प्रतिष्ठादौ शुभारंभं दूरयात्रां न कारयेत् |
सौभाग्यः शोभना युष्मान् सिद्धः साद्ध्यः शिवः शुभः ||
५७९ वृद्धिः प्रीतिर्धृतिः सिद्धिर्ध्रुवः शुक्लश्च शोभनाः |
यजमानस्यानुकूलेन प्रासादाग्रे तु कारयेत् ||
५८० उत्तमं वेद युग्मैस्तु वस्वेकेन तु मध्यमम् |
युग्मेन्दु कन्यसन्धाम ज्ञात्वान्यत्र प्रयोजयेत् ||
५८१ चतुरस्रं समङ्कृत्वा वास्तु मिष्ट्वा यथा पुरा |
खात्वाशल्योद्धृतिं कृत्वा पूरयित्वा दृढं यथा ||
५८२ त्रिभाग वेदिका युक्तं कोणस्तंभ विराजितम् |
वाह्येप्येव विधं स्तंभैर्यज्ञ वृक्ष समुद्भवैः ||
५८३ दशाष्ट षट्करोच्छेधैर्ज्येष्ठादीनां क्रमेण तु |
प्रदेशो वा यदा नास्ति अधो वा सुदृढं यथा ||
५८४ यत्रा भावस्तु वृक्षाणान्तत्र यद्रुचितङ्कुरु |
उच्चा सूर्याङ्गुला वेदी ततोर्द्धाङ्गुल विच्युतिः ||
५८५ ज्येष्ठज्येष्ठ्यासुरश्रेष्ठ ज्ञात्वान्यत्र प्रयोजयेत् |
विन्दु वेदाङ्गुलं कुण्डं दृक्त्यागात् तु यथाक्रमम् ||
५८६ ज्येष्ठादिकन्यसान्तान्तां वेदी पादाद्वहिः कृतम् |
वेद युग्मासितङ्कृत्वा अङ्गुलं भागसंमितम् ||
५८७ तावद् भिरङ्गुलैर्हस्तं कुण्डानां परिकल्पयेत् |
हस्तमात्रं खनेत् तिर्यग् ऊर्ध्वं मेखलया सह ||
५८८ वहिः खाताङ्गुलं कण्ठः सर्वकुण्डेष्वयं विधिः |
मेखला त्रितयं कार्यं कोणरामयमाङ्गुलैः ||
५८९ दैर्घ्यात् सूर्याङ्गुलानाभिस्त्र्यंशो ना विस्तरेण तु |
एकाङ्गुलोच्छ्रिता सा तु प्रतिष्ठाभ्यन्तरे तथा ||
५९० कुंभ द्वय समायुक्ता अश्वत्थदलवद्यथा |
अङुष्ठ मेखला युक्ता मध्ये त्वाज्य धृतिर्यथा ||
५९१ दक्षस्था पूर्वयाम्ये तु जलस्था पश्चिमोत्तरे |
दिक्षु वेदास्र वृत्तानि पञ्चमन्त्वीशगोचरे ||
५९२ तस्य नाभिर्जले दक्षे यदिष्टन्तत्करिष्यति |
कुण्डानि पञ्च एकं वा कर्तव्यं पूर्वतः स्थितम् ||
५९३ चतुर्मुखः प्रकर्तव्यः स्नानाख्यस्तस्य चोत्तरे |
ईशे प्राच्यथवा कार्यो वेदिकाद्वितयान्वितः ||
५९४ न्यग्रोधोदुम्वरोश्वत्थ प्लक्षास्तोरण मूर्तयः |
सूर्याङ्गुलाधिकैर्नागैरष्टभिर्मुनिभिः करैः ||
५९५ सप्तहस्तादधो यत्तु हस्तहस्त परिच्युतेः |
तोरणद्वितयं ख्यातन्तदूर्ध्वं तोरण द्वयम् ||
५९६ अन्तरालं त्रिधाभाज्य एकत्वेन नवैव तु |
सर्वेषान्तोरणानान्तु पञ्चमांशं प्रवेशयेत् ||
५९७ विस्तरेणोच्छ्रयन्तुल्यं वाहुल्येन षडङ्गुलम् |
पञ्चहस्तादितः कृत्वा वर्द्धयेदङ्गुलाङ्गुलम् ||
५९८ उच्छ्रयं पञ्चधाभाज्य शूलं पक्षांश निर्गतिः |
शाखयोरङ्गुलैश्चूला वसुभिश्चाङ्गुलन्ततः ||
५९९ पूर्ववृक्षोद्भवास्तंभा याज्ञिका वा अभावतः |
द्विगुणं ब्रह्मणो भागात् क्षीरवृक्षसमुद्भवम् ||
६०० पद्माङ्कञ्चतुश्चरणं रसैकाङ्गुलमुच्छ्रितम् |
उपस्करकुटीकार्या वारुण्यां मण्डयार्द्धक ||
६०१ स्रुक् स्रुवौ लक्षणो पेतौ यज्ञवृक्षसमुद्भवौ |
उदुम्वरपलाशाम्ररुद्राश्वत्थमधूकतः ||
६०२ रसरामाङ्गुला कार्या दोर्दण्डे नाथ वा समा |
अष्टाङ्गुला स्मृता वेदी कण्ठोङ्गुष्ठः फलं स्वरैः ||
६०३ उत्तमामध्यमा कन्या एकैकाङ्गुल हानितः |
मध्ये वृत्तन्तु संभ्राम्य त्यक्तैकं पट्टिकाङ्गुलम् ||
६०४ तत्समञ्चाध वाहुल्यं समस्तञ्चतुरङ्गुलम् |
पार्श्वयोरङ्गुलं स्थाप्य कुंभाकारमधो यथा ||
६०५ अग्रे त्रिभाग विस्तारमाज्यरन्ध्र कनिष्ठया |
गण्डिकाद्व्यङ्गुला दीर्घादण्डादेकाङ्गुलाधिका ||
६०६ षडङ्गुल परीणाहं शेषं दण्डस्य दीर्घता |
वृत्तवत्कलशोपेता तदङ्गोहास्तिकः स्रुवः ||
६०७ पृष्ठे कुंभ द्वयोपेतः पङ्के गोपदवद्यथा |
द्व्यङ्गुलं पुस्करन्तस्य दण्डमेकाङ्गुलं विदुः ||
६०८ गण्डिकाद्वियवा तस्य दण्डाग्रे कलशोद्गतिः |
वाहुमात्रांकुशैः स्निग्धैः खरामदलवर्तिताः ||
६०९ विष्टरास्तु प्रकर्तव्या मूलाग्रे दर्भग्रन्थयः |
तत्समा यज्ञ वृक्षोत्था परिधयः सुलक्षणाः ||
६१० प्राक्षेद मात्राः समिधः स्फुटिता दोषवर्जिताः |
अर्कोद्भवापलाशोत्था खदिराङ्गापामार्गजा ||
६११ अश्वत्थो दुम्वरोद्भूताः शमीदूर्वा समुद्भवाः |
कुशोत्था ग्रहशान्त्यर्थन्तदभावात्तिलैर्यवैः ||
६१२ इन्धनानि चतुष्कानि प्रशस्तान्यग्नि कर्मणि |
सौवर्णं राजतन्ताम्रं कुक्षिमत्कम्वुकन्धरम् ||
६१३ तद्वच्चकर्करी ज्ञेया सुरूपा चारूदर्शना |
अभावान्मृद्भवं सर्वं कृष्णावर्तादि वर्जितम् ||
६१४ कलशागड्डुकाप्येवं कुंभाश्चैवोपयोगिनः |
लोहिताः ससरावाश्च दीपवृक्षादि मल्लिकाः ||
६१५ नैवेद्यरन्धनार्थन्तु नानापाक समुच्चयम् |
अखिलं यागसंभारं यागभूमौ समाहरेत् ||
६१६ पञ्चहस्ता ध्वजां कार्या वैपुल्येन द्विहस्तिकाः |
सप्तहस्ता पताकास्तु विंशत्यङ्गुल विस्तृताः ||
६१७ पञ्चहस्ता ध्वजानान्तु पञ्चमांश प्रवेशिताः |
दशहस्ता पताकानां दण्डाः पञ्चांश वेशिताः ||
६१८ सिन्दूरा कर्वुरा धूम्रा धूसरा मेघसन्निभाः |
हरिता पाण्डुवर्णा च शुभ्राः पूर्वादितः क्रमात् ||
६१९ एवं वर्णाध्वजाः कार्याः पताकापाकशासन |
मध्ये श्वेताथ वा पीता दर्पणाद्युपशोभिता ||
६२० मण्डपान्तं वितानं स्यादथ वा वेदिकोपरि |
वस्त्रैरुल्लोचयेत् स्तंभान्तथा तोरण मूर्तयः ||
६२१ शान्तः शिशिर पर्यन्य विशोकाप्यायका मृतान् |
धनश्री शौच स्तम्भाधो द्वौ द्वौ रत्न युतौ न्यसेत् ||
६२२ चूतपल्लवशोभाढ्यान्प्रत्येकं कण्ठ वाससान् |
कदली स्तंभ विन्यासैः स्रग्दाम चूत पल्लवैः ||
६२३ शोभयित्वा वहिः पश्चात्ततश्चाभ्यन्तरं विशेत् |
वेदिकोपरि चैशान्यां सर्वधान्यासने स्थितम् ||
६२४ वस्त्रयुग्मावृतं कण्ठे चूतपल्लवशोभितम् |
स रत्नं शिव कुम्भञ्च भूषयन्तं मखालयम् ||
६२५ कर्करी तत्सखी वामे भूषितानाल पश्चिमा |
धर्माद्याः कोणसंस्थास्तु रत्नवस्त्रविभूषिताः ||
६२६ इन्द्रादि कलशोप्येवं तथा शान्ति घटानपि |
एवं निद्रा घटो दृष्टो ब्रह्मलक्ष्मी हरेर्घटाः ||
६२७ स्रग्वस्त्रवेष्टितं कुण्डं स्रुक्स्रुवौ तत्समीपगौ |
उपस्कर कुटी मध्ये स्थापयेद् यज्ञसाधनम् ||
६२८ ताम्रमयी चरुस्थाली स पिधाना स चट्टुका |
लोहयन्त्रिकया युक्ता चरुस्थालं तथाविधम् ||
६२९ स नालन्ताम्रपात्रञ्च घण्टाधूपक उच्छ्रकम् |
खभूतपलसंख्यन्तु तस्यार्द्धः स्यात् ततोर्द्ध्वतः ||
६३० ज्येष्ठादि कन्यसान्तानान्त्रिधा स्यादर्घपात्रकम् |
हेमद्रव्यादि निर्वृत्तम् भवादनुरूपतः ||
६३१ यन्त्रिका च तथा ज्ञेया प्रति कुण्डेर्घ पात्रकम् |
तथा तिलाज्य पात्राणि गन्धाख्यं स्यात् तथाविधम् ||
६३२ पञ्चगव्यस्य पात्राणि पञ्चैव परिकल्पयेत् |
तथाभ्यङ्गस्य पात्रञ्च लक्षणार्थं मधूद्वहम् ||
६३३ रामयुग्मैकमासैस्तु शलाका ज्येष्ठतः क्रमात् |
तूलिका द्वितयं कार्यं सोपधानं पटावृतम् ||
६३४ शययार्थं स्मृतः पट्टः पट्टाश्चैवोपवेशने |
गृहार्थन्तु चरूस्थाली पूर्वलक्षणलक्षिता ||
६३५ घटीताम्री तथा पात्रं भोजनार्थं प्रकल्पयेत् |
मार्जनीकण्डनीपेषी गृहोपस्कररणानि च ||
६३६ करण्डाड उल्लिका व्यजनं कण्डालाद्यन्तथैव च |
अपर्युषित पुष्पाणि बिल्वपत्रादि पत्रिकाम् ||
६३७ धूपार्थं गुग्गुलं साज्यं चन्दनं भोज्य सन्ततिः |
होमार्थन्तिलयवौसर्पिर्यथा योगं समाहरेत् ||
६३८ द्रव्याणामप्य लाभे तु यथा लाभमुपाहरेत् |
लिङ्गादि शोधनार्थन्तु स्नानद्रव्यं निगद्यते ||
६३९ गङ्गातीरमृदो ग्राह्याः कुलाद्रौ तीर्थसङ्गता |
पद्मखण्डे च वल्मीकेन दीनां सङ्गमेपि च ||
६४० उद्धृता दन्तिनान्दन्तैर्वृषैः सानन्ददर्पितैः |
न्यग्रोधोदुम्वरोश्वत्थ जम्वाम्र त्वक् सुशोभना ||
६४१ मुरामांसीवचा कुष्टं शैलजं रजनीयकम् |
सटीचम्पकमुस्तञ्च सर्वौषधिगणः स्मृतः ||
६४२ उशीरञ्चन्दनं लोध्रं तगरं फलिनी जला |
लक्षणागिरिकर्णी च क्षीरिणी वृहति शिखा ||
६४३ ब्रह्मदण्डी नागकर्णी सहदेवा पुनर्नवा |
कुमारी द्रोणपुष्पी च शंखिनी खरमञ्जरी ||
६४४ शिवाग्नौ संस्कृतं भस्म वस्त्रेणान्तरितंसितम् |
गोमूत्रङ्गोमयं क्षीरन्दधिशर्पिः पृथक् पृथक् ||
६४५ पञ्चामृतन्तथा भूतं फलानि विविधानि च |
रत्नादि पञ्चकञ्चैव सुसंपूर्णं पृथक् पृथक् ||
६४६ हैमङ्कूर्मन्तथा पद्मम्पारदंत्वोमतन्दुलाः |
इत्येवमादि संभारङ्कुम्भाद्यंयन्न चोदितम् ||
६४७ सर्वं सुसम्भृतं कृत्वा ज्ञापयेद् देशिकोत्तमः |
वृणुयाद् देशिकं पूर्वं वस्त्रहेमादि भूषणैः ||
६४८ तथानुमूर्तिपान्सर्वानस्तु जापि समन्वितान् |
ऋत्विजान्वेदनिष्ठांश्च बोधयित्वा च शिल्पिनः ||
६४९ श्रद्धाविष्टः शुचिः कर्ता नत्वा विज्ञापयेदिदम् |
त्वत् प्रसादाच्च हे नाथ लिङ्गसंस्थापनं मम ||
६५० हुङ्कारोमीत्यनुज्ञाय नित्यनिर्वर्तितो गुरुः |
आवश्यकन्ततः शौचमिन्द्रियाणाञ्च शोधनम् ||
६५१ मलस्नानं विधिस्नानं स सन्ध्यम्भस्मगुण्ठनम् |
यतिनो गृहिणः पूर्वसन्ध्यादौ समता द्वयोः ||
Sandhya, Atem und innere Verehrung
Als ergänzende Praxispause zum Sanskritstudium: eine heutige Herzmeditation.
६५२ सन्ध्याया लक्षणं शक्र प्रसङ्गेन निगद्यते |
आद्या शक्तिः पुरानित्या यासा कारणधर्मिणी ||
६५३ सा सन्ध्या परमार्थेन बोधेनाव गतात्मनः |
ध्याननिष्ठा प्रतिष्ठानां पुंसां लक्षानुरोधतः ||
६५४ मृणालसूत्रसङ्काशा पश्चात् स्थूलतराऽभवत् |
पूर्वकालादि भेदेन भिन्नवर्णाः पृथक् पृथक् ||
६५५ रक्ताशुक्ला तथा श्यामा चतुर्थी रूपविच्युता |
श्यामवर्णाथ वा सन्ध्या पश्चिमासुरसत्तम ||
६५६ लक्षमात्रधराः सर्वालक्षणैस्ता विवर्जिताः |
सत्वं रजस्तमश्चैव त्रयाणान्तु गुणत्रयम् ||
६५७ निर्गुणा च निराकारा त्वन्तिमा परमार्थतः |
हृदये च तथा विन्दौ ब्रह्मरन्ध्रे निरास्पदे ||
६५८ चतसृणां समुद्दिष्टन्ध्यानस्थानं शतक्रतो |
ज्ञानिनाङ्कथितङ्किञ्चिद् योगिनां कथ्यते हरे ||
६५९ अन्ते सूर्यस्य चन्द्रस्य द्वे सन्ध्ये प्राणयोगिनाम् |
परयोगेन कथितात्वन्यथा मम शूलिना ||
६६० शुद्ध बोध पदावस्था आत्मनो या शचीपते |
सन्ध्यान्तामपरां विद्धि शून्यरूपां परां पुनः ||
६६१ यथाकाल क्रमेणैव सन्ध्यां ध्यात्वा स्वभावतः |
मन्त्रैः शिवात्मकैः पश्चात् कुर्यात् तीर्थं सुभावितः ||
६६२ मार्जनं संहिता मन्त्रैः कृत्वा दक्षकरे स्थितम् |
बोधरूपन्तु तत्तोयमिडाया कर्षयेत् ततः ||
६६३ कुंभकस्थस्तदातिष्टेद् यावन्नोद्गच्छते रविः |
पिङ्गयारविवाहिण्या कारयेदघमर्षणम् ||
६६४ शिवमन्त्रं मृणन्मन्त्रि स्वाहान्तमुदकाञ्जलिम् |
दत्वा शिवाय गायत्रीञ्जपेत् पश्चात् सुभावितः ||
६६५ जप्त्वा निवेद्य देवाय तर्पणङ्कारयेत् ततः |
मन्त्रा देवाश्च ऋषये मनुष्याः कुणपास्तथा ||
६६६ पितरो मातरश्चैव मन्त्रैर्वै जाति योजितैः |
एतान् सन्तर्प्य मेधावी मेधावी आचमेत् पाकशासन ||
६६७ आदित्यं पूजयित्वा तु पश्चाद् गच्छेन् मखालयम् |
अभ्यर्च्य तोरणा नादौ द्वाराध्यक्षान् यथाक्रमम् ||
६६८ आरोग्यं शान्ति भूतिञ्च वलं सौम्यादितः क्रमात् |
धनश्री शौच शान्तादि युग्मयुग्मन्निवेशयेत् ||
६६९ देवीश्चैव तु चण्डीशं नन्दिनं कालमेव च |
भृङ्गीशञ्च गणाध्यक्षं दुर्मुखं स्कन्दमेव च ||
६७० गन्धैः पुष्पैश्च संपूज्य शिवाज्ञां संविधाय च |
यज्ञस्य रक्षकत्वेन स्थातव्यमां हितादरैः ||
६७१ वज्रादीनि पताकासु कुमुदाद्यं ध्वजेषु च |
स्फुरतो विन्यसेद् विद्वान् सर्वविघ्न भयङ्करान् ||
६७२ पिधाय सर्वद्वाराणि पश्चाद् द्वारेणसंविशेत् |
द्वारदेशे ततः स्थित्वा स्मरन्नस्त्रं सुभास्वरम् ||
६७३ विलोक्ययाग संभारं भूमौ पादाहतिं त्रिधा |
विद्युत्पुञ्जनिभं पुष्पन्तन्मध्ये हेतिनाक्षिपेत् ||
६७४ तत् तेजः पूरितन्धाम निरस्ता विघ्नसंहतिः |
दुःसहं परमं ह्येतदहो विस्मयमा गताः ||
६७५ तर्जयत् संविशेन्मध्यं गणान्वै विघ्नरूपिणः |
हेतिना विन्यसेत् पुष्पञ्ज्वलन्तन्द्वाररक्षकम् ||
६७६ प्रदक्षिण क्रमेणैवमुप विशेद्वेदिकोपरि |
दक्ष हस्तन्ततो वा मन्तयोः पृष्ठञ्च हेतिना ||
६७७ संशोध्य विन्यसेच्छक्तिम्सुधारूपं शिवेन तु |
मूर्तिं शिवन्तदङ्गानि कनिष्ठाद्या सुयोजयेत् ||
६७८ परमी कृतिन्तयोः कृत्वा धर्मगुप्तिन्ततः पुनः |
शोधयेद् भूतसङ्घातन्धारणाभिश्च पञ्चभिः ||
६७९ उद्यानैः पञ्चभिः पूर्वन्ततोन्यत्रैक विच्युतिः |
शून्यं शून्ये तु विन्यस्य न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ||
६८० अमृतञ्चिन्तयेत् पश्चाल्लब्ध्वानन्दगुणोदयः |
ततश्च शाक्तां मूर्ति शक्तां वीक्षं स्वके न्यसेत् ||
६८१ वक्त्रे वक्त्रं हृदिघोरं गुह्यं वाममधस्त्वजम् |
ततः शिवं षडङ्गञ्च यथा स्थानन्निवेशयेत् ||
६८२ परत्वञ्च महामुद्रां पादादारभ्य विन्यसेत् |
एवं कृत्वा पुराशक्र अन्तर्यागमथारभेत् ||
६८३ तडित्पुञ्जनिभन्ध्यात्वा ज्वलद् द्वीपशिखा कृतिम् |
तुषारदानरूपं वा शुद्ध स्फटिक रूपि वा ||
६८४ एषामेकतमन्ध्यत्वा यस्मिंल्लक्ष्ये व्रजेन्मनः |
पुष्पभावः क्षमाचार्घं दीपममलात्मकं विदुः |
अध्यवसायात्मिका बुद्धिः पुंसिलक्षस्य वेदने |
एवं विलेपनं शक्र येनाणुः स्यादलेपकः ||
६८५ अग्निः प्राणामतः पात्रं गर्वो धूपशिखा कुलः |
भावितस्तत्वाभावेन यदा लक्षं व्रजेत् पुमान् ||
६८६ स्वसम्वित्तौ शिवत्वेन तदा गवीयते किल |
धूप एष समाख्यातो नैवेद्यं विषयाः स्मृताः ||
६८७ आसनं प्रकृतिर्ज्ञेया पूजकः पुरुषः स्मृतः |
नाद समना समायोगात् स्वभावं व्रजते यदा ||
६८८ तदा जपः समुद्दिष्टो येनाणुः स्याच्छिवः स्वयम् |
नाभावेवन्तु सम्पूज्य प्राणाग्नौ तेज सान्निधौ ||
६८९ परमामृतरूपेण विषयाञ्जुहुयात् समाहितः |
होम एष समाख्यातो हुत्वा केवलतां व्रजेत् ||
६९० निस्तरङ्गे परे तत्त्वे व्यापके भाववर्जिते |
तल्लयत्वङ्गत आत्मा ध्यानमेतत् प्रकीर्तितम् ||
६९१ प्राकारश्चैव दिग्बन्धस्तर्जनं खातिका तथा |
शक्तिजालञ्च विज्ञेयं पञ्चमन्तत्सुदुःसहम् ||
६९२ अस्त्राभि मन्त्रितां करकीं तेजो रूपां सुदुःसहाम् |
तदम्वु प्रोक्षितं सर्वं द्रव्यजातमदोषकृत् ||
६९३ प्रक्ष्याल्य चार्घपात्रन्तु पूरयेद्ध्यानमाश्रितः |
न्यस्त्वा शक्तिं शिवं साङ्गं परत्वं मुद्रया कृतम् ||
६९४ विशोद्ध्य द्रव्यसंभारमात्मपूजां प्रकल्पयेत् |
सव्यहस्ते शिवञ्चेष्ट्वा तत्त्वन्यासपुरःसरम् ||
६९५ तेजोरूपं न्यसेद्ध्यात्वा समस्ते निष्कलं शिवम् |
लिङ्गादि वेशने पत्युः सामर्थ्यं मद्वशं यतः ||
६९६ भावयित्वा धिया सर्वं यज्ञारंभं समारभेत् |
ऋतुरामदलनिर्वृत्तं ज्ञानासिन्ताल सम्मितम् ||
६९७ सप्ताभि मन्त्रितं कृत्वा वाम कक्षे निवेशितम् |
पञ्चगव्यन्ततः कुर्याद् विकरादभि मन्त्र्य च ||
६९८ इष्ट्वा वास्तुं विकीर्याथ नानाशस्त्र स्वरूपिणः |
लाजा चन्दन सिद्धार्थ भस्म पुष्प कुशाक्षतान् ||
६९९ सुगन्धैर्गन्धपुष्पाद्यैः पूजयेत् कलशंवरम् |
सासनेन सदेहेन शिवेन समधिष्ठितम् ||
७०० एवमस्त्रालुकं चेष्ट्वा लोकपान्पूजयेत् क्रमात् |
शिवयागः समारब्धस्त्वद्भक्तानां शिवाज्ञया ||
७०१ रक्षणीयोन्तरायेभ्यो लोकपाः सुसमाहितैः |
इत्याज्ञां श्रावयेत् कुंभान् भ्रामयेदग्रतोस्त्रकम् ||
७०२ प्रदक्षिण क्रमेणाथ स्थापयेत् कलशालुके |
दत्वा स्थिरासनं पूर्वं विन्यसेत् कलशालुके ||
७०३ दत्वा स्थिरासनं पूर्वं विन्यसेत् तदनन्तरम् |
धारिकादि क्रमेणैव यावत् स्याद् विमलासनम् ||
७०४ प्राप्तिं व्यप्तिञ्च सामर्थ्यं मन्त्राणां परिणति क्रमम् |
यत् स्वरूपञ्च विन्यासं येन तत्कार्यसाधनम् ||
७०५ एवं ज्ञात्वा पृथक् सर्वन्ततो मन्त्रन्नियोजयेत् |
आसनङ्कारणान्तन्तु मूर्तिः शक्ति स्वरूपिणी ||
७०६ शोध्याध्यानन्न्यसेत् पश्चात् सृष्टिमार्ग क्रमेण तु |
इच्छाशक्ति मयीं मूर्तिं कल्पयेच्छां भवस्य तु ||
७०७ आवाहयेत् ततो देवं सूर्याग्नि चन्द्रयोगतः |
सन्निधानन्निरोधञ्च कृत्वा वेदावगुण्ठनम् ||
७०८ अमृतीकरणं योज्यमर्चान्तार्घञ्च चन्दनम् |
स्नानं प्रकल्प्य * * * संपूज्य धूपयेत् ततः ||
७०९ अङ्गान्याहूय संस्कृत्य पूजयित्वा विधानतः |
धूपदीपादिनैवेद्यमुपचारान्निवेदयेत् ||
७१० तोयं पवित्र दानञ्च परमीकरणन्ततः |
यथोक्तन्तु जपङ्कृत्वा वर्द्धन्यामखिलन्त्विदम् ||
Vorbereitung und Einsetzung des Lingams
७११ प्रणिपत्य पुनश्चेष्टा ततो विज्ञापयेदिदम् |
त्वन्मुखोक्त विधानेन रक्षितोयं मयामख ||
७१२ इदानीमन्तरायेभ्यः संकानो त्वत् प्रसादतः |
तस्मात् प्रबोधनि स्त्रिं शंगृहाणाज्ञां प्रदेहि मे ||
७१३ लिङ्गादि साधनं देव शोध्य बोध्यत्वमागतम् |
ममाज्ञया कुरुष्वेवं लिङ्गादौ शोध्यसन्निधिः ||
७१४ उक्तं शिवेन संभाव्य ततः कुण्डान्तिकं व्रजेत् |
निरीक्ष्य प्रोक्ष्य संभाव्य अभ्युक्ष्य च यथाक्रमम् ||
७१५ खात्वाविकीर्य तत्पूर्य समीकृत्याभिषेचयेत् |
निरूढ्य मार्जनं कृत्वा लेपनं कुण्ड कल्पना ||
७१६ परिधानं त्रिसूत्रेण रेखा तुर्यश्चतुष्पथम् |
सर्व मन्त्रेणवस्वेक संस्कारं कुण्डकर्मणि ||
७१७ वर्मणा त्वक्षपाटन्तु विस्तरं चत्वरे हृदा |
वागीशौ पूजयेत् तत्र वृषस्यन्तौ सुयौवनौ ||
७१८ ताम्रे नालयुते वह्निं वीक्षणाद्यैर्विशोधयेत् |
भागं पलाशिनां त्यक्ता तदैकत्वं यथा त्रिधा ||
७१९ तद्वीजं विन्यसेत् तत्र षडङ्गे नाभि मन्त्रयेत् |
गृहीत्वा भ्रामयित्वा तु ईश वीज स्वरूपिणम् ||
७२० गर्भनाड्यां क्षिपेच्छक्तेर्दत्वा तोयन्तयोस्ततः |
गर्भाधानमजे नैव पुंस्त्वेवामं नियोजयेत् ||
७२१ सीमन्ते बहुरूपन्तु वक्त्रम्वै जातकर्मणि |
अर्घोदकेन संप्रोक्ष्य सदिध्याः पञ्चहोमयेत् ||
७२२ पूर्वादौ विष्टरन्यासं ब्रह्मादींल्लोकपान्यजेत् |
स्रुक्स्रुवौ वीक्ष्य संप्रोक्ष्य शक्तिं शंभुञ्च विन्यसेत् ||
७२३ शुद्धाज्येन मुखाघारं सन्धानमेकतान्ततः |
नाम्नी त्वीशञ्च सन्धाय पितरा विष्ट्वा विसर्जयेत् ||
७२४ विभज्य पञ्चधा पश्चाद् यथा कुण्डे नियोजयेत् |
धूपाद्यर्थं पृथक् त्यक्ता वह्निं संपूज्य तर्पयेत् ||
७२५ तद्धृदयाम्बुजे पश्चाल्लब्ध्वानुज्ञो यजेच्छिवम् |
समूर्तिञ्चासनन्न्यस्त्वा शोध्या ध्यानञ्च विन्यसेत् ||
७२६ शिवं साङ्गं ततः त्वेष्ट्वा नाडी सन्धान पूर्वकम् |
मन्त्रसन्तर्पणं कृत्वा पूर्णां दत्वा निवेद्य च ||
७२७ देशकाल निमित्ताक्ष्यै दुर्निमित्त प्रशान्तये |
शतंशतन्तु होतव्यं पूर्णाच्छिन्नं शत क्रतो ||
७२८ अधिवास लग्नयोर्मध्यं ज्ञात्वा कृत्यं समारभेत् |
अत्यारंभमनारंभं तथारंभं न कारयेत् ||
७२९ वक्त्रं वर्मयुतं प्राचि दक्षे घोरं शिखायुतम् |
सद्यो हृदा युतं पश्चात् सौम्ये वामं शिरो युतम् ||
७३० शिवं सर्वैस्तु सामान्यं सन्धानं मन्त्र तर्पणम् |
मूर्तिपानामिदङ्कर्म सर्वकृद्देशिकोत्तमः ||
७३१ दत्वा पूर्णाहुतिं पश्चाच्छिवं विज्ञाप्य देशिकः |
निरस्य विघ्नसंघातं गत्वा लिङ्गान्तिकन्ततः ||
७३२ भद्रपीठे तु संस्थाप्य कृत्वा चिह्नं सुचिह्नितम् |
मृद्भिर्गोमय गोमूत्रैः स्नापयेदस्त्र वारिणा ||
७३३ वस्त्रयुग्मा वृतं कृत्वा स्वस्ति वाच्य प्रचालयेत् |
ततः स यजमानस्तु श्रद्धा विष्टः समाहितः ||
७३४ अग्रतः पृष्ठतो गच्छन्मुच्यते सर्वपातकैः |
प्रदक्षिण क्रमेणैव पुरप्रासाद मण्डपे ||
७३५ जप शब्दैः समानीय वेशयेत् स्नान मण्डपम् |
निरीक्ष्य प्रोक्ष्य सन्ताड्य कुशैरुल्लिख्य मण्डपम् ||
७३६ अक्षतै स्वस्तिकं वेद्यां भद्रपीठं न्यसेत् ततः |
प्रणवे नासनन्दत्वा ततो लिङ्गन्निवेशयेत् ||
७३७ निरीक्ष्य प्रोक्ष्य सन्ताड्य शोध्य मृद्गोमयादिभिः |
द्वितीय वेदिकायान्तु आसनन्तूलिकोपरि ||
७३८ तस्योपरि न्यसेल्लिङ्गं सघृतं पायसं पुनः |
शिरोदेशे व्यवस्थाप्य ततो लक्षणामालिखेत् ||
७३९ लक्षणेन विनिर्मुक्तं यतो लिङ्गमलक्षणम् |
देशदेशाधिपानान्तु सर्वदास्याद्भयङ्करम् ||
७४० तस्मात् प्रयत्नमास्थाय कुर्याल्लिङ्गं स लक्षणम् |
येन सर्वफलावाप्तिर्जायते साधकस्य तु ||
७४१ नोर्द्धं भाग द्वयात् कार्यं लक्षणं भूतिमिच्छताम् |
ऋत्वेकभाजितायामे रूपे रामतनूच्युते ||
७४२ लक्षरेखाङ्गुला ज्येष्ठे तारैकांशच्युतेन्यतः |
भागद्वयादधः पक्ष रेखास्याद्वसुभाजिते ||
७४३ भ्रमाद्भागद्वयोर्द्धन्तु पृष्ठतः सङ्गमं तयोः |
ऊर्ध्वन्तु कुण्डलाकारं द्वेष्ठष्ठे ग्रन्थ्यधः स्थिते ||
७४४ यथा लिङ्गशिरः प्रोक्तन्तथा लक्ष शिरोहितम् |
सर्वसिद्धिप्रदं धन्यं सर्वविघ्नभयङ्करम् ||
७४५ सर्वसाधारणं शक्रलक्षणं शुभलक्षणम् |
अनुच्छ्रितेन हस्तेन गुरुर्हेमशलाकया ||
७४६ आलिखेल्लक्षणं विद्वाञ्छिल्पीशस्त्रेण चोत्किरेत् |
जपन्मृत्युजितं मन्त्रं पूरयेन्मधुसर्पिषा ||
७४७ रोचनां दधिदूर्वाञ्च दत्वा कृत्वा वधारणम् |
आरोप्य भद्रपीठे तु शोध्य मृद्गोमयादिभिः ||
७४८ अस्त्रतोयेन संस्नाप्य मन्त्रन्यासन्तु कारयेत् |
इष्ट्वासाध्याणुना सिद्ध्यैर्मन्त्रैर्वा ब्रह्मवाचकैः ||
७४९ संशोध्य द्रव्य संघातं स्नानमन्त्रैः पुरोदितैः |
मृद्भिर्गोमय गोमूत्रैर्भस्मना सलिलान्तरैः ||
७५० पञ्चगव्य कषायैश्च ततः पञ्चामृतेन तु |
हेमसस्यफलैः स्नानं रत्नौ षध्यन्ततः पुनः ||
७५१ सर्वौषधि युतञ्चान्ते सर्वमङ्गलसाधनम् |
क्षाराद्यैरष्टभिः स्नाप्यमार्जयेन्मृदुवाससा ||
७५२ विलिप्य चन्दनाद्यैस्तु वर्म जप्ते तु वा ससी |
परिधाप्य ततो विद्वान् भूषयेत् कुसुमादिभिः ||
७५३ देशिकं दक्षयित्वा तु तोषयित्वा च शिल्पिनम् |
सुयन्त्रितन्ततो लिङ्गं रथे कृत्वा सुभावितः ||
७५४ जपशब्दादि निर्घोषैर्वेदध्वनि विमिश्रितैः |
जपन्पाशुपतं मन्त्रं देशिकः सुसमाहितः ||
७५५ रथयात्रान्ततः कृत्वा आनयेन्मण्डपाग्रतः |
भद्रपीठन्तु संस्थाप्य तत्र लिङ्गन्निवेशयेत् ||
७५६ स्थिरो भवभवेत्युक्ता स्वपञ्चाभ्यन्तरं विशेत् |
वीक्षणादिभिः संशोध्य कुशैरुल्लिख्य वेदिकाम् ||
७५७ अक्षतैः स्वस्तिकं कृत्वा तत्र पट्टं स तूलिकम् |
सोपधान पटच्छन्नं न्यस्त्वानन्तासनं न्यसेत् ||
७५८ अर्घ्यं दत्वा तु देवस्य मण्डपं संप्रवेशयेत् |
विन्यस्य तूलिकोर्द्धन्तु न्यसेन् मन्त्रान्यथा क्रमम् ||
७५९ पिण्डिकायास्त्विदं कर्म मन्त्रैः शाक्तैस्तु तद्भवेत् |
लक्षणन्तु भगाकारं स्नानाघं लिङ्ग च यथा ||
७६० एवं ब्रह्मशिलायान्तु कूर्माख्याया मयं विधिः |
आनीय मण्डपान्तस्तु यथा स्थानन्निवेशयेत् ||
Die vier Bereiche und die Gegenwart der Gottheit
७६१ पाददेशे गुरुः स्थिता मूर्त्यादि न्यासमारभेत् |
ज्ञात्वा सम्यक्परं भावमपरं लक्षणान्वितम् ||
७६२ योजानाति परं भावं तस्य लक्षं चतुर्विधम् |
चतुर्गोचरसंस्थानं यत्स्वरूपं क्रियाक्रमम् ||
७६३ स एवाराधकस्तस्य स्थापकस्तु न चापरः |
शिवाच्छैवं शिखं शक्तेर्विन्दोर्ज्योतिरधस्ततः ||
७६४ नादात्सावित्र संज्ञञ्च एभ्यः शास्त्र समुच्चयम् |
स्वभावावस्थितं शैवं शिखं संवित्तिलक्षणम् ||
७६५ प्रकाशस्थं स्मृतञ्ज्योतिः स्पष्टविज्ञान लक्षणम् |
सावित्रन्नादसंस्थानं ध्वनिः संवित्तिलक्षणम् ||
७६६ शिखाकुलास्थितिः साकेकुशे सावित्रि संज्ञकात् |
चतुर्णां संस्थितिः क्रौञ्चे चतुर्वर्ण व्यवस्थया ||
७६७ शिवाख्याच्छाल्मली द्वीपे पुस्करे ज्योति संज्ञकान् |
प्रजानुग्रह हेत्वर्थमेवं कुल चतुष्टयम् ||
७६८ दीक्षाद्यवस्थितौ शक्र सप्तद्वीपे त्वियं स्थितिः |
लक्षलक्षणयोर्भेद विज्ञानन्तुर्यगोचरे ||
७६९ सम्यज्ज्ञात्वा त्रिधावस्थं ततो यजनमारभेत् |
आधारं लक्षणं विद्धि आधेयं लक्षरूपिणम् ||
७७० लक्षणं वेदना रहितं द्विविधं लक्षं स वेदनम् |
समनञ्चोन्मनं विद्धि चतुर्लक्षेष्वियं स्थितिः ||
७७१ स्वरूपं यस्य यो वेत्ति तल्लयं याति स ध्रुवम् |
चतुर्णामपि सामान्यं स देशे यजनं विदुः ||
७७२ लक्षं सदा शिवाकारं लिङ्गमूर्तौ नियोजयेत् |
क्रमो यमादि सर्गस्य ज्ञात्वान्यत्र प्रयोजयेत् ||
७७३ इच्छाशक्तिमयीं मूर्ति कल्पयेत् कारणस्य तु |
कलान्यासं पुरा कृत्वा तत्व न्यासं सदैवतम् ||
७७४ तत्वानां पञ्चकं तद्वत्त्रितत्वं साधि दैवतम् |
मूर्ति वक्त्राणि विन्यस्य अङ्गभङ्गा न्यसेत् पुनः ||
७७५ आवाहयेत् ततो देवं शिवं परम कारणम् |
अङ्गन्यासं यथा स्थानं कृत्वा देवं न्यसेत् पुनः ||
७७६ उपचारन्ततः कृत्वा भूषयेद् भूषणैस्ततः |
सुगन्धैः कुसुमैरिष्ट्वा स घृतङ्गुग्गुलन्दहेत् ||
७७७ लेह्य चोष्यादि भक्ष्याणि नैवेद्यानि निवेदयेत् |
भुक्तान्प्रतिसरान्दत्वा प्रतिभाग प्रदर्शकान् ||
७७८ मुद्रां वध्वा नमस्कृत्य वस्त्रेणाच्छादयेत् ततः |
छत्राद्युपस्करं सर्वन्तस्मिन् काले निवेदयेत् ||
७७९ निद्रा कलशं शिरो देशे शिवे नैव निवेशयेत् |
अभ्यङ्गं पाददेशे तु ततः शोधनमारभेत् ||
७८० पिण्डिकानि कटङ्गत्वा शक्तिमन्त्रन्निवेशयेत् |
शिवविद्यात्मतत्वन्तु इच्छा ज्ञानक्रियान्वितम् ||
७८१ शक्ति भावं परङ्कृत्वा नैवेद्यानि निवेदयेत् |
एवम्ब्रह्मशिलायान्तु कूर्माख्यायां मयं विधिः ||
७८२ आधाराधेय भावेन तयोर्भेदम्पृथक् पृथक् |
शिवं सम्पूज्य विज्ञाप्य तत्वशुद्धिं सभारभेत् ||
७८३ भूतानां वलिदानार्थमादिशेद् देशिकोत्तमम् |
तत्त्वोपस्थापनङ्कृत्वा यायात् कुण्डान्तिकङ्गुरुः ||
७८४ इष्ट्वा शिवं विशेषेण प्रतिष्ठा होममाचरेत् |
शतं सहस्रमर्द्धम्वा हुत्वा मूर्तिधरैः सह ||
७८५ दत्वा पूर्णाहुतिं पश्चाल्लिङ्गं शान्ति घटाम्भसा |
सम्प्रोक्ष्य संस्पृशेद्धर्भैर्होम संख्यं जपेदणुम् ||
७८६ तत्व सन्धिन्ततः कृत्वा तत्वोपस्थापनम् भवेत् |
तथा होमस्तथा स्पर्शः पुनर्होमस्तथा जपः ||
७८७ एवन्त्रिष्वपि संपाद्य विधिं भागेष्वनु क्रमात् |
शिवाद्यवनिपर्यन्तमध्वानं सन्धयेत् ततः ||
७८८ व्यापकन्तन्मयन्ध्यात्वा होमयेन्मूर्तिपैः सह |
पूर्णाहुतिन्ततो दत्वा शिवाय विनिवेदयेत् ||
७८९ एवं पीठ संशुद्धिमुमामन्त्रेण कारयेत् |
ब्रह्मकूर्मशिलायान्तु ततश्छिद्रन्निरस्य च ||
७९० शान्ति होमन्ततो हुत्वा घृतेन मधुना सह |
प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने प्रत्येकं रूपिणा शतम् ||
७९१ हुत्वा पूर्णवच्छिन्नं शिवाय विनिवेदयेत् |
शिवं सम्पूज्य विज्ञाप्य निच्छिद्रमव धारयेत् ||
७९२ प्रासादन्तुरुतोगच्छेज्जपन्नस्त्रं समूर्तिपः |
महास्रतेज सा दग्धं सर्वविघ्नसमुच्चयम् ||
७९३ प्रासादं प्रोक्षयेद्ध्यात्वा शस्त्ररूपेण वारिणा |
ब्रह्मस्थाने तथाश्वभ्रं कूर्म ब्रह्मशिलोच्छ्रयम् ||
७९४ प्रवेशं ब्रह्मभागस्य ज्ञात्वाश्वभ्रं प्रकल्पयेत् |
वस्वंशं पादभागञ्च त्रिभागं वा द्वयन्तथा ||
७९५ अर्द्धं समस्तकं वापि ब्रह्मभागम्प्रवेशयेत् |
पृथक् फल विभेदेन ज्ञात्वा श्वभ्रं प्रकल्पयेत् ||
७९६ इष्ट्वा वास्तु गतान् देवान् पूर्ववत् पदयोगतः |
मध्यं सुचिह्नितं कृत्वा न्यसेत् कूर्मशिलान्ततः ||
७९७ तस्योपरि न्यसेत् कूर्म्मं हैमं द्वारस्य सन्मुखम् |
ऋतुमात्रेन्दु संभक्ते द्वारव्यासे शतक्रतो ||
७९८ मध्यादेकं वहिस्त्यक्ता तेन मध्यं विवर्जयेत् |
पूर्वोत्तरेण तन्मध्ये शिलामध्यं निवेशयेत् ||
७९९ मध्यं सुनिश्चितङ्कृत्वा शक्तिमन्त्रं स्मरेद् गुरुः |
कशिलान् निवेशयेन् मध्ये धारिकाशक्ति रूपिणीम् ||
८०० आद्याशक्तिस्त्वमीशस्य सर्वदा धाररूपिणी |
तदाज्ञया त्वया तस्मात् स्थातव्यमिह सर्वदा ||
८०१ परावस्थान्ततः कृत्वा रत्नादि न्यासमाचरेत् |
वज्रं सूर्योपलं नीलमतिनीलञ्च मौक्तिकम् ||
८०२ पद्मरागञ्च वैदूर्यं शक्तिं प्राकाशिकां स्मरेत् |
रुक्मार्क लोहवङ्गञ्च चन्द्रारं कांक्षपन्नगम् ||
८०३ मध्ये समस्तकान्येव शक्तिं शारीरिकां स्मरेत् |
हरितालं शिलांतोरीं हरि सूताग्नि गैरिकाम् ||
८०४ वलिंवसा गगनं चैव स्मृति शक्त्यात्मकां न्यसेत् |
चन्दनन्तच्च रक्ताह्वमगुरुञ्चाञ्जन मूलकम् ||
८०५ उशीरञ्चक्रिणीं देवीं लक्ष्यशक्तिमनुस्मरन् |
गोधूमयव स तिलान्मुद्गवीवारश्यामकान् ||
८०६ सर्षपान्याज्ञिकान्धान्यान् तृप्तिशक्तिं स्मरन्न्यसेत् |
एतैः सर्वैः समायुक्तं मध्ये पद्मन्निवेशयेत् ||
८०७ गुग्गुलं पायसं वाथ रन्ध्राणां लेपने हितम् |
एतेषामप्य लाभे तु यथा स्थानन्निवेशयेत् ||
८०८ वज्रन्तालं सुवर्णञ्च सहदेवां यवैः सह |
अभावात् पद्मरागन्तु काञ्चनं वाथपारदम् ||
८०९ रन्ध्रं सुलेपितङ्कृत्वा सम्यग्ब्रह्मशिलातलम् |
शिवा सनन्न्यसेत् तत्र श्वभ्रे ब्रह्मशिलात्मके ||
८१० प्राप्ति व्याप्ती च सामर्थ्यं सर्वं ज्ञात्वा पृथक् पृथक् |
कन्दान्तं पार्थिवन्तत्वन्नालं मायान्त गोचरम् ||
८११ तदूर्ध्वञ्च रणाच्छदने पद्ममीशावधिष्ठितम् |
अतोर्ध्वङ्कर्णिकाज्ञेया वामाद्यैः शक्तिभिर्वृता ||
८१२ शक्तिं शिवा सनन्ध्यात्वा सूर्यकोटि समप्रभम् |
प्रीणयन्तञ्जगत्सर्वं व्यापयन्तं शिवासनम् ||
८१३ गन्धधूपादिभिः पूज्य दत्वा कुण्डान्तिकं व्रजेत् |
शिवं सम्पूज्य विज्ञाप्य मन्त्रान्सन्तर्प्य देशिकः ||
८१४ सन्धानं पूर्णया सहितङ्कृत्वा विज्ञापयेच्छिवम् |
लब्ध्वानुज्ञस्ततो गच्छेत् प्रासादं मन्त्र विग्रहः ||
८१५ दक्षिणस्यां दिशि स्थित्वा न्यसेन् मन्त्रान् यथाक्रमम् |
सर्वशक्ति मयन्ध्यात्वा आसनन्त्वा सनाधिपम् ||
८१६ निरोध्य पूजयित्वा च शनैः पूजां समुद्धरेत् |
शोधयित्वा तु तच्छूभ्रं चन्दनादि विलेपितम् ||
८१७ रक्षितन्तत्पटच्छन्नङ्कृत्वा यागालयं व्रजेत् |
शिवं संपूज्य विज्ञाप्य मूर्तिपैः शिल्पिभिः सह ||
८१८ पूर्वसङ्केतितैर्धीरैः सहायैर्वलवत्तरैः |
शुभे लग्ने हृदोत्थाप्य लिङ्गमर्घ्यं प्रचालयेत् ||
८१९ तदग्रतो गुरुर्यायाद्ध्याना विष्टः शिवं स्मरन् |
स्वदिक्स्थामूर्तिपाः सर्वे स्वमन्त्राहित चेतसा ||
८२० कर्ता च स्वजनैः सार्द्धञ्छुद्धाविष्टः स्पृशञ्छिवम् |
वेदगीत स्वरैर्दिव्यैर्माङ्गल्यैश्च महोत्सवैः ||
८२१ क्षिपन्रत्नादिकङ्कर्ता प्रासाद द्वारमानयेत् |
द्वारदेशे तु विश्राम्य किञ्चिद् द्वारस्य सन्मुखम् ||
८२२ विनाद्वारेण देवेशं तन्मार्गेण प्रवेशयेत् |
द्वारार्द्धेन शिखाशून्ये शिखे शान्ति पुरः स्मरन् ||
८२३ प्रविष्टभद्र * * * * * * * * * * * ? |
* * * * * * * * * * * * * * * * ? ||
८२४ * * * ? त्वा तु देवस्य प्रोक्ष्य ब्रह्मशिलातलम् |
तदूर्ध्वं यन्त्रितन्धार्यं सुलग्नं यावदा गतम् ||
Vereinigung von Shiva und Shakti
८२५ चिह्नमध्यं सुविज्ञाय लिङ्ग मध्यं सुनिश्चितम् |
शक्तिशक्तिमतोर्ध्यात्वा अभेदं धर्मधर्मिणोः ||
८२६ स्वभावस्थं स्मरन्मन्त्रन्त्यक्तैश्वर्यलय स्थितम् |
सृष्ट्या सदेश संस्थानं सम्यग् लिङ्गन्निवेशयेत् ||
८२७ रुक्मरौप्यर्किनागादिकं विभिः सुदृढं यथा |
मन्त्रन्यासन्ततः कृत्वा शिवमावाहयेत् सुधीः ||
८२८ कृत्वा चाङ्गादि विन्यासं पूजयेच्छिवमादरात् |
मन्त्रन्यासे कृते शक्र शिलामध्यान्न चालयेत् ||
८२९ प्रमादाच्चालिते देवे राष्ट्रभङ्गः प्रजायते |
ततः सञ्चिनुयात्पीठञ्छिला श्वभ्रसमं यथा ||
८३० वालुकापुरितं लिप्तन्तस्यार्द्धे पिण्डिकान्न्यसेत् |
दिक् चिह्नैश्चिह्नितङ्कृत्वा देवीमुद्वोधयेत् क्रियाम् ||
८३१ आनीयपूर्ववत् सर्वं मन्त्रं शक्त्यन्तिकं स्मरन् |
सुलग्ने लम्वनैः प्रगुणां सृष्टिमार्गेण विन्यसेत् ||
८३२ शक्तिमूर्तेर्महेशस्य पृथक् शक्ति समर्पणम् |
साम्प्रतन्तु तयोर्योगस्तत्त्वमानन्द लक्षणम् ||
८३३ दिक्चिह्नैः संस्थिताङ्कृत्वा सन्धिलेपं समाचरेत् |
शङ्खचूर्णं मलं लौहं तथा सर्वरसं पयः ||
८३४ पपित्वा लेपयेत् तेन मन्त्रन्यासं यथा पुरा |
मुष्टिं वद्ध्वा ततो विद्वाञ्छिवशक्ति स्वरूपिणीम् ||
८३५ पिण्डिकायां न्यसेल्लिङ्गमङ्गुष्ठेन स्पृशेत् ततः |
उमामहेशमन्त्राभ्यां सन्धानं मुक्तिकाङ्क्षिणाम् ||
८३६ शिवोमामन्त्रयोगेन सन्धानं भूतिमिच्छिताम् |
शान्तिकुंभांभ सा स्नाप्य तथा पञ्चामृतैरपि ||
८३७ विलिप्य कुङ्कुमाद्यैस्तु मन्त्रन्यासन्तु कारयेत् |
आसनस्थान्यथा स्थानं मूर्त्यादींल्लिङ्गविग्रहे ||
८३८ प्रत्येकं विन्यसेन् मन्त्री ध्यानयुक्तसमाहितः |
लिङ्गे निवेशयेद् वोधं क्रियाह्वां पीठरूपिणीम् ||
८३९ परत्वन्तु तयोर्ध्यात्वा भिन्नाभिन्न स्वरूपयोः |
व्यक्ति रूपन्तयोर्ध्यात्वा स्नानं विविधमाचरेत् ||
८४० विलिप्य पूर्ववत् ताभ्यां कृत्वा पूजां पृथक् पृथक् |
जपङ्कृत्वा तयोर्दत्वा प्रणिपत्य क्षमापयेत् ||
८४१ न्यूनातिरिक्तशान्त्यर्थं रूपिणा होममाचरेत् |
विज्ञापयेत् ततो देवं लोकानुग्रह हेतुतः ||
८४२ सूर्याचन्द्रमसौ यावत् स्थिति लोके प्रवर्तते |
तावत्तात्कालं महादेव लिङ्गेस्मिन् वरदो भव ||
८४३ लब्ध्वानुज्ञां विभोर्लिङ्गे ध्यायन्तीशन्निरोधयेत् |
निरोध्यैवं नमस्कृत्वा पुनर्विज्ञापयेदिदम् ||
८४४ ज्ञानतो ज्ञानतो वापि यच्चोक्तन्न कृतं मया |
तत्सर्वं पूर्णमेवास्तु त्वत्प्रसादान्महेश्वर ||
८४५ यजमानस्य यन्नाम योजयेद् ईश्वरेण तु |
ततः स यजमानस्तु पूजयेद् देशिकोत्तमम् ||
८४६ वित्तशाठ्यादसौ कर्ता ग्रामाद्यं सन्निवेदयेत् |
मूर्तिपेभ्योस्त्र जापिभ्यो विप्रेभ्यो गणकाय च ||
८४७ सूत्रधाराय शिल्पेभ्यो दक्षिणा स्यात् स संभ्रमा |
महोत्सवं महानन्दङ्कुर्याद् दिनचतुष्टयम् ||
८४८ प्रायश्चित्तं द्वितीयेह्नि शान्तिश्चैव तृतीयके |
देशिकाद्याश्चतुर्थेह्नि कुर्युश्चातुर्थिकाह्निकम् ||
८४९ सुस्थाल्यान्तु विशुद्धायां ब्रह्माङ्गैः साधयेच्चरुम् |
संपाताभिहुतङ्कृत्वा प्रतिकुण्डं यथाक्रमम् ||
८५० अग्रन्निवेद्य देवाय तर्पयेच्चरुणा शिवम् |
स्थिराद्या हुतयः सप्त प्रदद्याद्वन संख्यया ||
८५१ पूर्णान्दत्वा शिवं ज्ञाप्य कृत्वा शान्तिं प्रवाचनम् |
लोकपाल वलिं दत्वा क्षेत्ररक्षां प्रवाचयेत् ||
८५२ अन्येषामपि देवानाञ्चतुर्थेह्नि चतुर्थिका |
ततः संपूजयेद् देवं स्नानादि विधि विस्तरैः ||
८५३ विहायलिङ्गविन्यासं न्यस्ताणुं संविसर्जयेत् |
शक्तिभावो विसर्गः स्याद् व्यक्तिरावाहनं हरे ||
८५४ शिवकुंभविधानेन कृत्वा कुभ द्वयं गुरुः |
एकेन स्नापयेद् देवं पूजयित्वा यथा पुरा ||
८५५ कर्तारमपरेणैव ततः कुर्यात् फलार्पणम् |
ततस्तु स्थापको दृष्ठो यजमानेन पूजितः ||
८५६ प्रतिष्ठायाः फलं कर्त्तुर्यथा दद्यात् तदुच्यते |
मूलमन्त्रं समुच्चार्य यावच्छक्त्यन्त गोचरम् ||
८५७ कारणत्यागयोगेन लब्ध्वानन्दस्तु देशिकः |
तेजो रूपनिधिं ध्यात्वा पुण्यराशिं स्वरेकरे ||
८५८ विद्यातत्त्व प्रचारेण करे कर्तुः समर्पयेत् |
तत्फलं भुक्तिमुक्त्याख्यं लिङ्गाराधन तस्त्रिधा ||
८५९ लिङ्गे संस्थापिते मोक्षो भूतयश्च निरन्तराः |
ततो विज्ञाप्य देवेशं यजेच्चण्डेश्वरं गुरुः ||
८६० चण्डमन्त्रैः समावाह्य ताराद्यैः फट्कृतान्तकैः |
स्नानं पूजा जपो होमो नैवेद्यादि यथा पुरा ||
Weitere Einsetzungen und Bannerweihe
८६१ कृष्णवर्णञ्चतुर्वक्त्रं त्र्यक्षं चण्डा हि भूषणम् |
शूलटङ्ककरं भीमं कमण्डल्वक्षमालिनम् ||
८६२ एतद् रूपं सदाध्यातुः सर्वविघ्नविनाशनम् |
आधारशक्ति कमले मूर्तिवक्त्राङ्गसंयुतम् ||
८६३ स्वस्थाने प्राणमार्गेण कृत्वात्मस्थं निवेशयेत् |
ब्रूयादेनं शिवं द्रव्यं रक्षंस्तिष्ठञ्छिवान्तिके ||
८६४ सम्पूज्यगन्धपुष्पाद्यैर्लिङ्गस्थन्तन्निरुध्य च |
पृथक् पीठञ्चलं लिङ्गं पूर्ववत्सन्निवेशयेत् ||
८६५ किन्तु रत्नादि विन्यासं पीठगर्भे स शक्तिकम् |
एकपीठन्त्वभेदेन रत्नाद्यं चेतसा न्यसेत् ||
८६६ पूर्ववच्च स्मृतङ्कर्म किन्तु चण्डेश्वरं विना |
वाणक्षेत्रोद्भवं वाणं सर्वप्रासादपीठगम् ||
८६७ पीठस्य संस्कृतन्तत्र स्वयं व्यक्तेप्ययं विधिः |
स मन्त्रं स्थापयेद्रौहं सर्वप्रासादपीठगम् ||
८६८ वाणवच्च विधिः ख्यात ऋषिर्देवादि कल्पिते |
प्रतिष्ठा व्यक्तलिङ्गानां क्रियाशक्ति पुरःसरा ||
८६९ रत्नाढ्यं पिण्डिका गर्ते विधिश्चण्डेश्वरं विना |
सर्वेषामेव देवानां स्नानाद्यं पूर्ववद्यथा ||
८७० स्वमन्त्रैः स्थापनं कार्यं ज्ञात्वा व्याप्तिं पृथक् पृथक् |
दर्पणे विहितं स्नानं लेयचित्रागमेषु च ||
८७१ प्रतिष्ठा पूर्ववत् कार्या पीठाद्यं शक्तिकल्पितम् |
पूजा तेषामधः कार्या धूपमात्रन्न दुष्यति ||
८७२ प्रतिष्ठा चूलकादीनां पूर्वोक्त लिङ्गवद्यथा |
न तत्र लक्षणोद्धारञ्चतुर्थी चण्डकल्पना ||
८७३ प्रवेशो ब्रह्मणोर्द्धेन शक्तिरत्नादि पूर्वकम् |
मूर्तिवक्त्राङ्ग विन्यासः सदेशाकार रूपधृक् ||
८७४ कुम्भे प्येवं त्रिशूले तु त्रिशक्तिं व्यापिनं शिवम् |
निष्पन्नं शिखरं दृष्ट्वा ध्वजशून्यन्न धारयेत् ||
८७५ ध्वजशून्यन्तु प्रासादं समाश्रित्य विनायकाः |
जनयन्ति भयं घोरं तस्मात् कार्यो महाध्वजः ||
८७६ प्रासाद दैर्घ्यदीर्घस्तु द्विहस्तो विस्तरेण तु |
जघान्तो वाथ कर्तव्यो यथा लाभमथापि वा ||
८७७ अथवा प्रदक्षिणी कृत्य यथा लिङ्गन्तु वेष्ठ्यते |
शिखरत्र्यंशतो ज्येष्ठे मध्यमे पादवर्जिते ||
८७८ कन्यसे चोत्तमोर्द्धेन समग्रन्थिस्तु वैणवः |
मुक्तये विषमः शस्तो दृढः सद्दारूजोथवा ||
८७९ समाहृत्य द्वयं कार्यं स्नानाद्यञ्च यथा पुरा |
मूर्त्यादि तत्व विन्यासस्तथा किन्त्वस्त्र सन्निधिः ||
८८० पूजा होम जपस्पर्शन्तथा कार्यं मखाधिप |
प्रासादो वाह्यलिङ्गन्तु जगती पिण्डिकाहरे ||
८८१ तत्प्रतिष्ठा प्रकर्तव्या यथा पूर्वमुदाहृता |
दण्डाधारे न्यसेच्छक्ति रत्नाद्यं पञ्चकन्तथा ||
८८२ ध्वज युक्तन्न्यसेद् दण्डमस्त्रालङ्कृतविग्रहम् |
सूर्यकोटिसहस्राभं ज्वलन्तमति भीषणम् ||
८८३ सुरासुर प्रदुष्टानां दुःप्रेक्ष्यं दर्पनाशकम् |
महापातकिनो ये तु तेपि दृष्ट्वा ध्वजोच्छ्रयम् ||
८८४ तत्क्षणादेव निष्पायाः किन्नकर्तुः कुलद्वयम् |
लिङ्गादि परमाणूनां संख्यायावच्छिवालये ||
८८५ तावत् कल्प सहस्राणि वसेत् कर्ता च तत्पुरे |
ध्वजोच्छ्रये कृते शक्र भवेत् कोटिगुणं फलम् ||
८८६ मन्दिरेपि प्रकर्तव्यं प्रतिष्ठाद्यं ध्वजोच्छ्रयम् |
अनुषङ्गात् प्रवक्ष्यामि मन्दिरेपि ध्वजोच्छ्रयम् ||
८८७ ज्ञात्वा मन्दिरमादौ तु दण्डमानञ्च कारयेत् |
एकभौमं द्विभौमम्वा त्रिभौमं मन्दिरं हरे ||
८८८ कन्यसं मध्यमं ज्येष्ठं तेषां दण्डमिति शृणु |
गायत्री तुष्टि भुवनैः करैर्दण्डन्तु कारयेत् ||
८८९ अन्यथा वा प्रकर्तव्या गृहदण्डमिति शुभा |
वेश्म व्यास त्रिभागस्थन्तत्पादोनं द्वितीयकम् ||
८९० तृतीयमर्द्धभागेन दण्डमानमुदाहृतम् |
ध्वजान्वितं समादाय प्रोक्ष्यास्त्रेण पटावृतम् ||
८९१ शिवतत्व विभागेन त्रितत्वन्तत्व या न्यसेत् |
अस्त्रं न्यस्त्वा ततो विद्धान्सन्निदेहो ममाचरेत् ||
८९२ मन्दिरे च यथा न्यासस्तं वक्ष्येहं शतक्रतो |
मन्दिरे विन्यसेत् तत्त्वं शक्तिं विन्यस्य धारिकाम् ||
८९३ आत्मतत्वमधोभागे ब्रह्माण्डो वधि विन्यसेत् |
विधातत्त्वन्न्यसेन्मध्ये बुद्धितत्व पदानुगम् ||
८९४ ऊर्ध्वं वै शिवतत्त्वं स्याच्छुद्ध विद्यावसानिकम् |
कारण त्रितयं न्यस्त्वा शिवं साङ्गञ्च विन्यसेत् ||
८९५ तत्त्वोपस्थापनं शुद्धिः प्रोक्षण स्पर्शनं जपः |
सान्निध्यं रोधनं पूजा सन्धानं प्रतितत्त्वतः ||
८९६ एवं सर्वत्र विधिवद्विधानं पूर्णतां व्रजेत् |
शुभलग्नं समासाद्य विन्यसेद् ध्वजमादरात् ||
८९७ मन्दिरं स्नपयेत् पश्चात् फलाद्यैः शुभवस्तुभिः |
काष्ठिका तृणनिर्वृत्ते गृहे न्यासस्तु कथ्यते ||
८९८ कंवीषु पृथिवीतत्त्वं तृणेष्वाप्यं नियोजयेत् |
तेज सम्बन्धतोद्देशे दण्डकेषु च वायवम् ||
८९९ स्थूणासु व्योमतत्त्वन्तु शिवं साङ्गञ्च विन्यसेत् |
जीर्णेपि संस्कृते पुण्यं कर्तुः स्यान्मौलिकं यतः ||
Erneuerung beschädigter Heiligtümer

९०० ततो जीर्णं समुद्धृत्य गुणवद् विन्यसेत् सुधीः |
महाभयकरन्नित्यमत्यन्तं क्रूररूपधृक् ||
९०१ दोषं करोति वहुधा राष्ट्रे राजनि सर्वदा |
दुष्टलिङ्गे स्थिते राष्ट्रे प्रजामारीनिरन्तरम् ||
९०२ राजा च दुःखशोकार्तः क्षीयते वलवाहनैः |
आत्मशून्यं यथा देहं संप्रविश्येहराक्षसाः ||
९०३ भयमुत्पादयन्त्याशु दुस्तरं मरणान्तिकम् |
तथैव देवताः शून्यं दृष्ट्वालिङ्गं गुणोज्झितम् ||
९०४ यजताञ्च समाश्रित्य जनयन्ति महद्भयम् |
हीनञ्जीर्णङ्कृशं दग्धं स्थूलं मानाधिकं हरे ||
९०५ लक्ष्मशून्यञ्च गर्भाढ्यं संपुटं स्फुटितन्तथा |
भग्नञ्च स क्षतञ्चैव तथा वज्रहतं पुनः ||
९०६ एवमादीनि चान्यानि लिङ्गानि परिवर्जयेत् |
जीर्णाद्यैः प्रोचितैरेतैस्त्याज्यार्चा पिण्डिकादिकम् ||
९०७ चलितञ्चालितं लिङ्गं पतितं पातितं हरे |
मध्यस्थं विषमं निम्नं दिङ्मूढमति चोच्छ्रितम् ||
९०८ स्थापनीयानि तत्रैव यद्येतान्ये व्रणानि च |
परित्यक्त शिलायोगं निर्व्रणञ्चललक्षणम् ||
९०९ संसक्तामुद्धरेद्वेवीं तत्रैव स्थापनाय च |
जीर्णाद्यं पूजितं हन्ति निहन्ति तदपूजितम् ||
९१० तस्मात् तदुद्धरेल्लिङ्गं शास्त्रविद्विधि पूर्वकम् |
विधिं विनोद्धृतं लिङ्गमशास्त्रज्ञैस्तु देशिकैः ||
९११ राष्ट्रं राष्ट्राधि पञ्चैव द्रुतमुच्छादयेद्धरे |
उद्धृतं विधिना लिङ्गं देशिकैः समयच्युतैः ||
९१२ तेन दोष विपाकेन गजवाजिक्षयो भवेत् |
दक्षे मण्डपस्त्वीशे वा आप्यद्वारैक तोरणः ||
९१३ अत्रापि द्वारपूजादि स्थण्डिले तु शिवार्चनम् |
मन्त्र सन्तर्पणं कृत्वा दीपनादि यथा पुरा ||
९१४ शिवं तु लिङ्गिनो भोज्या विष्ण्वादौ द्विजसत्तमाः |
भूतादिभ्यो वलिं दत्वा शिवमध्येष्य शान्तिकम् ||
९१५ क्षीराज्य मधुदूर्वाभिः समिद्भिर्वा विधाय च |
गत्वा लिङ्गान्तिकं मन्त्री तदा स्नाप्य प्रपूजयेत् ||
९१६ ओं व्यापकेश्वरा येति नमोन्तो मूलवाचकः |
ओं व्यापक हृदयाय नाभ्यन्तं हृदयं स्मृतम् ||
९१७ एवं शिरो ज्वालिनी वर्मनेत्रास्त्राणि क्रमेण तु |
एभिस्तारासने लिङ्गं स्थण्डिलन्तु प्रपूजयेत् ||
९१८ ततस्तत्राश्रितं सत्त्वं श्रावयेदस्त्र मुच्चरेत् |
सत्वः कोपी हयः कश्चिल्लिङ्गमाश्रित्य तिष्ठति ||
९१९ लिङ्गन्त्यक्ता स यत्रेष्टं तत्र या तु शिवाज्ञया |
एवमुक्ता महास्त्रेण दत्वा चार्घ्यं विसर्जयेत् ||
९२० ततः पाशुपतास्त्रेण प्रतिभागे स्वशक्तितः |
हुत्वाहरे ततोभ्युक्ष्य शान्ति कुम्भस्य वारिणा ||
९२१ ततो दर्भेण संस्पृश्य जप्त्वास्त्रं होमसंख्यया |
अर्घंपराङ्मुखं दत्वा विसृजेत् तत्त्व तत्त्वपान् ||
९२२ दृक् क्रिये पीठमन्त्राश्च भागत्रयमनूनपि |
शिवं साङ्गं त्रिखण्डाध्व पतीनथ समायुतान् ||
९२३ चण्डनाथं खनित्रेण हैमेनास्त्राणुनाखनेत् |
वद्ध्वाकाञ्चन पाशेन वालरज्वा च यत्नतः ||
९२४ स्कन्ध स्थितया वृषयोर्लिङ्ग पीठ शिलामपि |
द्वयमेकं समस्तं वा यत्नादेषां समुद्धरेत् ||
९२५ शिवमंत्रं गृणंल्लोकैः प्रक्षिपेत् तज्जले गुरुः |
भूयः पुष्ट्यर्थकं हुत्वा दिक्पतीनां प्रतर्पणे ||
९२६ प्रासाद वास्तु शुद्ध्यर्थं होतव्यञ्च शतं शतम् |
महापाशुपतं शक्र प्रासादरक्ष्णे न्यसेत् ||
९२७ यावन्नैवा परं लिङ्गं स्थापयेद् विधिना पुनः |
पूर्वमानान्वितं लिङ्गन्तद्रूपं संस्कृतन्तथा ||
९२८ स्वस्थाने सन्निवेश्यापि विधिना पूजयेत् ततः |
असुरैर्मुनिभिर्देवैस्तत्त्वविद्भिः प्रतिष्ठितम् ||
९२९ भग्नम्वाप्यथ जीर्णम्वा विधिनापि न चालयेत् |
विधिमेतम् प्रकुर्वीत जीर्णधाम समुद्धृतौ ||
९३० निस्त्रिंशे विन्यसेन् मन्त्रान् दर्पणे वा सुनिर्मले |
अपरन्त्वारभेत् पश्चात् पूर्वरूपं यथा भवेत् ||
९३१ समाप्ते मन्त्रसंयोगः प्रतिष्ठा पूर्ववत् स्मृता |
वाह्यं चैवेष्टकं कार्यमैष्टकत्वौ पलं हरे ||
९३२ हीनधामोत्तमैर्द्रव्यैः कुर्याद्वातन्मयं शुभम् |
यो यथा संस्थितो वास्तुर्दीर्घो वा समविस्तरः ||
९३३ तस्मिंस्तु कल्पयेद् भित्तिं हानिर्वृद्धिं विवर्जयेत् |
हानौ सत्यां भवेन्मृत्युर्वृद्धौ द्रव्य क्षयो भवेत् ||
९३४ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन हानिं वृद्धिं न कारयेत् |
दक्षिणां वस्त्र हेमाद्यैर्दत्वा सन्तोष यद्गुरुम् ||
९३५ क्षमस्त्वेति वदेद्वाक्यं शिवं सोपि वदेत् ततः |
इति क्रिया समोपेतं लिङ्गमन्त्रि स साधकः ||
Vergänglichkeit und tägliche Praxis
९३६ लभतेभि मतां सिद्धिं मोक्षं मोक्षपरायणः |
पत्रपत्रे यथातोयं वातोद्धृतं सुचञ्चलम् ||
९३७ तद्वत्सु चञ्चलं शक्र प्राणिनां हतजीवितम् |
अस्थिरं यौवनं शक्र द्रव्यमस्थिरमेव च ||
९३८ अस्थिरं पुत्रपौत्राघं रम्भासारसमोपमम् |
तस्मात् पुत्रकलत्राणि सुदृन्मित्रधनानि च ||
९३९ विहाय मोहजालानि कुर्याल्लिङ्ग परिग्रहम् |
कालिञ्जरे महीन्द्रे वा सह्ये वाम लयेपि वा ||
९४० गङ्गा तटे समुद्रे वा श्रीशैले सरितां तटे |
पत्र पुष्प फलोपेते मृत्कुशोपचिते शुभे ||
९४१ माहेश्वर जनाक्रान्ते सर्वदोष विवर्जिते |
सुतिथौ च सुनक्षत्रे सुयोगे करणान्विते ||
९४२ सम्पूज्य देवदेवेशं कुर्याल्लिङ्ग परिग्रहम् |
स्थापितं ऋषिभिः पूर्वं सर्वलक्षणसंयुतम् ||
९४३ आश्रये सिद्धिदं लिङ्गं स्वयम्वा परिकल्पितम् |
कीलितं वर्जयेद्विद्वान् स्कन्द विष्ण्विन्द्र मातृभिः ||
९४४ उपर्यु परिलिङ्गञ्च वर्जयेत् साधकः सदा |
पूर्वास्यं पश्चिमास्यन्तु श्रेष्ठं लिङ्ग द्वयं हरे ||
९४५ याम्यं कौवेर चक्रन्तु न सिद्धा विष्यते बुधैः |
परिगृह्येक्षितं लिङ्गं यथाशास्त्रं शतक्रतो ||
९४६ पूजयेत् सततं मन्त्री ज्ञात्वा देहमशाश्वतम् |
पूजाहोम परो नित्यं ध्वजध्यान परायणः ||
९४७ सर्व कार्येषु कुशलः साधकः स्याज्जितेन्द्रियः |
क्षेत्रान्ते रक्षणं पूजा वलिं दानञ्च कारयेत् ||
९४८ रक्षा गृहेपि कर्तव्या यथा क्षेत्रे पुरन्दर |
पर्वकालेषु सर्वेषु निमित्तेष्वखिलेषु च ||
९४९ पूजां विशेषतः कुर्याज्जपाद्यं द्विगुणञ्चरेत् |
शिवपूजापवित्रञ्च कर्तव्यं सर्वदा हरे ||
९५० पवित्रेण विना पूजा तामसी परिकीर्तिता |
राजसी च भवेदिन्द्र परमीकरणाद्विना ||
९५१ तस्मात् पूजा पवित्रञ्च परमीकरणन्तथा |
कर्तव्यं सततं सद्भिः संसार भयभीरूभिः ||
९५२ पत्रिकाभिः प्रसूनैर्वा कुशैर्वा परिकल्पयेत् |
पवित्रं प्रत्यहंशभोर्महापुण्यजिगीषया ||
Pavitra: das Fest der rituellen Erneuerung
९५३ इति नित्यक्रियाख्याता शृणु नैमित्तिकी पुनः |
आषाढस्यसिताविश्वा श्रावणस्य सितासिता ||
९५४ सप्तम्योथ त्रयोदश्यस्तत्र गन्ध पवित्रकम् |
त्रयोदश्यां प्रकर्तव्यं पवित्रं गन्धसंज्ञितम् ||
९५५ पवित्रमथ भूतायामाषाढं नियमः स्मृतः |
दीक्षादि स्थापनञ्चैव पवित्रादि शतक्रतो ||
९५६ अधिमासेन कुर्वीत यदीच्छेच्छुभमात्मनः |
दर्शद्वयं भवेद् यत्र रविसंक्रान्ति वर्जितम् ||
९५७ अधिमासः स विज्ञेयो विष्णुः स्वपितिकर्कटे |
तुल्यमासेधि मासे वा कर्तव्यन्तु पवित्रकम् ||
९५८ सुप्ते चैव हृषीइकेशे दोषभागं यथा भवेत्? |
कन्यया कर्तितं सूत्रं कर्तितन्त्वात्मनापि वा ||
९५९ ग्रन्थिकेश विनिर्मुक्तं सर्वदोष विवर्जितम् |
कृत्वा नवगुणं शक्र क्षालयेद् विधिना ततः ||
९६० कुर्यात् तत्कन्दुकाकारमन्तः सूत्रं प्रयत्नतः |
अङ्गविन्द्विन्दुमारभ्य यावन्नागयमावधि ||
९६१ ज्येष्ठादि कन्य स प्रान्तेन वलिङ्गे मया तव |
दशह्रासान्मयाख्याता सूत्रसंख्या पुरन्दर ||
९६२ घटितानां विधिः ख्यातो नान्येषान्तु कदाचन |
स्थण्डिले चल लिङ्गे च वाणलिङ्गे स्वयम्भुवि ||
९६३ रौहादौ नियमो नास्ति यथा पूर्वमुदाहृतः |
अष्टोत्तरशतादूर्द्धन्न कर्तव्यं कदाचन ||
९६४ सर्वेषां नियमः शक्र इत्याज्ञा पारमेश्वरी |
अष्टोत्तर शतैः कुर्यात् स्थण्डिलादौ पवित्रकम् ||
९६५ तस्यार्द्धेन तदर्द्धेन यथा लाभेन वा हरे |
दर्भमुञ्जादिभिश्चैव सूत्रा भावात् पवित्रकम् ||
९६६ कर्तव्यं स्वेश्वरैर्लोकैः प्रायश्चित्तमतोन्यथा |
कर्तव्यं वलयाकारं पवित्रत्रितयं हरे ||
९६७ समान्तराः प्रकर्तव्याः प्रत्येकं समग्रन्थयः |
पिण्डिकास्पृक्प्रकर्तव्यं गङ्गाख्यन्तदुदाहृतम् ||
९६८ तत्रापि कथ्यते संख्या ग्रन्थीनान्ते निराकुलम् |
विन्दुवाणं समारभ्य यावत् स्यान्नाग चन्द्रकम् ||
९६९ युगह्रासान् समाख्याता ग्रन्थयः सुरसत्तम |
ज्येष्ठादि कन्यसे प्रान्ते पवित्रे सार्वदैविके ||
९७० ग्रन्थिसंख्यासमुद्दिष्टा क्रमात् तेषु निराकुला |
सार्वदैविक संयुक्तन्त्रयं शम्भोः पवित्रकम् ||
९७१ आदित्यानलचण्डानां सम्पत्तौ स्याच्चतुष्टयम् |
एकैकं द्वारपालानामेकञ्चिअवात्म मूर्तये ||
९७२ वाह्यान्तर्वलि देवानामेकैकं परिकल्पयेत् |
एकैकं लोकपालानामेकं पीठे निवेशयेत् ||
९७३ वद्ध्वा सर्वपवित्राणि रञ्जयेत् तदनन्तरम् |
ग्रन्थिस्थाने ततः शक्र पवित्रं मण्डयेत् सुधीः ||
९७४ कुङ्कुमेनेन्दु युक्तेन चन्दनेनारुणेन च |
मण्डयेद् गोमृदासूत्रं रजन्यां शिलयाथवा ||
९७५ धातुना मण्डयेद् वाथ सर्वा भावात् सुराधिप |
पार्थिवं दारुवञ्चैव पात्रव्रातञ्च वंशजम् ||
९७६ विहायस्रुक्स्रुवौ शक्र त्यजेत् सर्वं पुरातनम् |
सर्वोत् पादित संभारः कृतस्नान विधिक्रियः ||
९७७ सन्ध्यां नैमित्तिकीं स्मृत्वा कुर्यात् कर्म तदुच्यते |
यागधामादिकं सर्वं कुम्भान्तं यद्व्यवस्थितम् ||
९७८ त्रिवृत्सूत्रेण तत्सर्वं वेष्टयेत् कवचाणुना |
सूर्यं संपूज्य विज्ञाप्य द्वारपालान्यजेत् ततः ||
९७९ कृत्वा परिग्रहं भूमेः पूर्ववत् पूजयेच्छिवम् |
अग्निं सञ्जनयेत् कुण्डे कुण्डसंस्कारपूर्वकम् ||
९८० आवाहयेत् ततो देवं पूजयेत् तर्पयेत् ततः |
पूर्णां दत्वा क्रियाच्छिद्रन्निरस्य तदनन्तरम् ||
९८१ ऐन्द्रान्तु विन्यसेत् काष्ठं सुशुद्धं भस्मदक्षिणे |
मृत्तिकां विन्यसेच्छक्र पात्रस्थामाप्य गोचरे ||
९८२ सजलाञ्च न्यसेद्धात्रीं कौवेर्या सुरनायक |
वर्मणा शिखया चैव हृदा च शिरसा हरे ||
९८३ गङ्गोदकन्न्यसेदैशे मूलमन्त्रमनुस्मरन् |
मन्त्रैरेतैर्नमोन्तैश्च ढौकयेच्छिव सन्निधौ ||
९८४ पुष्पैरञ्जलिमापूर्य प्रत्येकं क्षीरमुद्रया |
स्वाहा युतेन मूलेन सुतृप्तिम्भावयेच्छिवे ||
९८५ पुटं निवेद्य पूतात्मा कुर्यात् सूत्रस्य संस्थितिः |
ताम्रपात्रादि संस्थानि निकटीकृत्यकुण्डतः ||
९८६ तत्त्व दृष्ट्या समालोक्य प्रोक्ष्ययेच्छिव वारिणा |
मन्त्रितः संहिता मन्त्रैश्छन्नं पात्रान्तरेण तु ||
९८७ संपाताभिहुतं कुर्याच्छिवं वर्षात्मकं स्मरन् |
घृतपूर्णं श्रुवं कृत्वा स्वेत्यग्नौ भागमाक्षिपेत् ||
९८८ हेतिं युञ्ज्यात् पवित्रेषु संपातः कथितो हरे |
मूलेन हृदये नैव शिरसा शिखया तथा ||
९८९ कवचेनास्त्र मन्त्रेण एकैकामाहुतिं क्षिपेत् |
एवं संशोध्य दातव्यं पवित्रं गन्धसंज्ञकम् ||
९९० सर्वौषधि समालब्धं मानोन्मान विवर्जितम् |
सामान्यं सर्वदेवानामेकग्रन्थि शतक्रतो ||
९९१ आदित्य द्वारपालादीन्ततो गणपतिं गुरुम् |
अर्चयित्वा पवित्रेण शिवमामन्त्रयेत् सुधीः ||
९९२ गन्ध पवित्रमादाय पुष्पगन्धोपशोभितम् |
आमन्त्रितोसि देवेश सर्वच्छिद्रमच्छिद्रताम् ||
९९३ त्वत्प्रसादात् समभ्ये तु पठित्वा मन्त्रमुच्चरन् |
ब्रह्मादि कारणत्यागाल्लयान्तं सुसमाहितः ||
९९४ समारोप्य ववित्रन्तु पतिपत्यक्षमापयेत् |
वह्नावपि समारोप्य पवित्रं संपुटेत् ततः ||
९९५ अस्त्रं वर्महृदं पात्रे न्यस्त्वा दत्वा पवित्रकम् |
मन्त्रयेत् संहितामन्त्रैर्हृदं वर्मास्त्रकं पुनः ||
९९६ न्यस्त्वा संवेष्ट्यसूत्रेण हृदाभ्यर्च्य समर्पयेत् |
क्रिया समर्पणं कृत्वा क्षपेद्रात्रिं शिवाग्रतः ||
९९७ जपध्यान परो भूत्वा स्तुतिगीतपरोपि वा |
प्रातःकाले समुत्पन्ने कृत्वा चावश्यकादिकम् ||
९९८ स्नात्वा सन्ध्यामुपास्यैव पवित्रमाहरेद् विभोः |
ततो विसर्जयेद् देवमष्टपुष्पा पुरार्चितम् ||
९९९ अथाह्निक द्वयं कृत्वा कुर्यान्नैमित्तिकं हरे |
सूर्यादीनां ततो दत्वा मन्त्रैः स्वैः स्वैर्यथोदितैः ||
१००० आत्मानम्पूजयेच्छक्र पवित्रेण गणं गुरुम् |
विशेषस्नपनोपेतं विस्तरं पूजयेच्छिवम् ||
१००१ विशेषा तर्पयेद्वह्निं दत्वा पूर्णाहुतिन्ततः |
गन्धपुष्पसमोपेतं दूर्वाक्षतसमन्वितम् ||
१००२ पवित्रमादाय देवं ततो विज्ञापयेदिदम् |
सर्वदेह स्थितो देवः सर्वज्ञः सर्वगो विभुः ||
१००३ हीनाधिकं विभो कर्म त्वया दृष्टम्मया कृतम् |
तदनेन पवित्रेण संपूर्णन् त्वत् प्रसादतः ||
१००४ एवं विज्ञाप्य देवेशं पवित्रमधिरोपयेत् |
पवित्रारोपणे शक्र प्रयोगमधुना शृणु ||
१००५ शिवमन्त्रं समुच्चार्यमायान्तत् सुसमाहितः |
आत्मतत्त्वाधिपाय शिवाय तदधिरोपयेत् ||
१००६ भूयो मन्त्रं समुच्चार्य स देशान्तं शतक्रतो |
विद्यातत्वाधिपाय शिवाय तदधि रोपयेत् ||
१००७ पुनर्मन्त्रं समुच्चार्य शक्त्यन्तं पाकशासन |
शिवतत्वाधिपाय शिवाय तदधि रोपयेत् ||
१००८ पश्चान्मन्त्रं समुच्चार्य लयान्तं सुप्रसन्नधीः |
सर्वतत्त्वाधिपाय शिवाय तदधि रोपयेत् ||
१००९ आरोपयेत् पवित्राणि जाति युक्तानि सर्वदा |
अधुना जातिं प्रवक्ष्यामि पवित्रारोपणायते ||
१०१० प्राणान्तामृत संविष्टमालिखेद् वीजमादरात् |
ब्रह्मवर्गद्वितीयेन मूर्द्ध्निभिन्नं यथा भवेत् ||
१०११ अंवरं योजयेत् पश्चाद् द्वितीय स्वरभेदितम् |
जातिरेखा समाख्याता पवित्रारोपणायते ||
१०१२ इत्यारोप्य पवित्राणि अर्घपञ्चसुभूर्द्धसु |
योजयेत् सर्वदा विद्वान् सर्वकामार्थ सिद्धये ||
१०१३ स्थिरबुद्धिं प्रकुर्वीत परमीकरणन्ततः |
पश्चात् कुर्याज्जपं विद्वान् यथा पूर्वमुदाहृतम् ||
१०१४ जपं कृत्वा महावाहो संपुटी कृत्यपूर्ववत् |
निवेदयेत् प्रयोगेण यथा वक्ष्यामि लक्षणम् ||
१०१५ आत्मतत्त्वमधः कृत्वा शिवतत्त्वञ्च कारयेत् |
विद्यातत्त्व प्रभावेण यदा निष्कल गोचरम् ||
१०१६ शिवाय च पदञ्चान्यत् स्वाहान्तं समुदीरयेत् |
जपं निवेदये देवं सर्वकर्मकरं वरम् ||
१०१७ आत्मतत्त्वं विजानीयात् पूरकं सुरनायक |
कुम्भकं शिवतत्त्वञ्च विद्याख्यं रेचकं हरे ||
१०१८ वह्नावपि समारोप्य पवित्रं पूर्ववद् यथा |
वलिना स पवित्रेण रुद्रादीन् पूजयेत् ततः ||
१०१९ स्तुत्वा प्रणम्य नियमं प्रतिज्ञां श्रावयेत् ततः |
चतुर्मासं द्विमासम्वा मासैकं पक्षमेव वा ||
१०२० दशाहं सप्तरात्रम्वा पञ्चाहम्वा दिन त्रयम् |
दिनद्वयमथैकम्वा प्रतिज्ञां कारयेत् सुधीः ||
१०२१ वित्तशाठ्यं विना विद्वान् गुरुं सम्पूजयेदथ |
भोजयेल्लिङ्गिनः पश्चाद् दद्याद् वस्त्रं सदक्षिणम् ||
१०२२ दीनानाथादिकान् सर्वान् तद् दिने भोजयेद्धरे |
रात्रौ महोत्सवः कार्यः शिवाग्रे गीतनर्तनैः ||
१०२३ प्रभाते तु समुत्पन्ने पवित्रं पूर्ववद्धरे |
अवतार्य धारयेद् यत्नात् ततो देवं विसर्जयेत् ||
१०२४ नित्यकर्मोत्तरं शक्र चण्डनाथं प्रपूजयेत् |
पूर्ववन् मन्त्रविन्यासं गन्धधूपस्रगादिभिः ||
१०२५ समारोप्य पवित्रन्तु तन्मन्त्रेणैव देशिकः |
शिवस्य पुष्पधूपादि निर्माल्यं स पवित्रकम् ||
१०२६ अर्पयेच्चण्डनाथस्य क्षमस्वेति वदेत् ततः |
प्रत्यहम्पूजयेद्यस्तु न स पापैः प्रलिप्यते ||
१०२७ हीनम्वाप्यधिकम्वापि यन्मया मोहतः कृतम् |
सर्वन्तदस्तु सम्पूर्णं चण्डनाथतवाज्ञया ||
१०२८ निर्माल्यमपनीयाथ भूमिं संशोध्य यत्नतः |
नद्यां नद ह्रदादौ च निर्माल्यं प्रक्षिपेत् ततः ||
१०२९ नदी सरः समुद्रेषु अन्धकूपनदी ह्रदे |
पञ्चस्थाने ष्वदुष्टं स्यात् सर्वत्रान्यत्र दुष्यति ||
१०३० न गन्तव्यं सहस्राक्ष पवित्रे त्वविसर्जिते |
विसर्जिते तु गन्तव्यं स्वेच्छम्वै यत्र रोचयेत् ||
Sühne, Reinheit und Lebensführung

१०३१ प्रायश्चित्तम्प्रवक्ष्यामि साम्प्रतन्तु शचीपते |
दोषव्यपोहनार्थाय धर्मस्य स्थितये पुनः ||
१०३२ मोहादज्ञानतो वापि अप्रसुप्ते जनार्दने |
पवित्रं कारयेद् यस्तु स पापी पापमोहितः ||
१०३३ पञ्चदिनमनाहारो जप्त्वा पञ्चायुतं हरे |
शुद्धिमेवं समभ्येति नान्यथा तु कदाचन ||
१०३४ भाद्रादूर्द्धं न कुर्वीत सिद्धान्ते दोषभाग् भवेत् |
लक्षद्वयमघोरेण जप्त्वा चैव विशुद्ध्यति ||
१०३५ दैवादज्ञानतो वापि नाषाढादि त्रये कृतम् |
तत्राप्येवं विनिर्देश्यं प्रायश्चित्तं पुरन्दर ||
१०३६ सुशास्त्रे वर्तनन्नित्यं समयाचार पालनम् |
सुपरीक्ष्य प्रकर्तव्यं निषिद्धाचार वर्जनम् ||
१०३७ यथाश्रुतं यथा दृष्टन्निवद्धं गुरुभिर्यथा |
स्वसिद्धान्ता विरोधेन तद्विलंघ्य विलङ्घनम् ||
१०३८ सकृत्सन्ध्या विलोपे तु अजातस्य शतन्जपेत् |
त्रिकाललोपात्त्रिगुणं सोपवासं स कामतः ||
१०३९ एककालार्चने लुप्ते सहस्रं दक्षिणञ्जपेत् |
एककालं द्विकालम्वा त्रिकालं सार्द्धरात्रिकम् ||
१०४० उपवास समोपेतं कर्मलोपे कृते सति |
देवार्थे चैव गुर्वर्थे काललोपेन दोषभाक् ||
१०४१ शास्त्रनिन्दा गुरोर्निन्दा लिङ्गादीनां यत्र वर्तते |
तस्मात् स्थानाद् व्रजेद् दूरं सद्योजातं शतञ्जपेत् ||
१०४२ महापातकसंयुक्ता ये चान्ये पापकर्मिणः |
पतिताश्चाभि शप्ताश्च ते तु वर्ज्याः प्रयत्नतः ||
१०४३ अज्ञानात् सङ्गतिं कृत्वा दक्षिणस्या युतञ्जपेत् |
न लङ्घयेद् गुरोश्छायां न शिवस्य न लिङ्गिनाम् ||
१०४४ त्रिशतं रूपिणा जप्त्वा गोकन्या स द्विजे शतम् |
सहस्राल्लुठिते लिङ्गे वर्तिते द्विगुणाच्छुचिः ||
१०४५ अयुतं त्रिचतुर्लुठिते च्युते श्वभ्रे दशायुतान् |
गड्डूकाद्यभिघाते च द्व्ययुताल्लद्यूतद्दलात् ||
१०४६ स्तुत्यादौ श्लेष्म संस्पर्शे दक्षिणस्या युत त्रयात् |
इष्टलिङ्गे हृतेनष्टे वह्निलीढे प्रमादतः ||
१०४७ जप्त्वा लक्षमघोरेण तद्रूपस्थापनाच्छुचिः |
साधारे पतिते लिङ्गे ताले ताले युतञ्जपेत् ||
१०४८ निराधारे तु द्विगुणं कल्प्यं न्यूनाधिकन्ततः |
अक्षसूत्रापराधे तु उक्तपादञ्चरेद् बुधः ||
१०४९ अविसर्जित पात्रे तु भङ्गे वाथ विवर्तिते |
शतद्वयात् सहस्रान्ते तदर्द्धात् क्रमतः शुचिः ||
१०५० द्विगुणं स्थण्डिले प्राहुः प्रायश्चित्तम्मखाधिप |
निर्वाणे स शिवे वह्नौ त्रिरात्र समुपोषितः ||
१०५१ अयुतं रूपिणां जप्त्वा शुद्धिमिच्छन्त्य संशयः |
रक्षितेपि हि निर्वाणे अहोरात्रमुपोषितः ||
१०५२ सहस्रं वहुरूपेण जप्त्वा शुद्ध्यति साधकः |
पूर्वाह्णं चैव मध्याह्नं समाप्य स्थितये तनौ ||
१०५३ चरेन्माधुकरीं भिक्षां भुक्ति मुक्ति समीहकः |
भिक्षां याचयित्वा तु किञ्चित् स्थित्वान्यतो व्रजेत् ||
१०५४ अनिवर्तितं भ्रमेद् भिक्षां ज्ञात्वा वृत्तञ्च वर्णिनाम् |
स्थितिं बुद्धाश्रमङ्गच्छेच्छुचि स्थाने निधाय च ||
१०५५ मृद्भिः संशोध्य चरणौ करौ क्षाल्या चमेत्ततः |
भस्मस्नानन्ततः कृत्वा मन्त्रकायोद्य कृत् स्मरन् ||
१०५६ अस्त्रं दीप्तोक्तया प्लाव्य प्रोक्ष्यतां त्रिर्विभज्य च |
शिवाय गुरुवे दत्वा भुञ्जीत विधिपूर्वकम् ||
१०५७ आचान्तः पूर्ववत् स्नातः स्मृत्वानत्वा शिवं गुरूम् |
अयाचितैः स्थितिं कुर्यात् स्वधनैर्वा क्रमागतैः ||
१०५८ स्वजाति दीक्षितैः स्पृष्टः स्नात्वा चम्य शतञ्जपेत् |
तस्मिन् न दीक्षिते स्पृष्टे स्नात्वा चम्य शतद्वयम् ||
१०५९ समीप दीक्षिते स्पृष्टे स्नात्वा चम्य शतद्वयम् |
तस्मिन् न दीक्षिते स्पृष्टे सोप वासो जपो मतः ||
१०६० एवं बुद्ध्वा प्रकर्तव्यमितरैः पादवर्जितम् |
पुरुषाघोर वामाजा जातीशा ब्राह्मणादितः ||
१०६१ त्रिरात्रमन्त्यज स्पर्शादं घोरस्या युताच्छुचिः |
स कृच्छ्रं त्र्ययुतं शक्रचण्डाल स्पर्शने दिशेत् ||
१०६२ ज्ञात्वा न्यत्र प्रकर्तव्यं प्रायश्चित्तं सुराधिप |
अन्नाघ्रं मदिरा स्पृष्टं यदि भुङ्क्तेत्व कामतः ||
१०६३ विण्मूत्र रेतसा दुष्टं लीढं वा काककुक्कुरैः |
कपि ग्राह शिवादक्षैर्विड्वराहैश्च दूषितम् ||
१०६४ शूद्रादुच्छिष्टसंपृक्तं पृष्टं वा त्वन्त जातिभिः |
कृत्वा स्नानन्निराहारः पञ्चगव्यं समाचरेत् ||
१०६५ प्रतिसन्ध्यं सहस्रन्तु जपेदघोरं समाहितः |
त्रिदिनन्नक्तभोजी स्यात् त्रिःस्नायी ध्यान तत्परः ||
१०६६ देवमिष्ट्वा चतुर्थेह्नि सहस्रं होमयेत् ततः |
उपवासस्तथा नक्तं पञ्चगव्यं विशुद्धये ||
१०६७ क्षत्रिये ध्यान निष्ठे तु शुद्धिमेवं विनिर्दिशेत् |
त्रिकालात् प्लवनं वैश्य सकृच्छूद्रे विनिर्दिशेत् ||
१०६८ अकामाद् द्विगुणं कामात् सर्वेषां परिकीर्तितम् |
गृञ्जनालावुलशुनं पलाण्डुकवकानि च ||
१०६९ अमेद्ध्योद्भवमांसं भुक्ता स्यान् निरसनस्त्र्यहम् |
मत्स्यकण्टक साम्वूक नखञ्चैव कपर्दिका ||
१०७० पीत्वा नवोदकं मन्त्री पञ्चगव्योप वासकम् |
कृमिकीटाभिसंपृक्तं भुक्ता कान्तेन शुद्ध्यति ||
१०७१ मक्षिका कीटकेशैस्तु दुष्टं त्यक्ताल्प मोदनम् |
भस्म संस्पृश्य संप्रोक्ष्य शेषं भोज्यन्न दुष्यति ||
१०७२ पीतशेषन्तु यत्तोयं प्रमादाद्यदि तत् पिवेत् |
उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ||
१०७३ पिवन्तोयं पतत्पन्ने तदन्नं योन्ति मोहितः |
सहस्रं रूपिणी जप्त्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ||
१०७४ भुञ्जानस्य गुदस्रावे उच्छिष्टस्येन्द्रिय शुर्ते |
आदौ शौचन्ततः स्नानमाचान्तः पुनराचमेत् ||
१०७५ सहस्रं रूपिणा जप्त्वा सोप वासो विशुद्ध्यति |
अनाचान्तः पिवेत् तोयं भक्षयेद् वाथ मूत्रयेत् ||
१०७६ अजप्त्वाघोरं विनाहारः पञ्चगव्येन शुद्ध्यति |
अधोच्छिष्टो यदा मन्त्री विष्टामद्यादि नाहतः ||
१०७७ स्नात्वो पोष्य जपेद् घोरं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति |
विना यज्ञोपवीतेन पिवति भुङ्क्ते यदा नरः ||
१०७८ पञ्चगव्य निराहारो जप्त्वा घोरं विशुद्ध्यति |
उच्छिष्टस्तु यदा स्पृष्ट उच्छिष्टैर्वेणुकादिभिः ||
१०७९ स्नानं शौच निराहारः पञ्चगव्य जपाच्छुचिः |
घोषार्करुक्मरौप्याणां वङ्गसीसकयोरपि ||
१०८० भस्माम्लवारिणा शुद्धिर्निर्लयं स्याद् यदा हरे |
शङ्खशाम्वूक शुक्तीनां तेजसवच्छुद्धिरिष्यते ||
१०८१ क्वथितं शुद्ध्यते क्षीरं दधि शुद्धिर्निगद्यते |
दधिपात्रान्तरे धृत्वा वीक्षयेत् तदनन्तरम् ||
१०८२ अन्नादि लेपनिर्मुक्तं प्रोक्षणाच्छुद्ध्यते दधि |
सुतप्तस्य श्रुतस्याथ शुद्धिराज्यस्य कीर्तिता ||
१०८३ एवम्मधुगुडादीनाम् प्रोक्षणादग्नि योगतः |
स तृणा चैव स क्षोदा सोच्छिष्टा तु स लेपिका ||
१०८४ सतृणा प्रोक्षणाच्छुद्धा सक्षोदामार्जनाधिका |
सोच्छिष्टा गोमयोद्वृष्टा पूर्वसंस्कार शोधिता ||
१०८५ स लेपान्तक्षितां कृत्वा घृष्ट्वा गोमय वारिणा |
मार्जयेत् प्रोक्षयेत् पश्चाद् भूमि शुद्धिरुदाहृता ||
१०८६ अन्यच्छुद्ध्यन्तरं वक्ष्ये समासात् पाकशासन |
सुस्नातश्च समाचन्तः शुद्धवासाः शुचिः पुमान् ||
१०८७ पितृदेवोपयुक्तानाम् प्रत्यहं शौचमिष्यते |
त्यागे परिधान वस्त्राणां प्रावरणस्य मलागमे ||
१०८८ रजक क्षालितं वस्त्रं पुनर्द्धौतं विशुद्ध्यति |
वर्मणां रज्जु वस्त्राणां शुद्धिः स्यात् क्षार वारिणा ||
१०८९ कौशेयाविकयोरुषैः क्षौमाणां गौरसर्षपैः |
श्रीफलैरंशु पट्टानां कुतपानामरिष्टकैः ||
१०९० तृणकाष्ठादिकं सर्वं प्रोक्षणाच्छुद्धिमेति हि |
शुद्धानां संहतानान्तु प्रोक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ||
१०९१ संहतानां वहूनान्तु यद्यल्लेपेन दूषितम् |
तत्तत्त्यक्ता तृणादीनां शोधयेत् स्याद् यथा शुचिः ||
१०९२ कारूहस्ताकरं द्रव्यं शुद्धं पुण्यं प्रसारितम् |
फलानां क्षालनाच्छुद्धिर्विनादोषं पुरन्दर ||
१०९३ दशाहाच्छुद्ध्यते विप्रो द्वादशाहेन भूमिपः |
वैश्यः पञ्चदशाहेन शुद्धिः शूद्रस्य मासिका ||
१०९४ अनुष्ठान विहीनानां याति मात्रात् पुरन्दर |
वेदवेदाङ्ग सम्पन्नस्त्वाहिताग्निस्तु स द्विजः ||
१०९५ शुद्ध्यते तत्क्षणात् स्नानाज्ज्ञात्वान्यत्र प्रकल्पयेत् |
अमद्यपाः कुलीनाश्च नित्यं धर्मपरायणाः ||
१०९६ शूद्राः शुद्ध्यन्ति पक्षेण नात्र कार्या विचारणा |
उद्वाहिताश्च तस्रो वै ब्राह्मणेन यदास्त्रियः ||
१०९७ सूतकन्तु क्रमात् तासां दशषट् द्व्येक वासरम् |
शवेन शुद्ध्यते वृद्धिर्न वृद्ध्या शुद्ध्यते शवः ||
१०९८ सर्वेषां वृद्धि वद्धानौ प्रवेश्यां नास्ति सूतकम् |
नृपाणां कारुकाणाञ्च दासीनाञ्च सूतकम् ||
१०९९ मृतके तु पृथक् पाकं कुर्याद् योगं नतैः सह |
त्यक्तुं न चेदसौ याति तदा शुद्धिर्भवे त्र्यहात् ||
११०० संसनात् पूर्ण गर्भस्य स्नाना देव विशुद्ध्यति |
जीवन्यातो यदि श्रेयान् मृतो वा जायते यदि ||
११०१ शावाशौचं न कर्तव्यं सूतीशौचं समारभेत् |
आनामकरणात् सद्य एकाहो दन्त जन्मनः ||
११०२ चूडायास्त्रिदिनम्प्रोक्तं तत्राग्न्यधिकमव्रतात् |
अतोर्द्ध्वं पूर्वच्छुद्धिः सर्ववर्णेष्वियं स्थितिः ||
११०३ अहस्त्वदन्त कन्याया दन्ताया द्विदिनम् भवेत् |
खभ्रादिषु च विज्ञेयं मातुलान् पाञ्च मातुले ||
११०४ देशान्तरे पृथक् पिण्डे स्नानं स्यात् तद्गुरुम्विना |
पशुत्वं संस्कृतं येषां सम्यग् निर्वाण दीक्षया ||
११०५ तस्य सम्पर्क शून्यस्य न स्यातां मृतसूतके |
अतश्च परतो देवः सम्पूज्यः सूतके सति ||
११०६ परान्नभोजना नित्यं परान्नद्रविण क्रियः |
गृहस्थः सर्वकर्माणि नित्यादन्यानि वर्जयेत् ||
११०७ द्रव्यैः सङ्कल्पितैः पूर्वं सूतकान् मृतकादपि |
धर्मार्थ दीक्षितैः पूजा कार्या चोत्पादितैस्तथा ||
११०८ पृथक्पाकं विनापुंभिर्लोकदीक्षानुसारिभिः |
अन्तर्यागः प्रकर्तव्यो जपः स्नानादिकाः क्रियाः ||
११०९ प्रायश्चित्तं समादेश्यमन्यथा निश्चिता स्थितिम् |
एवं हि वर्त्तमानस्य त्रिधा सिद्धिर्न दूरतः ||
१११० दुःस्वप्न दर्शने स्नानं रेतोत्सर्गे शतक्रतो |
अघोराष्ट शतञ्जाप्यन्तथा संभाष्य चाधमम् ||
११११ अद्भिः संशुद्ध्यते गात्रं सलेपन्तन्मृदाम्बुभिः |
देवचण्डगुरोर्द्रव्यं भक्षितं यद्य कामतः ||
१११२ लक्षपादन्तदादेयाद् द्विगुणन्नैष्ठिके मतम् |
अथाक्रम्य तु निर्माल्यञ्जपेत् पञ्चशतानि तु ||
१११३ त्रिगुणङ्कामतो ज्ञेयं पञ्चगव्यसमन्वितम् |
यन्निर्माल्ये न संस्पृष्टन्तदाहारोपजीविना ||
१११४ अष्टांशोनन्तु निर्माल्यं दानलङ्घन भक्षणात् |
लङ्घयेद् यस्तु निर्माल्यं दद्याद ज्ञानतोपि वा ||
१११५ गुणायुतञ्जपेद् घोरं तथा पोष्य विशुद्ध्यति |
निर्माल्य स्पर्शने त्याज्यं पुण्यद्रव्यन्तथौषधम् ||
१११६ स विकारं पयस्तोयन्तथेक्षु हिङ्गुजीरकम् |
सैन्धवाद्यं स कर्पूरं कटुकाद्यं स तण्डुलम् ||
१११७ घृष्टं स चन्दनं भस्म वेणुमृण्मय दारवम् |
सर्वं त्याज्य समुद्दिष्टं धान्याद्यं प्रोक्षितं शुचि ||
१११८ एवमन्यत्र वोद्धव्यं ज्ञात्वा द्रव्य वलावलम् |
शोधयेत् सर्वदा धीमान शुद्धे वन्धनं ध्रुवम् ||
१११९ हुतं यस्यापवर्गेच्छा स शुद्धौ कृत निश्चयः |
शुद्धि निष्ठ प्रतिष्ठस्य सिद्धिमुक्ती न दूरतः ||
Rücksicht auf die Kräfte des Menschen
११२० अशीतिर्यस्य वर्षाणि वालो वाप्यू न षोडशः |
प्रायश्चित्तार्द्धमर्हन्ति स्त्रियो व्याध्यादि पीडिताः ||
११२१ तत्रापि च परिक्लेशं ज्ञात्वार्द्धार्द्धम् प्रकल्पयेत् |
सुदुष्करं स्वयङ्कर्तुमक्षमाद् द्विगुणोन्यतः ||
११२२ दशोर्द्धं त्रिशतं यावज्जपात् स्नानेन शुद्ध्यति |
स नक्तम्पञ्चमं यावत् सोपवासन्तदूर्द्ध्वतः ||
११२३ तत्त्रिधायुत सञ्जापे तद्वृद्ध्याद्विगुणन्ततः |
तदर्द्धेन तु संयोगी तस्याप्यर्द्धन्तु शङ्करे ||
११२४ देशं कालं वयः शक्तिञ्जाति भक्तिङ्क्रियाक्रमम् |
सुविचार्य प्रदातव्यं नोपवासोरुगन्विते ||
११२५ शिवार्पितैक चित्तानां सुवृत्तानाम् पुरन्दर |
प्रायश्चित्तं समाख्यातं नोकुवृत्ति स्थितात्मनाम् ||
Abschluss der Unterweisung
११२६ सप्तकोटि प्रविस्तीर्णान् मोहचूरान्मया तव |
व्याख्यातं सारमादाय लक्षग्रन्थेन सुव्रत ||
११२७ पुनः पृष्टः समासेन त्वयाहं सुरनायक |
तदाख्यातन्तदर्द्धेन मोहचूरम्मयाहरे ||
११२८ सिद्धिसारसहस्रैस्तु युग्मचन्द्रैस्तदन्ततः |
योगज्ञानादि संयुक्तं व्याख्यातं शास्त्रमुत्तमम् ||
११२९ सुसंक्षेपं सुगम्भीरम् प्रतिष्ठा तन्त्रमुत्तमम् |
चतुर्गोचर सम्बद्धं भूयः ख्यातन्तदन्तरम् ||
११३० न देयं दुष्टसत्वानां निन्दातर्कानु वर्तिनाम् |
गुरुदेव द्विषां शक्र देशिकादि द्विषान्तथा ||
११३१ एते चान्ये च ये केचिद् दुष्टसत्वाः पुरन्दर |
तेषां शास्त्रं सदारक्ष्यम् प्रायश्चित्तमतो न्यथा ||
११३२ गुरुदेवाग्नि भक्ताय श्रद्दधानाय सुव्रत |
तस्मै देयमिदं शास्त्रमित्याह भगवाञ्छिवः ||
११३३ इत्याग्ने ये महातन्त्रे प्रतिष्ठा तन्त्रं मोहचूडोत्तरम् |
सम्पूर्णम् || शुभम् || शिवम्भूयात् ||
Abschreibervermerk
११३४ सम्वत् ६०६ फाल्गुनवदि १० भौमे श्रीमद्भोगलेसरमठावस्थित पण्डिताचार्यभट्टारक श्रीसर्वगणेन पुस्तकं लिखितमिति पुष्पिकान्तलेखयुतस्य प्राचीनदेवाक्षरलिपिमयस्य प्राचीनताडपत्र पुस्तकस्याधारेण १९८२ वैक्रमवर्षे ज्येष्ठमासे श्रीमहाराजाधिराज त्रिभुवनवीरविक्रमशाह देवविजयराज्ये प्रधान सचिव श्री ३ महाराजचन्द्रसंशेरजङ्गराणा प्रतिपालिते नेपालदेशे काष्ठमण्डपराजधान्यां श्रीमद्राजगुरुमान्यवर हेमराज विद्वद्वरैर्गणेशदत्तशर्म द्वारा लिखितमिदं पुस्तकम् ||
११३५ अस्याधारभूतस्य ताडपत्र पुस्तकस्य प्राचीनतया तत्प्रतिलिपी कृतस्य पुस्तकान्तरस्यापि त्रिशताब्दपूर्वप्राचीनता दर्शनेन तदुल्लिखित ८०६ सम्वत्सरो नेपालसम्वत्सराद्भिन्नो वैक्रमादिः संभाव्यते ||
Siehe auch
- Mohacurottara
- Mohacurottara 108 Verse und Mantras
- Devanagari, Sanskrit, Mantra, Lingam, Shiva, Shakti
- Kirana Tantra, Kamika Agama, Raurava Agama
Seminare
Sanskrit und Devanagari
- 06.01.2027 - 15.12.2027 Jahresgruppe Sanskrit - Lektüre der AMRITA SIDDHI 2 - online
Termine: 16x mittwochs: 06.01., 27.01., 17.02., 10.03., 31.03., 21.04., 12.05., 02.06., 23.06., 14.07., 08.09., 29.09., 20.10., 10.11., 01.12., 15.12.20…- Dr phil Oliver Hahn
- 09.04.2027 - 11.04.2027 Sanskrit Intensivwochenende
Du bist fasziniert vom Klang des Sanskrit und der tiefgehenden Wirkung der Wörter dieser uralten Sprache? Hast bereits Übersetzungen von Mantras oder …- Dr phil Oliver Hahn
Indische Schriften
- 26.12.2026 - 02.01.2027 Indische Rituale Ausbildung
Du interessierst dich für indische Rituale? Du hast die einzigartige Gelegenheit, in dieser Rituale Ausbildung bei Yoga Vidya die kleine Puja, große P…- Sukadev Bretz, Shankari Winkelbauer
- 01.01.2027 - 10.01.2027 Yogalehrer Weiterbildung Intensiv A1 - Jnana Yoga und Vedanta
Kompakte, vielseitige Weiterbildung für Yogalehrer rund um Jnana Yoga und Vedanta.
Tauche tief ein ins Jnana Yoga und Vedanta, studiere die indischen S…- Vedamurti Dr Olaf Schönert
Textgrundlage
Muktabodha Indological Research Institute: Mohacūḍottara, M00304, Devanagari-Fassung, Revisionsdatum 11. Februar 2014; erfasst unter Leitung von Mark S. G. Dyczkowski. Handschriftennachweis: NGMCP 5-1977, Film A 182/2. Wiedergegeben ist der gesamte vorhandene Sanskritbestand einschließlich der beschädigten Stellen und des Abschreibervermerks. Die 1.135 Referenznummern stammen aus dieser Ausgabe. An vier Stellen (486, 533, 554, 634) weicht die Devanagari-Schreibung geringfügig von der IAST-Fassung ab; ferner betrifft eine Abweichung die Zeichen in 291. Erläuterungen stehen unter Textgrundlage und Hinweise zur Übersetzung.
Die Sanskrittranskription steht nach dem Quellenvermerk unter Creative Commons BY-NC 4.0, Muktabodha Indological Research Institute. Hinzugefügt sind Einführung, Gliederung, Referenzzählung und Wiki-Formatierung; der Sanskrittext behält die angegebene Quellenlizenz.